हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #३२३ ☆ आइसोलेशन—प्रमुख ऊर्जा-स्त्रोत… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख आइसोलेशन—प्रमुख ऊर्जा-स्त्रोत। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

(डॉ मुक्ता जी द्वारा रचित एक भजन – मैं तो हर पल तेरा नाम जपूँ  / स्वर- रंजना मजूमदार, सौजन्य – तरूनम चैनल)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # ३२३ ☆

☆ आइसोलेशन—प्रमुख ऊर्जा-स्त्रोत… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

‘ज़िंदगी कितनी ही बड़ी क्यों न हो, समय की बर्बादी से छोटी बनायी जा सकती है’ जॉनसन की यह उक्ति आलसी लोगों के लिए रामबाण है, जो अपना समय ऊल-ज़लूल बातों में नष्ट कर देते हैं; आज का काम कल पर टाल देते हैं; जबकि कल कभी आता नहीं। ‘जो भी है, बस यही एक पल है/ कर ले पूरी आरज़ू’ फिल्म वक्त की ये पंक्तियां भी आज अथवा इसी पल की सार्थकता पर प्रकाश डालते हुए अपनी इच्छाओं की पूर्ति करने अथवा जीने का संदेश देती हैं। कबीरदास जी का यह दोहा ‘काल करे सो आज कर, आज करे सो अब/ पल में प्रलय होएगी, मूरख करेगा कब ‘ आज अर्थात् वर्तमान की महिमा को दर्शाते हुए वे सचेत करते हैं कि ‘कल कभी आने वाला नहीं और कौन जानता है, कौन-सा पल आखिरी पल बन जाए और सृष्टि में प्रलय आ जाए। चारवॉक दर्शन का संदेश ‘खाओ, पीओ और मौज उड़ाओ’ आज की युवा-पीढ़ी के जीवन का लक्ष्य बन गया है। इसीलिए वे आज ही अपनी हर तमन्ना पूरी कर लेना चाहते हैं। कल अनिश्चित है और किसने देखा है? इसलिए वे भविष्य की चिंता नहीं करते; हर सुख को इसी पल भोग लेना चाहते हैं। वैसे तो कौन जानता है कि अगली सांस आए या नहीं। सो! कल के बारे में सोचना, कल की प्रतीक्षा करना और सपनों के महल बनाने का औचित्य नहीं है।

ऐसी विचारधारा के लोगों का आस्तिकता से कोसों दूर का नाता होता है। वे ईश्वर की सत्ता व अस्तित्व को नहीं स्वीकारते तथा अपनी ‘मैं’ अथवा अहं में मस्त रहते हैं। उनकी यही अहं अथवा सर्वश्रेष्ठता की भावना उन्हें सबसे दूर ले जाती है तथा आत्मकेंद्रित कर देती है। वास्तव में एकांतवास अथवा आइसोलेशन–कारण भले ही कोरोना हो, हमें आत्मावलोकन का अवसर प्रदान करते हैं। कोरोना वायरस ने भले ही पूरे विश्व में तहलक़ा मचा रखा है, परंतु उसने हमें अपने घर की चारदीवारी में, अपने प्रियजनों के सानिध्य में रहने और बच्चों के साथ मान-मनुहार करने का अवसर प्रदान किया है। परंतु अक्सर लोगों को वह भी पसंद नहीं आया। मौन एकांत का जनक है; जो हमें स्वयं से रू-ब-रू करने का अवसर प्रदान करता है और सृष्टि के विभिन्न रहस्यों को उजागर करता है। सो! एकांतवास की अवधि में हम आत्मचिंतन कर ख़ुद से मुलाकात कर सकते हैं; जो जीवन में असफलता व तनाव से बचने के लिए ज़रूरी है। इतना ही नहीं, यह स्वर्णिम अवसर है; अपनों के साथ रहकर समय बिताने का; ग़िले-शिक़वे मिटाने का; ख़ुद में ख़ुद को तलाशने का; मन के भटकाव को मिटा कर अंतर्मन में प्रभु के दर्शन पाने का। सो! एकांत वह सकारात्मक भाव है, जो हमारे अवचेतन मन को जाग्रत कर, सर्वश्रेष्ठ को बाहर लाने अथवा अभिव्यक्ति प्रदान करने में सहायक सिद्ध होता है। आपाधापी भरे आधुनिक युग में रिश्तों में खटास व अविश्वास से उपजा अजनबीपन का एहसास मानव को अलगाव की स्थिति तक पहुंचाने का एकमात्र कारण है, कारक है और व्यक्ति उस मानसिक प्रदूषण अर्थात् चिंता, तनाव व अवसाद की ऊहापोह से बाहर आने का भरसक प्रयास करता है।

जब व्यक्ति एकांतवास में होता है, जीवन की विभिन्न घटनाएं मानस-पटल पर सिनेमा की रील की भांति आती-जाती रहती हैं और वह सुख-दु:ख की मन:स्थिति में डूबता-उतराता रहता है। इस मनोदशा से उबरने का साधन है एकांत, जिसका प्रमाण हैं– लेखक, गायक और प्रेरक वक्ता विली जोली, जो 1989 में न्यूज़ रूम कैफ़े में अपना कार्यक्रम पेश किया करते थे। उनकी लाजवाब प्रस्तुति के लिए उन्हें अनगिनत पुरस्कारों व सम्मानों से नवाज़ा गया था। परंतु मालिक के छंटनी के निर्णय ने उन्हें आकाश से धरा पर ला पटका और उन्होंने कुछ दिन तक एकांत अर्थात् आइसोलेशन में रहने का निर्णय कर लिया। एक सप्ताह तक आइसोलेशन की स्थिति में रहने के पश्चात् उनकी ऊर्जा, एकाग्रता व कार्य-क्षमता में विचित्र-सी वृद्धि हुई। सो! उन्होंने अपनी शक्तियों को संचित कर स्कूलों में प्रेरक भाषण देने प्रारंभ कर दिए और वे बहुत प्रसिद्ध हो गये। एक दिन लुइस ब्राउन ने उन्हें अपने साथ कार्यक्रम आयोजित करने को आमंत्रित किया; जिसने उनकी ज़िंदगी को ही बदल कर रख दिया। इससे उन्हें एक नई पहचान मिली, जिसका श्रेय वे क्लब-मालिक के साथ-साथ आइसोलेशन को भी देते हैं। इस स्थिति में वे गंभीरता से अपने अवगुणों व कमियों को जानने के पश्चात् तनाव से मुक्ति प्राप्त कर सके। सो! एकांतवास द्वारा हम अपने हृदय की पीड़ा व दर्द को, अपनी आत्मचेतना को जाग्रत करने के पश्चात् अदम्य साहस व शक्ति से सितारों में बदल सकते हैं अर्थात् अपने सपनों को साकार कर सकते हैं।

