(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “हृदय परिवर्तन…“।)
अभी अभी # 551 ⇒ हृदय परिवर्तन श्री प्रदीप शर्मा
आज हम हृदय प्रत्यारोपण की नहीं, हृदय परिवर्तन की बात करेंगे। इसमें केवल ट्रांसफॉर्मेशन होता है, ट्रांसप्लांटेशन नहीं। इसमें कोई मरीज नहीं होता, कोई चिकित्सक नहीं होता। कोई सर्जरी, दिल की अदला बदली नहीं होती, कुछ नहीं होता, बस कुछ कुछ होता है।
अगर किसी का हृदय परिवर्तन इतना आसान होता, तो दुनिया में युद्ध न होते, दुराचार, व्यभिचार, भ्रष्टाचार न होता। न रावण मरता, न कंस का वध होता।।
ईश्वर के इतने अवतार हुए, कभी मानवता के आदर्श के रूप में हुए तो कभी दुष्टों के संहार और अधर्म के नाश और धर्म की स्थापना के लिए। कभी हमने रामराज्य का विहंगावलोकन किया तो कभी कृष्ण ने प्रेम की बंसी बजाई। विश्व के कल्याण के लिए इन अवतारों को कितने पापड़ बेलने पड़े, समय साक्षी है।
ह्रदय परिवर्तन ज़ोर ज़बरदस्ती से, चाकू या तलवार की नोंक पर नहीं किया जा सकता !इसके लिए दोनों तरफ एक सी आग का होना जरूरी है। यह हृदय परिवर्तन है, धर्म परिवर्तन नहीं। जब कोई आदर्श हमारे हृदय में प्रवेश कर जाता है, तो हमारा हृदय परिवर्तन हो जाता है।।
आत्मा के सुधार के लिए किया गया परिवर्तन ही हृदय परिवर्तन है। अंगुलिमाल और वाल्मीकि के उदाहरण हृदय परिवर्तन के श्रेष्ठ उदाहरण हैं। किसी आदर्श का हमारे मन में बस जाना ही हृदय परिवर्तन है। कभी इसके लिए माध्यम कोई मार्गदर्शक भी हो सकता है, अथवा कभी कभी कोई परिस्थिति।
समर्पण ही हृदय परिवर्तन है। बुरे का अच्छे के प्रति समर्पण श्रेष्ठ समर्पण है। जयप्रकाश नारायण ने डाकुओं के आत्म-समर्पण जैसा अनूठा कदम उठाया। ऐसे सत्प्रयास भले ही शत प्रतिशत सफल न हों, लेकिन ये समाज को एक नई दिशा देते हैं, एक संदेश देते हैं।।
हमारी विधा में अपराध के बाद दंड का प्रावधान है। जेल सजा भुगतने के लिए तो होता ही है, लेकिन कैदी को वहां भी सुधरने के अवसर दिए जाते हैं। उनकी प्रवृत्ति के अनुसार उन्हें उत्तरदायित्व सौंपे जाते हैं। किरण बेदी ने कैदियों को सुधरने के कई अवसर दिए और उन्हें आशातीत सफलता भी मिली। महर्षि अरविंद स्वतंत्रता की खातिर कई वर्षों तक अंग्रेजों की जेल में रहे, जहां उन्होंने सावित्री जैसे महाकाव्य की रचना कर डाली। आपातकाल में मीसा में बंद अटल जी की कविताएं यह साबित करती हैं, कि शरीर को कैद किया जा सकता है, किसी की आत्मा को नहीं।
अच्छे और बुरे का संग्राम ही देवासुर संग्राम है। बुरे पर अच्छे की विजय सदा से होती आई है। खेत में से खरपतवार का निकालना आवश्यक होता है। कुछ पौधों की छंटनी से वे और अधिक पनपते हैं, पल्लवित होते हैं। अगर अपने अवगुणों की छंटनी कर दी जाए, तो अच्छाई उभर कर ऊपर आ सकती है। हमारे अंदर की गाजर घास का खात्मा भी उतना ही जरूरी है।।
(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के लेखक श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको पाठकों का आशातीत प्रतिसाद मिला है।”
हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों के माध्यम से हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)
☆ संजय उवाच # 269 ☆ मढ़ी न होती चामड़ी…!
संध्या भ्रमण के लिए मुझे सूनी सड़क के सूने फुटपाथ पसंद हैं। यद्यपि महानगर में यह पसंद स्वप्न से अधिक कुछ नहीं होती। तथापि भाग्यवश कैंटोन्मेंट प्रभाग में निवास होने के कारण ऐसी एकाध सड़कें बची हुई हैं। ऐसी ही तुलनात्मक रूप से सूनी एक सड़क के कम भीड़भाड़ वाले फुटपाथ पर भ्रमण कर रहा हूँ।
सूर्यास्त का समय है। डूबते सूरज के धुँधलके में मनुष्य साये में बदलता दिखता है। साँझ और साया..! जीवन की साँझ और साया रह जाना! यूँ दिन भर साथ चलती परछाई भी साया होने के सत्य को इंगित कर रही होती है। सूर्योदय से सूर्यास्त की परिक्रमा दैनिक रूप से मनुष्य को नश्वरता का शाश्वत स्मरण कराती है।
अस्तु! भ्रमण जारी है। भ्रमण के साथ अवलोकन भी जारी है। मुझसे कुछ आगे एक युवक चल रहा है। वह सिगरेट का कश लेकर धुआँ आसमान की ओर छोड़ रहा है। देखता हूँ कि यह धुआँ एक आकार लेकर धीरे-धीरे ऊपर उठ रहा है। धुएँ का आकार देखकर अवाक हूँ। यह कंकाल का आकार है। मनुष्य द्वारा फूँका जाता धुआँ, मनुष्य को फूँकता धुआँ। कंकाल पर देह ओढ़ता मनुष्य, देह का ओढ़ना खींचकर मनुष्य को कंकाल करता धुआँ।
यूँ देखें तो देह का भौतिक अस्तित्व कंकाल पर ही टिका है। कंकाल आधार है, माँस-मज्जा आधार पर चढ़ी सज्जा है। चमड़ी की सज्जा न होती तो क्या मनुष्य दैहिक आकर्षण में बंध पाता?
दृष्टांत है कि एक गाँव में एक रूपसी अकेली रहती थी। गाँव के जमींदार का उसके रूप पर मन डोल गया। वासना से पीड़ित जमींदार उस स्त्री के घर पहुँचा। महिला ने प्राकृतिक चक्र की दुहाई देकर चार दिन बाद आने के लिए कहा। जमींदार के लौट जाने के बाद उस रूपसी ने रेचक का बड़ी मात्रा में सेवन कर लिया। रेचक के प्रभाव के चलते उसे पुन:- पुन: शौच के लिए जाना पड़ा। स्थिति यह हुई कि सारा का सारा माँस शरीर से उतर गया और वह कंकाल मात्र रह गई। चार दिन बाद आया जमींदार उल्टे पैर लौट गया।
लोकोक्ति है,
सुंदर देह देखकर उपजत मन अनुराग।
मढ़ी न होती चामड़ी तो जीवित खाते काग।
प्रकृति सुंदर है। दैहिक सौंदर्य का आकर्षण भी स्वाभाविक है। तथापि आत्मिक सौंदर्य न हो तो दैहिक सौंदर्य व्यर्थ हो जाता है। सहज रूप से उगे गुलाब पुष्प की सुगंध नथुनों में गहरे तक समाती है। वहीं बड़े करीने से तैयार किए हाईब्रीड गुलाब दिखते तो सुंदर हैं पर सुगंध के नाम पर शून्य। सुगंध आत्मिकता है, शेष सब धुआँ है।
दूर श्मशान से धुआँ उठता देख रहा हूँ। किसी देह का ओढ़ना धुआँ-धुआँ हो रहा है। सबके लिए समान रूप से लागू इस नियम में बिरले ही होते हैं जो धुआँ होने के बाद भी अपनी आत्मिकता के कारण चिर स्मरणीय हो जाते हैं। दैहिक सौंदर्य के साथ मनुष्य आत्मिक सौंदर्य के प्रति भी सजग हो जाए तो धुआँ होने से पहले जग को सुवासित करेगा और आगे धुआँ इस सुवास को अनंत में प्रसरित करेगा।
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
मार्गशीर्ष साधना 16 नवम्बर से 15 दिसम्बर तक चलेगी। साथ ही आत्म-परिष्कार एवं ध्यान-साधना भी चलेंगी
इस माह के संदर्भ में गीता में स्वयं भगवान ने कहा है, मासानां मार्गशीर्षो अहम्! अर्थात मासों में मैं मार्गशीर्ष हूँ। इस साधना के लिए मंत्र होगा-
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
इस माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी को गीता जयंती मनाई जाती है। मार्गशीर्ष पूर्णिमा को दत्त जयंती मनाई जाती है।
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “एक जिंदगी स्मार्ट सी…“।)
अभी अभी # 550 ⇒ एक जिंदगी स्मार्ट सी श्री प्रदीप शर्मा
सादा जीवन उच्च विचार, क्या कहीं सुना सुना सा नहीं लगता ! दिमाग पर बहुत जोर डालना पड़ता है, तब अनायास लालबहादुर शास्त्री का ख्याल आता है। तब हमारे जीवन में भी कहां तड़क भड़क थी। आज की पीढ़ी भले ही कह ले, मजबूरी का नाम महात्मा गांधी, लेकिन इसमें हमारा भी कोई दोष नहीं। दिलीप कुमार खुद २२ इंच की मोरी की पैंट पहनता था, लड़के लोग देवानंद जैसे फुग्गे वाले बाल रखते थे और लड़कियां साधना कट बाल। तब बस यही फैशन और स्मार्टनेस की परिभाषा थी।
पहले बच्चों के कपड़े घर में मां ही सीती थी। इतने भाई बहन होते थे कि कपड़े, बस्ते और किताबें आपस में शेयर की जाती थी। वही कोर्स की पुरानी किताबें, नया कवर चढ़ाकर छोटे भाई बहन के काम आती थी। नये कपड़े वार त्योहार और शादी ब्याह के मौके पर।।
परिवार का एक ही दर्जी होता था, भीखाभाई टेलर मास्टर। हेयर कटिंग भी अगर करवानी है तो आपले केश कर्तनालय में।
अपनी कोई पसंद ही नहीं होती थी। रेडियो तक को सिर्फ पिताजी हाथ लगाते थे। बाल कभी बढ़ते ही नहीं थे। शरीफ बच्चे जो होते थे हम।
पहला फोटो कृष्णपुरा के गोपाल स्टूडियो में खिंचवाया, क्योंकि कॉलेज में आइडेंटिटी कार्ड बनवाना था। पहली बार खुद की साइकिल हाथ लगी और खुद का अलग कॉलेज। साला मैं तो स्मार्ट बन गया। अब हाफ पैंट पहनने में शर्म आने लगी थी।।
अच्छी तरह याद है, एवर स्मार्ट टेलर ने हमारा पहला पैंट सीया था। अब मुंह से अंग्रेजी निकलने लगी थी। स्टार लिट टॉकीज में अंग्रेजी फिल्में और अंग्रेजी उपन्यास भी पढ़ने शुरू कर दिए थे। कम सेप्टेंबर की धुन और टकीला ने हमें पूरा अंग्रेज बना दिया था।
अंग्रेजी फिल्म समझे ना समझे, डॉक्टर जिवागो, गन्स ऑफ नेवरोन, साइको (psycho) जिसे कुछ लोग पिस्को भी कहते थे, और ड्रेकुला देखना और रात में बिस्तर में डरना किसे याद नहीं।
तब तक इतने स्मार्ट तो हम भी हो गए थे, कि कॉलेज को बंक मार फिल्में देखना शुरू कर दिया था। अगर आए दिन कॉलेज में जी टी (जनरल तड़ी) और स्ट्राइक होगी तो रोज रोज सीधे घर तो नहीं जाया जा सकता ना। यहां हमारा कोई भाई बहन नहीं होता था, जो घर जाकर मां से चुगली कर दे। सभी जानते थे, कॉलेज लाइफ कैसी होती है।।
आज स्मार्ट टीवी के सामने बैठकर, स्मार्ट फोन पर जब पिछली जिंदगी का सिंहावलोकन करने बैठते हैं, तो बड़ी हंसी आती है। उंगलियों और कागजों पर गुणा भाग करना पड़ता था। तब कहां कैलकुलेटर नसीब होता था। एक चल मेरी लूना हमें कहां कहां ले जाती थी। अलका और प्रकाश सिनेमाघर हमेशा हाउसफुल रहते थे। लाइन में लगे, लेकिन कभी ब्लैक में टिकट नहीं लिया। लेकिन बाद में कई चीजों पर ऑन देना पड़ा।
कभी पूरा शहर पैदल और आसपास के पर्यटन स्थल साइकिल से आराम से नाप लिए जाते थे, लेकिन स्मार्ट सिटी बनता जा रहा हमारा शहर, अब हमसे नहीं नापा जाता। फेसबुक की पोस्ट पर रीच की तरह शहर में भी हमारी रीच बहुत कम हो गई है। या तो हम कम रिच (rich) हो गए हैं, या फिर मेरा शहर बहुत अमीर हो गया है।।
जिस शहर में लोग साइकिल छोड़ बाइक और कार में आ जाते हैं, वहां फिर पैदल कोई नहीं चलता। मोहल्ले कॉलोनियों में, और कॉलोनियां बहुमंजिला इमारतों में तब्दील होती चली जाती है। लोग अब शहर छोड़ गांव में नहीं जाते, गांव खुद ही शहर में शामिल होते चले जाते हैं।
मेरे आसपास आजकल सब्जियां और किराना बिग बास्केट से , और खाना जोमैटो से आता है। महीने का किराना आजकल बनिया नहीं लाता, लोग डी मार्ट चले जाते हैं। सभी कुछ ऑनलाइन होने से , भले ही आपकी जेब में फूटी कौड़ी ना हो, आप दुनिया भर की सैर आराम से कर सकते हैं। जब दुनिया भर का समय भी आजकल स्मार्ट वॉच ही बताती है, तो हमारी जिंदगी भी स्मार्ट ही हो गई है। कितना सुख चैन है इस स्मार्ट लाइफ में। आज अगर शैलेंद्र होते तो मजबूरी में वे भी शायद यही कहते ;
(डा. मुक्ता जीहरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से हम आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख दर्द और समस्या। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की लेखनी को इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # 259 ☆
☆ दर्द और समस्या… ☆
“दर्द एक ऐसा संकेत है कि तुम ज़िंदा हो; समस्या एक संकेत है कि तुम मज़बूत हो;- परिवार, मित्र और संगठन एक संकेत हैं कि तुम अकेले नहीं हो’ में जीवन जीने की कला का संदेश निहित है। दु:ख हमारे जीवन का अभिन्न अंग है जो हमें अपने-परायों से अवगत कराता है। यह जीवन की कसौटी है जो मित्र-शत्रु, उचित-अनुचित, भाव-सद्भाव व मानव में निहित दैवीय गुणों प्रेम, स्नेह, करुणा, सहानुभूति व संवेदनशीलता का परिचायक है।
दर्द हमारी सहनशीलता की परीक्षा लेता है और मूल्यांकन करता है कि हम कितने संवेदनशील है तथा हमारी सोच कैसी है? छोटी सोच शंका को जन्म देती है और बड़ी सोच समाधान से अवगत कराती है। यदि सुनना सीख लिया तो सहना सीख जाओगे और सहना सीख लिया तो रहना सीख जाओगे। सो! दर्द हमारे जीवित होने का प्रमाण है और समस्या हमारी दृढ़ता की परिचायक है। समस्याएं हमारी परीक्षा लेती हैं। यह हमें अपनी आंतरिक शक्तियों से अवगत कराती हैं तथा उनसे हमारा साक्षात्कार कराती हैं कि हममें कितना धैर्य, साहस व दृढ़ता कायम है? हम विषम परिस्थितियों का सामना करने में कितने सक्षम है? समस्याएं हमारी प्रेरक हैं, जीवन का आधार व पथप्रदर्शक हैं। यदि राहों में अवरोध ना हो तो जीने का आनंद ही नहीं आता। हम अपनी जीवनी शक्ति अर्थात् ऊर्जा को पहचान नहीं पाते। सो! यदि जीवन समतल धरातल पर चलता रहता है तो हम अंतर्मन में निहित शक्तियों से अवगत नहीं हो पाते तथा जीने का वास्तविक आनंद प्राप्त नहीं कर सकते।
समय व प्रकृति परिवर्तनशील हैं और समय अविराम चलता रहता है। जीवन में सुख-दु:ख, हानि-लाभ, खुशी-ग़म, हँसी-रूदन समयानुसार आते-जाते रहते हैं। संसार मिथ्या है तथा सृष्टि-नियंता के अतिरिक्त सब नश्वर है। सो! कभी मानव चाँदनी में अवगाहन कर प्रसन्न होता है तो कभी अमावस के घने अंधकार में जुगनूँ का प्रकाश पाकर कृतज्ञता ज्ञापित करता है। कभी भोर होते सूर्य की रश्मियाँ धरा पर कुँकुम बिखेर देती हैं और मलय वायु के झोंके मानव को मदमस्त बना देते हैं। मानव उन पलों में सुधबुध खो बैठता है। कभी सागर में उठती लहरें साहिल से टकराकर लौट जाती है, मानो कोई भक्त अपने प्रभु के चरण स्पर्श कर लौट जाता है और सागर अनमोल मोती, रत्न आदि साहिल पर दुआओं के रूप में छोड़ देता है। परंतु कभी-कभी सागर सुनामी के रूप में हृदय के क्रोध को भी प्रदर्शित करता है और सागर की आकाश को छूती लहरें अपनी राह में आने वाले समस्त पदार्थों को तहस-नहस कर बहा ले जाती हैं। चहुँओर उजाड़-सा भासता है, मानो मातम पसरा हो।
