प्रो. नव संगीत सिंह

☆ लघुकथा ☆ अपशब्द प्रो. नव संगीत सिंह

यूं ही बातें करते-करते वह ऊंची आवाज में बोलने लगा – “अरे भाई, क्या हाल है, रिटायरमेंट के बाद… आजकल क्या कर रहे हो… तुम्हारे तो सारे दांत टूट गए हैं, देखो – मेरे सारे दांत पूरे हैं… बाल डाई करते हो क्या? देखो, मेरे सारे बाल सफेद हो गए हैं… बहुत पतले हो गए हैं, मैं तुमसे दस साल बड़ा हूं… फिर भी स्वस्थ दिखता हूं…” और मैं ‘हां-हां’ कहता रहा और उसे टालता रहा। लेकिन वह सोच रहा था कि मैं प्रतिक्रिया क्यों नहीं करता? कई अन्य अजीबोगरीब बातें करने के बाद उसने कहा, “क्या आप कभी अमेरिका गए हैं? वहां बहुत सारी सुविधाएं हैं। भारत में क्या है? समय की बर्बादी…। कभी आइए वहां मेरे पास…विदेशी शराब, अंग्रेजी कल्चर, झीलें, समुद्र, दृश्य, और भी बहुत कुछ है…”

उसने मुझे उत्तेजित करने की बहुत कोशिश की, लेकिन वह सफल नहीं हो सका। वो बेचारा हाथ मलता ही रह गया, इस उम्मीद में कि शिकार आएगा, लेकिन मैं उसके जाल में नहीं फंसा। आज मुझे अपने पिता के शब्द सच लगे – ‘एक चुप सौ सुख।’ अगर मैं भी उसकी बातों पर प्रतिक्रिया देने लगता तो बात ‘तू-तू मैं-मैं’ से होती हुई बहुत आगे बढ़ जाती। फिर बाबा फ़रीद जी की ये पंक्तियां दोहराने से क्या फायदा – “फ़रीदा, बुरे दा भला कर, गुस्सा मन न हडाए। देही रोग न लगई, पलै सब किछ पाए।” आज मैंने बाबा फ़रीद के श्लोकों को असली रूप से जाना। इससे पहले मैं इन्हें केवल पढ़कर ही बात खत्म कर देता था। मुझे उनकी शिक्षाओं और श्लोकों का पालन करने पर गर्व महसूस हुआ।

© प्रो. नव संगीत सिंह

संपर्क – # १, लता ग्रीन एन्क्लेव पटियाला-१४७००२ (पंजाब)

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares
3 1 vote
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

1 Comment
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments
नरेंद्र कौर छाबड़ा
0

शिक्षाप्रद सुंदर प्रस्तुति