ब्रूसली के मतानुसार ‘ग़लतियां हमेशा क्षमा की जा सकती हैं; यदि आपके पास उन्हें स्वीकारने का साहस है।’ दूसरे शब्दों में यह ही प्रायश्चित है। परंतु अपनी भूल को स्वीकारना दुनिया में सबसे कठिन कार्य है, क्योंकि हमारा अहं इसकी अनुमति प्रदान नहीं करता; हमारी राह में पर्वत की भांति अड़कर खड़ा हो जाता है। अब्दुल कलाम जी के मतानुसार ‘इंसान को कठिनाइयों की भी आवश्यकता होती है। सफलता का आनंद उठाने के लिए यह ज़रूरी और अकाट्य सत्य भी है कि यदि जीवन में कठिनाइयां, बाधाएं व आपदाएं न आएं, तो आप अपनी क्षमता से अवगत नहीं हो सकते।’ कहां जान पाते हो आप कि ‘मैं यह कर सकता हूं?’ सो! कृष्ण की बुआ कुंती का कृष्ण से यह वरदान मांगना इस तथ्य की पुष्टि करता है कि ‘उसके जीवन में कष्ट आते रहें, ताकि प्रभु की स्मृति बनी रहे।’ मानव का स्वभाव है कि वह सुख में उसे कभी याद नहीं करता, बल्कि स्वयं को ख़ुदा अर्थात् विधाता समझ बैठता है। ‘सुख में सुमिरन सब करें, दु:ख में करे न कोई / जो सुख में सुमिरन करे, तो दु:ख काहे को होय’ अर्थात् सुख-दु:ख दोनों स्थितियों में प्रभु की सुधि बनी रहे… यही सफल जीवन का राज़ है। मुझे याद आ रहा है वह प्रसंग–जब एक राजा ने भाव-विभोर होकर संत से अनुरोध किया कि वे प्रसन्नता से उनकी मुराद पूरी करना चाहते हैं। संत ने उन्हें कृतज्ञता-पूर्वक मनचाहा देने को कहा। सो! राजा ने राज्य देने की पेशकश की, जिस पर उन्होंने कहा –राज्य तो जनता का है,  तुम केवल उसके मात्र संरक्षक हो। महल व सवारी भेंट-स्वरूप देने के अनुरोध पर संत ने उन्हें भी राज-काज चलाने की सुविधाएं मात्र बताया। तीसरे विकल्प में राजा ने देह-दान की अनुमति मांगी। परंतु संत ने उसे भी पत्नी व बच्चों की अमानत कह कर ठुकरा दिया। अंत में संत ने राजा के अनुरोध पर उसे अहं त्यागने को कहा, क्योंकि वह सबसे सख्त बंधन होता है। अंततः राजा को अहं त्याग करने के पश्चात् असीम शांति व अलौकिक आनंद की अनुभूति हुई।

‘कलयुग केवल नाम आधारा,’ अंतर्मन की शुद्धता के लिए कलयुग में नाम-स्मरण ही पाप-कर्मों से मुक्ति पाने का साधन है। जब अंतस शुद्ध होगा, तो केवल पुण्य कर्म होंगे और पापों से मुक्ति मिल जाएगी। विकृत मन से अधर्म व पाप होंगे। हृदय की शुद्धता, प्रेम, करुणा व ध्यान से प्राप्त होती है… उसे पूजा-पाठ, तीर्थ-यात्रा व धर्म-शास्त्र के अध्ययन से पाना संभव नहीं है। सो! जहां अहं नहीं; वहां स्नेह, प्रेम, सौहार्द, करुणा व एकाग्रता का निवास होता है। आशा, विश्वास व निष्ठा जीवन का संबल हैं। तुलसीदास जी का ‘एक भरोसो, एक बल, एक आस विश्वास/ एक राम, घनश्याम हित चातक तुलसीदास।’ जीवन में डूबते को तिनके का सहारा अर्थात् घोर अंधकार व संकट में आशा की किरण भले ही जुगनू के रूप में हो; उसका पथ-प्रदर्शन करती है; धैर्य बंधाती है; हृदय में आस जगाती है। ‘नर हो ना निराश करो मन को/ कुछ काम करो, कुछ काम करो’ मानव को निरंतर कर्मशीलता के साथ आशा का दामन थामे रखने का संदेश देती है…यदि एक द्वार बंद हो जाता है, तो किस्मत उसके सम्मुख दस द्वार खोल देती है। सो! उम्मीद जिजीविषा की सबसे बड़ी ताकत है। राबर्ट ब्रॉउनिंग का यह कथन ‘आई ऑलवेज रिमेन ए फॉइटर/ सो वन, फॉइट नन/ बैस्ट एंड द लॉस्ट।’ सो! उम्मीद का दीपक सदैव जलाए रखें। विनाश ही सृजन का मूल है। भूख, प्यास, निद्रा –आशा व विश्वास के सम्मुख नहीं टिक सकतीं; वे मूल्यहीन हैं।

आइसोलेशन मन की वह सकारात्मक सोच है, जिसमें मानव समस्याओं को नकार कर स्वस्थ मन से चिंतन-मनन करता है। चिंता मन को आकुल-व्याकुल व हैरान-परेशान करती है और चिंतन सकारात्मकता प्रदान करता है। चिंतन से मानव सर्वश्रेष्ठ को पा लेता है। राबर्ट हिल्येर के शब्दों में ‘यदि आप अपना सर्वश्रेष्ठ दे रहे हैं, तो आपके पास असफलता की चिंता करने का समय ही नहीं रहेगा।’ असफलता हमें चिंतन के अथाह सागर में अवगाहन करने को विवश कर देती है, तो सफलता चिंतन करने को, ताकि वह सफलता की अंतिम सीढ़ी पर पहुंच सके। सो! एकांतवास वरदान है, अभिशाप नहीं; इसे भरपूर जिएं, क्योंकि यह विद्वत्तजनों की बपौती है; जो केवल भाग्यशाली लोगों के हिस्से में ही आती है। इसलिए आइसोलेशन के अनमोल समय को अपना भाग्य कोसने व दूसरों की निंदा करने में नष्ट मत करें। जीवन में जब जो, जैसा मिले, उसमें संतोष पाना सीख लें; आप दुनिया के सबसे महान् सम्राट् बन जाएंगे। जीवन में चिंता नहीं, चिंतन करें…यही सर्वोत्तम मार्ग है; उस सृष्टि-नियंता को पाने का; आत्मावलोकन कर विषम परिस्थितियों का धैर्यपूर्वक सामना कर सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने का। सो! हर पल का आनंद लें, क्योंकि गुज़रा समय कभी लौट कर नहीं आता तथा उसके लिए अपेक्षित है; अहम् का त्याग;  अथवा अपनी ‘मैं’  को मारना। जब ‘मैं’… ‘हम’ में परिवर्तित हो जाता है, तो ‘तुम’ का भाव अदृश्य हो जाता है। यही है अलौकिक आनंद की स्थिति; राग-द्वेष व स्व-पर से ऊपर उठने की मनोदशा, जहां केवल ‘तू ही तू’ अर्थात् सृष्टि के कण-कण में प्रभु ही नज़र आता है। सो! आइसोलेशन अथवा एकांत एक बहुमूल्य तोहफ़ा है… इसे अनमोल धरोहर-सम स्वीकारिए व सहेजिए तथा जीवन को उत्सव समझ, आत्मोन्नति हेतु हर लम्हे का भरपूर सदुपयोग कर अलौकिक आनंद प्राप्त कीजिए।

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© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ४१४ ☆ अदब के आफताब का अस्त: डॉ. बशीर बद्र को भावभीनी श्रद्धांजलि ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४१४ ☆

?  आलेख – अदब के आफताब का अस्त: डॉ. बशीर बद्र को भावभीनी श्रद्धांजलि ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

उर्दू अदब के इतिहास में, शायरी की दुनिया को अपनी सादगी से रोशन करने वाले अज़ीम शायर, पद्मश्री डॉ. बशीर बद्र ने 91 वर्ष की आयु में भोपाल में अपनी अंतिम सांस ली।

