श्री अरुण श्रीवास्तव

(श्री अरुण श्रीवास्तव जी भारतीय स्टेट बैंक से वरिष्ठ सेवानिवृत्त अधिकारी हैं। बैंक की सेवाओं में अक्सर हमें सार्वजनिक एवं कार्यालयीन जीवन में कई लोगों से मिलना   जुलना होता है। ऐसे में कोई संवेदनशील साहित्यकार ही उन चरित्रों को लेखनी से साकार कर सकता है। श्री अरुण श्रीवास्तव जी ने संभवतः अपने जीवन में ऐसे कई चरित्रों में से कुछ पात्र अपनी साहित्यिक रचनाओं में चुने होंगे। उन्होंने ऐसे ही कुछ पात्रों के इर्द गिर्द अपनी कथाओं का ताना बाना बुना है। प्रस्तुत है एक अप्रतिम श्रृंखला सबसे खास: हमारे बॉस” 

☆ कथा-कहानी # १२९ – सबसे खास: हमारे बॉस – भाग – ३ 🥇 श्री अरुण श्रीवास्तव ☆

शीर्षक भ्रमित करता है क्योंकि हमारे माइंडसेट इस तरह बन गये हैं कि व्यक्ति या पद के हमारे आकलन हमारे अनुभवों और अपेक्षाओं पर आधारित होते हैं। हम अक्सर मान लेते हैं कि हमें जो मिला, शायद योग्यता से कम मिला है या फिर ज़रूरत से ज्यादा पा लिया है।कम मिलने पर तो हम निष्पक्षता की गुहार लगाते हुये उत्तरदायित्व रूपी टोपी से उस सर (Head) को सुशोभित करने में रत्ती भर संकोच नहीं करते जो हमारा हेड या बॉस होता है पर अपेक्षा और योग्यता से अधिक मिलने का पूरा श्रेय खुद ही हड़पने में संकोच नहीं करते।पर मान लीजिए कि बॉस की जगह ईश्वर हो तो फिर क्या होता है।जीवन, सिर्फ ऑफिस की चारदीवारों से घिरा नहीं होता, पाना और खोना, कम या ज्यादा, जैकपॉट या सेट बेक सब कुछ ही तो जीवन के अंग ही हैं जिसमें शैशव काल से लेकर वृद्धावस्था तक हर पायदान के परिणाम ईश्वर ने निर्धारित कर दिया है।

अगर मिल गया तो बहुत अच्छा और अगर नहीं मिला तो ये ईश्वर की इच्छा। “जाहे विधि राखे राम, ताहि विधि रहिए “हमारी सनातन काल से चली आ रही जीवनशैली है जो शायद बदलते समय के साथ धूमिल पड़ रही है क्योंकि अधिकांश परिवारों का अपने नौनिहालों के लिए लक्ष्य 95% से शुरू हो रहा है।हम लोगों के सेवाकाल में भी वार्षिक मूल्यांकन में 95% पाना, याने “पदोन्नत” होने का अवसर गंवाना माना जाता रहा था।पर ये नंबर गेम बहुत कुछ छीन लेता है और शुरु हो जाती है रेटरेस। शुक्र है कि ये नंबर गेम हम सभी के जीवनकाल के लिए ईश्वरीय विधान नहीं है। प्रकृति ने सभी को सुनहले पल के उपहार दिये हैं।बहुत कुछ देख पाते हैं पर बहुत कुछ छूट भी जाता है, जो छूट जाता है वो शायद फोकस कहीं और होने से या फिर सर के ऊपर से गुजर जाने जैसा ही होता है।हर पल अपने आप में महत्वपूर्ण होता है जिसमें जीवन पाने से लेकर जीवन खोने तक की संभावनाएं छुपी रहती हैं, “जिंदगी का सफर है ये ऐसा सफर, कोई समझा नहीं, कोई जाना नहीं।है ये ऐसी डगर, चलते हैं सब मगर, कोई समझा नहीं कोई जाना नहीं”।

जीवन चलने का नाम है तो इसी तरह हम सभी और हम सभी के बॉस और उनकी भी बॉस भी इसी परंपरा का पालन करते रहेंगे याने यह श्रंखला जारी रहेगी। 

© अरुण श्रीवास्तव

संपर्क – 301,अमृत अपार्टमेंट, नर्मदा रोड जबलपुर 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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