श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना श्रावण मास की दस्तक – सुंदर रूप निखार : हरियाली । इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २९४ ☆

श्रावण मास की दस्तक – सुंदर रूप निखार : हरियाली ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

वर्षा की बूंदे सुखद, जीवन का आधार ।

हरियाली फैली रहे,  सुंदर रूप निखार ।।

*

बागों में झूले पड़े,   बारिश हो घनघोर ।

चंचल मन पर न चले, कभी किसी का जोर।।

श्रावण की पहली आहट के साथ ही लगता है मानो प्रकृति ने धरा के माथे पर हरियाली का तिलक सजा दिया हो। वर्षा की बूँदें केवल धरती की प्यास ही नहीं बुझातीं, वे मनुष्य के भीतर सोई संवेदनाओं को भी सींच देती हैं। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में श्रावण केवल एक मास नहीं, बल्कि प्रकृति और आत्मा के पुनर्मिलन का पर्व माना गया है।

हमारे ऋषियों ने ऋतुचक्र के साथ जीवनचक्र को इस प्रकार जोड़ा कि उपासना भी हो, अनुशासन भी और पर्यावरण का संरक्षण भी। देवशयनी एकादशी से लेकर गुरु पूर्णिमा और हरियाली अमावस्या तक प्रत्येक अवसर हमें यही स्मरण कराता है कि सृष्टि से हमारा संबंध उपभोग का नहीं, आत्मीयता का है। वृक्ष केवल छाया नहीं देते, नदियाँ केवल जल नहीं बहातीं और वर्षा केवल मौसम नहीं बदलती—ये सब जीवन के मौन गुरु हैं।

आज जब विकास की दौड़ में हरियाली सिमटती जा रही है, तब श्रावण हमें ठहरकर यह प्रश्न पूछने का अवसर देता है—क्या हम प्रकृति से उतना ही प्रेम करते हैं, जितना उसके उपहारों से?

यदि प्रत्येक व्यक्ति इस मास में केवल एक पौधे को अपना आत्मीय मान ले, जल और हरियाली के प्रति अपनी जिम्मेदारी स्वीकार कर ले, तो यह धरती फिर से मुस्करा उठेगी। श्रावण का सच्चा उत्सव मंदिरों की घंटियों से आगे बढ़कर तब पूर्ण होगा, जब हमारे मन, हमारे आँगन और हमारी धरती—तीनों फिर से हरे-भरे हो उठेंगे।

सपनों को मिलने लगा, एक नया आकार ।

हरियाली फैली रहे, सुंदर रूप निखार।।

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©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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