श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी गद्य क्षणिका – “वृद्धाश्रम…“।)
अभी अभी # 725 ⇒ वृद्धाश्रम
श्री प्रदीप शर्मा
मनु महाराज के चार वर्ण घोर कलयुग में शीर्षासन कर रहे हैं। अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष पर आधारित चार आश्रम ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यास में वृद्धाश्रम का कहीं नामो निशान ही नहीं है।
किसी ने ठीक ही कहा है। आवश्यकता आविष्कार की जननी है। सौ बरस की ज़िंदगी को अपने हिसाब से चार आश्रमों में बांट देना, आज के युग में कहां की समझदारी है। सह शिक्षा में २५ वर्ष तक कठोर ब्रह्मचर्य का पालन, कहीं बाल विवाह तो कहीं पढ़ने लिखने और नौकरी की तलाश ही में लाखों का सावन चला जाता है। आंखों पर चश्मा चढ़ जाता है, फिर भी घोड़ी चढ़ना नसीब नहीं होता आज की पीढ़ी को। कहीं अटल जी का आदर्श तो कहीं मोदीजी का राष्ट्र सेवा का संकल्प गृहस्थाश्रम की नींव कमजोर करता प्रतीत होता है।।
अब अगर २५ वर्ष की उम्र में गृहस्थाश्रम में प्रवेश ले भी लिया तो शादी, नौकरी, बाल बच्चे, और मकान बनाने के बाद लड़कियों के हाथ पीले करने में ही बाल सफेद हो जाते हैं। कहीं रिटायरमेंट ६० का, तो कहीं ६२ का, अगर प्रोफेसरी कर ली, तो ६५ तक अटके रहो। बी पी, शुगर, कोलेस्ट्रॉल के बाद अब वानप्रस्थ के लिए क्या बचा। बाबा जी का ठुल्लू !
वानप्रस्थ क्षत्रियों के लिए वंशवाद का एक आदर्श उदाहरण है। गृहस्थाश्रम के २५ वर्षों में राज भी कर लो, आठ दस पटरानियों से विवाह कर बच्चों की पलटन खड़ी कर, खुद ५० होते ही वानप्रस्थ के लिए निकल लो। आपके पीछे लूटपाट हो या खून खराबा, पूजा पाठ से अपना परलोक सुधारो। आज की तरह नहीं, कि बेटे बहू का घर में राज और माता पिता वृद्धाश्रम चले आज।।
कहने को तो हर सिक्के के दो पहलू होते हैं, लेकिन वृद्धाश्रम का उजला पक्ष अभी तक अंधकार में ही है। क्या यह पीढ़ियों का टकराव है या फिर नई पीढ़ी का स्वार्थ और खुदगर्ज़ी। क्या इसके लिए एक ही पीढ़ी दोषी है अथवा इसके कुछ मनोवैज्ञानिक और सामाजिक कारण भी हैं। सुना है पूर्व चुनाव आयुक्त टी एन शेषन आखरी समय तक सपत्नीक वृद्धाश्रम में ही रहे। उन्हें भूल जाने की बीमारी हो गई थी। कई मानवीय पहलू हैं इस समस्या के, जिनका हल अभी समाज को ढूंढना है।
न जाने क्यों, वृद्धाश्रम को एक सकारात्मक स्थान नहीं माना जाता। ऐसी मान्यता है कि वहां केवल प्रताड़ित माता पिता ही रहते हैं। औलाद ने या तो मकानों पर कब्जा कर लिया है अथवा सब कुछ अपने नाम कर खुद विदेश चले गए हैं और माता पिता को वृद्धाश्रम में छोड़ गए हैं। जिनकी असहाय की कोई औलाद नहीं होती, ऐसे प्रौढ़ भी वृद्धाश्रम में देखे जा सकते हैं।
विधवाओं की स्थिति देखना हो तो कभी वृंदावन चले जाएं। उनके निमित्त कुछ दान दक्षिणा कर आएं, थोड़ा पुण्य थोड़ा आशीर्वाद कमाएं।।
अगर आदमी थोड़ा पढ़ा लिखा है, व्यावहारिक है। कुछ रिश्वत का पैसा बच्चों से बचा रखा है तो वृद्धाश्रम के बजाय वानप्रस्थ से एक सीढ़ी ऊपर डायरेक्ट सन्यास लेना अधिक समझदारी का काम है।
शहर से थोड़ा दूर कुछ जमीन हथियाकर एक कुटिया नहीं, कॉटेज बनवाएं। कुछ महात्माओं, महामण्डलेश्वरों के प्रवचन करवाएं। एक अच्छे यजमान बनें। अगर ईश्वर और महात्माओं की कृपा हुई, तो संन्यास पक्का। बस मान लिजिये, आपका पुनर्जन्म हुआ। इतना सम्मान, भेंट सम्मान और चढ़ावा, कि आप स्वयं कितनी ही गौ – शालाएं और वृद्धाश्रम संचालित कर अपना जीवन धन्य कर सकते हैं। अन्यथा अपनी पेंशन में संतुष्ट रहें, बाल बच्चों का खयाल रखें।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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