श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “काग के भाग।)

?अभी अभी # ७९४ ⇒ आलेख – काग के भाग ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

अभी काग के भाव बढ़े हुए हैं! पीतल भले ही कभी सोने के भाव न बिके, पितृ-पक्ष में कोयल पीतल है, और कौआ सोना। भक्त और विभक्त में अंतर देखिये! यूँ तो कहने को दोनों ही कवि हैं। लेकिन एक कितना सकारात्मक और एक कितना नकारात्मक।

एक भक्त कवि रसखान हुए हैं, जो कहते हैं –

काग के भाग बड़े सजनी,

हरि हाथ सौं ले गयो माखन रोटी!

और अब एक कलयुगी कवि को देखिये –

कौआ कोयल दोनों काले

पर दोनों के काम निराले।

कांव कांव कौआ करता है

गंदी जगह पेट भरता है

कोयल कू कू बहुत सुहाती

डाल डाल पर वह है गाती।।

सौ दिन कोयल के! लेकिन एक दिन काग का भी होता है, जब हमें डाल पर कोयल की नहीं, काग की तलाश होती है। रसखान की भी उस काग में वही श्रद्धा है, जो हमारी श्राद्ध पक्ष में कौए के लिए होती है। एक का काग हरि के हाथ की रोटी ले जाता है, और दूसरे का काग खीर पूड़ी पर हाथ साफ करता है।

श्रद्धा और भक्ति दोनों में तर्क नहीं चलता! इनके अलावा एक अंध-विश्वास भी होता है ;

भोर होते कागा पुकारे काहे राम!

कौन परदेसी आएगा मोरे धाम।

और देखिये ;

मोरी अटरिया पे कागा बोले

मोरा जीया डोले

कोई आ रहा है।

उधर डाल पर कोई कौआ बोला, इधर किसी मेहमान के आने का अंदेशा हुआ। यानी जब डाकिया और एसएमएस नहीं था, तब कबूतर संदेश ले जाते थे, और कौआ मैसेज पढ़कर सुनाता था।

काँव काँव! Somebody is coming at your place.

लो जी रसखान और हमने तो काग को गुणों की खान साबित कर दिया। अब एक दो अवगुण तो सबमें होते ही हैं जी। फिर भी जब देखो तब कोयल का गुणगान। आप अगर काक-भुशुण्डि की कथा और पढ़ लें, तो रसखान से पूरी तरह सहमत होंगे कि वाकई काग के बड़े भाग हैं।

जब शंकर जी पार्वती जी को राम कथा सुनाते हैं, तो एक काग महाराज वह कथा सुन लेते हैं, और उनका ही जन्म काक-भुशुण्डि के नाम से होता है। अब सुबह -सुबह पूरा शिव-पुराण तो नहीं बाँचा जाता न! आपके भी बड़े भाग, जो आज काग-महात्म्य आपके कानों तक पड़ा।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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