श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “सूर सूर, तुलसी शशि।)

?अभी अभी # 735 ⇒ आलेख – सूर सूर, तुलसी शशि ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

आगे क्या लिखूँ, आप खुद समझदार हो। केशव दास को उड़गन यानी तारा बता दिया, और आज के कवियों के बारे में तो मत पूछिए, क्या क्या कह डाला, कहने वाले ने। बेचारों को जुगनू बनाकर रख दिया। हिंदी में इस उक्ति पर हमें निबंध भी लिखना पड़ता था। निबंध क्या, हम तो बस अर्थ कर देते थे, सूर तुलसी तो हम आज तक पढ़ते आ रहे हैं। केशवदास को हमने स्कूल के बाद कभी हाथ नहीं लगाया, बस बच्चन की मधुशाला और नीरज के कारवां गुजर गया, में ही अटके रहे।

जब पढ़ने की उम्र थी, तब तो बस जो कोर्स में था, वही पढ़ लेते थे। वह भी इसलिए, क्योंकि वह परीक्षा में आता था। उसी दौरान हमने तोते की तरह गिरधर की कुंडलियां, मीरा के भजन, कबीर की साखी और संस्कृत के कुछ श्लोक रट लिए थे। लेकिन असली पढ़ाई तो तब शुरू हुई, जब हमारे कॉलेज की पढ़ाई खत्म हुई।।

उसके बाद, हम अपनी मर्जी के मालिक थे, जो मर्जी हुई पढ़ा, जो पसंद नहीं आया, वह नहीं पढ़ा।

हिंदी तो खैर हमारी मातृभाषा भी रही है और घर में बोलचाल की भाषा भी, लेकिन अंग्रेजी से हमारा वास्ता तब पड़ा, जब हमें छठी का दूध याद आया, यानी छठी कक्षा से ही हमें अंग्रेजी का अक्षर ज्ञान हुआ।

जब हमें ज्ञात हुआ कि ये विचार तो आचार्य रामचंद्र शुक्ल के हैं, तो उनका व्यक्तित्व हमारी आंखों के समक्ष आ गया। उनके आगे कोई बड़ी लकीर नहीं खींची जा सकती। आप किसी आलोचक की आलोचना नहीं कर सकते, हां, उस पर विमर्श अवश्य कर सकते हैं।।

सूरदास अष्ट छाप के कवि थे और वैष्णव सम्प्रदाय के होकर कृष्ण भक्त थे, जब कि आचार्य तुलसीदास राम भक्त थे, और उनके द्वारा रचित रामचरितमानस का आज भी घर घर पाठ होता है। कई को सुन्दरकाण्ड कंठस्थ है तो कुछ को पूरी की पूरी रामायण। सूरदास के कुछ पद और रामायण की कुछ चौपाई तो खैर हमें भी याद है, लेकिन मैया मोरी, मैं नहीं माखन खायो सुनकर अनूप जलोटा का ही खयाल आता है, ना कि सूरदास जी का।

सही बात बोलें तो जितनी श्रद्धा जन मानस की तुलसीदास जी में है, उतनी सूरदास जी में नहीं। केवल ढोल, गंवार, शूद्र, पशु, नारी लिखने से तुलसीदास जी का महत्व कुछ कम नहीं हो जाता। हमने तो “सूरदास तब बिहँसि जसोदा, लै उर कंठ लगायो ” का भावार्थ यह भी सुना है, तब सूरदास जी ने हंसते हुए, यशोदा जी को गले लगा लिया।।

सूर, तुलसी, मीरा, कबीर, रहीम और जायसी, सभी भक्तिकाल के कवि थे, और शायद इसीलिए इस काल को हिंदी साहित्य का स्वर्णकाल माना गया है।

राजनीति की तरह इन पर कीचड़ नहीं उछाला जाता, इन पर शोध ग्रंथ लिखे जाते हैं।

इसी संदर्भ ने मानस पीयूष, Gita Press, Gorakhpur द्वारा प्रकाशित रामचरितमानस पर एक विस्तृत टीका है। इसे “रामचरितमानस की सबसे बड़ी टीका” के रूप में जाना जाता है, जिसे संत विद्वान श्री अंजनी नंदन शरण जी ने संपादित किया है. यह सात खंडों में उपलब्ध है, और इसमें रामकथा के विभिन्न विद्वानों, विचारकों और संतों की व्याख्याओं का संग्रह है।।

कवि और आलोचक अपनी बात कहने के लिए स्वतंत्र है, लेकिन सूरदास जी को सूर्य बताना और तुलसीदास जी की तुलना चंद्रमा से करना, हमें कुछ हजम नहीं हुआ। हमारे समकालीन पंत, निराला, और महादेवी जैसे कई कवि क्या कवल साहित्यकाश में टिमटिमा रहे हैं। आचार्य शुक्ल स्वयं धुरंधर विद्वान एवं विचारक थे। हम तो आचार्य रामचंद्र शुक्ल सहित सभी आलोचकों और संत कवियों को सादर नमन करते हुए अपनी लेखनी को विराम देते हैं।

वैष्णव कृष्ण भक्तों को जय श्री कृष्ण और तुलसी के राम भक्तों को जय राम जी की..!!

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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