श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “एक लोटा जल।)

?अभी अभी # ७५८  ⇒ आलेख – एक लोटा जल ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

ग्लास आधा खाली अथवा आधा भरा हो सकता है, लेकिन एक लोटा जल हमेशा पूरा भरा होता है।

पानी पिलाया जाता है, और जल अर्पित किया जाता है। एक समय था जब पानी भी लोटे से ही पिलाया जाता था, क्योंकि तब लोगों की प्यास आसानी से नहीं बुझती थी। अब तो लोग ग्लास से भी सिर्फ पानी चखकर ही तृप्त हो जाते हैं, क्योंकि उनकी प्यास आजकल पानी से कहां बुझ पाती है।

लाठी जितने ही गुण एक लोटे में भी होते हैं। लोटे का अपना विज्ञान है, जिसे धातु विज्ञान कहते हैं। सुबह सवेरे उठते ही तांबे के लोटे का जल खाली पेट पीया जाता था। उसके बाद सबसे पहले उगते सूरज को जल अर्पित किया जाता था। जिनका सूर्य कमजोर हो, उन्हें सूर्य नारायण को एक लोटा जल अवश्य अर्पित करना चाहिए। पूजा के भी अधिकांश पात्र तांबे के ही होते हैं। ।

तब ना तो आज की तरह स्टील और कॉच के बर्तन होते थे। आम घरों में तांबा, पीतल और कांसे के बर्तन ही होते थे। कुछ संपन्न परिवारों में जरूर चांदी के बर्तन भी होते थे।

चांदी के चम्मच से नवजात शिशु को पहली बार खीर चटाना शुभ माना जाता था। सब लोग वैसे भी कहां, मुंह में चांदी का चम्मच(सिल्वर स्पून) लेकर पैदा होते हैं।

आज से ग्यारह वर्ष पहले तक लौटे का उपयोग दिशा मैदान के लिए भी किया जाता था। बचपन में हम जब अपने गांव ननिहाल जाते थे, तो सुबह पौ फटने के पहले ही उठकर, लोटा लेकर, जंगल जाना पड़ता था। वैसे गांव के बाहर और नदी किनारे को भी जंगल ही कहा जाता था, जहां आबादी ना हो।

लौटते समय नदी अथवा कुंए पर ही कुल्ला दातून और स्नान करके आना पड़ता था। ।

शिव जी को एक लोटा जल चढ़ाने की प्रथा बहुत पुरानी है, जिसे आज के कथा वाचकों ने एक इवेंट बना दिया है। जो भोलेनाथ बिल्व पत्र से ही संतुष्ट हो जाते हैं, उनके लिए भक्तों की श्रद्धा देखिए, श्रावण मास में भक्त जन सैकड़ों मिलों की कांवड़ यात्रा सम्पन्न कर अपने इष्ट को प्रसन्न करते हैं। एक लोटा जल अथवा कांवड़, सब भाव और श्रद्धा का मामला है।

अंग्रेजी के वॉटर, हमारे पानी और उर्दू के आब में वह भाव नहीं, जो हमारे एक लोटा जल में है। यूं तो सभी नदियों का जल शुद्ध होता है, करीब गंगा जल की बात कुछ और ही है।

हमारे घर का एक्वागार्ड और हेमा मालिनी का ब्रांड केंट प्यूरीफायर, सिर्फ पानी को साफ ही कर सकता है, उसे गंगा जल जैसा पवित्र नहीं बना सकता। आखिर गंगा शिव जी की जटाओं से जो निकली है। यही कारण है, जब भोलेनाथ का अभिषेक गंगा जल से किया जाता है, तो वह अधिक प्रसन्न होते हैं। शायद घी, दूध और शहद से अधिक प्रसन्न होते हों।।

ईश्वर की भक्ति बुरी नहीं, अगर वह बिना किसी स्वार्थ अथवा सांसारिक कामना के की जाए, लेकिन हम संसारी जीव ईश्वर से वही तो मांगेंगे, जिसका हमें अभाव होगा। धन, संपत्ति, सुख, औलाद और निरोग काया, बस यही हमारा पसारा है, और हमारी सांसारिक बुद्धि और कुछ मांग ही नहीं सकती। कहीं पितृ दोष तो कहीं साढ़े साती। इनसे बचे तो राहु केतु और चंद्रमा नीच का।

अगर किसी संत महात्मा अथवा बाबा के पास इन लाख दुखों की एक दवा हो तो कौन नहीं उल्टे पांव भागेगा उसके धाम। केवल एक चिथड़ा सुख नहीं, त्रय ताप यानी दैहिक, भौतिक और दैविक, तीनों तापों से छुटकारा अगर एक लोटा जल से हो जाए, तो समझो हमें भगवान मिल गए। और हमें क्या भगवान का अचार डालना है। हमें अपने मतलब से मतलब।।

जो हमारे दुख दूर करे, वही हमारा भगवान। चमत्कार को नमस्कार करते करते हम धर्म की शरण में चले जाते हैं, और बाबा नाम केवलम्। बस हमें साक्षात् भगवान जो मिल गए। भक्तों की भीड़ बढ़ती जा रही है। नेता भी बहती गंगा में हाथ धो रहे हैं। अगर ऐसे समागम में कुछ हादसे भी होते हैं, तो वह भी हरि इच्छा। वही कर्ता है, हमने तो अब कर्त्तापन पूरी तरह त्याग दिया है। सनातन हिंदू राष्ट्र में धर्म की विजय हो, अधर्म का नाश हो। विश्व का कल्याण हो। बोलो सब संतन की जय। आज के आनंद की जय..!!

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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