श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “कर्नाटक संगीत…“।)
अभी अभी # ७९१ ⇒ आलेख – कर्नाटक संगीत
श्री प्रदीप शर्मा
क्या यह शीर्षक कुछ कुछ राग दरबारी जैसा नहीं ! जब किसी ने मुझे राग दरबारी पढ़ने की सलाह दी तो पहले मुझे अपने आप पर हँसी आई, जिसे शास्त्रीय संगीत का सा रे ग म नहीं मालूम, उसे राग दरबारी पढ़ने की सलाह दी जा रही है। लेकिन जब राग दरबारी पढ़नी शुरू की, तो पता चला, व्यंग्य की भी सरगम होती है, कभी खुशी, कभी गम होती है।
कर्नाटक संगीत के साथ ऐसा नहीं ! यह किसी उपन्यास का नाम नहीं। सभी जानते हैं, कर्नाटक एक प्रदश है, जिसकी भाषा कन्नड़ है और जहां कावेरी नदी के जल को लेकर तमिलनाडु से अक्सर विवाद चलता रहता है। कर्नाटक की दो विधाएं महत्वपूर्ण हैं एक नाटक और संगीत। जहां शीर्षक ही कर्नाटक हो, वहां नाटक ना हो, यह संभव नहीं। संगीत की तरह नाटक भी एक विधा है जिसके लिए कर्नाटक जाना जाता है। फिर चाहे वह नाटक थियेटर का हो अथवा राजनीतिक। ।
जब भी देश में कहीं राजनीतिक उथल पुथल हुई है, दलबदल हुआ है, किसी प्रदेश के लोकतंत्र के सेवकों ने अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनी है, विधायकों को किसी सुदूर, गुप्त स्थान पर नजरबंद किया गया है। न जाने क्यों, इस सियासी नाटक के लिए बेंगलुरु एक सुरक्षित स्थान माना गया है। विश्वास अथवा अविश्वास के मत के दौरान ही देश के ये भावी कर्णधार अचानक अज्ञातवास से प्रकट हो जाते हैं, और लोकतंत्र की रक्षा कर उसे और मजबूत कर देते हैं।
एक कुशल अभिनेता और रंगकर्मी गिरीश कर्नाड का नाम किसने नहीं सुना। वे कर्नाटक के ही नहीं, पूरे नाट्य जगत के गौरव रहे हैं। गिरीश कर्नाड के नाटक तुगलक का सभी भाषाओं में सफलतापूर्वक मंचन ही नहीं हुआ, इस नाटक पर उन्हें संगीत नाट्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत भी किया गया है। लोक नाट्य और लोक संगीत में हमारी सभ्यता और संस्कृति रची बसी है। नाटक और संगीत के बिना जीवन नीरस है। ।
कर्नाटक संगीत और हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में बहुत समानता है, क्योंकि जहां सरगम है, वहीं संगीत है। संगीत गायन भी है और वादन भी। एक हिंदी फिल्म आई थी मोहरा। जिसका एक गीत बहुत मशहूर हुआ था। तू चीज बड़ी है मस्त मस्त ! बोल कुछ अटपटे, फूहड़ से लगे थे लेकिन चूंकि यह गीत राग भीम पलासी पर आधारित था, इसलिए खूब चला। इसके बीच के आलाप में आपको कर्नाटक गायन शैली साफ नजर आती है। जो हमारे लिए राग यमन है वह कर्नाटक संगीत में कल्याणी है।
अगर आपने फिल्म पड़ोसन के गीत और संगीत पर ध्यान दिया होगा तो यह उत्तर और दक्षिण के संगीत का एक दुर्लभ फ्यूजन है।
लता का गीत शर्म आती है मगर, अभोगी की एक उत्कृष्ट प्रस्तुति है। राग हंस ध्वनि कर्नाटक शैली का ही राग है।
जा तो से नहीं बोलूं कन्हैया।
राह चलत पकड़ी मोरी बैंया। ।
एक और कमाल।
कहते हैं, संगीत गंधर्व लोक की देन है। कर्नाटक के धारवाड़ जिले में जन्मे शिवपुत्र सिद्धारमय्या कोमकली मठ, जिन्हें हम कुमार गंधर्व के नाम से जानते हैं, इस कथन की पुष्टि करते प्रतीत होते हैं। कर्नाटक शैली के इस गायक ने देवास की माता चामुण्डा देवी की शरण में अपनी संगीत साधना की धूनी ऐसी जमाई कि फिर वापस कर्नाटक जाने का नाम नहीं लिया। भीमसेन जोशी के अभंग से हटकर कबीर के भजनों को मालवी लोकगीतों
की शैली में, अध्यात्म को अपने सुरों में पिरोने का को काम कुमार गंधर्व ने किया वह शास्त्रीय संगीत की अमूल्य धरोहर है। ।
कृष्णा कावेरी का जल जिस तरह कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र, तमिलनाडु की ही नहीं, जन जन की प्यास बुझाती है। हमने देश, प्रदेश ही नहीं, नदी पहाड़ों को भी बांट दिया। कहीं हवा और पानी का भी बंटवारा किया जाता है। कर्नाटक, नाटक और संगीत ही नहीं, अब तो आई टी सेक्टर में भी कमाल दिखा रहा है। नाटक हो या संगीत, हम कैसे भूलें कर्नाटक और वहां के नाट्य पुरुष गिरीश कर्नाड और सवाई कुमार गंधर्व के संगीत और गायन के क्षेत्र में उनके योगदान को। कुमार जी के ही शब्दों में ;
अवधूता, गगन घटा गहराई ..!!
© श्री प्रदीप शर्मा
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