सौ. उज्ज्वला केलकर
(ई-अभिव्यक्ति के “दस्तावेज़” श्रृंखला के माध्यम से पुरानी अमूल्य और ऐतिहासिक यादें सहेजने का प्रयास है। श्री जगत सिंह बिष्ट जी (Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker) के शब्दों में “वर्तमान तो किसी न किसी रूप में इंटरनेट पर दर्ज हो रहा है। लेकिन कुछ पहले की बातें, माता पिता, दादा दादी, नाना नानी, उनके जीवनकाल से जुड़ी बातें धीमे धीमे लुप्त और विस्मृत होती जा रही हैं। इनका दस्तावेज़ समय रहते तैयार करने का दायित्व हमारा है। हमारी पीढ़ी यह कर सकती है। फिर किसी को कुछ पता नहीं होगा। सब कुछ भूल जाएंगे।”
दस्तावेज़ में ऐसी ऐतिहासिक दास्तानों को स्थान देने में आप सभी का सहयोग अपेक्षित है। इस शृंखला की अगली कड़ी में प्रस्तुत है सौ. उज्ज्वला केलकर जी का डॉ हंसा दीप जी के जीवन से जुड़े संस्मरणों पर आधारित एक आत्मीय दस्तावेज़ “कारवां चलता रहा… – हंसा परिचय “। यह दस्तावेज़ तीन भागों में दे रहे हैं।)
डॉ. हंसा दीप
☆ दस्तावेज़ # 16 – कारवां चलता रहा… – हंसा परिचय – 3 – मराठी लेखिका – सौ. उज्ज्वला केलकर ☆ हिन्दी भावानुवाद – श्री भगवान वैद्य ‘प्रखर’ ☆
पर्व तीन
यहां से उसके जीवन का तीसरा पर्व आरंभ हुआ। यह पर्व आधुनिक तांत्रिक सुविधा-युक्त था। वह कहती है, ‘भीड़ में अपनी पहचान कायम करना यानी पुन: पहले चरण से आरंभ करना था। पुत्रियां आगे बढ़ रही थीं पर मेरी स्थिति विचित्र हो गयी थी। धार की यादें न्यूयार्क समान महानगर पर हावी हो रही थीं। हालांकि फोनपर कहा जाता, ‘यहां सब कुशल-मंगल है।’ जवाब मिलता, ‘यहां भी सब ठीक है।’ उसे लगता दूरस्थ रिश्तों की दूरी बढ़ती जा रही है। पुत्रियां बड़ी हो रही थीं। विदेश में उनके ब्याह के बारे में सोचने मात्र से डरलगता था। हंसा कहती है, ‘उन दिनों जो कहानियां उभरती थीं उन्हें कागज पर उकेर कर संजोकर रख देती थी। उन दिनों अनेक नौकरियों के प्रस्ताव आए। पर निश्चय कर रखा था कि जो भी कार्य करूंगी, हिंदी से संबंधित ही करूंगी। उस कारण राहें सीमित हो गयीं पर बंद न हुईं । उसके बाद न्यूयार्क के फ्लशिंग विभाग में हिंदी पढ़ाना आरंभ हुआ । तब अनेक लोग उसे जानने लगे। यह पढ़ाना स्वयंसेवी अर्थात मानद, निशुल्क था। उसके बाद लोग उसे ‘हिंदी वाली दीदी’ कहने लगे। ‘भारत से दूर रहकर भी हिंदी पढ़ाकर मैं मातृभूमि से जुड़ी हुई हूं यह सोचकर मैं गर्व महसूस करती थी।‘ वो कहती है।
श्री भगवान वैद्य ‘प्रखर’
उसे न्यूयार्क व न्यूजर्सी की काव्य-गोष्ठियों में श्री रामेश्वर अशांत, श्री राम चौधरी समान अनेक हिंदी प्रेमियों को निकट से जानने का अवसर मिला तथा वे उसके काम से परिचित हुए।
अगला पड़ाव था, टोरंटो। धर्म जी ने नौकरी त्याग कर टोरंटो में रहने का निर्णय लिया। पांच साल बाद भारत लौट पाएंगे और फिर धार महाविद्यालय में सहायक प्राध्यापक की नौकरी कर पाएंगे, उसकी इस आशा पर पानी फिर गया।
फिर एक बार नया शहर, नया देश, नए लोग। कटे हुए वृक्ष के तने को नयी जमीन की तलाश आरंभ हो गयी। भाषा जीवित रखने के उद्देश्य से प्रेरित होकर दीपट्रांसइंक . की अध्यक्ष बनी और अनुवाद कार्य आरंभ किया। अनेक प्रसिद्ध हॉलीवूड फिल्म्स का हिंदी में अनुवाद किया। अनेक अंगरेजी फिल्मों के लिए हिंदी में सब टाइटल्स का भी अनुवाद किया।
इससे भाषा तो समृद्ध हो ही गयी, अनुवाद की चुनौतियां और उसका महत्व भी समझ में आ गया।
यार्क यूनिवर्सिटी में हिंदी कोर्स- डायरेक्टर बनकर हिंदी के क्लासेस आरंभ करना उसके लिए मील का पत्थर साबित हुआ । यार्क यूनिवर्सिटी में, टोरंटो के क्लास में खड़े रहकर पढ़ाते समय भारत के महाविद्यालय में पढ़ाने का स्मरण होना स्वाभाविक था। पर यहां के छात्रों के चेहरे देखकर लगता कि उन्हें कुछ आता नहीं है। ये भारत के बी ए , एम ए की क्लासेस नहीं हैं। यहां पदवी और पदव्युत्तर स्तर की हिंदी को बीगिनर्स के स्तर पर लाना था। समय की मांग के अनुसार अपने हिंदी-तर छात्रों के हितार्थ हिंदी को अंगरेजी माध्यम से समझाने लायक कोर्स-पैक का निर्माण उसे आवश्यक लगने लगा। बिगिनर्स और इंटरमीजिएट कोर्स के लिए दो साल के परिश्रम से उसने पुस्तकें और ऑडियो सीडी बनायीं।कैनेडियन विश्वविद्यालय में हिंदी के छात्रों के लिए अंगरेजी-हिंदी में पाठ्यपुस्तकें तैयार कीं।
इन अथक प्रयासों से उसका हिंदी-प्रशिक्षण का आत्मविश्वास अपने चरम पर पहुंच गया। समय को मानों पंख लग चुके थे। इसी बीच उसका ‘चशमें अपने-अपने’ कहानी-संग्रह प्रकाशित हो गया। इस कारण हर बार पेड़ के तने कट जाने के दुख के बीच ही उन्हें नयी उर्वरा भूमि प्राप्त होती गयी, उनपर फूल-पत्तियों की बहार आ गई, वे फलों से लद गए।
वह कहती है, ‘चशमें अपने-अपने’ के प्रकाशित होने के बाद मेरे डैनों में कुछ और पर उग आए। उड़ान में गति आ गयी । उसके पश्चात ‘बंद मुट्ठी’ उपन्यास आ गया। बाद में ‘कुबेर’, ‘केसरिया बालम’ और ‘कांच घर’ ये उपन्यास प्रकाशित हुए। ‘बंद मुट्ठी’ का अनुवाद गुजराती में हो गया। घर गृहस्थी के साथ-साथ उसका रचना- संसार भी विस्तार पाता गया। बीच-बीच में ‘प्रवास में आसपास’, ‘शत प्रतिशत’, ‘उम्र के शिखर पर खड़े लोग’, छोड़ आए वो गलिया’, ‘चेहरों पर टंगीं तख्तियां’, ‘मेरी पसंदीदा कहानियां’, ‘टूटी पेंसिल’ आदि कहानी-संग्रह भी प्रकाशित होते रहे। इनमें की कहानियां प्रतिष्ठित हिंदी पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी थीं। उनमें से कुछेक के मराठी, पंजाबी, बांग्ला, अंगरेजी, तमिल, और उर्दू पत्र-पत्रिकाओं में अनुवाद प्रकाशित हुए। ‘पूरन विराम तों पहिला’ यह कहानी-संग्रह पंजाबी में अनूदित हुआ। अमरजीत कौंके ने किया। चुनी हुई कहानियों के दो संग्रह मराठी में प्रकाशित हुए। ‘आणिशेवटी तात्पर्य’ तथा ‘ मन गाभार्यातीलशिल्पे।’ उज्ज्वला केळकर ने अनुवाद किया। इसके अलावा उसने लेख, नाटक, एकांकिका, रेडियो नाटक भी लिखे। अनेक पुस्तकों की भूमिकाएं लिखीं। सम्पादन किया। पर उसकी सबसे प्रिय साहित्य-विधा है, कहानी। विश्वगाथा मासिक-पत्रिका के संपादक पंकज त्रिपाठी से साक्षात्कार में उसने कहा था, एक कथा-सूत्र के इर्दगिर्द बहुत कुछ बुना जा सकता है। आज के गतिमान युग में दो-सौ पृष्ठ का उपन्यास पढ़ने के लिए लगनेवाला समय और धैर्य पाठकों के पास नहीं होता। इस कारण बहुत-से उत्कृष्ट उपन्यास भी पढे नहीं जा सकते। हंसा के उपन्यास, कहानियां, साहित्यिक दृष्टिकोण आदि के संबंध में डॉ दीपक पाण्डेय एवं नूतन पाण्डेय, विजय तिवारी आदि ने भी लिखा है।
पिछले चार-छह सालों में हंसा के लेखन को सम्मानित, पुरस्कृत किया जाता रहा है। राष्ट्रीय निर्मल वर्मा पुरस्कार, पुरवाई कथा सम्मान, सर्वश्रेष्ठ कहानी- कमलेश्वर स्मृति कथा पुरस्कार, आदि सम्मान-पुरस्कार प्राप्त हुए हैं। इनकी सूची लंबी है।
एक ओर लेखन का आलेख चढ़ता जा रहा था। वहीं दूसरी ओर अध्यापन भी जोर-शोर से शुरू था। विश्वविद्यालय की प्रचार-पुस्तिकाओं में हंसा की हिंदी कक्षाओं के फोटो छपे थे। सेंट जॉर्ज कैम्पस, स्कारबोरो कैंपस समान अनेक स्थानों पर हिंदी की कक्षाएं आरंभ हुईं और उसका काम चौपट हो गया। हर सत्र में उसने हिंदी के चार-चार कोर्स पढ़ाए।
इसी बीच हंसा को नातन हुई। कृति की कन्या, वान्या। और उसकी खुशी सातवें आसमान पर पहुंच गयी। उसके बाद नवासा याविन, नातन- रिया। पुत्रियां शैली, कृति। दामाद सचिन और नवनीत, नाती, नातन -ऐसा उसका समृद्ध संसार है। जीवन साथी धर्मपाल तो सदा उसके साथ है हीं। इतना सब कुछ बढ़िया है। उसकी जीवन-कहानी सफल है, ऐसा कहने में कोई हर्ज नहीं । तथापि एक अफसोस है जो उसे सालता रहता है… ।
जीवन-यात्रा में उसे किसी से कोई शिकायत नहीं है। अफसोस नहीं है । अफसोस है तो खुद अपने बारे में ही। उसे लगता है, वह कहीं भी अपनी पहचान नहीं बना पायी। कोई भी देश उसे ‘अपना’ नहीं कहता। दुनिया की दृष्टि में वह विदेशी है, कैनडा के लोगों के लिए वह ‘भारतीय’ है। पर अपने देशवासियों के लिए भी वह विदेशी ही है, क्योंकि वह कैनडा में रहती है। हालांकि किसी के विदेशी कहने से कोई फर्क नहीं पड़ा है। न स्वाद बदला न स्वभाव। देश बदले। सरकारें बदलीं। नियम-कानून बदले। सरहदें बदल गयीं । नहीं बदला तो उस मिट्टी का अहसास जो आज भी वक्त-बेवक्त यादों के झोंकों से उसे हवा देकर आग में तब्दील कर देता है । वह तपिश कागज पर शब्दों के संजाल उकेरती है।’ वह आगे कहती है, ‘इस लंबे जीवन के बदलते रास्तों पर पड़ाव तो कई थे लेकिन मुझे मसीहा मिलते रहे और कारवां चलता रहा ।’
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डॉ हंसा दीप
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मूल लेखिका – सौ. उज्ज्वला केळकर
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भावानुवाद – श्री भगवान वैद्य ‘ प्रखर ‘
संपर्क – 30 गुरुछाया कालोनी, साईनगर, अमरावती 444607
मो. 9422856767, 8971063051
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈















