श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव 

गोरखपुर, उत्तरप्रदेश से श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव जी एक प्रेरणादायक महिला हैं, जिन्होंने अपनी लेखनी से समाज में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उन्हें 2024 में अंतरराष्ट्रीय महिला सम्मान से नवाजा गया। उनके द्वारा संवाद टीवी पर फाग प्रसारण प्रस्तुत किया गया और विभिन्न राज्यों के प्रमुख अखबारों व पत्रिकाओं में उनकी कविता, कहानी और आलेख प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी लेखनी में समाज के प्रति संवेदनशीलता और सृजनात्मकता का सुंदर संगम देखने को मिलता है।

☆ आलेख ☆ || अवसाद / तनाव / डिप्रेशन || ☆ श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव ☆

“तुम ने कहा नहीं

फिर भी मैं सुनना चाहती हूँ

कोई प्रेम पे काव्य नहीं ना ही किसी दूसरे के द्वारा बल्कि मैं वह सारी बातें तुम से सुनना चाहती हूँ”

मन के अतंस में अक्सर अपने जीवन साथी से बस दो पल और दो बातें को तरस जाती स्त्रियों चुप्पी साधे निहारती रहतीं है उन्हे सांत्वना या दु:ख नहीं होता बल्कि घुटन होती है वह अपने जीवन साथी से बहुत कुछ कहना चाहती है, सुनना चाहती हैं लेकिन शायद उसके पति के पास इस सब के लिए वक़्त होता है और अगर वक़्त नहीं होता है तो केवल पत्नी के लिए नहीं होता।

ना जाने कितनी स्त्रियाँ अजीब सी जिदंगी जीने पे मजबूर हैं, जो कहती नहीं लेकिन जी रहीं हैं। इस रिश्तों में पति-पत्नी एक छत के नीचे बैठते उठते हैं लेकिन बातें बस औपचारिकतावश करते हैं। उनके लिए बच्चे एक प्राथमिकता हैं जो उन्हें जोड़कर रखे हैं  समाज में सुखी कपल्स दिखते हैं, जबकि उनका रिश्ता बिलकुल उस पेड़ के जैसे होता है जो अंदर ही अंदर खोखला हो चुका होता है।

यह अलगाव ज्यादातर संयुक्त परिवार में नज़र आ रहा है। कारण है पति पत्नी को खुद के लिए वक़्त ना मिलना। पत्नी का घर के कार्य में व्यस्त और पति चाकरी में। दोनों साथ होकर भी साथ नहीं होते। परिवार में आपसी तालमेल नहीं होने के कारण दोनों के रिश्तों में तनाव उभरने लगता है। कुछ रिश्ते बच्चों के लिए बचा लेते हैं, तो कुछ तलाक़ लेकर अलग अलग हो जाते हैं।

समाज को दिखावे के लिए कुछ कपल्स जोड़ी चुपचाप साथ रहते हैं और अवसाद तनाव झेलते है, कुछ तनाव में आकर सुसाइड तक कर लेते हैं।

इस सब के पीछे बस एक ही कारण है ‘पति पत्नी के रिश्तों में वक़्त की कमी’।

मैं यह नहीं कह रही कि आप पत्नी या पति को की-रिंग बना कर घुमाये लेकिन आत्मिक सुख चैन शांति संवाद जरूर बनाकर रखें।

अपनी जीवनसंगिनी को संयुक्त परिवार के साथ सास-ससुर के घर में नहीं बल्कि अपने हृदय में रखने की कोशिश करें ताकि आप की पत्नी आपके साथ साथ आपके घर में निवास करे।

अरे पत्नी को समझने के लिए उसके पति को ज्यादा कुछ नहीं बस एक स्नेह भरा स्पर्श देते हुए एक वाक्य कहना पड़ता है ‘पगली मैं हूँ न तेरे साथ’।

बस यही एक वाक्य पति पत्नी के रिश्तों को अटूट विश्वास प्रेम में बांधकर जिंदा रहने के लिए मजबूर कर देता है।

वक्त रहते अगर संभाल सकते हैं तो संभाल लीजिए वरना तस्वीरें संभालने में देर नही लगती।

© श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव

गोरखपुर, उत्तरप्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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