हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य #207 – हाइकु पर समीक्षात्मक लेख: ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” की हाइकू की रचनाएँ – गीत गरिमा ☆ साभार – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत उनकी मानवीय दृष्टिकोण से परिपूर्ण लघुकथाएं आप प्रत्येक गुरुवार को पढ़ सकते हैं। आज प्रस्तुत है हाइकु पर समीक्षात्मक लेख: ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” की हाइकू की रचनाएँ।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # 207 ☆

☆ हाइकु पर समीक्षात्मक लेख: ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” की हाइकू की रचनाएँ – गीत गरिमा ☆ साभार – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’

प्रस्तावना

हाइकु एक जापानी काव्य शैली है, जो अपनी संक्षिप्तता और गहनता के लिए जानी जाती है। परंपरागत रूप से यह 5-7-5 अक्षरों की संरचना में लिखा जाता है और प्रकृति, मौसम, और मानवीय भावनाओं को सूक्ष्मता से व्यक्त करता है। हिंदी साहित्य में हाइकु ने अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है, जिसमें भारतीय संस्कृति और सामाजिक यथार्थ का समावेश होता है। ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” (जन्म: 26 जनवरी 1965, रतनगढ़, नीमच, मध्य प्रदेश) की प्रस्तुत रचनाएँ इसी हीपरंपरा का हिस्सा हैं। उनकी ये कविताएँ हाइकु की भावना को अपनाते हुए ग्रामीण जीवन, सामाजिक कुरीतियों और मानवीय संवेदनाओं को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करती हैं। यह लेख इन हाइकुओं की समीक्षा करता है।

हाइकु की संरचना और शैली

प्रकाश जी के हाइकु पारंपरिक 5-7-5 अक्षरों की संरचना से थोड़े स्वतंत्र हैं, किंतु इनमें हाइकु की मूल भावना—संक्षिप्तता, प्रकृति से जुड़ाव और एक क्षण का चित्रण—स्पष्ट रूप से झलकती है। प्रत्येक हाइकु तीन पंक्तियों में लिखा गया है, जो एक दृश्य या भाव को पूर्णता प्रदान करता है। उनकी भाषा सरल, सहज और ग्रामीण परिवेश से प्रेरित है, जो पाठक को तत्काल उस दृश्य से जोड़ देती है। उदाहरण के लिए, “जाड़े की रात~ तस्वीर साथ रखे सोती विधवा” में ठंडी रात का मौसमी संदर्भ और विधवा की भावनात्मक स्थिति का चित्रण हाइकु की परंपरा के अनुरूप है।

प्रमुख बिम्ब और भाव

प्रकृति और मानव का संवाद

हाइकु की मूल विशेषता प्रकृति से जुड़ाव यहाँ स्पष्ट है। “घना कोहरा~ कार में दबी माँ का मुख टटोला” और “शीत लहर~ आलू भुनती दादी चूल्हे के पास” में मौसम (कोहरा और शीत लहर) मानव जीवन के दुख और सुख के साथ जुड़ता है। “इन्द्रधनुष~ ताली बजाता बच्चा गड्ढे में गिरा” में प्रकृति की सुंदरता और जीवन की अनिश्चितता का मिश्रण एक मार्मिक चित्र प्रस्तुत करता है।

ग्रामीण जीवन का यथार्थ

प्रकाश जी के हाइकु ग्रामीण भारत की आत्मा को प्रतिबिंबित करते हैं। “नीम का वृक्ष~ दातुन लेकर माँ बेटे के पीछे” और “मुर्गे की बांग~ चक्की पर चावल पीसती दादी” में दैनिक जीवन की सादगी और पारिवारिक प्रेम झलकता है। वहीं, “पकी फसल~ लट्ठ से नील गाय मारे किसान” किसानों की मजबूरी और प्रकृति से संघर्ष को दर्शाता है।

सामाजिक विडंबनाएँ

“बाल वाटिका~ लड़की को दबोचे गुण्डा समूह” और “निर्जन गली~ माशुका के घर में झांकता पति” जैसे हाइकु सामाजिक कुरीतियों और नैतिक पतन को उजागर करते हैं। ये रचनाएँ नारी असुरक्षा और पुरुष की संदिग्धता पर करारा प्रहार करती हैं। “शव का दाह~ अंतरिक्ष सूट में चार स्वजन” आधुनिकता और परंपरा के टकराव को चित्रित करता है, जो संभवतः महामारी काल की ओर संकेत करता है।

नारी और उसकी पीड़ा

 “शिशु रुदन~ गर्भिणी माँ के सिर गिट्टी तगाड़ी” और “जाड़े की रात~ तस्वीर साथ रखे सोती विधवा” में नारी के संघर्ष और एकाकीपन का मार्मिक चित्रण है। ये हाइकु नारी जीवन की कठिनाइयों को संवेदनशीलता से व्यक्त करते हैं।

हाइकु की विशेषताएँ और प्रभाव

प्रकाश जी के हाइकु संक्षिप्त होने के बावजूद गहरे भाव और चिंतन को जन्म देते हैं। प्रत्येक रचना एक क्षण को कैद करती है, जो पाठक के मन में लंबे समय तक रहता है। “झींगुर स्वर~ जलमग्न कुटी से वृद्धा की खाँसी” में प्रकृति की ध्वनि और मानव की सहायता का संयोजन हाइकु की गहराई को दर्शाता है। हालाँकि, इस हाइकु का दो बार प्रयोग संभवतः त्रुटि है, जो संग्रह की एकरूपता को प्रभावित करता है।

उनके हाइकु में मौसमी संदर्भ (जाड़े की रात, शीत लहर, घना कोहरा) और प्रकृति के तत्व (नीम का वृक्ष, इन्द्रधनुष, काँव का स्वर) पारंपरिक हाइकु से प्रेरणा लेते हैं, किंतु भारतीय परिवेश में ढलकर विशिष्ट बन जाते हैं।

कमियाँ और सुझाव

कुछ हाइकु, जैसे “बीन की धुन~ पत्थर लिए बच्चे क्रीड़ांगन में”, संक्षिप्तता के कारण पूर्ण भाव को व्यक्त करने में असमर्थ प्रतीत होते हैं। यहाँ चित्र स्पष्ट नहीं हो पाता, जिससे पाठक को और विवरण की आवश्यकता महसूस होती है। यदि इनमें और विविधता और स्पष्टता जोड़ी जाए, तो प्रभाव और गहरा हो सकता है।

निष्कर्ष

ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” के हाइकु हिंदी साहित्य में हाइकु परंपरा को भारतीय संदर्भ में समृद्ध करते हैं। इनमें ग्रामीण जीवन की सादगी, सामाजिक यथार्थ की कटुता और मानवीय संवेदनाओं की गहराई एक साथ समाहित है। ये रचनाएँ संक्षिप्त होते हुए भी विचारोत्तेजक और भावनात्मक हैं। हाइकु की आत्मा को जीवित रखते हुए ये कविताएँ पाठक को एक अनूठा अनुभव प्रदान करती हैं। प्रकाश जी का यह प्रयास निश्चित रूप से सराहनीय है और हिंदी हाइकु साहित्य में एक महत्वपूर्ण योगदान है।

 – गीता गरिमा

साभार – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

16-07-2024

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ घरेलू हिंसा और झूठे मुकदमों से घुटते पुरुष ☆ सुश्री रेखा शाह आरबी ☆

सुश्री रेखा शाह आरबी

(सुश्री रेखा शाह आरबी जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। साहित्य लेखन-पठन आपकी अभिरुचि है। आपकी प्रकाशित पुस्तक का नाम ‘संघर्ष की रेखाएँ’ है। आज प्रस्तुत है समसामयिक विषय पर आपका एक विचारणीय आलेख ‘घरेलू हिंसा और झूठे मुकदमों से घुटते पुरुष’।)

? आलेख ⇒  घरेलू हिंसा और झूठे मुकदमों से घुटते पुरुष ? सुश्री रेखा शाह आरबी  ?