शब्दों का प्रणाम।

बशीर साहब का जाना एक जिस्म का रुखसत होना नहीं , बल्कि उर्दू गज़ल के उस सुनहरे दौर का अवसान है जिसने शायरी को महलों और दरबारों से निकालकर आम आदमी की दहलीज पर ला खड़ा किया था।

अयोध्या की सरज़मीं पर जन्मे और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से तालीम हासिल कर प्रोफेसर बने बशीर बद्र ने ताउम्र शब्दों की साधना की। उन्होंने भारी-भरकम और जटिल उर्दू अल्फ़ाज़ के बजाय आम बोलचाल की जुबान को अपनी गज़लों का जेवर बनाया। यही वजह है कि उनकी शायरी सीधे रूह में उतर जाती है।

बशीर बद्र साहब की विदाई के इस गमगीन मौके पर उनकी ही लिखी पंक्तियां आज हमारी भावनाओं को ज़बान दे रही हैं। ज़िंदगी के फलसफे और इसके आखिरी पड़ाव को उन्होंने बरसों पहले जिस खूबसूरती से पिरोया था, वह आज पूरी तरह मौजूं बैठता है।

“उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,

न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए।”

आज वाकई बशीर साहब की जिंदगी की शाम हो गई है, लेकिन वे जाते-जाते हमारे पास अपनी यादों और गजलों के ऐसे चिराग छोड़ गए हैं, जिनकी रोशनी कभी मद्धम नहीं पड़ेगी।

उनके सफर का थमना हमें उनकी उस बेहद मशहूर गज़ल की याद दिलाता है ,जिसे फिल्म मसान में भी बेहद शिद्दत के साथ इस्तेमाल किया गया था ।

“मुसाफ़िर हैं हम भी, मुसाफ़िर हो तुम भी,

किसी मोड़ पर फिर मुलाक़ात होगी।”

 बशीर बद्र जी मानवीय संवेदनाओं और मोहब्बत के अमर हस्ताक्षर थे ।

उन की शायरी की सबसे बड़ी ताकत यह थी कि वे हर दिल के जज्बात को बखूबी शब्द देना जानते थे।

समाज का दर्द हो, मोहब्बत की कशिश हो या फिर इंसानी रिश्तों की मजबूरियां, उन्होंने हर रंग को अपनी कलम से मुकम्मल किया।

आइए, अदब के इस उस्ताद के कुछ और चुनिंदा और बेहद मकबूल शेरों के जरिए उनके फन को याद करें।

रिश्तों की नाजुकता और जुदाई पर..

 “कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से,

ये नए मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से मिला करो।”

सियासत और समाज के दर्द पर…

“लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में,

तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में।”

मोहब्बत के हसीन और मुकम्मल अहसास पर..

“कोई मिल तो जाएगा मगर तुम्हारी तरह कौन चाहेगा,

चलो मय-कदे में वहीं बात होगी।”

रिश्तों के टूटने और बिखरने के सलीके पर…

“दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे,

जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिंदा न हों।”

बशीर बद्र साहब ने अपने जीवन के आखिरी तीन दशक भोपाल की आबो-हवा में गुजारे। भोपाल की इस ऐतिहासिक और साहित्यिक सरज़मीं की यह तासीर रही है कि इसने हमेशा बड़े फनकारों को अपनी गोद में पनाह दी है और निखारा है। जब हम बशीर बद्र के अवदान को देखते हैं, तो स्वतः ही भोपाल के उन समकक्ष और समकालीन दिग्गजों की याद हो आती है जिन्होंने अपने-अपने दौर में शब्दों की हुकूमत चलाई।

एक तरफ जहाँ दुष्यंत कुमार ने इसी भोपाल की ज़मीन से हिंदी गज़ल को आम आदमी के गुस्से और व्यवस्था के खिलाफ तल्खी का हथियार बनाया और कहा कि *’सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं, मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए’, वहीं दूसरी तरफ शरद जोशी ने अपने तीखे और बेबाक व्यंग्य से सत्ता और समाज की विसंगतियों की धज्जियां उड़ा दीं।

जहाँ दुष्यंत की गज़ल में इंकलाब की तड़प थी और शरद जोशी के लेखन में समाज को आईना दिखाने वाला अचूक तंज था, वहीं बशीर बद्र ने इस त्रिवेणी में अपनी बेहद मखमली, रूमानी और सीधे दिल को छू लेने वाली गज़लियत का रंग घोला था।

 इन महान रचनाकारों की उपस्थिति ने भोपाल को अदब का एक ऐसा वैश्विक केंद्र बना दिया, जिसकी चमक कभी फीकी नहीं पड़ सकती।

 आज बशीर साहब के जाने से भोपाल की साहित्यिक थाती का एक और विशाल स्तंभ ढह गया है।

बशीर बद्र जी के साथ उनके एक युग का अंत, हुआ है पर उनकी किताबें और यादें हमेशा जिंदा रहेंगी।

डॉ. बशीर बद्र केवल पन्नों पर लिखे जाने वाले शायर नहीं थे, वे मुशायरों की जान और महफिलों की धड़कन थे। उन्होंने उर्दू अदब को जो मिजाज और रूमानी शिद्दत दी, उसका कोई दूसरा सानी नहीं है। उनका काव्य हिंदी और उर्दू की भोपाल की साझी तहजीब का ऐसा अनमोल दस्तावेज है, जो पीढ़ियों तक इंसानी दिलों को आपस में जोड़ने का काम करता रहेगा।

शायर कभी मरते नहीं, वे अपने शेरों के जरिए कायनात के हर जर्रे में हमेशा के लिए अमर हो जाते हैं। बशीर साहब भले ही आज हमारे बीच जिस्मानी तौर पर मौजूद नहीं हैं, लेकिन दुष्यंत और शरद जोशी की तरह वे भी अपने कालजयी शब्दों के जरिए भोपाल की फिजाओं में , यहां के तालाब में बनते उनके अक्स में हमेशा के लिए रचे-बसे रहेंगे।

उर्दू अदब के इस बेताज बादशाह को अश्रुपूर्ण और कोटि-कोटि श्रद्धांजलि।

खुदा उनकी रूह को सुकून बख्शे ।

 ☆

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

लंदन प्रवास पर

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १००३ ⇒ घूंट घूंट चिंतन ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “घूंट घूंट चिंतन…“।)

?अभी अभी # १००३ ⇒ आलेख – घूंट घूंट चिंतन ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

मन की कई अवस्थाएं होती हैं। एक शांत मन होता है, जिसमें विचारों की भीड़ जमा नहीं होती, वहीं दूसरी ओर एक उत्तेजित मन ऐसा भी होता है, जहां विचारों का जमघट लगा रहता है। कहीं लहर है, तो कहीं तूफान और कहीं प्रशांत महासागर।

उनके खयाल आए, तो आते चले गए। विचारों के सैलाब को थामने के लिए, कागज़ पर कलम चलाने के लिए मूड बनाया जाता है। खिड़की खोली जाती है, पंखा चलाया जाता है, मौसम के हिसाब से ठंडा गरम हुआ जाता है। सुबह सुबह तो चाय का प्याला कमाल कर जाता है, चुस्कियों के साथ चुटकियों में कलम सरपट दौड़ने लगती है।।

