श्री धर्मपाल महेंद्र जैन

संक्षिप्त परिचय

(सुप्रसिद्ध एवं वरिष्ठ साहित्यकार श्री धर्मपाल जी का जन्म रानापुर, झाबुआ में हुआ। वे अब कैनेडियन नागरिक हैं। प्रकाशन :  “गणतंत्र के तोते”, “चयनित व्यंग्य रचनाएँ”, “डॉलर का नोट”, “भीड़ और भेड़िए”, “इमोजी की मौज में” “दिमाग वालो सावधान” एवं “सर क्यों दाँत फाड़ रहा है?” (7 व्यंग्य संकलन) एवं Friday Evening, “अधलिखे पन्ने”, “कुछ सम कुछ विषम”, “इस समय तक” (4 कविता संकलन) प्रकाशित। तीस से अधिक साझा संकलनों में सहभागिता। स्तंभ लेखन : चाणक्य वार्ता (पाक्षिक), सेतु (मासिक), विश्वगाथा व विश्वा में स्तंभ लेखन। नवनीत, वागर्थ, दोआबा, पाखी, पक्षधर, पहल, व्यंग्य यात्रा, लहक, समकालीन भारतीय साहित्य, मधुमती आदि में रचनाएँ प्रकाशित। श्री धर्मपाल जी के ही शब्दों में अराजकता, अत्याचार, अनाचार, असमानताएँ, असत्य, अवसरवादिता का विरोध प्रकट करने का प्रभावी माध्यम है- व्यंग्य लेखन।” आज प्रस्तुत है आपका व्यंग्य खिसियानी बिल्ली जूता नोचे।)

☆ व्यंग्य – खिसियानी बिल्ली जूता नोचे ☆ श्री धर्मपाल महेंद्र जैन ☆

भगवान किस रूप में कहाँ आते हैं, कब आते हैं और वहाँ क्या छोड़ जाते हैं, कौन जान सकता है! उनकी लीला आरपार है, वे ही जानें। दशरथ पुत्र भरत उनकी पादुकाएँ उठा लाए थे तो वे संसार सागर से तिर गए थे। बस इसी आशा में मैं नई चरण पादुकाएँ उठा लाता हूँ, और अपनी जीर्ण-शीर्ण पादुकाओं को वहाँ सेवानिवृत्त कर आता हूँ।

अब जो पादुकाएँ मिलती हैं वे काष्ठ की नहीं होतीं, चाम्र की होती हैं। वे भले अपवित्र हों पर चमकदार होती हैं। माल चमकदार हो तो उसकी पवित्रता कौन देखता है। भगवन् पादुकाओं को पॉलिश करवा-करवा कर इतना भव्य रखते हैं कि मेरी एक नज़र उन पर पड़ती है तो फिर नहीं उठती। मैं अपने पाँवों में चरण पादुकाएँ धारण करने के बाद ही नज़र उठा पाता हूँ, ताकि मैं यह सुनिश्चित कर सकूँ कि जो प्रसाद मैंने ग्रहण किया है, उस पर किसी और की नज़र तो नहीं है। यदाकदा ही ऐसा होता है कि उन मनभावन पादुकाओं को और कोई क्लेम करने आता हो। पर कोई आ भी जाए तो मैं जी भर कर हँसता हूँ। कहता हूँ ‘सॉरी सर’। धन्य हो अंग्रेज़, हमें सॉरी कहना सिखा गए। अन्यथा ऐसे मौकों पर खिसियानी बिल्ली को जूता नोचना पड़ता।

नई चरण पादुकाएँ पहन कर प्रभु निवास पर जाना मुझे नहीं सुहाता। पिछले सप्ताह जब अपने नए ‘हश पपीज़’ जूते पहन मैं प्रभु दर्शन को पहुँचा तो मैंने दायाँ जूता पूर्व दिशा में और बायाँ जूता पश्चिम दिशा में खोला। ताकि किसी दर्शनार्थी का मन नए जूते पर डोल भी जाए तो उसे दूसरा जूता सहज सुलभ नहीं हो। यद्यपि यह तरकीब काम कर गई, जूते यथास्थान ही रहे पर प्रभुदर्शन में मेरा चित्त न लगा। बार-बार मेरा चित्त प्रवेश द्वार के पूर्व और पश्चिमी कोनों में भटकता रहा। प्रभु ने पूछा भी, वत्स क्या बात है आज तुम व्यथित हो, कुछ माँग नहीं रहे? मैं इतना ही कह पाया – प्रभु मेरे नए जूतों का ध्यान रखना। प्रभु हँस कर चले गए। मैंने मूर्खतावश ऐसा दुर्लभ अवसर जूतों की रक्षा में गवाँ दिया। तब मैं प्रभु से जूतों का भरा-पूरा स्टोर भी माँग लेता तो प्रभु तथास्तु कह देते। बाबा को जब यह वाकया बताया तो वे बहुत खिन्न हुए। उपदेश देने लगे, ‘बेटे तुम्हें स्वर्ग मिल सकता था, तुम जूतों की रखवाली में यह जनम गवाँ आए मूर्ख।’ अब कोई मैं अकेला मूर्ख तो हूँ नहीं जो जूतों के चक्कर में स्वर्ग गवाँ रहा हूँ। उस दिन के बाद से मैं कभी नए जूते पहन कर प्रभु दर्शन के लिए नहीं गया, न प्रभु वहाँ आए। प्रभु बड़े नटखट हैं, भक्तों की कैसी परीक्षा लेते हैं! नए जूतों में मन रमा था तो आशीर्वाद देने प्रकट हो गए। अब उनसे मिलने जाते-जाते जूते घिस गए हैं, वे प्रकट ही नहीं होते।

जूतों के चक्कर में मैंने प्रभु को खो दिया तब से जूतों से वितृष्णा हो गई है। अब घर से बिना जूते पहने प्रभुदर्शन को जाता हूँ। रुआँसा घर लौटता हूँ तो ध्यान कहीं और होता है। घर आ कर पता लगता है कि मैं नंगे पाँव गया था, ढँके पाँव आया हूँ। घर में समान नंबर के जूतों का स्टोर बन रहा है, सब प्रभु की माया है। प्रभु मैं तो पुण्य कमाने आ रहा था, जूते कमा रहा हूँ। बाबा पूछते हैं कितनी पनौती इकट्ठी करेगा? जिसे मैं प्रभु प्रसाद समझ रहा था वह पनौती कैसे हो गई?

आज लौट रहा था तो एक सज्जन ने पूछा, “बड़े अच्छे जूते हैं, कहाँ से ख़रीदे?”

“यहीं से लिए थे।”

“ये तो मेरे जूते हैं।”

“आप ले लीजिये।”

“फिर आप क्या करेंगे?”

“मैं खाली हाथ आया था, खाली पैर चला जाऊँगा।”

मैंने एक वाक्य में उन्हें सारा जीवन दर्शन समझा दिया।

नई चरण पादुकाओं ने मुझे हमेशा धर्म संकट में डाला है। मुझे याद है, मेरे पाँवों में नए जूते थे, विवाह वेदी पर बैठने के लिए जूते खोलने थे। प्रियतमा वरमाला लिए खड़ी थीं पर मेरा सारा ध्यान जूतों पर ही था। जूते खोलूँ तो लूट जाऊँ, न खोलूँ तो कुआँरा रह जाऊँ। जूतों के चक्कर में सर्वप्रिय सलोनी सालियाँ खूँखार शेरनियाँ लग रही थीं। उनकी हँसी ने मेरे दिल को और उनकी तीखी निगाहों ने मेरे नए जूतों को छलनी-छलनी कर दिया था। मैंने सोचा भी दुल्हन को जाने दूँ, अपनी इज्ज़त, जूतों को बचा लूँ। भला हो बाबा का, मेरी दुविधा ताड़ गए और जूते उतरवा दिए। अन्यथा पहले भगवान गवाएँ थे, अब दुल्हन को गवाँ देता।

जैसे ऑफिस में घुसते ही बॉस अपनी कुर्सी पर बिराज जाते हैं, घर में घुसते ही जूते अपना नियत स्थान सम्हाल लेते हैं। पहली फुरसत में आदमी उन्हें कीचड़-माटी रहित कर, पुनः पॉलिश से चमका देता है। मुख और मन मलिन हो तो कुछ नहीं, जूते और बाल चमचमाते रहना चाहिए। 

हमारे गाँव और शहर के बीच एक नदी है। प्रभु की जटा से जितनी सिमटी गंगा निकलती है, उसकी धारा यहाँ वैसी ही पतली है। पर नदी का पाट सरकारी आश्वासनों जैसा चौड़ा है। गर्मी में जब पानी चाहिए नदी सूखी पड़ी होती है। झमाझम बारिश में जब चारों तरफ पानी ही पानी होता है, नदी भी पूरे आवेग में बहती है। बाढ़ में पुलिया बहा ले जाती है। ग्रामवासी अपनी चरण पादुकाएँ सिर पर रख या दिल से लगा कर नदी पार कर रहे होते हैं। तब भी आदमी को ख़ुद से ज़्यादा अपनी चरण पादुकाओं का ध्यान रहता है।

चरण अब पादुकाओं में बंद रहते हैं। आशीर्वाद की ज़रूरत में मैं बड़े-बूढ़ों के चरण स्पर्श करना चाहता हूँ तो उनकी पादुकाएँ ही दिखती हैं। आशीर्वाद की जगह जूते ही मिलते हैं। लगता है जूते मिलने की परम्परा हमारी संस्कृति से जुडी है। मेरे कवि मित्र बिना बुलाए ही कवि सम्मेलनों में नंगे पाँव जाते हैं। बिना मानदेय के जाते हैं और जब लौटते हैं तो जूतों की चार-छः जोड़ियाँ उपहार में ले कर आते हैं। उपहार का उपहास करना उन्हें अच्छा नहीं लगता। उनका मानना है कि प्रसिद्ध व्यक्तियों को ही जूते पड़ते हैं। वे बताने लगे, “पत्रकार वार्ता में एक पत्रकार ने जॉर्ज बुश के ऊपर जूता दे मारा, पहला निशाना चूका तो उसने दूसरा जूता भी दे मारा। दो जूते पा कर अमेरिकन राष्ट्रपति जॉर्ज बुश दुनिया भर में इतने प्रसिद्ध हो गए कि कोई उनकी बराबरी नहीं कर सकता, राष्ट्रपति ट्रम्प भी नहीं। पत्रकार की चर्चा तो कुछ महीनों में बंद हो गई पर जॉर्ज बुश जूते खाने के लिए अमर हो गए। याद रखें, जूते मारने वाले से जूते खाने वाला बड़ा होता है और उसे हमेशा याद रहता है कि उसे जूता पड़ा था।”

मुझे कवि मित्र की बात में दम लगा। दुनिया भर में लाखों व्यंग्यकार रोज ही तमाम विसंगतियों तथा कुप्रवृत्तियों पर तंज कसते हैं। देर रात तक कॉमेडी शोज़ चलाते हैं। लोग व्यंग्य को भी हँस कर टाल देते हैं, इन सबका कोई गंभीर नोटिस नहीं लेता। व्यंग्यकार ने शाब्दिक जूतों की बजाय भौतिक जूते चलाए होते तो दुनिया अलग हो सकती थी।

कुछ भी हो, इन दिनों फटे-पुराने जूतों की माँग बढ़ गई है, बड़े चुनाव आने वाले हैं। विरोधियों को जूते की माला पहना कर सम्मानित करने के लिए फटे-पुराने जूते ही चाहिए। नए जूतों से सम्मान को गरिमा नहीं मिलती।

क्या कहा आपने, आपके जूते नहीं मिल रहे। थोड़ी प्रतीक्षा कीजिए, मैं आता हूँ।

बुश दुनिया भर में इतने प्रसिद्ध हो गए कि कोई उनकी बराबरी नहीं कर सकता, राष्ट्रपति ट्रम्प भी नहीं। पत्रकार की चर्चा तो कुछ महीनों में बंद हो गई पर जॉर्ज बुश जूते खाने के लिए अमर हो गए। याद रखें, जूते मारने वाले से जूते खाने वाला बड़ा होता है और उसे हमेशा याद रहता है कि उसे जूता पड़ा था।”

मुझे कवि मित्र की बात में दम लगा। दुनिया भर में लाखों व्यंग्यकार रोज ही तमाम विसंगतियों तथा कुप्रवृत्तियों पर तंज कसते हैं। देर रात तक कॉमेडी शोज़ चलाते हैं। लोग व्यंग्य को भी हँस कर टाल देते हैं, इन सबका कोई गंभीर नोटिस नहीं लेता। व्यंग्यकार ने शाब्दिक जूतों की बजाय भौतिक जूते चलाए होते तो दुनिया अलग हो सकती थी।

कुछ भी हो, इन दिनों फटे-पुराने जूतों की माँग बढ़ गई है, बड़े चुनाव आने वाले हैं। विरोधियों को जूते की माला पहना कर सम्मानित करने के लिए फटे-पुराने जूते ही चाहिए। नए जूतों से सम्मान को गरिमा नहीं मिलती।

क्या कहा आपने, आपके जूते नहीं मिल रहे। थोड़ी प्रतीक्षा कीजिए, मैं आता हूँ।

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© श्री धर्मपाल महेंद्र जैन

संपर्क – 22 Farrell Avenue, North York, Toronto, ON – M2R1C8 – Canada

वेब पृष्ठ : www.dharmtoronto.com

फेसबुक : https://www.facebook.com/djain2017

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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