हमारे देश में महिला सुरक्षा एक ज्वलंत और महत्वपूर्ण मुद्दा रहा है। आधुनिक समाज और सरकार की यह मंशा रही है कि महिलाएं किसी भी प्रकार के हिंसा उत्पीड़न और दुर्व्यवहार से सुरक्षित रहे। समाज में महिलाओं को सुरक्षित माहौल मिले और काम करने का अधिकार मिले और वह आत्मनिर्भर बनकर समाज को सशक्त बनाने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाए। इसके लिए भरसक प्रयास किया गया है। इसके लिए महिलाओं के हित सुरक्षा के लिए अनेक कानून और नीतियां है। जो उन्हें समाज में समान स्थान दिलाने के लिए जरूरी भी था।

दहेज प्रथा भारतीय समाज और महिलाओं के लिए एक अभिशाप था। और इसके उन्मूलन के लिए कानूनी प्रावधान रुपी सशक्त कानून दहेज प्रतिषेध अधिनियम (1961) बनाया गया जिसमें भारतीय दंड संहिता की धारा 498A का उद्देश्य दहेज की प्रताड़ना से प्रताड़ित महिलाओं का उत्पीड़न रोकने के लिए बनाया गया था। जो काफी कारगर भी सिद्ध हुआ है। इस कानून के कारण महिलाओं को घरेलू हिंसा से संरक्षण सुरक्षा बहुत हद तक मिल रहा है। जिससे वह अपना सुरक्षित विकास कर सके।

अपने देश में जब भी सामाजिक न्याय, शोषण, लैंगिक समानता की चर्चा उठती है। तब सिर्फ महिलाओं को ही शोषित और प्रताड़ित माना जाता है जो कि सर्वथा अनुचित है। पुरुष भी प्रताड़ना के शिकार होते हैं घरेलू हिंसा के शिकार होते हैं। उनके साथ भी अनुचित और घोर अमानवीय व्यवहार होता है।

पुरुष को भी घरेलू हिंसा से टॉर्चर किया जाता है और झूठे मुकदमों में फंसा कर उन्हें प्रताड़ित किया जाता है। दहेज प्रतिषेध अधिनियम 1961 जैसा एक तरफा कानून होने के वजह से पुरुषों को अपनी सुरक्षा के लिए कानूनी संरक्षण नही प्राप्त हो पाता है।

जिसके कारण वह खुद को लाचार और असहाय महसूस करते हैं। कुछ महिलाएं 498A धारा को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने लगी हैं। और दुर्भावना से प्रेरित होकर निर्दोष पुरुष और उनके परिवारों को इस कानून के दायरे में फंसाने के लिए उपयोग करने लगी हैं।

आप सोच कर देखिए यदि कोई महिला अपनी गलत मंशा की पूर्ति के लिए यदि इस कानून का अपने ससुराल वालों के खिलाफ इस्तेमाल करती है। या पति के खिलाफ इस्तेमाल करती है तो वह कितने असहाय हो जाते हैं।

और इसके अलावा हमारे समाज की मानसिकता ऐसी है कि जब भी स्त्री और पुरुष में कोई विवाद का मामला सामने आता है। तो बिना विचार किये पुरुषों को दोषी और अपराधी बता दिया जाता है। जबकि पुरुष भी दोषी हो सकता है महिला भी दोषी हो सकती है इसका पूरी संभावना रहती है।

अधिकांश पुरुष अपने घर की बातें समाज में ले जाने से भी अक्सर कतराते है। क्योंकि उसे उसी समाज में रहना होता है। और वह अपनी जग हंसाई से डरता है। और जब भी पुरुष दहेज के झूठे मुकदमे में फंसता है या घरेलू हिंसा का शिकार होता है तो वह ज्यादातर घुट घुट कर जीने को मजबूर हो जाता है।

क्योंकि वह जानता है कि ज्यादातर लोगों की सहानुभूति बिना हकीकत को जाने महिला पक्ष की तरफ रहेगी। उसका आत्मविश्वास पहले ही टूट जाता है।

और पुरुष प्रताड़ना का सबसे ज्यादा आधार बनते हैं वह नियम जो स्त्रियों को सुरक्षा देने के लिए बनाए गए। किसी भी वैवाहिक जीवन में विवाद की स्थिति आने पर दहेज प्रतिषेध अधिनियम (1961) के कानून धारा 498A का पत्नि और उनके परिवार वाले नाजायज और अनुचित फायदा उठाते हैं। और उन्हें कानून के आधार पर डरा धमकाकर अपनी अनुचित और नाजायज मांगो की पूर्ति करते हैं। और पुरुष अपने परिवारजन और अपने आप को बचाने के खातिर ब्लैकमेल होता रहता है।

भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A, जो एक विवाहित महिला के प्रति उसके पति या पति के रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता से संबंधित है, अब भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 85 में शामिल की गई है। इस नए प्रावधान में मूल रूप से वही अपराध परिभाषित है, जिसमें किसी महिला के प्रति क्रूरता (शारीरिक, मानसिक या भावनात्मक) को दंडनीय बनाया गया है, और इसमें कारावास की सजा, जो तीन साल तक हो सकती है, के साथ-साथ जुर्माना भी शामिल है।

कई बार इन कानूनो के वजह से ऐसा हो जाता है कि जहां तक उसके बर्दाश्त की सीमा होती है वहां तक वह यह प्रताड़ना झेलता रहता है। और जब यही प्रताड़ना हद से ज्यादा बढ़ जाती है तो वह सुसाइड की तरफ अपना कदम बढ़ा लेता है।

और इसके एक नहीं अनेक समाज में उदाहरण देखने को मिल रहे हैं। ऐसे प्रताड़ना के शिकार होकर मरने वाले पुरुषों की संख्या दिन-ब-दिन आश्चर्यजनक रूप से बढ़ती ही जा रही है।

कुछ नाम हाल ही में चर्चा में आए। ऐसा कहा जा रहा है कि आगरा निवासी टीवीएस कंपनी के मैनेजर मानव शर्मा, बेंगलुरु के एआई इंजीनियर अतुल सुभाष, दिल्ली के सॉफ्टवेयर इंजीनियर सतीश या इनके जैसे अनेक लोग तथाकथित घरेलू हिंसा और पत्नी प्रताड़ना के शिकार हो गए हैं ।

यह दो-तीन नाम तो मात्र चर्चा में आए और सुर्खियों में आने के कारण लोग जान रहे हैं। लेकिन इनके अलावा भी हजारों ऐसे लोग हैं जो घोर प्रताड़ना के शिकार हैं। और जिनकी खोज खबर लेने वाला भी कहीं कोई नहीं है। वह मर मर कर जीने को मजबूर है।

यह सब कोई अशिक्षित, बेरोजगार युवा नहीं है बल्कि समाज में अच्छे ओहदे पर कार्यरत और पढ़े लिखे युवा थे। सोच कर देखिए इतने अच्छे ओहदो पर अपनी बुद्धि, क्षमता, कार्य कुशलता से पहुंचने वाले युवा आखिर ऐसी कौन सी स्थिति बन रही है कि अपने आप को खत्म कर ले रहे हैं। इस सवाल का जवाब समाज को ढूंढना बहुत जरूरी है।

इस पर समाज को विचार करने की बेहद आवश्यकता है। यदि ऐसा ही चलता रहा तो पुरुष वर्ग का विवाह नामक संस्था से विश्वास पूर्णतया उठ जाएगा। जो समाज में और भी अराजकता और दुराचार फैलाने का कारण बनेगा।

