हिंदी साहित्य – आलेख ☆ आलेख ☆ महिलाओं की सुरक्षा  – ज़िम्मेदार कौन? ☆ श्री आलोक मिश्रा ☆

श्री आलोक मिश्रा

अल्प परिचय 

श्री आलोक मिश्रा जी मूलतः रायबरेली, उत्तर प्रदेश के निवासी हैं और अब सिंगापुर के स्थाई निवासी हैं। आलोक जी सिंगापुर की एक शिपिंग कंपनी में टेक्निकल मैनेजर के पद पर कार्यरत हैं | आलोक जी के दो साझा काव्य संग्रह, एक साझा ग़ज़ल संग्रह और एक साझा हिंदी हाइकु कोश प्रकाशित हो चुके हैं |

☆ आलेख ☆ महिलाओं की सुरक्षा  – ज़िम्मेदार कौन? ☆ श्री आलोक मिश्रा जी ☆

मैं जो बात कहने जा रहा हूँ, मैं समझता हूँ कि इससे सभी लोग सहमत नहीं होंगे, एकमत नहीं होंगे | उसकी आवश्यकता भी नहीं है क्योंकि पूरे देश में अरब से भी अधिक की आबादी में सभी लोगों का किसी एक बात पर एकमत होना असंभव नहीं तो मुश्किल और असाध्य काम अवश्य लगता है | तो चलो उस पर ध्यान देने के बजाय मैं अपने विचार आप के सामने रखता हूँ |

आज जो कुछ हमारे आस-पास  घटित हो रहा है उस को ध्यान  में रखते हुए चुप रहना भी ठीक नहीं है | अगर कुछ सकारात्मक बात कहने के लिए है तो मैं समझता हूँ कि वह कही जानी  चाहिए, उसे लोगों के संज्ञान में लाना  चाहिए | यह अलग बात है कि अगर लोगों  को लगता है कि इस बात में कोई दम नहीं है, उसको बेझिझक नकार दें, अस्वीकार कर दें | इसमें कोई दुविधा वाली बात नहीं है | तो ये बात चल रही थी कि आजकल समाचार पत्रों, न्यूज़ चैनेल्स और सोशल मीडिया से पता चलता है  कि महिलाओं के साथ दुष्कर्म या दुराचार की निंदनीय हरकतें बढ़ गयी हैं | इन घटनाओं पर रोक लगनी चाहिए जिससे देश में महिलाएँ अपने आप को सुरक्षित महसूस कर सकें | लेकिन महवपूर्ण प्रश्न है कि  यह संभव हो तो कैसे?

पिछले कुछ वर्षों में हमारे देश ने आर्थिक रूप से नई उपलब्धियाँ हासिल की हैं और साल दर साल नए आयाम प्राप्त किए हैं | रोज़गार के कई नए अवसर खुल रहे हैं हमारे युवाओं के  लिए | आज युवा वर्ग निजी व्यवसाय में भी आगे आ रहे हैं | देश की आर्थिक उन्नति में महिलाओं का भी बहुमूल्य योगदान रहा है | अब महिलाएँ घर की चारदीवारी के भीतर और बाहर दोनों जगह अपनी ज़िम्मेदारियाँ भली–भाँति निभा रही हैं | सेना में, फैक्ट्री में, दफ्तरों में या अन्य व्यवसाय में आज महिलाएँ उत्तम काम कर रहीं हैं | संभव है कि किन्हीं अपरिहार्य कारणों से उन्हें घर लौटने में देर हो जाती है | इससे महिलाओं के लिए अपनी सुरक्षा की चुनौती खड़ी हो गयी है |

अक्सर महिलाएँ दलील देती हैं कि पुरुषों को अपने मन पर काबू रखना चाहिए, महिलाओं के प्रति  उन्हें अपनी नीयत साफ़ और विचार स्वच्छ रखने चाहिए | बात तो ठीक है, लेकिन यह भी सच है कि किसी और को बदलने की बजाय स्वयं को बदलना आसान है | ऐसी भी दलीलें सुनाई पड़ती हैं कि “अगर पुरुष कभी भी कहीं भी आ-जा सकता है, तो महिलाओं पर रोक लगाने का क्या औचित्य है?” मैं समझता हूँ ऐसी दलीलों का कोई अंत नहीं है और ना ही इनके कुछ सकारात्मक निष्कर्ष निकलने वाले हैं | यह तो सोचिए कि आख़िर नुक्सान किसका है?

मैं समझता हूँ कि अपने बचाव में महिलाओं को आगे आना  होगा | उन्हें बहुत ज़िम्मेदारी भरे  क़दम उठाने होंगे अपने आप को सुरक्षित रखने के लिए | आप शायद कहना चाह रहे होंगे “क्या उनके परिधान में अंग प्रदर्शन अधिक हो रहा है या उनकी भावभंगिमा ऐसी है जिसके कारण पुरुष अनुमान लगा  लेते हैं कि अमुक महिला  शारीरिक सम्बन्ध के लिए इच्छुक है |” जी नहीं, मैं ना तो  ऐसा कोई प्रस्ताव रख रहा हूँ और मैं इस बात से बिलकुल भी सहमत नहीं हूँ |

हाँ, कुछ बातें हैं जिस पर महिलाएँ अगर ध्यान दें  तो स्वयं को अधिक सुरक्षित रख सकती हैं | अभी हाल ही में एक समाचार सुनने में आया कि पुणे में बस अड्डे पर  खड़ी एक महिला बस का इंतज़ार कर रही थी | तभी एक लड़के ने उस के पास आकर  उसको बहन कह कर संबोधित किया और पूछा ‘बहन, कहाँ  जा रही हो?’ लड़की ने उसे  अपने गंतव्य की जानकारी दी | उस पर लड़के ने कहा कि ‘वहाँ की बस तो दूसरी जगह से जाती है | चलिए मैं आपको वहाँ ले चलता हूँ |’ वह लड़की बिना सोचे समझे एक अज्ञान व्यक्ति के साथ चल दी | उस लड़के पर  सिर्फ़ इसलिए विश्वास कर लिया कि उसने लड़की को बहन कह कर संबोधित किया था | आज हर घर में लड़कियों को सिखाया जाता है कि अपने आप को संभाल कर रखो | बचपन  में जब हम  रेलगाड़ी से यात्रा करते थे तो माँ हमेशा कहती थीं कि रात को सोते समय  अपना बैग पैरों के बीच में फंसा लेना | इस तरह के छोटे-छोटे आवश्यक निर्देश अपनी और अपने सामान की सुरक्षा की दृष्टि से माँ हमें बताती थीं और हम उनका अक्षरशः पालन भी करते थे |

दूसरे बस स्टैंड के पास  पहुँच कर लड़के ने एक बस की तरफ़ इशारा कर के कहा कि यह बस तुम्हारे गाँव जायेगी |  लड़की ने कहा ‘इस बस में तो  अंधेरा है |’ इस पर लड़का बोला “दीदी, यात्री बस में  बैठे हुए हैं | अभी थोड़ा समय है बस चलने में इसलिए ड्राईवर अभी नहीं आया | आप बैठो इस बस में | जैसे ही ड्राईवर आएगा, वह बिजली का स्विच आन कर देगा और बस में रोशनी आ जाएगी |’ सोचने वाली बात है कि अगर बस में कुछ लोग बैठे होते  तो क्या वह  सब साँस रोक कर चुप बैठे रहते | उसमें कुछ लोग  तो निश्चित  बातें करते | आज के युग  में तो सबके पास मोबाईल फ़ोन हैं | अंधेरा होगा तो लोग फ़ोन की लाईट से ही बस में उजाला कर लेंगे | खाली बैठने पर लोग सोशल मीडिया  में कुछ पढ़ या लिख रहे होते हैं | बहरहाल, पता नहीं वह लड़की कैसे उस लडके की बातों में आ गयी और उस अँधेरी बस में सवार हो गयी | लड़की के पीछे -पीछे वह लड़का भी बस में चढ़ गया और उस लड़की के साथ अपना मुंह काला किया |

महिलाओं को अपनी समझ बूझ का परिचय देते हुए किसी पर बिना सोचे समझे विश्वास नहीं करना चाहिए | रेलगाड़ी या बस में सफ़र करते समय यात्री अमूमन खान-पान साझा करते हैं जो समाज में  आपसी भाईचारे की बेहद ख़ूबसूरत मिसाल है | लेकिन पिछले कुछ वर्षों में कुछ धोखाधड़ी के मामले संज्ञान में आए हैं कि अमुक यात्री ने खाने की चीज़ में कुछ नशीले पदार्थ मिलाकर सहयात्रियों को खिला दिया और उनका सामान लेकर चंपत हो गए |  महिलाओं को किसी अनजान व्यक्ति से कुछ खाद्य पदार्थ नहीं लेना चाहिए | ‘भूख नहीं है’ कहकर साफ़ मना कर देने में कुछ बुराई नहीं है |

अब एक और बात ध्यान देने योग्य है  | आज कल हर छोटे-बड़े शहरों में ड्रिंक्स बार हैं जहाँ पर शराब मिलती है और नाच-गाने की व्यवस्था होती है | आज के युवा लड़के-लड़कियाँ पूरे दिन ख़ूब  मेहनत से काम  करने के  बाद सुकून के लिए  अक्सर इन ड्रिंक्स बार में दोस्तों के साथ कुछ समय बिताते हैं | अगर कोई पुरुष महिला को ड्रिंक्स ऑफर कर रहा है तो महिला को चाहिए कि ड्रिंक्स लेने से साफ़ मना कर दे | महिला को अगर  ड्रिंक्स लेनी है तो ख़ुद बार काउंटर पर जाकर अपनी ड्रिंक्स ले और उसका भुक्तान भी स्वयं करे | महिला अगर शराब नहीं पीती है, तो उसे  दोस्तों के बहकावे में आकर या अपनी शान दिखाने के लिए  शराब नहीं पीनी चाहिए | पुरुष दोस्त या सहकर्मी के साथ कहीं जा रही हैं तो कोशिश करें कि अकेले ना जाएँ और सुनसान जगह पर कदापि ना जाएँ | होटलों में महिलाओं के  अश्लील वीडियो बनाने की ख़बरें आए दिन अख़बारों में छपती रहती हैं | आप कहेंगे ‘महिलाओं की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी पुलिस प्रशासन पर है |” जी बिलकुल, मैं आपकी इस बात से सहमत हूँ | जो भी कारन हों, सच्चाई यही है कि महलाओं के प्रति आत्याचार और दुराचार की घटनाएँ थमने का नाम नहीं ले रहीं हैं |

आजकल कई महिलाएँ नौकरी करती हैं | अगर महिला का  ऑफ़िस उसके  घर से  दूर है और रास्ता सुनसान जगह से गुज़रता है, तब कोशिश करनी चाहिए कि वह  ऑफ़िस से निर्धारित समय पर निकल जाए या फिर घर  से किसी को बुला ले रास्ते में साथ रहने के लिए |  अगर टैक्सी ले रही हैं, तो टैक्सी का नंबर अपने घर वालों, ऑफ़िस और मित्रों को ज़रूर व्हाट्सएप्प से भेज दें  जिससे कि वह टैक्सी का मार्ग ट्रैक कर सकते हैं | कुछ ऐसी भी नौकरियाँ हैं जहाँ शिफ्ट में काम होता है जैसे आई.टी. सेक्टर के कॉल सेंटर इत्यादि | अगर ऐसे काम आवश्यकतावश करने पड़ें, तो पहली कोशिश यही होनी चाहिए की रात की शिफ्ट में काम ना करें | अगर किन्हीं अपरिहार्य कारणों से ऐसा करना संभव ना हो, तो कंपनी के प्रबंधक के सामने अपनी चुनैतियों को रखें जिससे रात में कार्यस्थल के पास ही  ठहरने की सुरक्षित व्यवस्थ कंपनी के प्रबंधक करें | यह भी ध्यान रखें कि रात की ड्यूटी पर आप अकेली महिला कर्मचारी ना हों |

मैं समझता हूँ ऊपर बताई गयी छोटी-छोटी बातों का ध्यान रख कर महिलाएँ अपने आप को सुरक्षित रख  सकती हैं |

© श्री आलोक मिश्रा

सिंगापुर

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 656 ⇒ सैटेलाइट ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “सैटेलाइट।)

