डॉ कुंदन सिंह परिहार
(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी का साहित्य विशेषकर व्यंग्य एवं लघुकथाएं ई-अभिव्यक्ति के माध्यम से काफी पढ़ी एवं सराही जाती रही हैं। हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहते हैं। डॉ कुंदन सिंह परिहार जी की रचनाओं के पात्र हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं। उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य – ‘बकरों-मुर्गों की फ़रियाद’। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३०३ ☆
☆ व्यंग्य ☆ बकरों-मुर्गों की फ़रियाद ☆
दिल्ली के जंतर मंतर मैदान पर एक सवेरे अचानक बकरे और मुर्गे इकट्ठे होने लगे। देखते-देखते सारा मैदान बकरों और मुर्गों से भर गया। सब तरफ बकरों के मिमियाने और मुर्गों की बांग का शोर गूंज रहा था। उनके आगे काले कोट में दो वकील थे जो बकरों-मुर्गों के प्रवक्ता थे। बड़ी मुश्किल से दो शुद्ध शाकाहारी वकीलों को ढूंढ़ कर यह काम सौंपा गया था।
बकरों-मुर्गों के वकीलों का कहना था कि कुत्तों की रक्षा के मामले की तो सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हो गयी, लेकिन बकरों-मुर्गों के दुख को सुनने के लिए आज तक कोई पंचायत तक नहीं बैठी। यह सरासर बेइंसाफी है। उन्होंने बताया कि इस सभा के लिए भैंसें और मछलियां भी आना चाहती थीं, लेकिन भैंसों को उनके तबेले वालों ने छोड़ा नहीं और मछलियां इतनी दूर तक घिसट कर नहीं आ सकतीं।
वकीलों ने कहा कि कुत्तों को तो सिर्फ अलग बाड़े में रखने की बात पर इतना हो-हल्ला हुआ, लेकिन बकरों, मुर्गों और मछलियों को बेदर्दी से मार कर खा लिया जाता है, उनकी सुनने वाला कोई नहीं। यह काम धर्म के नाम पर भी हो रहा है, जो समझ पाना मुश्किल है। आदमी को यह खुशफ़हमी है कि बकरों की जान लेने से उसे पुण्य या सवाब प्राप्त होता है। क्या बकरों मुर्गों को बनाने वाला कोई दूसरा है? बकरों-मुर्गों का कहना है कि भगवान का एक मुख्य अवतार मत्स्यावतार है, फिर भी मछलियों को बख्शा नहीं जाता। देहातों में अब भी बकरियों का दूध आदमी के पोषण के काम में आता है। गांधी बाबा बकरी का दूध ही पीते थे। मुर्गी के अंडे पूरी दुनिया में स्वास्थ्यवर्धक माने जाते हैं। फिर भी आदमी अपने स्वाद के लिए इन्हें मारने में एक पल भी नहीं सोचता। भैंसों का दूध बेचकर दुनिया के व्यापारी मोटा मुनाफा कमाते हैं, लेकिन उन्हीं भैंसों को ‘बीफ़’ के रूप में बेचने के पहले कोई विचार नहीं होता।
गाय हमारी माता है, लेकिन गोमूत्र और गोबर बेचकर मुनाफा कमाया जाता है। गाय के दूध और घी से भी मोटा मुनाफा मिलता है, लेकिन मुनाफे का कितना हिस्सा गाय की देखभाल पर खर्च होता है यह जांच का विषय है।
बकरों-मुर्गों का तर्क है कि जब आदमी गुफाओं में रहता था तब उसके पास खाने को कुछ नहीं था। तब वह जंगली जानवरों को मार कर पेट भरता था। लेकिन अब तो उसके पास छप्पन व्यंजन हैं, फिर पशुओं-चिड़ियों पर ज़ुल्म क्यों? बकरे-मुर्गे ने कुत्तों की तरह भौंकते हैं, न किसी को काटते हैं, फिर भी ज़ुल्म का शिकार होते हैं। बकरों की हालत पर समाज में मुहावरे चल पड़े हैं— ‘बलि का बकरा’ और ‘बकरे की मां कब तक खैर मनाएगी?’
बकरों का कहना है कि जंगल के जानवरों और पक्षियों की रक्षा के लिए देश में कानून बन गया है। जो पशु इंसानों को नुकसान पहुंचाते हैं वे भी संरक्षित हो गये हैं। शिकार पर रोक लग गयी है। बंदरों, भालुओं, सांपों, घोड़ों पर अत्याचार दंडनीय हो गया। यहां तक कि कई पौधों के संरक्षण के लिए कानून बन गया है। बकरे-मुर्गे किसी को नुकसान नहीं पहुंचाते, लेकिन उनका पुरसाने-हाल कोई नहीं है।
उनका यह भी कहना है कि आदमी अपने को अहिंसक और शांतिप्रिय कहता है, लेकिन वह जिस तरह निरीह पशु-पक्षियों को मारता और खाता है उसे देखकर इस बात को हज़म कैसे किया जा सकता है?
बकरों ने अफसोस ज़ाहिर किया कि कुत्तों की बाड़ाबंदी पर कई श्वान-प्रेमी आंसू बहाते दिखे, लेकिन बकरों-मुर्गों की किस्मत पर आंसू बहाने वाला कभी कोई नज़र नहीं आया।
© डॉ कुंदन सिंह परिहार
जबलपुर, मध्य प्रदेश
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈







एकदम तरोताज़ा विषय, बेहतरीन व्यंग्य।
साधुवाद!
(अभिव्यक्ति पर व्यंग्य संख्या 300 पार पहुंचने पर बधाई!)
🙏🍀🌺🍀🙏
धन्यवाद, बिष्ट जी।
धन्यवाद, बिष्ट जी।
अच्छा व्यंग्य
धन्यवाद, ठाकुर साहब।