498A धारा का दुरुपयोग हजारों पुरुषों के जीवन को पूरी तरह तहस-नहस कर देता है। क्योंकि इस कानून के कारण उनको न्याय के लिए बुरी तरह भटकना पड़ता है। किंतु उसे उम्मीद की किरण नहीं दिखाई देती है। और यही निराशा उसकी जान ले लेती है।

एनसीआरबी के आंकड़े के अनुसार 498A के तहत दर्ज मामलों में लगभग 74% कोई ठोस सबूत नहीं मिला। 90% मामलों में पुरुष को अंततः बरी कर दिया गया क्योंकि वह निर्दोष थे। लेकिन इस प्रक्रिया, अवधि में उन्हें सामाजिक, आर्थिक, मानसिक प्रताड़ना का बुरी तरह शिकार होना पड़ा।

जिससे वह टूट जाते हैं और वह इसलिए टूट जाते हैं क्योंकि उनकी बरसों की कमाई, मान, प्रतिष्ठा सब कुछ तहस-नहस कर दिया जाता है। एक पुरुष के लिए उसकी सामाजिक मान, प्रतिष्ठा और उसकी आर्थिक स्थिति काफी महत्वपूर्ण स्थान रखती है। क्योंकि अभी भी अधिकांश घरों में परिवार की पहली जिम्मेदारी पुरुष के ऊपर ही होती है। उसके कंधों पर ही सारा भार होता है और परिवार में सिर्फ पत्नी नहीं होती है। उसके बच्चे होते हैं, माता-पिता होते हैं, छोटे- भाई बहन होते हैं। और यदि वह किसी झूठे केस और दहेज के झूठे मुकदमे में फंस जाता है। तो वह अपनी कोई भी जिम्मेदारी ढंग से पूरी नहीं कर पता है जिसके कारण भी वह बेहद गहरे अवसाद में चला जाता है और शायद ही वह फिर कभी अपनी पहले जैसी आर्थिक स्थिति, सम्मान, प्रतिष्ठा को वापस पाता है।

आखिरकार पुरुषों को भी एक सम्मान पूर्वक जीवन जीने का समान रूप से अधिकार है। इसके लिए सरकार जब तक ऐसे झूठे मुकदमे करने वाले लोगों के खिलाफ सख्त कार्यवाही नहीं करेगी। तब तक इस स्थिति में सुधार नहीं आएगा। पुरुष घरेलू हिंसा के झूठे मुकदमों का शिकार होते रहेंगे और अपनी जान गंवाते रहेंगे।

यह तथ्य भी सही है कि स्त्री प्रताड़ना की बहुत अधिक शिकार होती हैं। लेकिन पुरुषों की प्रताड़ना को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता है। जितना नारी सशक्तिकरण आवश्यक है। उतना ही पुरुषों को भी न्याय मिलना आवश्यक है। दोनों के हितों की समान रूप से रक्षा होनी चाहिए।

अन्याय चाहे स्त्री के प्रति हो या पुरुष के प्रति हो अन्याय तो अन्याय ही रहेगा। इसलिए अब ऐसे कानून की बेहद आवश्यकता है। जो ऐसे झूठे मामलों में फास्ट ट्रैक कोर्ट के द्वारा जल्द से जल्द फैसला दिया जाए। ताकि निर्दोषो को तुरंत न्याय मिल सके। और वह शांति पूर्वक अपना पारिवारिक जीवन जी सके। एक सभ्य समाज का निर्माण समानता के धरातल पर ही टिक सकता है। स्त्री हो या पुरुष एक वर्ग का असंतोष पूरे समाज को प्रभावित करता है।

परिवार, दोस्तों, पड़ोसियों को भी चाहिए कि यदि ऐसी स्थिति में प्रताड़ित हुआ कोई दोस्त मित्र उनके संज्ञान में आए तो वक्त पर उस व्यक्ति को मानसिक भावनात्मक सहारा अवश्य दें। जिससे कि वह अपने मानसिक तनाव से लड़ सके। ऐसा करना हो सकता है कि किसी की जान बचा ले।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© सुश्री रेखा शाह आरबी

बलिया( यूपी )

ईमेल – rekhasahrb@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 651 ⇒ काली मूँछ ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “काली मूँछ।)

?अभी अभी # 651 ⇒ काली मूँछ ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

मूँछें मर्द की होती हैं ! वे शुरू में काली होती हैं, लेकिन उम्र के साथ सफेद होती चली जाती है। लेकिन चावल की एक किस्म होती है, जिसे भी काली मूँछ कहा जाता है। यह चावल काला नहीं सफेद होता है, लेकिन इसकी लंबाई के आखिर में हल्का सा कालापन दिखाई देता है, शायद इसीलिए इसे काली मूँछ कहते हों।

कृष्ण और सुदामा की दोस्ती में चावल का जिक्र ज़रूर होता है। मुट्ठी भर चावल की दास्तान ही कृष्ण-सुदामा की दोस्ती की पहचान है। आज भी आप जगन्नाथ पुरी चले जाएं, जगन्नाथ के भात का भोग ही प्रसाद के रूप में भक्तों को प्राप्त होता है। चावल को अक्षत भी कहते हैं, बिना कंकू-चावल के पूजा नहीं होती। किसी खास अवसर पर निमंत्रण हेतु पीले चावल भिजवाए जाते हैं। और तो और बिना चावल के हाथ भी पीले नहीं होते। सावधान के मंत्र के साथ अक्षत वर्षा होती है, और वर-वधू सावधान हो जाते हैं।।

आप देश के किसी भी कोने में चले जाएं, भोजन में चावल का स्थान नमक की तरह निश्चित है। बासमती, जैसे कि इसके नाम से ही जाहिर है, खुशबू वाला चावल है। बिरयानी कहीं भी खाई जाए, बिना चावल के नहीं बनती।

यूँ तो छत्तीसगढ़ को धान का कटोरा कहा गया है, लेकिन पॉलिश और खुशबू वाले बासमती चावल की तुलना में यहाँ का चावल अधिक स्वास्थ्यवर्धक है। जिस चावल में स्टार्च कम हो, वह अधिक लाभप्रद होता है। मणिपुर में एक काले चावल की प्रजाति पाई जाती है। औषधीय गुण की अधिकता के कारण इसकी कीमत 1800 ₹ किलो है। इसमें एंटीऑक्सीडेंट अधिक मात्रा में पाया जाता है।

पसंद अपनी अपनी, स्वाद अपना अपना। ग्वालियर के आसपास पाया जाने वाला काली मूँछ चावल बासमती चावल की तुलना में आजकल कम प्रचलन में है। मूँछ हो या न हो, कभी काली मूँछ चावल का स्वाद भी चखकर देखें।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ वेदों में अंकगणितीय परम्परा… ☆ श्री राजेन्द्र शर्मा ‘राही’ ☆

श्री राजेन्द्र शर्मा ‘राही’

(श्री राजेंद्र शर्मा ‘राही’ (अभियंता), लेखक ,कवि एवं ज्योतिष विद का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत। )

☆ आलेख ✍ वेदों में अंकगणितीय परम्परा… ☆ श्री राजेन्द्र शर्मा ‘राही’ 

गणित की मुख्यतः तीन शाखाएं हैं – अंकगणित, बीजगणित और रेखागणित। 

अंकगणित को पाटी गणित भी कहा जाता है जब लकड़ी की पट्टी पर लिखकर हिसाब लगाया जाता था तब इसे पाटी गणित के नाम से जाना जाता था उस समय पाटी के उपर बालू या मिट्टी डालकर गड़ना करने की प्रथा भी थी जिसे धूलि कर्म कहा जाता था अंकों के उपयोग के कारण पाटी गणित को व्यक्त एवम अंक के साथ अक्षर के कारण बीजगणित को अव्यक्त गणित कहा जाता है। 

