श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “स्पेशल।)

?अभी अभी # 710 ⇒ स्पेशल ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

आज का विषय कुछ स्पेशल है, इसलिए इस अभी अभी के शीर्षक के लिए असाधारण, विशेष, विशिष्ट, अथवा खास शब्दों की जगह इस अंग्रेजी शब्द का सहारा लिया गया है।

सबसे पहले, यह शब्द स्पेशल क्यों है ! जब भी बाज़ार में कहीं दोस्तों के साथ चाय पीने जाते हैं, और जब चाय वाले को कहते हैं, कि यार बढ़िया चाय पिलाओ, तो वह स्पेशल चाय ही पिलाता है। अदरक, इलायची, सौंठ, दालचीनी और न जाने क्या क्या। नमकीन की दुकान हो या मिठाई की, सबसे पहले नजर किसी स्पेशल आइटम पर ही जाती है। साड़ियों की खरीद हो या आभूषण की, कुछ खास, स्पेशल डिज़ाइन की ही फरमाइश की जाती है। अखबारों के पृष्ठ स्पेशल ऑफर के इश्तहारों से भरे रहते हैं। स्पेशल डिस्काउंट पर किसकी नजर नहीं होती।

किसी के चेहरे की मुस्कुराहट से पता चल जाता है, समथिंग स्पेशल ?

बच्चे सभी स्पेशल होते हैं। और अगर उसमें भी बच्चा हमारा होता है, तो वह स्पेशल होता ही है, लेकिन भगवान कुछ बच्चों को स्पेशल बनाता है, इतना स्पेशल, कि उन्हें स्पेशल चाइल्ड कहा जाता है। आज का अभी अभी हर उस स्पेशल चाइल्ड को समर्पित है। हम जब भी अपने आसपास के संसार से रूबरू होते हैं, तो अपने परिचितों, रिश्तेदारों और आत्मीय परिजनों में इन फरिश्तों की उपस्थिति का हमें अहसास ही नहीं, प्रत्यक्ष अनुभव भी होता है।

जिंदगी के रंग कई रे ! जिसने हमें यह खूबसूरत जिंदगी दी है, हमें जीता जागता, वन पीस बनाया है, हम कब उसके शुक्रगुजार हुए हैं। आपकी इस सुंदर काया को बनाने में उसने कोई कमी नहीं छोड़ी। अच्छे भले नाक नक्श, आंख, नाक, कान, गला, हाथ पांव, पूरी anatomy और physiology, तेज तर्रार दिमाग और एक धड़कता हुआ दिल। हमने कब उसे शुक्रिया कहा।

आपने सब कुछ अपने पुरुषार्थ से हासिल किया है। किसी ने हम पर कोई अहसान नहीं किया। अहं‌ ब्रह्मास्मि।।

अगर वह जन्म से ही आपको दो की जगह एक आँख देता, या एक कान देता, तो आप क्या कर लेते। आपका एक सामान्य, साधारण इंसान होना ही सबसे बड़ा चमत्कार है। हमारी निगाह अक्सर अभावों पर ही जाती है, जो हमें मिला है, उस पर नहीं।

स्पेशल चाइल्ड वे होते हैं, जिन्हें वह सब नहीं मिला, जो हमें मिला है। बच्चों के शारीरिक विकास के साथ साथ ही उनका मानसिक विकास भी होता है। जब किसी कारण दोनों का विकास साथ साथ नहीं हो पाता, तब इस विसंगति का पता चलता है।।

अगर स्पेशल चाइल्ड है, तो उसकी देखभाल भी स्पेशल ही होती है। उनको अलग से ध्यान देना पड़ता है। उनके मन की भाषा को समझना पड़ता है। वे बड़े तो होते जाते हैं लेकिन उनका औसत मानसिक विकास नहीं हो पाता। उनका बाल मन उनका साथ नहीं छोड़ता। जिन बच्चों में हम ईश्वर को देखते हैं, वह ईश्वर इस स्पेशल चाइल्ड का कभी साथ नहीं छोड़ता। इन बच्चों की सेवा ही ईश्वर की सेवा बन जाती है।

दुनिया में रहते हुए भी ये स्पेशल चाइल्ड दुनिया से दूर रहते हैं। उनकी अपनी एक दुनिया होती है, जिसमें सिर्फ वे ही लोग होते हैं, जो उनके करीबी होते हैं। ये लोग बनावटी जिंदगी नहीं जी सकते। छल कपट, राग द्वेष और गला काट स्पर्था से इनका वास्ता ही नहीं पड़ता, इसलिए इनका भोलापन कायम रहता है। जो इस पाखंडी, खुदगर्ज, स्वार्थी दुनिया से जितना दूर है, वह उतना ही अपने अन्तर में स्थापित है। एक स्पेशल चाइल्ड की दुनिया में प्रवेश पाना एक ऐसे अनूठे, अद्भुत संसार में प्रवेश पाना है, जहां कोई महत्वाकांक्षा नहीं, कोई प्रतियोगी नहीं, कोई शत्रु नहीं, किसी तरह के झूठ का सहारा नहीं, कोई आडंबर नहीं, कोई दिखावा नहीं।।

ये असहज तब होते हैं, जब इनकी सहजता में विघ्न पड़ता है। विज्ञान कितनी भी प्रगति कर ले, इतने मनोवैज्ञानिक और मनोचिकित्सक भी अब तक न तो मन की थाह ही पा पाए, ना ही जन्म के समय से विकसित किसी विसंगति का इलाज ही कर पाए।

जिस तरह विज्ञान ने पोलियो पर विजय पाई है, कैंसर और पैरालिसिस का समय रहते निदान संभव हुआ है, इन बच्चों को भी स्पेशल की जगह हमारी तरह साधारण जीवन का अनुभव हो, बस इनकी अच्छाइयां हमसे दूर ना हों, हमारी बुराइयों का इनमें प्रवेश ना हो। आमीन।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares
0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments