श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी गद्य क्षणिका – “सृजन और विसर्जन…“।)
अभी अभी # 727 ⇒ सृजन और विसर्जन
श्री प्रदीप शर्मा
एक इमारत बनती है, एक इमारत ढहती है, एक दीया जलता है, एक दीया बुझता है, एक कली खिलती है, एक फूल मुरझाता है, बहार के साथ खिजां भी चली ही आती है। चमन में रह के मेरा दिल, वीराना होता जाता है। खुशी के साथ, कुछ गम, भी शामिल होता जाता है।
सृजन में भले ही हमें सुख प्रतीत होता है, लेकिन सृजन की प्रक्रिया इतनी आसान भी नहीं। वैसे देखा जाए तो इस सृष्टि का एक ही सरजनहार है, एक ही पालनहार है और इसे समेटने वाला, विसर्जित करने वाला, संहारक भी एक ही है। सृजन विसर्जन सृष्टि का एक चक्र है, साइकल है, अथवा कहें तो रिसाइकल है।।
बनाना और मिटाना, क्रिएशन और डिस्ट्रक्शन है, आजकल हम जिसे विकास और विनाश में परिभाषित करते हैं। लेकिन देखा जाए तो ये दोनों हैं एक ही, केवल इनकी अवस्था में अंतर है। हमने एक गुब्बारे में हवा भरी, उसे फुलाया, और हवा के अधिक दवाब के कारण वह फूट गया। जितनी हवा का सर्जन हुआ था, वह विसर्जित हो गई।
हवा तो पहले से ही हवा थी, फिर हवा हो गई। कबीर भी यही कहना चाहते हैं ;
पत्ता टूटा डाल से ले गई पवन उड़ाय।
अब के बिछड़े कब मिलेंगे दूर पड़ेंगे जाय।।
सृजन का सिद्धांत भी शायद यही है। ऐसा कहा जाता है, पीड़ा से सृजन होता है, लेकिन सृजन में सुख है, इसलिए सृजन की पीड़ा में भी सुख है। जब एक मूर्तिकार किसी पत्थर को तराशकर मूर्ति बनाता है, तो भले ही उसे परिश्रम लगता हो, आनंद की अनुभूति होती हो, बेचारा पत्थर तो टूटता ही है न, बिखरता ही है न। जब पत्थर टूटता है, बिखरता है, पिघलता है, तब ही तो पत्थर में प्राण आते हैं।
पदार्थ कभी नष्ट नहीं होता, केवल अपना स्वरूप बदलता है। ख़ाक होने से, ख़ाक तो फिर भी बच ही जाती है, वही ख़ाक मिट्टी में मिल फिर कोई नई कहानी लिख जाती है। बीज में वृक्ष की संभावना है, लेकिन एक जला हुआ बीज कभी अंकुरित नहीं होता। सृजन का भी कुछ विधान है।।
क्या सृजन का दिखाई देना, प्रकट होना, अथवा बाहर आना जरूरी है। क्या जो प्रकट नहीं है, प्रकाशित नहीं है, वह सृजन नहीं है। हमारी पृथ्वी के गर्भ में क्या है, ऐसा नहीं है कि हम नहीं जानते। धधकते ज्वालामुखी हैं पृथ्वी के गर्भ में। उनका पृथ्वी के गर्भ में रहना ही सृष्टि का रहस्य है। ज्वालामुखी बाहर, सृष्टि अंदर। क्या कोरोना वायरस मानवता के साथ घिघौना मज़ाक नहीं ? सृजन वही श्रेष्ठ, जो कल्याणकारी हो। इसीलिए सृजन को क्रिएशन कहा गया है। सत्यं, शिवम्, सुंदरम्।
एक सृजनोन्मुख साहित्यसेवी की रचना जब एक पुस्तक का आकार ले लेती है, तब वह बड़ा प्रसन्न होता है। उसे याद आती है सृजन की पीड़ा। अधिक चिंतन से उसे कब्ज़ हो गई थी। घंटों विसर्जन कक्ष में बिताए थे उसने, इसबगोल और सिगरेट के धुएं के छल्लों के बीच। तब जाकर कुछ सृजन हो पाया था। जब सृजन शुरू होता है, तो विसर्जन बुरा मान जाता है। अब पुस्तक छपने के बाद कितनी हलकान, व्हाट ए रीलीफ।।
उसे याद आते हैं वे दिन, जब उसकी रचना संपादक द्वारा अस्वीकृत कर वेस्ट पेपर बास्केट के हवाले कर दी जाती थी। Love’s labour lost वाला फीलिंग आता था उसे। उसका संघर्ष रंग लाया। उसकी रचना ने पहले अखबार का मुंह देखा फिर
सप्ताहिक, पाक्षिक और मासिक पत्रिकाओं का। बाद में तो कैलेंडर की तरह उसकी रचनाएं छपने लगी। सृजन सुख, छपास सुख, और पारिश्रमिक का सुख, यानी 3 इन 1 का सुख।
आज भी जब उसे कब्ज़ का अहसास होता है, वह जान जाता है, कलम से कुछ बाहर आने वाला है, सृजन सुख से बड़ा कोई सुख नहीं। दुनिया गोल है, जब तक पास में इसबगोल है। पहले सृजन सुख, बाद में विसर्जन सुख।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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