श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव
गोरखपुर, उत्तर प्रदेश की निवासी लेखका व कवयित्री अभिलाषा श्रीवास्तव जी एक प्रेरणादायक महिला हैं। साहित्य की सेवा में निरंतर रत | आपको 2024 में अंतरराष्ट्रीय महिला सम्मान पत्र से नवाजा गया। विशेष सम्मान : एक्सीलेंट कवयित्री अवार्ड से सम्मानित तथा पुरस्कृत |उनके द्वारा संवाद टीवी पर फाग प्रसारण में प्रस्तुत किया गया और विभिन्न राज्यों के प्रमुख अखबारों व पत्रिकाओं में उनकी कविता, कहानी और आलेख प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी लेखनी में समाज के प्रति संवेदनशीलता और सृजनात्मकता का सुंदर संगम देखने को मिलता है।
☆ आलेख ☆ सुसज्जित फूल ☆ श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव ☆
स्त्रियों की वजूद बिलकुल गेदें के फूल के हिसाब जैसा है, वक़्त पड़े तो औषधि बन जाती हैं तो कभी साज्ज सज्जा में लिप्त नज़र आती है। बड़ा मोहक है यह गेंदें का फूल!
‘तोरण बन दरवाजे पर लटक के लक्ष्मी आगमन की सुगंध बन बिखर जाती हैं तो कभी शिव के थाली में सुज्जित होकर मंदिरों में चढ़ जाती हैं।
अक्सर आसानी से खिल जाता यह गेंदें का फूल। मिट्टी ही तो चाहिए इसे पनपने के लिए और थोडी सी देखभाल फिर आंगन में खडी़ खुद ही सबकों मोहित कर देता है यह गेंदें का फूल।
भींगी भींगी खुशबु से परिपूर्ण पीले रंग की अत्यंत मनभावन किंतु भावनाओं से परिपूर्ण होती है ।
कहते हैं, गेंदें का फूल जहाँ खिलाता हैं वहां खुशियाँ इक़ट्ठा करती तभी तो तस्वीर या दरवाजे पे बैठीं पुरनिया स्त्री नज़र कवच सा बन लिपटी मोह माया के धागों से पिरोने के बाद अथाह अपनत्व के पीड़ा में डूबीं केवल संवेदना को छुपाई मौन नज़र आती है लेकिन कमब्खत उफ्फ्फ तक नहीं करतीं ।
गेंदें के इस फूल को आंगन में लाने के बाद पुरुषों ने मन के हिसाब से उपयोग किया क्योंकि गुलाब की तरह उसनें मुहब्बत की मांग जो नहीं रखीं बस ताउम्र मौन उपलब्धि दर्ज करातीं अपने भाग्य के भरोसे बैठीं थोड़ी सी मिट्टीसे परिपूर्णता दर्शाती रही।
~ अभिव्यक्ति की स्याही ~
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© श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव
गोरखपुर, उत्तरप्रदेश
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





