सुश्री इन्दिरा किसलय

☆ लघुकथा ☆ बेटा तो है ना ! ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

शलभ– यार मृतका मिसेज माला का बेटा तो है ना !

प्रतीक– हां है तो —

शलभ–फिर उन्हें सबसे छोटी बेटी ने ही मुखाग्नि दी और कपाल क्रिया भी उसी ने की !

प्रतीक–शायद तुम कुछ भी नहीं जानते ।

शलभ– बरसों पहले ये लोग हमारे पड़ोसी हुआ करते थे। काफी अच्छे रिश्ते थे परिवार से। फिर बरसों बीत गये। मेरा ट्रान्सफर होता रहा — अब लौटकर इसी शहर में आ गया हूं। मुझे स्टाफ के एक सदस्य ने बताया जो उनका रिश्तेदार है। मालाजी के निधन का ऐसे पता चला।

प्रतीक– अब मुझसे सुनो— मालाजी तीसरे एक्सीडेंट के बाद जिन्दा लाश में तब्दील हो चुकी थीं। बेटे बहू ने  पाँच वर्ष तक खूब सेवा की। बेटा मलय पांच वर्ष तक बोलता था। फिर किसी बीमारी के बाद उसकी आवाज़ और सुनने की क्षमता भी चली गयी। उसने स्वयं गूँगा होने के कारण गूँगी लड़की से  ही शादी की।

शलभ—फिर

प्रतीक— फिर क्या! बहू भी पोस्ट ऑफिस में सर्विस करती थी। देखा नहीं  मालाजी की अंतिम यात्रा की तैयारी के समय बहू की मूक बधिर सहेलियां ही लगभग सारा काम संभाल रही थीं।

शलभ–सचमुच अत्यन्त करुण कथा है।

प्रतीक– आगे भी है शलभ। बेटे बहू ने  क्रिश्चियन धर्म स्वीकार कर लिया इस तकलीफ के साथ कि बरसों तक पूजा पाठ पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ करने के बाद भी  इस भगवान ने हमें क्या दिया–केवल जानलेवा दर्द।

शलभ की आँखों में अब किसी सवाल के लिए कोई जगह नहीं बची थी।

©  सुश्री इंदिरा किसलय 

नागपुर

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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