वेद सबसे मुख्य प्राचीन एवम प्रमाणिक ग्रंथ है जिनकी कुल संख्या चार हैं, जिन्हें हम ऋग्वेद,यजुर्वेद,अथर्ववेद, सामवेद के नाम से जानते हैं वेदों की रचना ईसा से काफी वर्ष पहले हुई थी जिसमें हमें अंकगणित के प्रारम्भिक रूप के दर्शन होते हैं ।

इसी प्रकार संस्कृत साहित्य मुख्यतः दो भागों में विभक्त है वैदिक साहित्य एवं लौकिक साहित्य। वैदिक साहित्य के अंतर्गत वेद ब्राह्मण ग्रंथ,आरण्यक,उपनिषद, वेदांग आदि ग्रंथ आते हैं जबकि लौकिक साहित्य के अंतर्गत रामायण, महाभारत,काव्य,नाटक, पुराणादि ग्रंथ आते हैं। अंकगणित के बीज वैदिक साहित्य के साथ साथ लौकिक साहित्य में भी प्राप्त होते हैं। 

आज हम आधुनिक गणित का जो परिष्कृत एवम उन्नत रूप देख रहे हैं इसके मूल में हमारे वेद ही हैं वेदों के अंतर्गत अंकगणित का अनेक जगह उल्लेख मिलता है ऋग्वेद के 10 वे मंडल के अक्ष सूक्त (10.34.02) मंत्र में द्युत विद्या अंतर्गत अक्षों के ऊपर एक दो तीन चार इत्यादि अंकों को लिपिबद्ध करने का वर्णन मिलता है इसी प्रकार इस मंडल के एक अन्य दूसरे मंत्र (10.34.08) में 53 संख्या का उल्लेख भी मिलता है इसी वेद अंतर्गत ऋषि एक अन्य मंत्र में कहते हैं कि एक स्थान पर मुझे ऐसी हजारों गायें देखने को मिली जिनके कान पर 8 का अंक लिखा हुआ था। 

इंद्रेण युजा निः सृजन्त वाघतो व्रजम गोमन्त मशविनम सहस्त्रम मे ददतो अष्टकर्णय: श्रवो देवेश्वक्रतः

ऋग्वेद १०.६२.०७

अन्कानाम वामतो गति: प्राचीन काल से ही संख्या पद्धति के लेखन एवं उच्चारण में शब्दांक और संख्यांक में विपरीत गति है

ऋग्वेद के मंत्र (3.9.9) एवम (10.52.6)मंत्रों में अंकों को शब्दों में लिखने का वर्णन प्राप्त होता है

त्रिणी शतानी त्रिसहस्त्राणी त्रिंशत च नव च

इसी तरह ऋग्वेद के (1.20.7), (10.27.15) (1.32.14) (10.72.8) मंत्रों में अन्य संख्याओं के लेखन का वर्णन भी मिलता है ऋग्वेद के ही एक अन्य मंत्र में अलंकारिक रूप से तीन सौ साठ दिनों को एक चक्र में लगी हुई तीन सौ साठ कीलें बताया गया है। 

वहीं यजुर्वेद में गणितीय तथ्य कर्मकांडों के साथ मिलते हैं मंत्र संख्या (17.2) में 10 की घात शून्य एवम दस की घात 12 तक की संख्याओं का वर्णन प्राप्त होता है जिनको निम्न तरीके से उल्लेखित किया गया है ।

एक, दश,शत(सौ),सहस्त्र (एक हजार), अयुत (दस हजार), नियुत (एक लाख),प्रयुत,(दस लाख),अरबुद,(एक करोड़), न्युरबुद (दसकरोड़), समुद्र(एक अरब),मध्य(दस अरब),अन्त(एक खरब),परार्ध(दस खरब) इस प्रकार परार्ध सबसे बड़ी संख्या के रूप में देखी गई है ।

यजुर्वेदीय याग पद्धति में संख्याओं की लेखन पद्धति को मंत्र संख्या (18.24,18.25) में स्पष्ट किया गया है ।

एका चमे त्रिस्तस्च चमे पञ्च चमे, सप्तस्चमे नवस्चमे एक्दश्चमे, द्वादश्चमे…. यज्ञेन कल्पन्ताम

इसका अर्थ है कि – 1, 3, 5, 7, 9, 11, 13, 15, 17, 19, 21, 23, 25, 27, 29, 31, 33 आदि प्रभृति अयुग्म साम मुझे यज्ञ में सिद्ध होवें।इसी प्रकार इन्हीं मंत्रों में 4, 8, 12, 16, 20, 24, 28, 32, 36, 40, 44, 48 प्रभृति स्वर्ग प्रामक युग्म स्तोम मुझे यज्ञ के द्वारा सिद्ध होवें।  इस प्रकार

सख्याओं का वर्णन मिलता है जिन्हे रुद्राभिषेक के सप्तम अध्याय में भी उल्लेखित किया गया है। 

इसी मंत्रांतर्गत अयुग्म संख्या(विषम संख्या )तथा युग्म संख्या (सम संख्या) का भी वर्णन देखने को मिलता है अयुग्म संख्या (१,३), (३,५), (५,७), (७,९), (९,११), (११,१३), (१३,१५), (१५,१७), (१७,१९), (१९,२१), (२१,२३), (२३,२५), (२५,२७),), (३७,२९), (३९,३१),और युग्म संख्या चार के पहाड़े के रुप में समानांतर श्रेणी एवम गुनोत्तर श्रेणी में वर्णित है। 

(४,८), (८,१२), (१२,१६), (१६,२०), (२०,२४), (२४,२८), (२८,३२), (३२,४०), (४०,४४), (४४,४८),

यजुर्वेद के ही तेत्तरिय संहिता में मंत्र  संख्या (७,२.११-२०) में विषम संख्याओं का विस्तृत विवेचन निम्न रूपों में प्राप्त होता है

१, ३. ५, ७, ९, ११, १३, १५, १७, १९, २९, ३९, ४९, ५९, ६९, ७९, ८९, ९९

इसके अलावा मंत्र संख्या (१४.२३) में जोड़ घटाव गुणन का भी वर्णन दिया हुआ है और मंत्र संख्या (8.30) में एक पदी, द्विपदी, त्रिपदी, चतुष्पदी क्रम आदि की संख्याओं का अभीष्ट गणितीय संयोजन मिलता है। 

 मंत्र संख्या( २३.२४) में सचछंदा, विचछंदा पदों का अर्थ है विभाज्य एवम अविभाज्य संख्याएं सम संख्याएं विभाजित होती है और विषम संख्याएं अविभाजित होती हैं यद्यपि कुछ विषम संख्याएं भी विभाजित होती हैं ।

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि यजुर्वेद में गणितीय संख्याओं का उल्लेख विभिन्न रूपों में अधिक मिलता है ।

सामवेद के आरण्यक पर्व में भी ऋषि अग्निदेव की आराधना करते हुए विराट पुरुष के स्वरूप का संख्याओ के साथ वर्णन करते हैं विराट पुरुष हजारों सिर वाला, हजार नेत्रों वाला एवम हजार चरणों वाला होता है।

इसी प्रकार अथर्ववेद में भी गणितीय तथ्यों से संबंधित संख्यांक संख्याएं मूलगणितीय संक्रियाएं जोड़ ,घटाव गुणन प्राप्त होती है शून्य के सिद्धांत का उल्लेख सूक्त (५.१५) में किया है ।

इसी में मन्या विनाशन सूक्त के मंत्र (६.२५,१.३)में शुनः शेप ने गले के रोगों के निदान के लिए गणितीय अंकों का प्रयोग किया है गंडमाला रोग की गर्दन में ५५,ग्रीवा में ७७, कंधे में ९९ धमनियां उसी प्रकार नष्ट हो जाती हैं जैसे पतिव्रता स्त्री के सामने दोषपूर्ण वचन अथर्ववेद के श्लोक (८.८.७,१०.८.२९) में भी अंकगणित के दर्शन मिलते हैं मंत्र संख्या (१३.५.१५ ,१५,१८) में एक से दस संख्याओं का वर्णन मिलता है अन्य सूक्त (५.१६) में ११ तक की संख्यायों का वर्णन मिलता है अथर्ववेद के मंत्र (१९.२३ )में बीस तक के अंकों की संख्या हवन विधि अंतर्गत निम्न रूप में दी गई है ।

पंच चरभेभ्य स्वाहा, सष्टाचेभ्य स्वाहा, सप्तचरभेभ्य स्वाहा …… विशति स्वाहा

इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि हमारे ऋषि मुनियों को गणित का प्रारम्भिक ज्ञान था जो समय के साथ उन्नत एवम परिष्कृत होकर आज हमारे सामने है इस प्रकार गणित का मुख्यत: श्रेय हमारे ऋषि मुनियों को ही जाता है।जिन्हें वैदिक सभ्यता ही अंकगणित का ज्ञान था

 

© श्री राजेन्द्र शर्मा राही 

भोपाल 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 650 ⇒ नीचे गिरने की कला ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “नीचे गिरने की कला ।)

?अभी अभी # 650 ⇒ नीचे गिरने की कला ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

आप इसे आकर्षण कहें या गुरुत्वाकर्षण, गिरना पदार्थ का स्वभाव है। जंगलों में बहता पानी पत्थरों और पहाड़ों के बीच रास्ता बनाता हुआ, झरना बन नीचे ही गिरता है, पहाड़ पर नहीं चढ़ता। गंगोत्री हो या अमरकंटक, भागीरथी गंगा हो या माँ नर्मदे, पहाड़ों, पठारों के बीच होती हुई, नीचे की ओर कलकल बहती हुई सागर में ही जाकर मिलती है।

इंसान भी जब गिरता है, तो धुआंधार गिरता है और जब उठता है, तो सनी देओल की भाषा में उठ ही जाता है। वैसे गिरना उठना किस्मत का खेल है ! अब आप सेंसेक्स को ही लीजिए, कितनों को ऊपर उठाया, और कितनों को नीचे गिराया। जो काम पहले सट्टा बाज़ार करता था, वह काम आजकल सत्ता का बाज़ार कर रहा है। किसी को उठा रहा है, किसी को गिरा रहा है। पहलवानों की भाषा में, इसे ही उठापटक कहते हैं।।

साहित्यिक भाषा में इसे उत्थान और पतन कहते हैं। इतिहास भी क्या है। सिकंदर भी आए, कलन्दर भी आये, न कोई रहा है, न कोई रहेगा। प्रसिद्धि के बारे में भी कहा गया है। कितना भी ऊँचा उठ जाओ, उसकी सीमा है। गिरने की कोई सीमा नहीं। वे फिर भी भाग्यशाली होते हैं, जो आसमान से गिरते हैं और खजूर में अटकते हैं। अगर ज़मीन पर गिरते तो क्या हश्र होता।

आप इसे क्या कहेंगे, अतिशयोक्ति अलंकार ही न ! तुम इतना नीचे गिरोगे, मैंने सोचा भी न था। क्या कोई ऊपर भी गिरता है। गिरने का मतलब नीचे गिरना ही होता है। किसी के ऊपर तो कोई कभी नहीं गिरता। वे कितने समझदार हैं, जिनका सरनेम गिरपडे़ है। वे कभी नहीं कहते, नीचे गिर पड़े। बस गिर पड़े, तो गिरपड़े।।

एक नीचे उतरना भी होता है।

यह बड़ा सभ्य और शालीन तरीका होता है। लोग कार से नीचे उतरते हैं, हवाई जहाज से नीचे उतरते हैं, मंत्री हेलीकॉप्टर से नीचे उतरते हैं। लेकिन साउथ अफ्रीका में मोहनदास को काला समझ गोरों ने ट्रेन से क्या उतारा, वो महात्मा बन गया। पहाड़ पर अगर चढ़ा जाता है, तो नीचे भी उतरा जाता है। बस केवल एक ऊँट ही है जो बड़ी मुश्किल से पहाड़ के नीचे आता है।

चरित्र का गिरना बुरा और किसी राजनीतिक पार्टी का गिरना अच्छा माना जाता है, ऐसा क्यों ? एक गिरा हुआ आदमी, कितना गिरा हुआ है, इसकी कोई पहचान नहीं, कोई मापदंड नहीं। कितने गिरे हुओं को समाज और कानून दंड देता है, इसका कोई हिसाब किताब नहीं। झूठ बोलने की कोई सज़ा नहीं, चोरी करके पकड़े जाने की सज़ा है। कितने भी मच्छर मारिए, कोई सज़ा नहीं, किसी पुलिस वाले को हाथ लगाकर तो देख लें।।

जो आदमी जितना नीचे गिरता है, वह उतना ही ऊँचा उठता है, इसे राजनीति कहते हैं। यहाँ विज्ञान का कोई सिद्धांत लागू नहीं होता। क्योंकि यह राजनीति विज्ञान है। समय आने पर लोग भूल जाते हैं, वह कितना गिरा हुआ था, उसे सर आँखों पर बिठाया जाता है। बस वह अपनी सत्ता की कुर्सी सम्भालकर रखे। क्योंकि कुर्सी पर बैठा इंसान कभी गिरा हुआ नहीं कहलाता।

गिरना एक कला है, यह सबके बस की बात नहीं। आप अगर गिरें और ठोकर खाएँ, तो समझदारी इसी में है, उठ खड़े हों और आगे से संभलकर चलें।

जिन्हें वक्त ने लात मारकर नीचे गिराया है, उन्हें भी उठाएं, गले से लगाएँ। गलत तरीकों से ऊपर उठना, नीचे गिरना ही कहलाता है। यह पतन का मार्ग है, आत्मा के उत्थान का नहीं।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 649 ⇒ पंचवटी ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “पंचवटी।)

?अभी अभी # 649 ⇒ संतुलन ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

जीवन संतुलन का नाम है। पूरी सृष्टि का संचालन श्रेष्ठ संतुलन का ही परिणाम है। भौगोलिक परिस्थितियां और पर्यावरण, मौसम के बदलते चक्र, सब कुछ किसी अज्ञात शक्ति के इशारे पर होता हुआ, क्रमबद्ध, नियम बद्ध। सुबह उठते ही एक कप चाय की तरह, तश्तरी में सुबह की ताजी हवा और धूप, और वह भी आपकी खिड़की में, बिना नागा।

क्या हमारी धरती और क्या आसमान, सुबह दोपहर और शाम, दिन और रात, अंधेरा उजाला, सूरज चंदा, तारा, नदी पहाड़ और वृक्ष वनस्पति और कुछ नहीं एक दिव्य संतुलन है। अगर पांचों तत्व हम पर मेहरबान हैं तो यह सब सृष्टि के संतुलन का ही परिणाम है।।

हम संतुलन का पाठ बचपन से ही सीखते चले आए हैं। एक नन्हा बालक पहले पालने में हाथ पांव मारता है, फिर जमीन पर संतुलन बनाते हुए वह उठना, बैठना और चलना भी सीख ही लेता है। आज हमें गर्व नहीं होता, लेकिन जब पहली बार अपने पांव के संतुलन के सहारे गिरते पड़ते दौड़ लगाई थी, तो मां कितनी खुश हुई थी। एक एक कदम लड़खड़ाते हुए चलना, संभलना, गिरना, फिर उठ खड़े होना। कभी रोना, कभी खुश होकर ताली बजाना। अपने पांव पर खड़े होना। जीवन के संतुलन का पहला पाठ।

संतुलन को हम balance भी कहते हैं और equilibrium भी। न कम न ज़्यादा, समान अनुपात। अगर हमारा वजन कम है तो हमें पौष्टिक आहार की सलाह दी जाती है और अगर वजन ज्यादा है तो संतुलित आहार। मात्रा का अनुपात ही प्रतिशत है। शून्य से शत प्रतिशत। कहीं जीरो तो कहीं हीरो। किसे पता था कि संतुलन का ग्राफ किसी दिन इतना ऊपर चला जाएगा कि लोग सफलता की सीढ़ियां चढ़ तो जाएंगे, लेकिन बाद में उतरना ही भूल जाएंगे। और सफलता का ग्राफ 0 से 100 का नहीं, 99 से 100 का ही रह जाएगा। आज जितना सुखी और संपन्न इंसान पहले कभी नहीं था।।

तराजू संतुलन के लिए होती है। जितने वजन का बांट होता है, उतना ही सौदा तुलता है। औषधि हो या भोजन, एक निश्चित मात्रा में ही असर करते हैं। पुण्य का कोई घड़ा नहीं होता, पाप का घड़ा जल्दी भर जाता है। जब पुण्य घटता है तो पाप का पलड़ा भारी हो जाता है। प्रकृति का संतुलन भी डगमगा जाता है। हमारे शरीर में भी अलार्म सिस्टम है और प्रकृति में भी। लेकिन हम उससे अधिकतर अनजान ही रहते हैं। जब पानी सर से ऊपर निकल जाता है, तब होश आता है।।

नफरत, स्वार्थ, खुदगर्जी, गला काट प्रतिस्पर्धा, किसी की टांग खींचना, किसी की चुगली करना, अपना ईमान गिरवी रखना, मुल्क के साथ, परिवार के लोगों के साथ विश्वासघात करना चारित्रिक असंतुलन की पराकाष्ठा है। मानवता पर कुठाराघात है। यह एक ऐसा सामूहिक अपराध है, जिसका दंड साधु और शैतान दोनों को भोगना है।

नृत्य में संतुलन है, भाव है भंगिमा है। नृत्य वंदना भी है और आराधना भी। नृत्य से नटराज प्रसन्न रहते हैं और नंगे नाच से वे भी क्रोधित और कुपित हो तांडव लीला प्रारंभ कर देते हैं। कोरोना का नंगा नाच हम देख ही चुके हैं।।

संतुलन ही असंतुलन का एकमात्र हल है, विकल्प है। अपने विकारों का नहीं, अच्छे विचारों का पलड़ा भारी हो। किसी का अनिष्ट सोचने की अपेक्षा सबके कल्याण के लिए प्रार्थना व प्रयत्न करें। पाप का पलड़ा भारी ना हो।

मानवता की रक्षा ही सृष्टि की सुरक्षा है। मन, वचन और कर्म में संतुलन बनाए रखें।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # 126 – देश-परदेश – Marry a Colleague ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # 126 ☆ देश-परदेश – Marry a Colleague ☆ श्री राकेश कुमार ☆

जब तक विवाह नहीं हो जाता है, तब तक पेरेंट्स परेशान रहते हैं। विवाह हो जाने पर “विवाहित युगल” परेशान रहते हैं। इसी समस्या को लेकर बेंगलुरु के युवाओं ने इसके समाधान हेतु एक नई पहल आरम्भ कर दी है।

विगत कुछ वर्षों से युवा लड़के और लड़कियां समान रूप से किसी संस्था में कार्य करते हैं। रेल के इंजन चालक से देश के सुरक्षा बलों में महिलाएं पूर्णतः सहभागी बन चुकी हैं।

पति और पत्नी दोनों का नौकरी करना और अपने पेरेंट्स के बिना रहने से अनेक कठिनाइयां उनकी जिंदगी को दूभर बना देती है।

एक जापानी कांसेप्ट “क्वालिटी सर्कल” कार्यालय की समस्या को सुलझाने के लिए प्रचलन में हुआ करता था। उसी से प्रेरणा लेकर आज के युवा अपने कुलीग से ही विवाह कर बहुत सारी समस्याओं का निराकरण स्वत: कर सकते हैं।

पूर्व में भी कुलीग से प्रेम विवाह या पेरेंट्स द्वारा भी विवाह तय किया जाता रहा है। ये कोई नई बात तो नहीं है, परंतु इसके होने वाले लाभ की चर्चा आजकल सोशल मीडिया में खूब हो रही है।

आर्थिक, सामाजिक और पारिवारिक सुविधाओं की चर्चा में घर किराए से लेकर यातायात में शत प्रतिशत बचत की बात की जा रही है। एक ही टिफिन में दोपहर के भोजन से भविष्य में युगल के बच्चों को पति और पत्नी दोनों रेफर कर, दोहरा लाभ अर्जित कर सकते हैं।

दोनों द्वारा “घर से कार्य” करने पर तो ये लाभ की मात्रा तो कई गुना बढ़ जाएगी। एक ही कार्यालय में काम करने से एक दूसरे पर शक सुबहा की संभावना भी नगण्य हो जाती है। इतनी सुख सुविधाओं के कारण “marry a colleague” एक बहुत अच्छा आइडिया कहा जा सकता है।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 648 ⇒ हंसते जख्म ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “हंसते जख्म।)

?अभी अभी # 648 ⇒ हंसते जख्म ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

बात कॉमेडी की चल रही थी, बीच में यह हंसते जख्म का जिक्र किसने छेड़ दिया! हंसते हंसते पेट में बल पड़ सकते हैं, हंसते हंसते आंखों में आंसू भी आ सकते हैं, लेकिन हंसते ही जख्म, कुछ हजम नहीं हुआ।

हंसना संजीवनी है, अगर हमारी जीवन संगिनी हंसती खेलती नसीब हो जाए तो क्या यह जीवन, कॉमेडी सर्कस नहीं हो जाए। आखिर कौन दुखी, जख्मी, आहत, और नाशाद रहना चाहता है इस जिंदगी में। तुम आज मेरे संग हंस हो, तुम आज मेरे संग गा लो, और हंसते गाते, इस जीवन की उजली राह संवारो। ढिंग चिक चिक चिक ढिंग ..ढोलक मंजीरा।।

लेकिन आज हंसने की स्थिति अत्यंत दयनीय और हास्यास्पद हो गई है। दुनिया हंस तो रही है, लेकिन इस हंसी में खुशी की आत्मा नहीं है, कहीं कोई खोखली हंसी हंस रहा है, तो कहीं कोई किसी और की गलती पर हंस रहा है। जो हास्य कभी सहज था, अब फूहड़ और अश्लील होता चला जा रहा है। जब हंसी के शब्दकोश में अपशब्द का समावेश हो जाता है तो वह हंसी भी अश्लील होती चली जाती है।

हंसी जो स्वास्थ्यवर्धक है, उसे हमने मनोरंजन का साधन बना लिया है। किसी मजबूर गरीब बुजुर्ग मुसीबत के मारे इंसान को अपने मनोरंजन के अड्डे पर पकड़ लाए। दादा पाय लागू ! दारू पीयोगे, मस्ती आ जाएगी। नहीं भैया, हम नहीं पीते, हमें जाने दो। नहीं दादा, ऐसा नहीं चलेगा, पहले दो घूंट चखना, फिर तो बस चखना, भूल गए आज होली है। बुजुर्ग छटपटा रहे हैं, इन्हें वीभत्स रस की प्राप्ति हो रही है, क्या यह हंसते जख्म नहीं है।।

हमारे लिए मनोरंजन ही हंसी है, हंसी थट्टा है, जिसका किसी की संवेदना से कोई लेना देना नहीं। बस हमें खुश रहना है। यही हास्य का मकसद है, हास्य की परिभाषा है।

हास्य बेचारा वैसे ही दोहरी मार खा रहा है। व्यंग्य में उसकी एंट्री एक एक्स्ट्रा की तरह है, कभी बुलाया जाता है, कभी बाहर निकाल दिया जाता है। तुम तो हास्य कवि सम्मेलन के लिए ही बने हो। डा सरोजिनी प्रीतम और काका हाथरसी ही जानते हैं, हास्य रस की फुलझड़ी क्या होती है। मुंह फुलाकर अपनी पत्नी की हंसी उड़ाकर, आप भले ही सुरेंद्र शर्मा बन बैठें, अब तो आप भी हास्य के पात्र ही नजर आते हो। सोने की मुर्गी जो हाथ लग गई थी।।

खुद पर हंसना ही वास्तविक हास्य है, दूसरों की हंसी उड़ाना, उन पर कीचड़ फेंकना, ना तो सहज हास्य है और ना ही स्वस्थ मनोरंजन। राजनीति ने भोले भाले सहज हास्य की हत्या की है, उसे बुरी तरह जख्मी किया है। जख्म लेकर फिर भी वह हंस रही है, और हमारी जनता उसके हंसते जख्म को अनदेखा कर तालियां बजा रही है, अपने नेताओं का गुणगान कर रही है।

खेल ताश का हो या सर्कस का, हम हमेशा जोकर को बीच में ले आते हैं। राजकपूर एक शो मैन थे, आम आदमी का दर्द समझते थे। जोकर भी क्या था, बच्चों के लिए मनोरंजन का किरदार।

सनातन, संपन्न नाट्य विधा में भी विदूषक तो होता ही था।।

समय ने हास्य को उठाया भी और गिराया भी। हास्य भी बुलंदियों की ऊंचाइयों तक पहुंचा भी और फिर गर्त में गिरा भी। उमा देवी जैसी गायिका को जब समय ने टुनटुन बना दिया, तो क्या कला ने आत्म हत्या कर ली। नहीं उमा देवी को ही अपनी आत्मा को मारना पड़ा।

जब फिल्मों पर हास्य के गिरते स्तर के युग में कुंदन शाह जाने भी दो यारों जैसी मनोरंजक फिल्म लेकर आए तो लगा अब हास्य जी उठेगा। नुक्कड़ और देख भाई देख, देखकर मन खुश हो गया था। लेकिन हास्य हमेशा अपनी मर्यादा भूल जाता है। उस पर जब एक पतिव्रता स्त्री की शर्तें थौंपी जाती है, तो वह बगावत कर बैठता है। जब art for arts’ sake हैं, व्यंग्य अपनी शालीन मर्यादा लांघ पोर्न होता चला जा रहा है, आधा गांव और काशी के अस्सी पर आपत्ति नहीं, लेकिन कपिल का कॉमेडी शो तो हम नहीं देखते, बड़ा फूहड़, दो दो अर्थी वाला है।।

हमारे देश में भक्त भी हैं और आलोचक भी। कुछ स्तरीय लोग भी कपिल के शो पर आकर घटिया जॉक सुनाते हैं और इसी मंच पर सतीश कौशिक और अनुपम खेर अपनी यारी दोस्ती के कारनामे ठहाकों में सुनाते हैं। अभी अभी यहां सुधा मूर्ति जी ने भी कदम रखा। कला कला है, यहां कभी वाह उस्ताद जाकिर हुसैन तो कभी अल्ला रखा।

वाकई आज हास्य जख्मी है और उसका जख्म हमारी खुदगर्जी है, हमें उससे तो बहुत अपेक्षाएं हैं लेकिन उसे हमने आज भी अपने सहज जीवन से कोसों दूर रखा है। फूलों की हंसी, बच्चों की फुलवारी और पक्षियों के कलरव में आज भी दिव्य हास्य मौजूद है, कभी अपने पर हंस लें और कभी आज की राजनीति पर दो आंसू बहा लें, गंगा नहा आएंगे आप। हास्य गुदगुदी है, कोई जख्म नहीं, लाफ्टर कोई मेडिसिन नहीं, शरीर और आत्मा का कायाकल्प है। सुख सागर है, परमानंद सहोदर है।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # 283 – राम, राम-सा..! ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # 283 ☆ राम, राम-सा..! ?

राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे,

सहस्त्रनामतत्तुल्यं राम नाम वरानने।

राम मर्यादापुरुषोत्तम हैं, लोकहितकारी हैं। राम एकमेवाद्वितीय हैं। राम राम-सा ही हैं, अन्य कोई उपमा उन्हें परिभाषित नहीं कर सकती।

विशेष बात यह कि अनन्य होकर भी राम सहज हैं, अतुल्य होकर भी राम सरल हैं, अद्वितीय होकर भी राम हरेक को उपलब्ध हैं। डाकू रत्नाकर ने मरा-मरा जपना शुरू किया और राम-राम तक आ पहुँचा। व्यक्ति जब सत्य भाव और करुण स्वर से मरा-मरा जपने लगे तो उसके भीतर करुणासागर राम आलोकित होने लगते हैं।

राम का शाब्दिक अर्थ  हृदय में रमण करने वाला है। रत्नाकर का अपने हृदय के राम से साक्षात्कार हुआ और जगत के पटल पर महर्षि वाल्मीकि का अवतरण हुआ। राम का विस्तार शब्दातीत है। यह विस्तार लोक के कण-कण तक पहुँचता है और राम अलौकिक हो उठते हैं। कहा गया है, ‘रमते कणे कणे, इति राम:’.. जो कण-कण में रमता है, वह राम है।

राम ने मनुष्य की देह धारण की। मनुष्य जीवन के सारे किंतु, परंतु, यद्यपि, तथापि, अरे, पर,  अथवा उन पर भी लागू थे।  फिर भी वे परम पुरुष सिद्ध हुए।

वस्तुतः इस सिद्ध यात्रा को समझने के लिए उस सर्वसमावेशकता को समझना होगा जो राम के व्यक्तित्व में थी। राम अपने पिता के जेष्ठ पुत्र थे।सिंहासन के लिए अपने भाइयों और पिता की हत्या की घटनाओं से संसार का इतिहास रक्तरंजित है। इस इतिहास में राम ऐसे अमृतपुत्र के रूप में उभरते हैं जो पिता द्वारा दिए वचन का पालन करने के लिए राज्याभिषेक से ठीक पहले राजपाट छोड़कर चौदह वर्ष के लिए वनवास स्वीकार कर लेता है। यह अनन्य है, अतुल्य है, यही राम हैं।

भाई के रूप में भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न के लिए राघव अद्वितीय सिद्ध हुए। उनके भ्रातृप्रेम का अनूठा प्रसंग हनुमन्नाष्टक में वर्णित है। मेघनाद की शक्ति से मूर्च्छित हुए लक्ष्मण की चेतना लौटने पर हनुमान जी ने पूछा, ‘हे  लक्ष्मण, शक्ति के प्रहार से बहुत वेदना हुई होगी..!’  लक्ष्मण बोले, “नहीं महावीर,  मुझे तो केवल घाव हुआ,  वेदना तो भाई राम को हुई होगी..!’

