श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “रिश्तों की धूप छांव।)

?अभी अभी # 456 ⇒ रिश्तों की धूप छांव? श्री प्रदीप शर्मा  ?

यहां कौन है तेरा,

मुसाफिर जायेगा कहां

दम ले ले घड़ी भर,

ये छैयाँ पायेगा कहां ..

हमें छाँव की आवश्यकता तब ही होती है, जब सर पर तपती धूप होती है, और पांव के नीचे पिघलता पत्थर, लेकिन अगर रास्ता ही बर्फीला हो, और कहीं सूरज का नामो निशान ही ना हो, तो हमारी गर्म सांसें भी जवाब दे जाती है, और बस बाकी रह जाती है, एक उम्मीद की किरण।

रिश्ते हमारी जिंदगी की धूप छांव हैं, रिश्ता उम्मीद का एक ऐसा छाता है, जो बारिश में भी हमारे सर को भीगने से बचाता है, और धूप में भी सूरज की तपती धूप में हमें छांव प्रदान करता है। लेकिन जब समय की आंधी चलती है, तो ना तो सर के ऊपर का छाता साथ देता है और ना ही अपना खुद का साया। ।

पैदा होते ही, हम रिश्तों में ही तो सांस लेते हैं, और पल बढ़कर बड़े होते हैं।

लेकिन बदलते वक्त के साथ अगर इन रिश्तों से आती खुशबू गायब हो जाए, रंग बिरंगे फूल अगर कागज के फूल निकल जाएं, तो एक प्यार के रिश्तों का प्यासा, इन कागज़ के फूलों को देखकर सिर्फ यही तो कह सकता है ;

देखी जमाने की यारी

बिछड़े सभी बारी बारी

क्या ले के मिलें

अब दुनिया से,

आँसू के सिवा

कुछ पास नहीं।

या फूल ही फूल थे दामन में,

या काँटों की भी आस नहीं।

मतलब की दुनिया है सारी

बिछड़े सभी, बिछड़े सभी बारी बारी

वक़्त है महरबां, आरज़ू है जवां

फ़िक्र कल की करें, इतनी फ़ुर्सत कहाँ…

मरने जीने से रिश्ता नहीं मर जाता, लेकिन जब इंसानियत मर जाती है, तो सारे रिश्ते भी दफ़्न हो जाते हैं। ।

साहिर एक तल्ख़ शायर था। शौखियों में फूलों के शबाब को घोलने का हुनर उसके पास नहीं था। उसकी तो ज़ुबां भी कड़वी थी और शराब भी और शायद इसीलिए गुरुदत्त जैसा संजीदा कलाकार हमारी इस नकली दुनिया में ज्यादा सांस नहीं ले सका।

होते हैं कुछ लोग, जो अकेले ही खुली सड़क पर सीना ताने निकल पड़ते हैं, फिर चाहे साथी और मंजिल का कोई ठिकाना ना हो। जो मिल गया उसे मुकद्दर बना लिया और जो खो गया, मैं उसको भुलाता चला गया। ।

काश सब कुछ भुलाना इतना आसान हो। काश हमारे रिश्ते किसी ऐसे फूलों के गुलदस्ते के समान हो, जो कभी मुरझाए ना। काश पुराने रिश्तों का भी नवीनीकरण हो पाता, कुछ निष्क्रिय रिश्तों में फिर से जान आ जाती, तो यह जिंदगी जीने लायक रह जाती। रिश्तों को ढोया नहीं, लादा नहीं जाए, उनको प्रेम की चाशनी में भिगोया जाए, धो पोंछकर चमकाया जाए। मतलब और स्वार्थ के नये रिश्तों में वह चमक, दमक कहां।

Old is gold…..!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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