बच्चों का मन बड़ा चंचल होता है, खेलते वक्त उन्हें खाने पीने की कोई फिक्र नहीं होती। मां आवाज देती है, दूध पीकर खेलने जाओ। बच्चा, बचने का बहाना बनाता है, अभी गर्म है। मां उसकी चालाकी समझती है, तुरंत ठंडा कर देती है, फीका है, एक और बहाना। मां दूध में हॉर्लिक्स मिला देती है, चलो अब जल्दी गट गट पी जाओ, फिर चॉकलेट भी दूंगी। और बच्चा एक सांस में गट गट, पूरा ग्लास खाली कर देता है।

जो लोग स्वाद के शौकीन होते हैं, वे चाय हो अथवा दूध, आराम से घूंट घूंट पीते हैं। हमने वह जमाना भी देखा है जहां कॉफी हाउस में एक कप कॉफी और सिगरेट के सहारे लोग घंटों समय काटा करते थे। एक एक चाय का घूंट और हर फिक्र को धुएं में उड़ाने का अंदाज़। सार्वजनिक स्थानों पर आज भले ही धूम्रपान वर्जित हो गया हो, लेकिन आज भी केसर के दाने दाने में दम है। चोर, चोरी से जाए, हेराफेरी से ना जाए।।

जो शायर कम्युनिस्ट होते हैं, वे बदनाम होते हैं। खुले आम शराब पीते हैं, और कहते हैं ;

मैने पी शराब !

तुमने क्या पीया ?

आदमी का खून ….

पीने पिलाने की भी तहजीब होती है। शराब की चुस्कियां नहीं ली जाती, पेग पीये, पिलाये जाते हैं, कहीं घूंट घूंट, तो कहीं बच्चों की तरह गटागट। कहीं शराब गम गलत करती है, तो कहीं खुशी बढ़ाती है।

और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा।

राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा।।

एक आम आदमी की जिंदगी भी क्या है। वहां रोज संघर्ष है, मान अपमान है, राग द्वेष है,

महत्वाकांक्षा है, हार जीत है, पेशेवर ईर्ष्या (professional jealousy) है। आए दिन कभी उसे अपमान का घूंट

पीना पड़ता है, तो कभी जहर का। कभी उसका खून जल रहा है, तो कभी वह बेबस, लाचार सिर्फ खून का घूंट पीकर ही रह जाता है।

घुट घुटकर जीने से तो अच्छा है, दो घूंट ही लगा लें। हम पीने पिलाने से इत्तेफाक नहीं रखते, क्योंकि यह आपका जाती मामला है। फिर भी

हम किसी को खून का घूंट पीने से नहीं रोक सकते। ऐसी परिस्थितियों में मुकेश का यह गीत हमारा शॉक ऑब्जर्वर का काम करता है ;

जब ग़म ए इश्क़ सताता

है तो हँस लेता हूँ।

हादसा याद ये आता

है तो हँस लेता हूँ।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ “हमारी जेब हमारा चेहरा…” ☆ श्री सुधीर मोता ☆

श्री सुधीर मोता

?  आलेख – हमारी जेब हमारा चेहरा… ? श्री सुधीर मोता ☆

उस जेबकतरे ने मेरे चेहरे और हाव भाव से अनुमान लगा लिया होगा कि इसकी जेब में माल है , तभी ना उसने मेरी जेब में हाथ डालने की कोशिश की । यह उस की कला है जो उसके रोजगार में काम आती है । कह नहीं सकता कि अगर वह सफल हो जाता तो अपने को उतना ही समृद्ध अनुभव करता जितना मैं वह सौ के इकलौते नोट की संपदा जेब में ले कर घूमने में कर रहा था या मेरे उसकी उम्मीद से घटिया निकलने पर मन ही मन मुझे गालियां दे रहा होता। जो भी हो उस घटना ने जो कि आगे बढ़ते बढ़ते रूक गई मुझे सचेत कर दिया। मुझे वह कला सीखना होगी जिससे मेरा चेहरा और हाव भाव देख कर अनुमान ही न लगाया जा सके कि यह अनमना सा लगता इंसान किस हद तक मालदार या कड़का है। मैं सौ रूपये जेब में ले कर इतना फूला न समाया घूम रहा था कि मेरे बेहद मालदार होने जैसे हाव भाव चेहरे पर थे। अब मुझे अपने बारे में कुछ करना होगा । मैं गूगल गुरू की शरण में जा ही रहा था कि मेरी नजर एक समाचार पर ठिठक गई । किसी के घर एक दुर्घटना हुई या हुवाई गई और उसके एक कमरे में करोड़ों के अधजले नोट पाये गये । मैंने खबर विस्तार से पढ़ी उस व्यक्ति की फोटो भी देखीं, उसके कामकाज के बारे में जाना। फिर इतने ज्ञान के साथ गूगल गुरू की शरण में चला गया। 

वहां ऐसी घटनायें भरी पड़ीं थीं । किसी की कार में करोड़ों का सोना। किसी के घर में करोड़ों के नोट। ये व्यक्ति मेरे गुरू बन सकते हैं जिनसे सीख कर मैं किसी भी जेबकतरे को चकमा दे सकता हूं। इन लोगों के चेहरे से तो कोई अनुमान नहीं लगा पाया कि वे कितनी दौलत के ढेर पर बैठे हैं। ये अपनी नौकरी, अपना कामकाज यूं कर रहे थे जैसे कोई भी और करता है । एक साबुन के विज्ञापन में एक महिला की त्वचा से उम्र का पता ही नहीं चलता वाली बात कही गई वैसे ही इन लोगों की चमड़ी चाल ढाल से किसी को पता तक ना चला कि वे इतनी अकूत दौलत के स्वामी हैं । मैं इन लोगों की फोटो को बड़ा कर कर के देखता हूं शायद कहीं से पता चले । बिल्ली जब मलाई या दूध की तपेली चाट चूट कर उतने ही दबे पांव निकलती है तो गृह स्वामिनी पल में समझ जाती है कि उसके चेहरे पर के भाव क्या कह रहे हैं । पर ये भाई साब होन ? घर में इतना मालपानी भरा पड़ा और आपकी शक्ल यूं जैसे पहली तारीख को तनख्याह ना मिले तो आप भूखे ही मर जायें । कहां से लाते हो भाई इतनी सादगी ?

मुझे लगता है अगर आप चेहरे पर सदा भूख के भाव रखें तो दुनिया को भरम में रख सकते हैं । जैसे अगर आप ने एक करोड़ का धन आनन फानन में अर्जित कर लिया जो कि जाहिर है किसी ऐसे स्रोत से आया होगा जो मान्य नहीं है पर प्रचलित भरपूर है तो आप दूसरे एक या अधिक करोड़ की जुगाड़ में जुट जाईये। जैसे कोई मछली पकड़ने वाला या बगुला मग्न होकर नदी सरोवर समुद्र किनारे ताक में बैठा रहता है वैसे ही। मजाल है कोई आप को चीन्ह सके कि आप के तो घर में अपार धन रूपी मत्स्य संपदा भरी पड़ी है। आप यूं बैठे रहिये कि इस प्रयास के सफल होने पर ही आपके घर का चूल्हा जल सकेगा। आपके बच्चों की स्कूल की फीस भरी जा सकेगी । दोस्तों के साथ आप चाय पीने जायेंगे तो शायद इस बार आप का हाथ जेब में जाये तो कुछ पैसे ले कर बाहर निकले। मैं बता देना चाहता हूं कि ये सब कुछ मुझे गूगल गुरू ने नहीं बताया । मैंने खुद उन लोगों का प्रोफाईल देख कर ये लाभप्रद सीखें अपने लिये अर्जित कर लीं । पर उस से क्या ? हम भी रहे ढोर के ढोर ही । आदतें इतनी आसानी से नहीं जातीं । शऊर भी यूं एकाएक नहीं आ सकता । जिनके घर में करोड़ो के नोट बमुश्किल अपने भीतर के ताप को दबाये रहे और अंततः कोई चिंगारी भड़की जिसने रहस्य लगभग खोल ही दिया , उसके तप को और ताप दबाये रखने की क्षमता की आप तनिक भी प्रशंसा नहीं करेंगे ? और इसके बाद भी तो देखिये कितना ही बड़ा मनोवैज्ञानिक होगा उन महानुभाव के चेहरे को पढ़़ सके इतनी प्रतिभा उसमें नहीं होगी।

तो अब किया क्या जाये ? एक जेबकतरे ने हमें झकझोर कर रख दिया और इस उम्र में हमें पता है कि हम कहते ज़रूर हैं कि दुनिया न बदल पायें अपने को ज़रूर बदलेंगे पर होता यह है कि हम तनिक-सा बदलते हैं दुनिया अपने को पट से भारी बदल लेती है । लोगों के घरों से, मोटर गाड़ियों से करोड़ों की दौलत संयोग से धरी पकड़ाई जाती है पर जिनकी नहीं पकड़ी जाती उनकी संख्या हज़ारो लक्खों गुनी है। हम अपनी जेब की दौलत को किस तरह उजागर न होने दें वह कला हमें कौन सिखायेगा ? उतने तक तो ठीक , हमारी जेब में सौ के नोट की जगह एकाध लाख की दौलत से भरा बटुआ है ये कैसे लग जाता है दुनिया वालों को। ये मुस्काते रहने वाली मुद्रा और सदा संतोषी दिखते रहने का छदम कैसे लाद लिया हमने अपने पे के हमें पता ही ना चला और हमारी ऐसी नुकसानदेह इमेज बन गई ? अब इसका हर कोई अलग मीनिंग निकाल लेता है मौके बे मौके। जेब कतरे तो दृश्य में कभी कभार ही आते हैं , बकिया वक्त में कितनी तपती निगाहें हमें घूरती रहती हैं हम ही जानते हैं। 

हमें तो लगता है हमारे पसीने की गंध ही इतनी भन्नाट है कि लाख छुपाओ ये दौलत प्रकट हो ही जाती है और जित्ती है उससे अधिक ही समझ आती दुनिया को। कम पसीने से धन कमा सकें ऐसी कोई तरकीब किस उस्ताद या गुरू से मिलेगी ? या ऐसा कुछ हो सके कि कमाई हो और पसीना ही न निकले। एक पूरी रात मंथन करने के बाद हमें अपने में जो खोट है वह समझ आ ही गई। जब तक हम अपने को ये समझा कर तैयार नहीं कर लेंगे कि जितना हमारी जेब में है या जितना हमने कमाया हम उससे अधिक के लायक हैं तब तक हमारा कुछ नहीं होने का । जेबकतरे हम पर घात करते रहेंगे और निराश होते रहेंगे, हम ऐसी खबरें पढ़ पढ़ कर सीखने की नाकाम कोशिश करते रहेंगे। खुद अपने को अपनी औकात कुछ बढ़ा चढ़ा कर बताने की कोशिश कर देखते हैं हैं एकाध बार। शायद कुछ हो सके। ये तो साबित हो ही चुका है कि खोट हम में ही है । देखिये न अभी अभी अपना हाथ अपनी फूली हुई जेब पर चला गया। जुकाम के कारण गीला, मुचा हुआ रूमाल और कुछ बिल ठुंसे थे जेब में। जेबकतरों और दुनिया के इस-उस टाइप के लोगों के और स्वयं अपने हित में हमें अपने आप को बदलना ही होगा, वरना जेबकतरे तक हमें ब्लेकलिस्ट कर देंगे। शायद अपने को हिंदी लेखक के रूप में प्रसिद्ध करवाने से कुछ बात बने , पर वह भी तो नहीं आता हमें। लगता है बिना जेब वाला वह अंतिम वस्त्र धारण करने तक हमारा कुछ नहीं होने का।

☆

© श्री सुधीर मोता

संपर्क – राजविला 2 बी सिविल लाइन्स भोपाल 462 002. फोन 9303138889

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १००२ ⇒ फकीर की लकीर ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “फकीर की लकीर…“।)

?अभी अभी # १००२ ⇒ आलेख – फकीर की लकीर ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

लकीर तो लकीर होती है, क्या फकीर की और क्या साहूकार की। लकीर के फकीर तो हम लोगों ने बहुत देखे हैं लेकिन कभी किसी फकीर को लकीर पर चलते नहीं देखा। संत और सीकरी का जो रिश्ता होता है, वही रिश्ता एक फकीर का लकीर से होता है। फकीर न तो किसी लकीर पर चलते हैं और न ही अपने बाद कोई लकीर छोड़ जाते हैं।

लेकिन इन भक्तों को कौन समझाए। वे उसी लीक, उसी लकीर पर चलने की कोशिश करते हैं, जिस पर कभी फकीर चला था। फकीर तो फकीर था, जिस रास्ते पर चला, उसके कदमों के निशान ही लकीर बन गए। वह तो मंजिल तक पहुंच गया, भक्त फकीर की लकीर को ही पत्थर की लकीर समझ बैठे और वक्त की लकीर को ही पीटते रहे। यही लकीर आगे चलकर पंथ बन जाती है।।

कहीं लकीर है, कहीं रेखा है तो कहीं दीवार है। हमने अपनी सुविधा और स्वार्थ की खातिर कई लकीरें खींची हैं, कितनी ही लक्ष्मण रेखाओं का उल्लंघन किया है। हमने कभी कोशिश नहीं की कि अमीरी और गरीबी की लकीर को मिटाया जाए।

हमें हमेशा यही सिखाया गया है कि अगर किसी लकीर को छोटा करना हो तो उसके पास एक बड़ी लकीर और खींच दो। गरीबी मिटाने का सबसे आसान तरीका है, आप अमीर बन जाओ। सुविधा और स्वार्थ की खातिर पाला बदलना, इस लकीर को लांघ उधर निकल जाना ही सफलता की कुंजी है। लकीर फकीरों के लिए नहीं बनी। हम जैसे समझदारों के लिए बनी है।

मैं कोई फकीर नहीं। लेकिन मुझे लकीर पर चलने का शौक है। पक्की सड़क के किनारे पर जहां भी मुझे कोई लंबी मोटी चूने की लकीर नजर आती है, मैं उस पर चलना शुरू कर देता हूं। मेरे लिए यह एक अभ्यास है, शारीरिक और मानसिक संतुलन का एक ऐसा तरीका है, जिसका किसी पंथ और विचार से कोई लेना देना नहीं। मैं जानता हूं, यह लकीर मेरी मंजिल नहीं, अपना प्रयोजन सिद्ध होते ही मुझे इस लकीर से किनारा करना है। कोई जरूरी नहीं कि लकीर पर चलने की इस कला का, किसी नट की तरह, दो बांसों के बीच, किसी रस्सी पर चलकर प्रदर्शन किया जाए।

