श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “छतरी और साइकिल।)

?अभी अभी # ७५४  ⇒ आलेख – छतरी और साइकिल ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

आज भी डूबते को तिनके के सहारे की तरह, किसी भीगते इंसान को छाते का ही सहारा होता है। गाड़ी में पेट्रोल खत्म होने पर, अथवा गाड़ी खराब होने पर, आज भी आपातकालीन विकल्प एक साइकिल ही है, लेकिन अफसोस, कल की जरूरत, आज यह द्वि चक्र वाहिनी महानगर में घोर उपेक्षा की शिकार है।

सन् ६० के दशक में हर मध्यमवर्गीय परिवार में एक अदद एटलस साइकिल और काली छतरी अवश्य होती थी।

तब शहर की दीवारें आज की तरह स्वच्छता का चौका जैसे नारों से नहीं, हम दो हमारे दो वाले विज्ञापनों से सजी होती थी। यह अलग बात है कि हर घर में कम से कम सात आठ सदस्य तो आसानी से नज़र आ ही जाते थे। हम दो, हमारे दो, के हिसाब से चार तो वैसे ही हो ही गए, थोड़ा बहुत कम ज्यादा तो इसमें भी चलता था। अगर शुरू में ही तीन बेटियां हो गईं तो इसमें किसका दोष ? एक बेटे की आस किसे नहीं होती।।

तब गजब का भाईचारा था भाई साहब ! मेहमां जो हमारा होता था, वो जान से प्यारा होता था। गांव से एक बार आता था, तो फिर जाने का नाम ही नहीं लेता था। पड़ोसी भी चाय शकर की तरह कभी छाता तो कभी साइकिल मांगकर ले जाते, अभी लाया, जरा बबली को स्कूल छोड़ आऊं। यह बारिश भी ना, एकदम बरस पड़ती है।

घर में स्त्री पुरुष की ही तरह छाते और साइकिल की भी लेडीज और जेंट्स की जोड़ी होती थी। लेडीज साइकिल, जेंट्स साइकिल, और जेंट्स काली छतरी और लेडीज रंग बिरंगी छोटी छतरी।

लेडीज साइकिल तो कोई भी चला लेता, लेकिन जेंट्स साइकिल जेंट्स ही चलाते थे।।

बाबूजी कुर्ता पायजामा पहनते थे, उनकी अपनी अलग साइकिल और छतरी थी। साइकिल चलाने के पहले वे पायजामे को नीचे से मोड़, दोनों पांवों पर एक लोहे की पतली चूड़ी नुमा रिंग चढ़ा लेते थे, जिससे पायजामा साइकिल की चेन में ना फंसे। वैसे साइकिल में भी चेन कवर होता था। जो लोग दिलीप कुमार टाइप बावीस इंच की मोहरी वाली पैंट पहनते थे, उनको भी इसी तरह, साइकिल चलाते वक्त, पैंट की सुरक्षा करनी पड़ती थी। छतरी को भी वापरने के बाद, पूरी तरह से सुखाकर और समेटकर, कायदे से एक बटन द्वारा बंद किया जाता था।

तब बरसात में बाजार में छाते ही छाते नजर आते थे। जितने सर उतने छाते। बेचारे काम करने वाले सब्जी बेचने वाले और मजदूर एक बोरेनुमा बरसाती से ही अपना तन सुरक्षित कर लेते थे। स्कूटर और मोटर साइकिल के साथ छतरी का कोई मेल नहीं था। तब तक रेनकोट मार्केट में जो आ गए थे। जेंट्स और लेडीज दोनों बरसातियों के बावजूद छाते फिर भी शान से सर पर तनते ही रहे, और आम आदमी की मेंटेनेंस फ्री साइकिल भी सड़क के बीचोबीच चलती ही रही।।

आज साइकिल भले ही घर में छोटे बच्चों को सवारी बनकर रह गई हो, एक अदद छाता हर कार वाले की जरूरत बन गया है। कार में बरसते पानी में चढ़ते उतरते वक्त, बेहतर है, छतरी की सेवाएं ले ही ली जाएं।

हम कितने भी डिजिटल हो जाएं, पेट्रोल के विकल्प में ई वाहन ले आएं, पॉवर क्राइसिस हमारा पीछा नहीं छोड़ने वाला ! हमें घूम फिरकर वापस साइकिल पर आना ही होगा। अब मेट्रो आपके घर आने से तो रही। खैर, फिलहाल हम बारिश का सामना करें, और अपनी अपनी छतरी तान लें।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares
0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments