श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “धीमी गति।)

?अभी अभी # ७८८ ⇒ आलेख – धीमी गति ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

लिप्टन माने अच्छी चाय, और धीमी गति माने स्लो मोशन !कभी आकाशवाणी पर धीमी गति के समाचार प्रसारित होते थे। जब हम किसी को डिक्टेशन देते हैं, तो हमें अपने बोलने की गति को धीमा करना पड़ता है। वह पहले सुनता है, समझता है, और फिर लिखता है। सुनने और लिखने में तालमेल को ही डिक्टेशन कहते हैं।

हिंदी में धीमा और तेज़ के लिए दो शब्द प्रचलित हैं, चुस्त और सुस्त। लोग चुस्ती को तंदुरुस्ती और सुस्ती को बीमारी अथवा आलस्य से जोड़ लेते हैं। लाइफबॉय है जहाँ तंदुरुस्ती है वहाँ। टी वी के एक विज्ञापन में तो एक मोटे बच्चे का साबुन भी स्लो बताया गया है, धीते रहो, धोते रहो ! वहीं एक लड़की सिर्फ हैंड वाश लगाती है, और बैक्टीरिया ग़ायब। साबुन भी कहीं स्लो होता है। विज्ञापन क्या न कराए। ।

कुछ लोग चाय चुस्कियां ले लेकर पीते हैं, गर्म चाय को फूँक मार-मारकर ठंडी होने पर पीते हैं, तो कुछ इधर मुँह पर लगाई, और उधर खत्म। भोजन को चबा-चबाकर खाना चाहिए। कुछ लोग भोजन को चबाते ही रह जाते हैं, और सामने वाला पंगत छोड़कर उठ खड़ा होता है। जीवन में कहीं गति है, तो कहीं धीमी गति। कुछ तेज चलते हैं, कुछ धीमे ! जो धीमे चलते हैं, वे यह मानकर चलते हैं, जल्दी का काम शैतान का। धीरे चलिए, सुरक्षित पहुँचिये। और शैतान बाज़ी मार ले जाता है। इनका निर्णय सुरक्षित रखा रह जाता है।

कुछ लोग तेज आवाज में बात करते हैं, तो कुछ इतना धीरे बोलते हैं, कि शायद वे खुद भी नहीं सुन पाते। जो तेज़ आवाज़ में बात करते हैं, उनकी बात ग़लत होते हुए भी सही प्रतीत होती है, और जो धीमी आवाज़ में बातें करते हैं, वे मनमोहनसिंह कहलाते हैं। ।

कुछ की आवाज़ की गति तेज होती है तो कुछ लोग बड़े आराम से बोलते हैं। उनका एक वाक्य एक पेरेग्राफ जितना लंबा होता है, शब्दों की लंबाई के कारण नहीं, बोलने में ठहराव के कारण। एक उदाहरण पेश है।

हमारे शाखा प्रबंधक बहुत आराम से, रूक-रुककर बातें करते थे। वह मोबाइल का नहीं, ट्रंक कॉल का ज़माना था। बड़ी मुश्किल से कॉल लगता था, और तीन मिनिट में समाप्त हो जाता था। आप या तो कॉल एक्सटेंड करें, या फिर से लगाएं !

सुबह एकाएक उनके केबिन की घंटी बजी, उन्होंने टेलीफोन उठाया ! गुड मॉर्निंग सर, (pause)दिस इज़ बैंक ऑफ इंडिया, (pause) लक्ष्मी बाई नगर ब्रांच, (pause) इंदौर। (एक मिनिट पूरा) आय एम आर. आर. जोशी, (pause) ब्रांच मैनेजर, (pause)स्पीकिंग। ( दो मिनिट पूरे ) व्हाट कैन आय डू फ़ॉर यू सर्। और फ़ोन कट गया। तीन मिनिट पूरे। उन्होंने फिर से फ़ोन लगाया, लाइन नहीं मिली। । (अतिशयोक्ति अलंकार)

जो लोग बहुत आराम से बोलते हैं, उन्हें आप आराम से ही सुन सकते हैं ! अगर आप जल्दी में हैं, तो उनकी पूरी बात शायद ही सुन पाएँ। यही बात धीमी गति और तेज़ गति पर लागू होती है। पति-पत्नी साथ-साथ टहलने निकलते हैं, मुश्किल से दो कदम ही साथ चल पाते हैं, कि पति और पत्नी के बीच फासले बढ़ने शुरू हो जाते हैं। पति महोदय पीछे मुड़कर भी नहीं देखते कि उनकी पत्नी किस मोड़ पर है।

जहाँ गति है, वहाँ विकास है, प्रगति है, उन्नति है ! जहाँ धीमी गति है, वहाँ झुग्गी है, झोपड़ी है, चॉल है। अगर गति तेज है, तो स्मार्ट सिटी है, हेल्थ क्लब है, ट्रेड सेंटर है, ऑर्बिट मॉल है।।

हमारी गति चाहे धीमी हो या तेज़। हम जल्दी जल्दी बोलें या आराम से, कोई फर्क नहीं पड़ता। हम सब अपने गंतव्य तक आराम से पहुँच जाते हैं। जीवन में कहीं कछुआ चाल है, तो कहीं खरगोश की गति और कहीं कहीं तो भेड़-चाल ! हम सबकी गति एक ही होना है। हम सब अपनी अपनी चाल से अपने गंतव्य तक पहुंचें, ईश्वर से यही प्रार्थना है। बहुत भागमभाग है जीवन में, थोड़ा सुस्ता लें।

शायद हमारे लिए ही सचिन दा कह गए हैं –

दम ले ले, दम ले ले घड़ी भर !

ये छैयां पाएगा कहाँ।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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