श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “घुटने का दर्द।)

?अभी अभी # ७५५  ⇒ आलेख – घुटने का दर्द ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

इसे कहते हैं, दुखती रग पर हाथ रखना ! घुटने का दर्द भले ही आम लगता है, लेकिन अधिकतर यह महान लोगों को ही होता है।

बहुत वर्ष पहले एक परिचित मिले, बोले, मेरे भी घुटने में दर्द है ! मैंने पूछा, मेरे भी का क्या मतलब ? वे बोले, क्या आप नहीं जानते, अटल जी को भी है !

और तो और दयालु शंकर अर्थात पूर्व राष्ट्रपति डॉ शंकर दयाल शर्मा भी घुटनों के दर्द से परेशान रहते थे।

जिस तरह मनुष्य के शरीर में दो घुटने होते हैं, उसी तरह शब्द घुटने के भी दो अर्थ होते हैं।

घुटना शब्द घुटन से बना है। घुटने का दर्द तो चाल-ढाल से ही पकड़ में आ जाता है, लेकिन अंदर की घुटन को सिर्फ महसूस किया जा सकता है, बताया नहीं जा सकता। घुटने के दर्द के तो कई इलाज हैं, नारायणी तेल से मालिश अगर कारगर न हो तो, घुटने का प्रत्यारोपण भी करवाया जा सकता है, लेकिन घुटन का किसी वेद, हकीम, ओझा फ़क़ीर के पास कोई इलाज संभव नहीं। किसी प्यासे ने कहा भी है, इसको ही जीना कहते हैं तो, यूँ ही जी लेंगे। उफ़ न करेंगे, लब सी लेंगे, आँसू पी लेंगे।।

आज तक इस तथ्य पर ज़्यादा विचार नहीं हुआ, कि आदमी एड़ियाँ ज़्यादा घिसता है, या घुटने ! बचपन में घुटने-घुटने चलने वाले इंसान का बड़े होकर जब एड़ियाँ घिसने से भी काम नहीं चलता, तब घुटने टेकने ही पड़ते हैं। इससे यह भी सिद्ध होता है कि एड़ियाँ, घुटनों से अधिक मजबूत होती हैं। वे घुटनों की तरह आसानी से घुटने नहीं टेक देती। वैसे भी घुटनों की तुलना में एड़ियाँ कम ही ख़राब होती हैं।

अंधेरे बंद कमरे, और कम हवादार स्थान पर जब साँस लेने में दिक्कत होती है, तब घुटन का अहसास होता है। खुले में, बाग-बगीचों में, और प्राकृतिक स्थानों पर कभी घुटन का अहसास नहीं होता। जो एकांतप्रिय है, जिसकी किसी से घुटती नहीं, वह तो ज़न्नत में भी घुटन का माहौल बना सकता है। मंथरा महलों में भी रहती है।।

जब इंसान अकेला होता है, किसी ग़म को गले से लगाए बैठा होता है, या जब कोई पुराना ज़ख्म हरा हो जाता है, तो वह अंदर से घुटने लगता है। कुछ लोग इस घुटन का इलाज कड़वे घूँट में भी ढूंढना चाहते हैं, लेकिन इससे घुटन और भी बढ़ती ही है, कम नहीं होती।

न जाने क्यों एक ज़माने में घुटनों के दर्द को पहलवानों से जोड़ा जाता था। लेकिन जब से यह पति-पत्नी दोनों को एक साथ होने लगा है, तब से जोड़ों का दर्द कहलाने लगा है।

घुटनों और घुटन दोनों का अगर समय रहते इलाज नहीं किया गया तो इसका शरीर और मन पर विपरीत असर पड़ने लगता है।

शारीरिक वज़न का संतुलन, नियमित व्यायाम, सकारात्मक जीवन और स्वस्थ मानसिकता ही दोनों तरह के दर्द का एकमात्र उपचार है। न कभी अपने आप में घुटें, न कभी आपको घुटने के दर्द का अहसास हो, ईश्वर से आज सुबह की यही प्रार्थना।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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