कभी-कभी भगवान भी हमें दु:खों के भँवर में फंसा कर हमारे धैर्य की परीक्षा लेते हैं। इससे ज्ञात होता है कि हम कितने अडिग, अचल, दृढ़ व मज़बूत हैं। यदि हम उस स्थिति में विचलित हो जाते हैं तो हम सामान्य मानव हैं और हममें साहस की कमी है; सहनशीलता हमसे कोसों दूर है। उस स्थिति में हमारी नौका सागर में डूबती-उतराती है और उसमें विलीन हो जाती है। दूसरे शब्दों में हम लहरों के थपेड़ों को सहन नहीं कर पाते और अंतत: डूब के सागर बन जाते हैं।
परिवार, मित्र व संगठन एक संकेत हैं कि तुम अकेले नहीं हो। वे सुख-दुःख व सम-विषम परिस्थितियों में आपके साथ खड़े रहते हैं। परिवार का हर सदस्य व सच्चे मित्र आपके हितैषी होते हैं। वे आपको मँझधार में छोड़कर कहीं नहीं जाते। वैसे भी मानव अपनी स्वार्थ वृत्ति व संकुचित दृष्टिकोण के कारण दु:ख बाँटने पर सुक़ून पाता है और सुख को एकांत में भोगना चाहता है। परंतु ‘हमारे मित्र हमें हर पल एहसास दिलाते हैं कि हम तुम्हारे साथ हैं। आगे बढ़ो, बीता हुआ कल तुम्हारे मन में है और आने वाला कल तुम्हारे हाथ में है।’ अतीत लौटता नहीं और भविष्य अनिश्चित् है। परंतु आप वर्तमान में अथक परिश्रम द्वारा आगामी कल को सुंदर बना सकते हैं।
सत्य की नौका डगमगाती अवश्य है, परंतु डूबती नहीं। सत्य कटु होता है, परंतु शाश्वत् होता है। यह शिवम् व सुंदरम् भी होता। इसे सामने आने में समय तो लग सकता है, परंतु यह असंभव नहीं है। भले ही सत्य सात परदों के पीछे छिपा होता है, परंतु यह हकीक़त को सामने ला देता है। यह कल्याणकारी होता है तथा किसी का अहित नहीं करता। सबका मंगल भव की भावना इसमें निहित रहती है। परिणामत: जीवन में कोई समस्या नहीं रहती।
वैसे भी हर प्रश्न का उत्तर व समस्या का समाधान होता है। आवश्यकता होती है– हमारी लग्न की, प्रयास की, परीक्षा की, अथक परिश्रम, धैर्य व साहस की। ‘संसार में असंभव शब्द तो मूर्खों के शब्दकोश में होता है।’ तुम सब कर सकते हो, जीवन का मूलमंत्र होना अपेक्षित है। मानव में असीम शक्तियां व्याप्त हैं, जिनके बल पर वह आगामी आपदाओं का सामना कर सकता है। इसलिए आत्मविश्वास की, सत्य का मूल्यांकन करने की, अपनी सुप्त अथवा विस्मृत शक्तियों को पहचानने की ज़रूरत है।
मानव का दर्द से अटूट रिश्ता है। हमें खुशियों को तलाशना है; खुद से मुलाक़ात करनी है। जब हम ख़ुद में ख़ुद को तलाशते हैं तो हमारे अंतर्मन में दिव्य शक्तियां संचरित हो जाती हैं। हम ‘शक्तिशाली विजयी भव’ को स्वीकार जीवन- पथ पर अग्रसर होते हैं, क्योंकि ‘मन के हारे हार है, मन के जीते जीत’ तथा ‘आप जो चाहोगे वही अवश्य पाओगे।’
काँच की तरह होता है मन/ इसे जितना साफ रखोगे/ दुनिया उतनी आपको साफ दिखाई देगी’ के माध्यम से हम समझ सकते हैं कि ‘तोरा मन दर्पण कहलाए/ भले-बुरे सब कर्मन को/ देखे और दिखाए।’ सो। सत्कर्म कीजिए, सदैव अच्छा सोचिए, अच्छा कीजिए। दुनिया रूपी रंगमंच पर मानव को अपना क़िरदार अवश्य निभाना पड़ता है, जो हमारे पूर्वजन्म के कर्मों पर आधारित होते हैं।
अपनापन, परवाह, आदर व व्यवहार वक्त की वह दौलत है, जिससे बड़ा किसी को देने के लिए कोई उपहार नहीं हो सकता है। सो! यह वे दैवीय गुण हैं, जिन्हें आप दूसरों को दे सकते हैं। यह अनमोल हैं और वक्त से बड़ी तो कोई दौलत हो ही नहीं सकती है। यदि आप किसी को चंद लम्हें देते हैं तो वे उसके हृदय की ऊहापोह को समाप्त करने में सक्षम होते हैं। उस स्थिति में आप अपनी अनमोल पूंजी अर्थात् उपहार उसे दे रहे हैं। किसी के हृदय की पीड़ा, दुख-दर्द को दूर करना सर्वोत्तम उपाय है। दुनिया में सुख बाँटिए व दु:खों का हरण कीजिए। आपदाओं व विषम परिस्थितियों में आप पर्वत की भांति अचल, अडिग व डटकर खड़े रहिए।
परिवार, मित्र व संगठन को महत्व दीजिए। सदैव मिलजुल कर अहं का त्याग कर जीवन-यापन कीजिए। अहं दिलों में दरारें उत्पन्न करता है। ‘फ़ासले दिलों के मिटा दीजिए। बेवजह न किसी से ग़िला कीजिए/ यह समाँ तो गुज़र जाएगा किसी ढब/ सबसे मिलजुल कर रहा कीजिए।’ दर्द, आपदाएं व समस्याएं स्वत: मिट जाएंगी और चहुँओर उल्लास व प्रसन्नता का साम्राज्य होगा।
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जीद्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “मौन भला सबको लगे…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
संस्कार, आचार, प्रचार, विकार, विचार, साकार, सदाचार ये सब मिलकर भावनाओं का प्रदर्शन करते हैं । मन के मनके जब शब्दों की माला पहन बाहर आते हैं,तो बोलने वाले की भावाव्यक्ति अपने आप प्रदर्शित हो जाती है । जैसी सोच होगी वैसा ही स्वतः दिखायी देने लगता है । संगति का असर किसी को नहीं छोड़ता सो सोच समझ कर दोस्ती करें । आजकल डिजिटल दोस्त ऑन लाइन फ्रॉड करके बुद्धू बनाने का कोई मौका नहीं छोड़ते हैं। समझदार और सचेत रहने में भलाई है । परिवार से बड़ा कोई संकटमोचक नहीं हो सकता है, इसलिए इसकी कीमत समझें और जीवन मूल्यों को पहचानकर ऑफलाइन रिश्तों का सम्मान करें ।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “पुस्तक यात्रा…“।)
अभी अभी # 548 ⇒ पुस्तक यात्रा श्री प्रदीप शर्मा
एक पुस्तक की यात्रा तब शुरू होती है, जब कोई पाठक उसको पढ़ना शुरू करता है। यह यात्रा कहीं से भी शुरू हो सकती है, घर में ही स्टडी रूम से, बैडरूम से, लाइब्रेरी से, दफ्तर अथवा कॉलेज में चुराए हुए पल से या फिर लंबे ट्रेन के सफर के साथ साथ।
कुछ लोग पुस्तक चखते हैं, कुछ सरसरी निगाह से देखकर रख देते हैं, कुछ पूरी पढ़ते हैं और बहुत कम ऐसे होते हैं, जो पुस्तक को चबा चबा कर हजम कर जाते हैं।।
पुस्तक चाटने का मज़ा कोई दीमक से सीखे। सभी जानते हैं, कुछ पाठक किताबी कीड़े होते हैं तो कुछ पुस्तक प्रेमी भी होते हैं। उन्हें पुस्तक से बहुत प्रेम होता है। हर पराई पुस्तक उन्हें अपनी लगती है। अपने घर की पुस्तक उन्हें अखबार बराबर लगती है और पराई पुस्तकों पर वे डोरे डाला करते हैं।
उन्हें पुस्तक हथियाने का बड़ा शौक होता है। एक पुस्तक प्रेमी को पुस्तक मांगने में शर्म नहीं करनी चाहिए। पुस्तकों का हरम ही तो पर्सनल लाइब्रेरी कहलाता है। पुस्तक पढ़े कोई भी, अथवा न भी पढ़े, लेकिन अच्छी से अच्छी और महंगी से महंगी पुस्तक रखना हर पढ़े लिखे, बुद्धिजीवी इंसान की पहचान है।।
पुस्तक कभी नहीं कहती, वह खरीदी हुई है अथवा किसी से मांगी गई है। वह तो बेचारी कभी यह भी रहस्य उद्घाटित नहीं करती कि वह अपने स्वामी द्वारा छुई भी गई है अथवा नहीं। कुछ बेचारी अभागी पुस्तकों के तो पन्ने ही चिपके रहते हैं। जब ऐसी कुंवारी किताब जब किसी सच्चे पुस्तक प्रेमी के हाथ लगती है, तब उसके बंद पन्ने फड़फड़ा उठते हैं। पुस्तक के भाग जाग जाते हैं।
कोई पुस्तक आसमान से नहीं टपकती, इतनी आसानी से उसका जन्म नहीं होता। उसके जन्म की भी अजीब दास्तान है।
हर पुस्तक किसी की कृति है, रचना है, उसका भी कोई सरजनहार है। किसी लेखक द्वारा पहले उसे शब्दों में उतारा जाता है, इसे भी सृजन की ही प्रक्रिया कहते हैं। एक लेखक के कई वर्षों की तपस्या का फल होता है जब उसकी रचना पुस्तक रूप में प्रकाशित होकर पाठकों तक पहुंचती है।।
लेखक ही उसे एक नाम देता है। किसका बच्चा है, की तरह उसकी पहचान भी लेखक से ही होती है। अच्छी किताब है, इसका लेखक कौन है। किताब प्रकाशक की नहीं होती, खरीददार की नहीं होती, किसी पाठक की बपौती नहीं होती, किताब सिर्फ और सिर्फ एक लेखक की मेहनत होती है। उसके बरसों का सपना होती है एक किताब।
हर पुस्तक एक सुधी पाठक तक पहुंचे, यही उसका गंतव्य है। धन्ना सेठों की तरह, महंगे महंगे वार्डरोब की तरह, वह पुस्तकालय और व्यक्तिगत बुक शेल्फ की शोभा न बढ़ाए। सब जानते हैं, लक्ष्मी कहां कैद है।
सरस्वती का वाहन हंस है, जो नीर, क्षीर और विवेक का प्रतीक है। पुस्तक ज्ञान का भंडार भी है और स्वाध्याय का सर्वश्रेष्ठ विकल्प। कहीं सरस्वती कैद ना हो। पुस्तकों की यात्रा अनवरत चलती रहे।
एक प्रबुद्ध पाठक ही एक अच्छी पुस्तक का वाहक हो सकता है। वर दे, वर दे, वर दे, वीणा वादिनी वर दे।।
(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के लेखक श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको पाठकों का आशातीत प्रतिसाद मिला है।”
हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों के माध्यम से हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)
☆ संजय उवाच # 268 ☆ गीता सुगीता…
(गीता जयंती पर विशेष)
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय।।
अर्थात धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में युद्ध की इच्छा से एकत्रित हुए मेरे और पांडु के पुत्रों ने क्या किया?
यह प्रश्न धृतराष्ट्र ने संजय से पूछा था। यही प्रश्न श्रीमद्भगवद्गीता का प्रथम श्लोक भी है।
18 अध्यायों में विभक्त श्रीमद्भगवद्गीता 700 श्लोकों के माध्यम से जीवन के विभिन्न आयामों का दिव्य मार्गदर्शन है। यह मार्गदर्शन विषाद योग, सांख्य योग, कर्म योग, ज्ञानकर्म-संन्यास योग, कर्म-संन्यास योग, आत्मसंयम योग, ज्ञान-विज्ञान योग, अक्षरब्रह्म योग, राजविद्याराजगुह्य योग, विभूति योग, विश्वरूपदर्शन योग, भक्ति योग, क्षेत्रक्षेत्रज्ञ विभाग योग, गुणत्रयविभाग योग, पुरुषोत्तम योग, दैवासुरसंपद्विभाग योग, श्रद्धात्रय विभाग योग, मोक्षसंन्यास योग द्वारा अभिव्यक्त हुआ है।
योगेश्वर श्रीकृष्ण ने मार्गशीर्ष माह के शुक्ल पक्ष की मोक्षदा एकादशी को गीता का ज्ञान दिया था। गीता जयंती इसी ज्ञानपुंज के प्रस्फुटन का दिन है। इस प्रस्फुटन की कुछ बानगियाँ देखिए-
1) यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन।
न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचराम्।।
अर्थात, हे अर्जुन! सम्पूर्ण प्राणियों का जो बीज है, वह मैं ही हूँ। मेरे बिना कोई भी चर-अचर प्राणी नहीं है।
इस श्लोक से स्पष्ट है कि हर जीव, परमात्मा का अंश है।
2) यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति।।
अर्थात जो सबमें मुझे देखता है और सबको मुझमें देखता है, उसके लिये मैं अदृश्य नहीं होता और वह मेरे लिये अदृश्य नहीं होता।
3) न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः।
न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम्।।
अर्थात न ऐसा ही है कि मैं किसी काल में नहीं था या तू नहीं था अथवा ये सारे राजा नहीं थे और न ऐसा ही है कि इससे आगे हम सब नहीं रहेंगे।
इसे समझने के लिए मृत्यु का उदाहरण लें। मृत्यु अर्थात देह से चेतन तत्व का विलुप्त होना। आँखों दिखता सत्य है कि किसी एक पार्थिव के विलुप्त होने पर एक अथवा एकाधिक निकटवर्ती उसका प्रतिबिम्ब -सा बन जाता है।
विज्ञान इसे डीएनए का प्रभाव जानता है, अध्यात्म इसे अमरता का सिद्धांत मानता है। अमरता है, सो स्वाभाविक है कि अनादि है, अनंत है।
4) या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः॥
सब प्राणियोंके लिए जो रात्रि के समान है, उसमें स्थितप्रज्ञ संयमी जागता है और जिन विषयों में सब प्राणी जाग्रत होते हैं, वह मुनिके लिए रात्रि के समान है ।
इसके लिए मुनि शब्द का अर्थ समझना आवश्यक है। मुनि अर्थात मनन करनेवाला, मननशील। मननशील कोई भी हो सकता है। साधु-संत से लेकर साधारण गृहस्थ तक।
मनन से ही विवेक उत्पन्न होता है। दिवस एवं रात्रि की अवस्था में भेद देख पाने का नाम है विवेक। विवेक से जीवन में चेतना का प्रादुर्भाव होता है। फिर चेतना तो साक्षात ईश्वर है। ..और यह किसी संजय का नहीं स्वयं योगेश्वर का उवाच है। इसकी प्रतीति देखिए-
मैं वेदों में सामवेद हूँ, देवों में इंद्र हूँ, इंद्रियों में मन हूँ और प्राणियों की चेतना हूँ।
जिसने भीतर की चेतना को जगा लिया, वह शाश्वत जागृति के पथ पर चल पड़ा। जाग्रत व्यक्ति ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते’ का अनुयायी होता है।
6) कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।।
अर्थात कर्म करने मात्र का तुम्हारा अधिकार है, तुम कर्मफल के हेतु वाले मत होना और अकर्म में भी तुम्हारी आसक्ति न हो।
मनुष्य को सतत निष्काम कर्मरत रहने की प्रेरणा देनेवाला यह श्लोक जीवन का स्वर्णिम सूत्र है। सदियों से इस सूत्र ने असंख्य लोगों के जीवन को दिव्यपथ का अनुगामी किया है।
श्रीमद्भगवद्गीता के ईश्वर उवाच का शब्द-शब्द जीवन के पथिक के लिए दीपस्तंभ है। इसकी महत्ता का वर्णन करते हुए भगवान वेदव्यास कहते हैं,
गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्रसंग्रहै:।
या स्वंय पद्मनाभस्य मुखपद्माद्विनिः सृता ।।
( महा. भीष्म 43/1)
श्रीमद्भगवद्गीता का ही भली प्रकार से श्रवण, कीर्तन, पठन, पाठन, मनन एवं धारण करना चाहिए क्योंकि यह साक्षात पद्मनाभ भगवान के मुख कमल से निकली है।
आज गीता जयंती है। इस अवसर पर श्रीमद्भगवद्गीता के नियमित पठन का संकल्प लें। अक्षरों के माध्यम से अक्षरब्रह्य को जानें, सृष्टि के प्रति स्थितप्रज्ञ दृष्टि उत्पन्न करें। शुभं अस्तु।
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
मार्गशीर्ष साधना 16 नवम्बर से 15 दिसम्बर तक चलेगी। साथ ही आत्म-परिष्कार एवं ध्यान-साधना भी चलेंगी
इस माह के संदर्भ में गीता में स्वयं भगवान ने कहा है, मासानां मार्गशीर्षो अहम्! अर्थात मासों में मैं मार्गशीर्ष हूँ। इस साधना के लिए मंत्र होगा-
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
इस माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी को गीता जयंती मनाई जाती है। मार्गशीर्ष पूर्णिमा को दत्त जयंती मनाई जाती है।
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “शब्द और विचार…“।)
अभी अभी # 547 ⇒ शब्द और विचार श्री प्रदीप शर्मा
विचारों के पंख तो होते हैं, लेकिन पाँव नहीं होते। उन्हें जमीन पर उतारने के लिए शब्दों का सहारा लेना पड़ता है। विचार लिखा जा सकता है, पढ़ा जा सकता है, और सुना भी जा सकता है, लेकिन देखा नहीं जा सकता। भले ही आप विचार को विचारक कह लें, और दर्शन को दार्शनिक, लेकिन विचार, दर्शन होते हुए भी, कभी दर्शन नहीं देता।
और तो और, विचारों के प्रदर्शन के लिए भी शब्दों का ही सहारा लेना पड़ता है।
शब्द अगर ध्वनि का मामला है, तो अक्षर का तो कभी क्षरण ही नहीं होता।
श्रुति, स्मृति हो, अथवा पुराण, बिना शब्द के सब, नि:शब्द हैं। प्रकाश की अगर किरणें होती हैं, तो ध्वनि की भी तरंगें होती हैं। होती होगी विचार की भी तरंग, उठती होंगी मन मस्तिष्क में, होते रहें आप विचार मग्न, केवल एक सद्गुरू ही आपके मन की तरंगों को पढ़ सकता है, जान सकता है, और अपने शुभ संकल्प से आपका कायाकल्प कर सकता है। विचार की तरह, गुरु तत्व और ईश्वर तत्व, कहीं दिखाई नहीं देते, लेकिन केवल विचारों के स्तर पर ही, उनका साक्षात्कार किया जा सकता है। हां, देह और शब्द उसके अनुभूति के माध्यम अवश्य हो सकते हैं।।
हम प्रभावित तो शब्दों से होते हैं, लेकिन उन्हें ही विचार मान लेते हैं। किसी के मन के विचारों को पढ़ने अथवा जान लेने की विद्या को टेलीपैथी अथवा दूर संवेदन कहते हैं। किसी के मन की बात को जान लेना अथवा पढ़ लेना अथवा एक ही विचार दो लोगों के मन में एक साथ आना, टेलीपैथी हो सकती है। अभी अभी आपको याद किया, और आप पधार गए। कभी कभी तो एक ही बात दोनों के मुंह से एक साथ निकल जाती है। है न विचित्र संयोग।
गजब की स्मरण शक्ति है हमारे मस्तिष्क की और मन है, जो संकल्प विकल्प से ही बाज नहीं आता। कैसे कैसे विचार हमारे मन में आते हैं, बिना किसी साधना अथवा धारणा ध्यान के ही, कहां कहां हमारा ध्यान चला जाता है। अगर मन, बुद्धि और अहंकार को विवेक और वैराग्य की राह पर ले जाया जाए, तो अवश्य वह घटित हो जाए, जो शब्दों से परे है और केवल हमारे चित्त के अधीन है।।
ज्ञान विज्ञान, परा विद्या, जादू टोना और अविद्या हमें जिस सूक्ष्म जगत के दर्शन कराती है, वह कितना खरा है और कितना खोटा, यह जानना इतना आसान नहीं, अतः जो आंखों से दिखाई दे, शब्दों के माध्यम से प्रकट हो, और शास्त्रोक्त हो, उसी विचार को आत्मसात कर, व्यवहार में लाया जाना चाहिए।
सनातन, पुरातन, आधुनिक और वर्तमान का समग्र चिंतन ही हमारा विचार प्रवाह है। शब्द ही वह माध्यम है, जो वैचारिक क्रांति भी लाता है और हमारे अंदर सकारात्मकता और नकारात्मकता के बीज भी बोता है। नीर, क्षीर और विवेक के अलावा और कोई गुरु अथवा मसीहा आपको सही राह नहीं दिखा सकता।।
मंत्र की ही तरह विचार भी बड़े शक्तिशाली होते हैं। जिस तरह मंत्र के शब्द गौण हो जाते हैं और मंत्र शक्ति ही काम करती है, इसी तरह शब्द तो गौण हो जाते हैं, और विचार शक्तिशाली हो जाते हैं।
आज के युग में शस्त्र से अधिक वैचारिक युद्ध कारगर हो रहे हैं। वाक् शक्ति का दुरुपयोग देखना हो तो आज अपने आसपास चल रहे वाक् युद्ध देखिए। शब्द और विचार इतने मारक भी हो सकते हैं, यह तो शायद ईश्वर ने भी नहीं सोचा होगा। हिंसा पर मानसिक हिंसा हावी है।।
कोई नेता नहीं, कोई अभिनेता नहीं, अपनी राह आप चुनें ;
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “|| पढ़ा लिखा ||“।)
अभी अभी # 546 ⇒ || पढ़ा लिखा || श्री प्रदीप शर्मा
हमारे बुजुर्ग कहते थे, पढ़ोगे लिखोगे, बनोगे नवाब, खेलोगे कूदेगो बनोगे खराब। कितने लोग पढ़ लिखकर नवाब बन गए, ये तो छोड़िए, नवाब खुद कितने पढ़े लिखे थे। ये नवाब किस गुरुकुल, ऑक्सफोर्ड अथवा नालंदा विश्वविद्यालय से तालीम हासिल करके आते थे।
वैसे भी यह सच है कि नवाबों की नस्ल शान शौकत से रहती है और राज करती है। लोकतंत्र के अपने नवाब होते हैं, कुछ पढ़े लिखे आईएएस और आईसीएस, जो कलेक्टर कमिश्नर बन जाते हैं और कुछ नेता जिन्हें जनता चुन चुनकर नवाब बना देती है। कोई पढ़ा लिखा कलेक्टर, कमिश्नर अगर ईमानदार हुआ तो अपना बुढ़ापा पेंशन के सहारे गुजार लेता है, लेकिन एक सफल राजनेता आखरी सांस तक राज्यपाल ही बना रहता है।।
एक बच्चा पढ़ता लिखता हैं, परीक्षा देने के लिए, पास होकर डिग्री हासिल करने के लिए। उसके बाद एक बार जब नौकरी धंधे में इधर लगा तो उधर पढ़ना लिखना बंद और कामकाज शुरू। बस केवल पढ़ाने वाले पेशेवर शिक्षक ही पढ़ते लिखते रहते हैं, और वह भी सिर्फ पढ़ाने के लिए। एक पंडित की तरह सब याद करने के बाद फिर कौन शिक्षक ईमानदारी से पढ़ता लिखता है। उन्हें कौन सी परीक्षा देनी है।
पढ़े लिखों की जमात में सिर्फ लेखक, पत्रकार और साहित्यकार ही रह जाते हैं और रह जाते हैं उनके पाठक। कुछ पाठक तो पढ़ते पढ़ते ही लेखक भी बन जाते हैं और कुछ, केवल पढ़ते ही रह जाते हैं।।
एक व्यक्ति क्या पढ़ता है, यह उसकी रुचि पर निर्भर करता है। साहित्य हल्का फुल्का भी होता है और गंभीर भी। साहित्य गवाह है, सबसे अधिक पाठक सुरेंद्र मोहन पाठक, गुलशन नंदा, ओमप्रकाश शर्मा और कर्नल रंजीत के ही हैं। लेकिन यह भी कड़वा सच है कि प्रेमचंद और शरद बाबू की तुलना इनसे नहीं की जा सकती।
बचपन में मेरी रुचि गंभीर साहित्य में कम ही रही।
बड़े बूढ़े जहां गुरुदत्त, आचार्य चतुरसेन शास्त्री, देवकीनंद खत्री और ओमप्रकाश शर्मा जैसे लेखकों को पढ़ा करते थे, मेरा बाल मन चंदामामा और दीवाना तेज में ही उलझा रहता था। मुझे वयस्क वयं रक्षाम: और वैशाली की नगर वधू ने बनाया। बाद में विमल मित्र का ऐसा चस्का लगा कि इकाई दहाई सैकड़ा, खरीदी कौड़ियों के मोल, बेगम मेरी बिस्वास और साहिब बीवी और गुलाम को भी नहीं छोड़ा।
मुझे फिल्म वाले गुरुदत्त अधिक रास आए।।
कौन कितना पढ़ा लिखा है और कौन कितना लिखता पढ़ता है, इसमें जमीन आसमान का अंतर है।
हमारे यहां पढ़ा लिखा सिर्फ वही समझा जाता है, जो या तो डिग्रीधारी प्रोफेसर, इंजीनियर हो अथवा किसी अच्छे पद पर आसीन हो।
आज तो पढ़े लिखों की हालत ये है कि जहां भी थोड़ा वाद विवाद, बहस अथवा असहमति हुई, वे एक दूसरे को मूर्ख समझने लगते हैं। जो बात, जो कायर हैं, वो कायर ही रहेंगे, से शुरू होती है, वह जो टायर है, वे टायर ही रहेंगे, पर जाकर खत्म होती है। नीर, क्षीर और विवेक भी शायद इसी को कहते हैं।।
(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ” में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक विचारणीय आलेख – “गीता हिन्दू धर्म की ही नहीं मानव की शाश्वत मार्गदर्शक… ” ।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # 318 ☆
आलेख – गीता हिन्दू धर्म की ही नहीं मानव की शाश्वत मार्गदर्शक… श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
श्रीमद्भगवतगीता अध्यात्म ज्ञान और जीवन शैली सिखाने वाला विश्व विख्यात अनुपम ग्रंथ है। गीता के अध्ययन और मनन से व्यक्ति आत्म शांति का अनुभव कर सकता है। जीवन को सुखी बना सकता है।
योगेश्वर श्री कृष्ण ने अर्जुन को निष्ठापूर्वक कर्म करके अपने जीवन को सफल करने का जो महत्वपूर्ण उपदेश ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते, मा फलेषु कदाचन्’ दिया । यह जीवन के मूल को समझने और व्यवहार करने का शाश्वत सूत्र है। रणभूमि में अर्जुन के हताश मन में नई स्फूर्ति और ओज भरने को कृष्ण ने गीता का उपदेश दिया था। इस बहाने सारी मनुष्य जाति को जीवन-समर को सही रीति से जीतने का अमर मंत्र ही गीता में है। इस तरह गीता हिन्दू धर्म विशेष की नहीं वैश्विक मूल्य की कृति है। इसीलिए दुनियां की लगभग सभी भाषाओं में गीता प्रस्तुत की जा चुकी है। इसके भाष्य और विवेचन निरन्तर विद्वानों द्वारा किए जाते हैं । गीता पर प्रवचन लोग रुचि से सुनते हैं।
द्वापर युग के समापन तथा कलियुग आगमन के समय आज से कोई पांच हजार वर्ष पूर्व कुरूक्षेत्र के रणांगण में उस समय गीता कही गई , जब महाभारत युद्ध आरंभ होने के समस्त संकेत योद्धाओं को मिल चुके थे। श्रीमद्भगवदगीता के प्रथम अध्याय में इसका विस्तृत वर्णन मिलता है। यथा युद्ध के वाद्यो का बजना, समस्त प्रकार के नादों का गूंजना, यहाँ तक कि तत्कालीन (द्वापर युग के) महानायक भगवान श्री कृष्ण के शंख “पांचजन्य” का उद्घोष, यह सब युद्धारंभ के स्पष्ट संकेत थे।
आज भी दुनियां कुछ वैसे ही कोलाहल , असमंजस और किंकर्तव्यविमूढ़ स्थिति में है। मानव मन जीवन रण में छोटी बड़ी परिस्थितियों में सदैव इसी तरह की उहापोह में डोलता रहता है। इसलिए गीता सर्वकालिक सर्व प्रासंगिक बनी हुई है।
श्रीमदभगवदगीता का भाष्य ही वास्तव में “महाभारत” है। गीता को स्पष्टतः समझने के लिये गीता को महाभारत के प्रसंगों में पढ़ना और हृदयंगम करना आवश्यक है। महाभारत तो विश्व का इतिहास ही है। ऐतिहासिक एवं तत्कालीन घटित घटनाओं के संदर्भ मे झांककर ही श्रीमदभगवदगीता के विविध दार्शनिक-आध्यात्मिक व धार्मिक पक्षों को व्यवस्थित ढंग से समझा जा सकता है।
अनेक विद्वानों के गीता के हिंदी अनुवाद के क्रम में हिंदी काव्य में छंद बद्ध सरस पदों में प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव विदग्ध ने भी इसका पद्यानुवाद किया है जिसे पढ़कर गीता को सरलता से समझा व आत्मसात किया जा सकता है।