जो बीच सड़क पर सीना तानते हुए, यातायात में बाधा पहुंचाते हुए, स्वयं एक पत्थर की लकीर बनाते हुए चलते हैं, अगर वे थोड़े अनुशासित हों, फुटपाथ पर एक जिम्मेदार नागरिक की तरह चलें तो कितना अच्छा हो।।

हमने अक्षर ज्ञान बाद में सीखा, पहले एक सीधी लकीर खींचना सीखा। पुराने समय में जब लाइन वाले कागज, कॉपियां नहीं आती थी, लिखने के पहले कागज़ पर एक लंबी लकीर खींची जाती थी।

मारवाड़ी हिसाब की पुरानी खाता बहियों और दस्तावेजों में एक लंबी लकीर पर ही सब कुछ लिखा जाता था। कहां अर्ध विराम है और कहां पूर्ण विराम। कुछ समझ में नहीं आता था।

कुछ लोग आज भी हिंदी में लिखते वक्त शब्दों का माथा नहीं बांधते। मुक्त विचार हैं, मस्तिष्क से बाहर आ गए। अब क्यों इनके माथे पर कोई लकीर लगाई जाए। मुक्त छंद, मुक्त गीत, मुक्त गद्य। जीवन में संयम हो, मर्यादा हो, अनुशासन हो, अगर हो तो बस लक्ष्मण रेखा हो।

बाकी सब लकीर ऐसी हों, जो सिर्फ हवा और पानी में ही नजर आएं, और ओझल हो जाएं। इंसान हवा पानी की तरह एक हो जाए। हमारी अक्ल में इतने पत्थर भी ना हों, जो हम पत्थर की लकीरें बनाते फिरें।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १००१ ⇒ फूटी कौड़ी और अभागा रुपया ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “फूटी कौड़ी और अभागा रुपया…“।)

?अभी अभी # १००१ ⇒ आलेख – फूटी कौड़ी और अभागा रुपया ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

क्या आप जानते हैं, कभी फूटी कौड़ी भी मुद्रा का ही एक छोटा सा भाग था और आज फल फूल रहा रुपया इतना अभागा है कि इसके भाग ही नहीं किए जा सकते। एक समय था, जब रूपये के भी भाग इतने बलवान थे कि उसके भाग किए जा सकते थे। कभी एक रुपए में सोलह आने होते थे और हर आने में चार पैसे के हिसाब से पूरे रुपए में चौंसठ पैसे हुआ करते थे रुपया, आना, पैसा! रुपया मतलब, आना पैसा।

रुपए से किसे प्यार नहीं!

फिर आया दशमलव का जमाना और भारत के एक रुपए की कीमत सौ नए पैसे हो गई। एक चमचमाता नया पैसा, जिस पर भारत के साथ ही लिखा होता, रुपए का सौंवा भाग। महाभारत के सौ कौरव की तरह भारत के इस रुपए के सौ नए पैसे मुद्रा बाजार में खनखनाते फिरते थे। एक नया पैसा, दो नया पैसा, तीन नया पैसा, पांच नया पैसा, दस नया पैसा, बीस नया पैसा, और हां पच्चीस पैसे की चवन्नी और पचास पैसे की अठन्नी और इन सबसे बड़ा रुपया। क्या ठाठ थे उन दिनों रूपयों पैसों के।।

आज के डिजिटल युग में आप चाहें तो रूपयों से नहा लें, डिजिटल ट्रांसफर और paytm से कुबेर का खजाना खरीद लें, लेकिन माफ करें, आज आपकी जेब में एक फूटी कौड़ी भी नहीं। क्योंकि आज की अधिकांश पीढ़ी ने तो कौड़ी का नाम भी नहीं सुना होगा। हां, अगर कभी मैगी और पिज्जा बर्गर से मन भर गया हो, तो बाजार में पकौड़ी जरूर खाई होगी।

आज बेशक, हमारे सर पर डिजिटल करेंसी का ताज है, लेकिन हम पाई पाई को मोहताज हैं। अब यह पाई कौन सी बीमारी है भाई। ज्यादा दूर ना जाएं। बस इस कहावत पर गौर फरमाएं। चमड़ी जाए, पर दमड़ी ना जाए। बस यह दमड़ी ही पाई की नानी है। इनकी भी बड़ी विचित्र कहानी है ;

फूटी कौड़ी से कौड़ी, कौड़ी से दमड़ी, दमड़ी से धेला, धेला से पाई, पाई से पैसा, पैसा से आना और आना से रुपया।

जो कभी सबसे बड़ा रुपया था, आज वह सबसे छोटा होकर रह गया है। जिस रुपए के भाग ही नहीं हो सकते, वह अभागा नहीं हुआ तो फिर क्या हुआ।

आज लोगों के पास दिखाने के लिए रुपया जरूर है, लेकिन उनके पास पैसा नहीं है। हम कैसे पैसे वाले, एक पैसा नहीं, हमारे जेब के हवाले। आज कबीर होते तो वे भी शायद यही कहते ;

यह कैशलैस मानुस कैसा ?

जेब में फूटी कौड़ी नहीं

रूपये को कहे पैसा!

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© श्री प्रदीप शर्मा

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मो 8319180002

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १७८ – देश-परदेश – विश्व संग्रहालय दिवस : 18 मई ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १७८ ☆ देश-परदेश – विश्व संग्रहालय दिवस : 18 मई ☆ श्री राकेश कुमार ☆

कल पूरे विश्व में संग्रहालय दिवस मनाया गया था।हमें इसकी जानकारी थी, कि इस दिन सभी संग्रहालयों में प्रवेश निशुल्क रहता हैं।

मौक़े पर चौक्का लगाते हुए हम चार साथी प्रातः ही जयपुर के संग्रहालय देखने के लिए एक मित्र की कार से रवाना हो गए।संग्रहालय में कुछ इक्का दुक्का हमारे जैसे मुफ्त के मज़े लेने वाले लोग अवश्य मिले।

अधिकतर संग्रहालयों में पार्किंग बहुत दूर रहती हैं।सुबह दस बजे ही मौसम के तेवर तेज़ हो रहे थे।चारों तरफ जेठ की तपती गर्मी ने बेहाल कर दिया था।एक मित्र ने तो हथियार डाल दिए।हम सब भी खाली हाथ लौट आए।साथी बोले ये विश्व संग्रहालय दिवस मई में ही क्यों मनाया जाता हैं ?ताकि, लोग मुफ्त में आनंद ना ले पाए।

व्यथित मन से घर आकर, अपने सब से अज़ीज़ मोबाइल में घुस गए।मन में विचार आया ये मोबाइल भी तो हमारा संग्रहालय हैं।

दुनिया भर की फोटो, बीमारियों के फर्जी नुस्खे, राजनतिज्ञों के झूठे वीडियो, अनजान लोगों के फालतू वाले ज्ञान और वो सैंकड़ों मैसेज जिन पर ये लिखा होता है, “इसको अवश्य सेव कर  लेवें” हमारे मोबाइल को संग्रहालय होने की मान्यता देते हैं।उसी संग्रहालय को देखते देखते पूरा दिन व्यतीत हो गया।

शाम के समय एक 15 वर्षीय बालक से हमने लिफ्ट में पूछा कि आज विश्व संग्रहालय दिवस है, आप इसके बारे में क्या जानते हैं ?

बालक बहुत ही नटखट निकला और बोला अंकल, हमें तो आप भी किसी संग्रहालय से कम नहीं लगते, ये पुरातन बातें और अपने बचपन के किस्से सुना सुना कर पका डालते हो, मोहल्ले के सभी बच्चे इसी लिए आप से दूर रहते है।

बालक ने अपनी भड़ास निकालते हुए कहा, आप लोग आज की बात क्यों नहीं करते हो ? जैसे आई पी एल का चैंपियन कौन बनेगा, चिप्स का कौन सा नया ब्रांड आया हैं, कौन से पिज्जा के साथ कोल्ड ड्रिंक फ्री है, पॉप सिंगर शकीरा ने कोर्ट कैसे जीत लिया है, आदि। गंतव्य पहुंचते ही बालक मिल्खा सिंह की स्पीड से दौड़ गया।

घर वापस आकर दैनिक भास्कर में अपना भविष्य पढ़ा,उसमें लिखा था, आज का दिन अच्छा नहीं है, यात्रा ना करें।दूसरों से बुराई मिलेगी।कितना सत्य बताते है, हमारे ये भविष्य वक्ता।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # २६ – आलेख – “चिकित्सा जगत के गौरव डॉ. आर.एस. मिश्रा” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक प्रेरणास्पद आलेख “चिकित्सा जगत के गौरव डॉ. आर.एस. मिश्रा”।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # २६ ☆

☆ आलेख ☆ चिकित्सा जगत के गौरव डॉ. आर.एस. मिश्रा ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

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86 वर्ष की उम्र में भी कर रहे रोगियों की सेवा

ऊंचा कद, गौर वर्ण, इकहरे बदन वाले आकर्षक व्यक्तित्व के स्वामी डॉ. रविशंकर मिश्रा याने डॉ. आर. एस. मिश्रा के जीवन का लक्ष्य ही पीड़ितों का उपचार कर उन्हें रोगमुक्त जीवन प्रदान करना है। मित एवं मधुर भाषी डॉ. मिश्रा गंभीर और शांत प्रकृति के व्यक्ति हैं। वे परिचतों, अपरिचितों अथवा इलाज कराने आये रोगियों की पूरी बात ध्यान से सुनते हैं और हल्की मुस्कुराहट के साथ ऐसा उत्तर देते हैं कि लोग प्रसन्न और तनाव मुक्त हो जाते हैं। रोगी का आधा इलाज तो उनकी विनम्रता और मीठी वाणी ही कर देती है। वे कहते हैं कि चिकित्सक की वाणी और व्यवहार भी रोगी की प्रतिरोधक क्षमता घटाने – बढ़ने वाला एक महत्वपूर्ण कारक है।

25 सितम्बर 1941 को देवरी, सागर में जन्में डॉ. मिश्रा 86 वर्ष की उम्र में भी अपने माता – पिता को दिया पीड़ितों की सेवा का वचन निभा रहे हैं। प्रारम्भिक शिक्षा देवरी से पूर्ण करने के उपरांत मिश्रा जी ने एम जी एम मेडिकल कॉलेज इंदौर से एम बी बी एस किया और 14 अप्रैल 1968 को शासकीय चिकित्सक के रूप में छतरपुर से सेवा प्रारंभ की। इसके उपरांत रीवा से उनकी सेवाएं आर्मी को स्थानांतरित कर दी गईं। उन्होंने 1971 में बांग्लादेश के आजादी के युद्ध में सीमा पर भारतीय सेना के घायल जवानों का मनोयोग से उपचार किया। आपने पश्चिमी पाकिस्तान की सीमा पर भी लंबे समय तक सैनिकों का उपचार किया तदोपरांत पुनः जबलपुर स्थानांतरित हुए फिर दमोह, जबलपुर कोतवाली डिस्पेंसरी, मेडिकल कॉलेज अस्पताल एवं पनागर में सेवाएं देते हुए 2003 में सेवानिवृत्त हुए।

चिकित्सक के रूप में वे जहां – जहां पदस्थ रहे उनके संपर्क में आए लोग आज भी उन्हें स्नेह और श्रद्धा से याद करते हैं। सेवानिवृत्ति के बाद भी सेवाभावी डॉ. मिश्रा ने घर में आराम करने के बजाए अंतिम सांस तक पीड़ितों की सेवा का संकल्प लिया और जबलपुर स्थित महाकौशल के सुप्रसिद्ध चिकित्सालय नेशनल हॉस्पिटल में सेवाएं देना प्रारंभ किया जो आज तक जारी है।

जब उनसे प्रश्न किया गया कि – “आर्मी में सैनिकों की चिकित्सा के दौरान आपने क्या विशेष अनुभव प्राप्त किया?” तब इस प्रश्न के प्रत्युत्तर में  डॉ. मिश्रा ने कुछ क्षण शून्य में निहारने के उपरांत कहा – “मुझे युद्धों से घृणा हो गई है, मैंने घायल सैनिकों के अत्यंत मार्मिक दृश्य देखे हैं। किंतु हां, नियमित जीवन शैली और लक्ष्य प्राप्ति के लिए अंतिम सांस तक संघर्ष करने की प्रेरणा मुझे सेना से ही मिली। संभवतः इसी कारण मैं सेवा के अपने लक्ष्य को जीवन के इस पड़ाव में भी निभा पा रहा हूं।”

उन्होंने नेशनल हॉस्पिटल में सेवाएं जारी रहने के प्रति संचालक डॉ. आनंद तिवारी को साधुवाद दिया।

डॉ. आर. एस. मिश्रा जी अपने 58 वर्षीय चिकित्सा सेवा काल में लगभग 25 लाख राेगियों की चिकित्सा का कीर्तिमान रच चुके हैं। अपने बाल्यकाल और किशोरावस्था में वे हाकी, बास्केटबाल और कबड्डी के खिलाड़ी रहे हैं। अब फुर्सत में गीत – संगीत सुनना पसंद करते हैं। डॉ. मिश्रा के सुपुत्र आनंद एयर फोर्स में वाइस एयर मार्शल के रूप में देश सेवा – सुरक्षा में रत हैं। डॉ. मिश्रा को स्वस्थ सुदीर्घ जीवन के लिए मंगलकामनाएं।

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १००० ⇒ विचार और अभिव्यक्ति (Thought & expression) ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “विचार और अभिव्यक्ति (Thought & expression)”।)

?अभी अभी # १००० ?

? आलेख – विचार और अभिव्यक्ति (Thought & expression) ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

क्या आपने thought of ocean (थॉट ऑफ़ ओशन) यानी विचारों के समुद्र के बारे में सुना है?

विचार हम उसे मानते हैं, जो प्रकट हो। यानी हम व्यक्त को ही विचार मानते हैं। फिर उस विचार का क्या, जो हमारे मन में पैदा तो होता है, लेकिन वह व्यक्त नहीं हो पाता। हमारी अभिव्यक्ति की विधा आज भी बोलने, लिखने और रिकॉर्ड करने तक ही सीमित है। वैसे दिव्यांग मूक बधिरों तक के लिए बिना बोले भी सांकेतिक भाषा विकसित हो चुकी है, दृष्टिबाधित के लिए ब्रेल और द्रुत गति से लिखने के लिए पिटमैन की शॉर्ट हैंड लिपि भी मौजूद है। आप लिखें और आप ही बांचे।

मन और बुद्धि जब मिल बैठते हैं, तो विचारों का जन्म होता है। श्रुति, स्मृति और संचित संस्कार हमारे अंदर एक थिंक टैंक का निर्माण करते हैं। लेकिन असल में शून्य के महासागर में कई विचार मछली की तरह तैरते रहते हैं। करिए, कितना शिकार करना है विचारों का।।

मन का काम संकल्प विकल्प करना है। जो भी दृश्य आंखों के सामने आता है, वह मन में विचारों को जन्म देता है। विचार, विचार होते हैं, अच्छे बुरे नहीं होते। अगर बुरा विचार आपने मन में रख लिया, तो कोई हर्ज नहीं।

अच्छे विचार ही तो आपको एक अच्छा इंसान बनाते हैं। कौन आपके मन में झांकने बैठा है।

दुनिया में पूरा खेल व्यक्त विचारों का ही तो है। अगर बुरे विचार तो बुरा आदमी, और अच्छे विचार तो अच्छा आदमी। इसीलिए दास कबीर भी कह गए हैं ;

ऐसी वाणी बोलिए मन का आपा खोए,

औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होए.

यानी बात मन, वचन और कर्म पर आ गई। अब अगर हमारे अंदर काम, क्रोध, लोभ और मोह के संस्कार हैं तो हम क्या करें, अपने मुंह पर ताला लगा लें। बस छान छानकर अच्छे विचारों को बाहर निकालो और बुरे विचारों को डस्टबिन में डाल दो।

आजकल तो कचरा भी री – साइकल हो रहा है, घूरे से सोना बनाया जा रहा है, लेकिन बेचारे बुरे विचार यहां से वहां तक रोते फिर रहे हैं, कोई घास नहीं डाल रहा। सबको अच्छे विचारों की तलाश है। ट्रक के ट्रक भरकर अच्छे विचार लाए जा रहे हैं और उनसे मोटिवेशनल स्पीच तैयार हो रही है। कितनी डिमांड है आजकल अच्छे विचारों की।।

एक गंदी मछली की तरह ही एक बुरा विचार पूरे समाज में गंदगी फैलाता है। अच्छे विचारों की खेती के लिए ही तो हम कीचड़ में कमल खिलाते हैं। जब बुद्धि, ज्ञान और विवेक काम नहीं करते, तो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का सहारा लेते हैं। स्वच्छ भारत का संकल्प जितना आसान है उतना ही मुश्किल है, अच्छे विचारों के भारत का संकल्प।

काश हमारे मन में ऐसा कोई प्युरिफायर होता जो हमारे विचारों को फिल्टर कर देता, अच्छे विचार थिंक टैंक में, बुरे विचार नाली में। हो सकता है, संतों के पास कोई ऐसी फिटकरी हो, जिसके डालते ही, विचारों की गंदगी नीचे बैठ जाती हो, और चित्त पूरा साफ हो जाता है। जहां मन में मैल नहीं, वहां तो बस पूरा तालमेल ही है। हमारे आपके विचार आपस में कितने मिलते हैं।।

है न ..!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३३६ – दशपुत्रसमो द्रुम: ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३३६ ☆ दशपुत्रसमो द्रुम:… ?

हमारा फ्लैट हाउसिंग सोसायटी की ऊपरी मंज़िल पर है। सोसायटी के सामने सड़क है। सड़क के दूसरी ओर शिरीष का विशालकाय वृक्ष है। इस पेड़ की फुनगियाँ गुलाबी रंग के फूलों से लकदक हैं।

यह वृक्ष लगभग 70 फीट ऊँचा और अपनी डालियों के माध्यम से लगभग इतना ही चौड़ा हो चुका है। तेज़ हवा, बरसात के साथ इसके फूल उड़ते हैं, यहाँ-वहाँ बिखरते हैं। उसमें से कुछ हमारी बालकनी में रखे पौधों के गमलों में भी गिरते हैं।

पिछले दिनों एक गमले में इसी शिरीष की एक संतान ने जन्म लिया। धरती पर खड़ा 70 फीट का विशाल पेड़  और उसके सामने गमले में जन्मा और बढ़ा लगभग 1 फुट का यह पौधा। देखता हूँ कि पेड़ की फुनगियाँ निरंतर हमारे बालकनी के निकट आ रही हैं। दूरी लगभग 10 फीट की रह गई है।

सोचता हूँ, सड़क के उस पार लगा 70 फीट का यह पेड़ भी कभी अंकुरित हुआ होगा, ऐसे ही पौधा बना होगा। धीरे-धीरे बड़ा हुआ होगा। आंधी, तूफान, भीषण गर्मी सब सहन किए होंगे। पशुओं का भक्ष्य होने से बच गया होगा। इसकी आयु कितने वर्ष है, यह तो पता नहीं पर इसे विकसित होने के समुचित अवसर मिले, फलत: यह 70 फीट का हो चला है।

सही शारीरिक-मानसिक-बौद्धिक पोषण और उचित परिवेश मिले तो मनुष्य भी इसी तरह विकास कर सकता है। प्रकृति में हरेक अनुपम है। अतः अपने बच्चों पर अपने अधूरे सपने थोपने के बजाय उन्हें विकास के लिए समुचित वातावरण उपलब्ध कराना चाहिए। आगे वे अपने स्वभाव और अपनी मूल प्रकृति के अनुसार स्वयं विस्तार करेंगे।

नन्हा शिरीष थोड़ा बड़ा हो जाए तो किसी सुरक्षित स्थान पर इसे रोप आऊँगा। ऐसे स्थान पर जहाँ इसे विकसित होने के पर्याप्त अवसर मिल सकें।

इन दिनों गर्मी चरम पर है। सामान्यत: हमारी वृत्ति वृक्षों को काटकर बढ़ते तापमान पर सेमिनार आयोजित करने की रही है। यदि 25 से 50 वर्ष के आयुसमूह का हर भारतीय नागरिक दो पौधे भी रोपे, उनका ध्यान रखे, तो 45 डिग्री का औसत तापमान कम करने में समय नहीं लगेगा। पंछी लौटेंगे, अपने घोंसले बुनेंगे, कीटक पेड़ की खोह में घर बसाएँगे, जड़ों में सरीसृप भी बिल बनाएँगे। जैव विविधता का खंडित चक्र फिर अखंड होने की राह पर चल पड़ेगा।

कहा गया है,

दशकूपसमा वापी दशवापीसमो ह्रदः।

दशह्रदसमः पुत्रो दशपुत्रसमो द्रुमः॥

दस कुओं के समतुल्य एक बावड़ी, दस बावड़ियों के समतुल्य एक सरोवर, दस सरोवरों के समतुल्य एक सुयोग्य पुत्र और दस पुत्रों के समतुल्य एक वृक्ष कल्याणकारी होता है।

पर्यावरण के संरक्षण के लिए अथवा पुण्य के लिए अथवा अकारण, पौधारोपण अवश्य करें। इन पौधों से विकसित होनेवाले वृक्ष, देश को हरा-भरा रख सकते हैं। अनुभव बताता है कि मनुष्य जीवन को भी पल्लवित, पुष्पित एवं सुरभित रखने में हरियाली महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

प्रयास करें कि प्रकृति हरी रहे, परिसर हरा रहे, मन हरा रहे।

© संजय भारद्वाज 

(14:09 बजे, 23 मई 2026)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ १७ मई से ज्येष्ठ अधिकमास आरंभ हुआ है। इसी दिन से नारायण साधना आरंभ होगी।  इसका मंत्र है – ॐ नारायणाय नम:। 🕉️

💥 इसके साथ मौन साधना एवं आत्म परिष्कार भी चलेंगे। अपनी हर निर्बलता पर विजय पाने का साधन है आत्म परिष्कार। इसका नियमित अभ्यास रखे💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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