डाॅ. निशिकांत श्रोत्री 

? इंद्रधनुष्य ?

☆ ॥ यमुनाष्टकम् ॥ (स्तोत्र दुसरे) ☆ मराठी भावानुवाद – डाॅ. निशिकांत श्रोत्री ☆

नमामि यमुनामहं सकल सिद्धि हेतुं मुदा,

मुरारि पद पंकज स्फ़ुरदमन्द रेणुत्कटाम।

तटस्थ नव कानन प्रकटमोद पुष्पाम्बुना,

सुरासुरसुपूजित स्मरपितुः श्रियं बिभ्रतीम॥१॥

*

कलिन्द गिरि मस्तके पतदमन्दपूरोज्ज्वला,

विलासगमनोल्लसत्प्रकटगण्ड्शैलोन्न्ता।

सघोषगति दन्तुरा समधिरूढदोलोत्तमा,

मुकुन्दरतिवर्द्धिनी जयति पद्मबन्धोः सुता॥२॥

*

भुवं भुवनपावनीमधिगतामनेकस्वनैः,

प्रियाभिरिव सेवितां शुकमयूरहंसादिभिः।

तरंगभुजकंकण प्रकटमुक्तिकावाकुका,

नितन्बतटसुन्दरीं नमत कृष्ण्तुर्यप्रियाम॥३॥

*

अनन्तगुण भूषिते शिवविरंचिदेवस्तुते,

घनाघननिभे सदा ध्रुवपराशराभीष्टदे।

विशुद्ध मथुरातटे सकलगोपगोपीवृते,

कृपाजलधिसंश्रिते मम मनः सुखं भावय॥४॥

*

यया चरणपद्मजा मुररिपोः प्रियं भावुका,

समागमनतो भवत्सकलसिद्धिदा सेवताम।

तया सहशतामियात्कमलजा सपत्नीवय,

हरिप्रियकलिन्दया मनसि मे सदा स्थीयताम॥५॥

*

नमोस्तु यमुने सदा तव चरित्र मत्यद्भुतं,

न जातु यमयातना भवति ते पयः पानतः।

यमोपि भगिनीसुतान कथमुहन्ति दुष्टानपि,

प्रियो भवति सेवनात्तव हरेर्यथा गोपिकाः॥६॥

*

ममास्तु तव सन्निधौ तनुनवत्वमेतावता,

न दुर्लभतमारतिर्मुररिपौ मुकुन्दप्रिये ।

अतोस्तु तव लालना सुरधुनी परं सुंगमात्तवैव,

भुवि कीर्तिता न तु कदापि पुष्टिस्थितैः॥७॥

*
स्तुति तव करोति कः कमलजासपत्नि प्रिये,

हरेर्यदनुसेवया भवति सौख्यमामोक्षतः।

इयं तव कथाधिका सकल गोपिका संगम,

स्मरश्रमजलाणुभिः सकल गात्रजैः संगमः॥८॥

*

तवाष्टकमिदं मुदा पठति सूरसूते सदा,

समस्तदुरितक्षयो भवति वै मुकुन्दे रतिः।

तया सकलसिद्धयो मुररिपुश्च सन्तुष्यति,

स्वभावविजयो भवेत वदति वल्लभः श्री हरेः॥९॥

*
☆ मराठी भावानुवाद ☆

*

प्रसन्नतेने सिद्धी कारण यमुनेला नमन

मुरारीचरण कमल उत्कट वालुकाकण

तटावरील काननात घालित सडा सूमन

सुरासूरही पूजिती श्रिया शिवासी सन्मान ॥१॥

*
गिरीशिखरावरी झेप घेउनी कालिंदी तेजस्वी

शैल कपारींवरुनी विलासे वाहतसे उल्हासी

उच्च रवाने विविध गतीने वाहे हासत डोलत 

जय हो पद्मबंध तनये मुकुंद प्रीती करि वर्धित ॥२॥

*

गुंजन करीत बहुध्वनींचे करी धरिती पावन

पूजा मयूर हंस शुकादि द्वारा अर्चने समान 

प्रवाह मोहक जैसे करीचे मौक्तीक कंगण

जणू सुंदरी नितंब किनारा कृष्णप्रियेला नमन ॥३॥

*

ब्रह्मा विष्णू महेश स्तवती असीम गुणालंकृत

घनपापहारिणी सदा ध्रुव पराशर इष्ट दैवत

तटावरी पावन मथुरा नगरी गोप-गोपी वेष्टित

कृपानिधे तुजला शरण मना सदैव ठेवी सुखात ॥४॥

*
धारण केले रूप सुप्रिय पद्मजा मुरारीस्तव

समागमाने प्रदान करिते सिद्धी भक्तांस्तव

हरी कमलजा प्रिय कालिंदी बहूकलायुक्त

मनी निरंतर वास करोनी तिथेच राही स्थित ॥५॥

*

सदैव तुजला नमन अद्भुत चरित्रगुणी यमुना

जलपानाने तव कदापि होत ना यमयातना 

भक्ती करता गोपी जैसे प्रिय होत श्रीकृष्णा

यमराज कदापि भगिनी पुत्रा प्रकोप करीत ना ॥६॥

*

तव सन्निध्ये देहासीया नवप्रफुल्लता दान

मुरारी मुकुंद प्रिये भक्तीने दुर्लभ काही न

हे सुरसरिते तव भक्तांना सुलभ कृपादान

कीर्तिमान तव महिमा भूवर समृद्धाही स्मरण ॥७॥

*

मुमुक्षु जन हे सारे करती प्रिये तुझे स्तवन 

भगवान हरी भक्तीने प्राप्ती मोक्षाची जाणुन

श्रम नि आंसवे गात्रोत्पन्न कणाकणापासून

कहाणी तुझी अधीक श्रेष्ठ गोपीमिलनाहुन ॥८॥

*

अष्टश्लोक हे देवसुते पठण करील आनंदाने 

दुरितांचा सकल विनाश होइल मुकुंदप्रीतीने

हरीकृपेने राहिल अंकुश अपुल्या मनावरी

प्राप्ती सकल सिद्धींची संतुष्ट होऊनी मुरारी ॥९॥

॥ इति निशिकान्त भावानुवादित श्रीयमुनाष्टक स्तोत्र संपूर्ण ॥

मराठी भावानुवाद  © डॉ. निशिकान्त श्रोत्री

एम.डी., डी.जी.ओ.

मो ९८९०११७७५४ ईमेल nishikants@gmail. com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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