यह वह समय था जब समाज में बहु पत्नी का चलन था। विशेषकर राज परिवारों में तो राजाओं की अनेक पत्नियाँ होना सामान्य बात थी। ऐसे समय में अवध का राजकुमार, भावी सम्राट ‘एक पत्नी’ व्रत का आजीवन पालन करे, यह विलक्षण है।

शूर्पनखा का प्रकरण हो या पार्वती जी द्वारा सीता मैया का वेश धारण कर उनकी परीक्षा लेने का प्रसंग, श्रीराम की महनीय शुद्धता 24 टंच सोने से भी आगे रही। सीता जी के रूप में पार्वती जी को देखते ही श्रीराम ने हाथ जोड़े और पूछा, “माता आप अकेली वन में विचरण क्यों कर रही हैं और भोलेनाथ कहाँ हैं? “

इसी तरह हनुमान जी के साथ स्वामी भाव न रखते हुए भ्रातृ भाव रखना, राम के चरित्र को उत्तुंग करता है- ‘तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई।’

समाज के सभी वर्गों को साथ लेकर चलना राम के व्यक्तित्व से सीखा जा सकता है। उनकी सेना में वानर, रीछ, सभी सम्मिलित हैं। गिद्धराज जटायु हों, वनवासी माता शबरी हों, नाविक केवट हो, निषादराज गुह अथवा अपने शरीर से रेत झाड़कर सेतु बनाने में सहायता करनेवाली गिलहरी,  सबको सम्यक दृष्टि से देखने वाला यह रामत्व केवल राम के पास ही हो सकता था। संदेश स्पष्ट है, जो तुम्हारे भीतर बसता है, वही सामने वाले के भीतर भी रमता है।…रमते कणे कणे…!  कण कण में राम को राम ने देखा, राम ने जिया।

भारत के अनेक प्रदेशों में अभिवादन के लिए ‘राम-राम’ कहा जाता है। राजस्थान में  ‘राम राम-सा’ का प्रयोग होता है। लोक के इस संबोधन में एक संदेश छिपा है। राम-सा केवल राम ही हो सकते हैं। सात्विकता से सुवासित जब कोई  ऐसा सर्वगुणसम्पन्न हो कि उसकी तुलना किसी से न की जा सके, अपने जैसा एकमेव आप हो तो राम से श्रीराम होने की यात्रा पूरी हो जाती है। यही राम नाम का महत्व है, राम नाम की गाथा है और रामनाम का अविराम भी है।

राम राम रघुनंदन राम राम,

राम-राम भरताग्रज राम राम।

राम-राम रणकर्कश राम राम,

राम राम शरणम् भव राम राम।।

सभी पाठकों को श्रीरामनवमी की हार्दिक स्वस्तिकामनाएँ।💐🙏

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

💥 15 मार्च से आपदां अपहर्तारं साधना आरम्भ हो चुकी है 💥  

🕉️ प्रतिदिन श्रीरामरक्षास्तोत्रम्, श्रीराम स्तुति, आत्मपरिष्कार मूल्याकंन एवं ध्यानसाधना कर साधना सम्पन्न करें 🕉️

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों  को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 647 ⇒ शाश्वतता (Timelessness) ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “शाश्वतता (Timelessness) ।)

?अभी अभी # 647 शाश्वतता (Timelessness) ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

आकाश और समय की गणना नहीं हो सकती, क्योंकि दोनों ही शाश्वत हैं। पृथ्वी से पहले आकाश था, समय तब भी था, जब समय की गणना असंभव थी। स्वामी विवेकानंद ने संसार को शून्य के महत्व से अवगत कराया। वह एक अंक था या समस्त ब्रह्माण्ड में व्याप्त शून्य, विज्ञजन शायद जानते हों।

क्या शून्य में ही आकाश और समय समाया हुआ है। क्या आपका और हमारा समय एक ही है? फिलहाल तो आप कह सकते हैं, सबका समय एक जैसा चल रहा है। ।

एक विश्व घड़ी भी होती है, जो सभी देशों का अलग अलग समय बताती है। सभी देशों के समय में अंतर होता है। जिनके परिजन विदेशों में रहते हैं, वे अपनी घड़ी का समय उनकी घड़ी से मिला लेते हैं, ताकि सुविधानुसार बात हो सके। यानी घड़ी के समय को हम अपनी मर्ज़ी अनुसार कम ज़्यादा कर सकते हैं।

एक स्टॉप वॉच होती है। आपका समय शुरू होता है अब ! क्या आप किसी का समय शुरू कर सकते हो। अगर हां, तो काश हम समय को रोक भी सकते। यहां घड़ी के समय की नहीं, काल की बात हो रही है। ।

समय की गणना के लिए घड़ी और कैलेंडर के अलावा पंचांग भी होता है जो हमें ग्रह नक्षत्रों की स्थिति भी बताता है। जितने वार उतने ग्रह। वैसे वार तो केवल सात ही होते हैं, लेकिन राहु केतु सभी ग्रहों के बाप है। शनि की इनसे मिलीभगत है। ये कभी भी वक्र हो जाते हैं और अच्छे भले काम में टांग अड़ा देते हैं।

ज्योतिष ही नहीं, समय के साथ सामुद्रिक विद्या भी अपने करतब दिखाने से पीछे नहीं हटती। मोती, मूंगे, पुखराज जैसे नग इंसान को अपनी उंगलियों पर नचाते हैं। इंसान का अच्छा अथवा बुरा समय इनके पास गिरवी रखा हुआ होता है। ।

जो लोग जीवन में शगुन, अपशकुन नहीं मानते, केवल विज्ञान के आगे नत – मस्तक होते हैं, कभी कभी उनका भी समय खराब चल रहा होता है। ज़्यादा बहस नहीं, दिमाग नहीं, चुपचाप जो कहा, वह करना। अगर कोरोना और ग्रहण काल में घर से बाहर नहीं निकलने का कहा, तो वैसा करो ना।

क्या हम समयातीत नहीं हो सकते। मोबाइल के किसी मेसेज की तरह, समय को डिलीट नहीं कर सकते। बहुत से आते हैं ऐसे पल हमारे जीवन में, जब समय कैसे गुज़र जाता है, पता ही नहीं चलता। बस इसी तरह, हम जब चाहें, जो समय हम नहीं चाहें, वह व्यतीत हो जाए, और हमें पता ही नहीं चले। ।

हमारी प्रथ्वी के समय की गणना, पल, सेकंड, मिनिट, घंटे, दिन, सप्ताह, माह और वर्ष तक सीमित रहती है। ब्रह्माण्ड में समय की गणना प्रकाश वर्ष में होती है। प्रकाश की गति समय से भी तेज होती है। क्या कभी समय को रोका जा सकता है। जो घटना एक पल में घटित होती है, क्या उस पल को मिटाया जा सकता है।

काल का पहिया घूमे भैया

लाख तरह इंसान चले।

ले के चले बारात कभी तो

कभी बिना सामान चले।।

अभी समय बिना सामान चलने का आ गया है। अज्ञेय ने भी काल के कठोर सच को स्वीकार किया है ;

हम सब काल के दांतों तले

चबते चले जाते हैं

चुइंग गम की तरह

कच कच कच

बड़ा कठोर सच।।

हमें समय की शास्वतता स्वीकार करनी ही होगी। हम समयातीत नहीं हो सकते। न समय को आगे कर सकते, न पीछे। जो समय को अपनी मुट्ठी में बांधकर रखना चाहते हैं, वे सभी आज समय के आगे हाथ बांध खड़े हैं। समय को बलवान यूं ही नहीं कहा गया है।

किसी ने सच ही कहा है ;

ये समय बड़ा हरजाई

समय से कौन लड़ा मेरे भाई।

कितना अच्छा हो, हम खराब समय को अपने हिस्से से डिलीट कर सकें। न हम पर कोई विपत्ति आए न इस संसार पर। काश आधुनिक मशीनों और अत्याधुनिक हथियारों की तरह, यह संसार भी हमने बनाया होता तो शायद शैलेन्द्र कभी यह नहीं कहते ;

दुनिया बनाने वाले,

क्या तेरे मन में समाई ?

काहे को दुनिया बनाई !

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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