?अभी अभी # 656 ⇒ सैटेलाइट ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

सैटेलाइट कृत्रिम उपग्रह को भी कहते हैं। हमारा मन भी तो एक तरह का सैटेलाइट ही है, जिसके जरिए हमने अपने चैनल सेट किये हुए हैं। किसी का मन २४ घंटे न्यूज में लगा है तो किसी का राजनीति में। कहीं सनसनी, सीआईडी और क्राइम पैट्रोल चल रहा है तो कहीं खाना खजाना।

स्पोर्ट्स चैनल में किसी को धोनी नजर आ रहा है तो किसी को नेटफ्लिक्स पर कोई बेहतरीन फिल्म। कुछ बड़े बूढ़े स्त्री पुरुष आस्था, संस्कार और सत्संग पर आँखें गड़ाए बैठे हैं तो कुछ युवा “पॉप पॉर्न” चबा रहे हैं।

वर्णाश्रम के अनुसार कभी जीवन के चार आश्रम होते थे। कलयुग में भी चार आश्रम ही होते हैं, जिनमें से तीन आश्रम तो आम व्यक्ति के लिए होते हैं, अनाथाश्रम, गृहस्थाश्रमऔर वृद्धाश्रम। चौथा आश्रम तो सिर्फ साधु महात्मा, महा मंडलेश्वर, जगद्गुरु और संन्यासियों का होता है।।

एक कुंआरा, शादीशुदा गृहस्थ होते होते, कब रिटायर हो जाता है, पता ही नहीं चलता। ५० वर्ष से ७५ वर्ष के बीच की एक अवस्था होती है, जिसे वानप्रस्थ कहा जाता है। अगर शास्त्र की मानें तो संन्यास अवस्था तो वानप्रस्थ के भी बाद की अवस्था है, क्योंकि तब मनुष्य की औसत आयु सौ वर्ष मानी जाती थी।

पचास वर्ष के बाद की आयु, भक्ति, ज्ञान और वैराग्य को समर्पित होती थी। तब कहां आज की तरह भौतिकवाद, वैज्ञानिक सोच, डिजिटल जीवन और हिन्दू मुसलमान होता था।

बस भगवान का नाम लेते रहो, क्या पता कब प्राण पखेरू उड़ जाएं। अंतिम सांस तक अगर नारायण का स्मरण है तो मुक्ति यानी मोक्ष अर्थात् जन्म मरण के बंधन से गारंटीड छुटकारा।।

मेरे पास भी मन रूपी सैटेलाइट है, जिस पर अक्सर मेरा म्यूजिक चैनल ही चला करता है। आज भी कुछ ऐसा ही हुआ। नहाते वक्त मैं रफी साहब का यह गीत गुनगुना रहा था ;

तुम एक बार मुहब्बत का इम्तहान तो लो

मेरे जुनूँ मेरी वहशत का इम्तहान तो लो …

(फिल्म बाबर १९६०)

इधर मैं गीत गुनगुना रहा था और उधर रेडियो पर यह गीत बज रहा था ;

मैने शायद तुम्हें पहले भी कहीं देखा है।

अजनबी सी हो,

मगर गैर नहीं लगती हो वहम से भी जो हो नाज़ुक वो यकीं लगती हो …

(बरसात की रात १९६०)

मुझे आश्चर्य हुआ, जो गीत मैं गुनगुना रहा हूं, उसी मूड का, उसी गायक का गीत उस समय रेडियो पर बज रहा था। यानी मेरे मन के सैटेलाइट और रेडियो की तरंगों में आपस में कुछ तो संबंध होगा ही।

ऐसी आकस्मिक घटनाओं को हम टेलीपैथी कहकर टाल देते हैं। लेकिन मेरी और रेडियो के बीच कैसी टेलीपेथी! ये दोनों गीत विलक्षण हैं, जिनकी धुन भी मिलती जुलती ही है और दोनों फिल्में सन् १९६० की ही हैं। इन दोनों गीतों के गीतकार साहिर लुधियानवी हैं, और संयोगवश इन दोनों फिल्मों के संगीतकार भी रोशन ही हैं। इसी मूड के और भी कई गीत होंगेे रफी साहब की आवाज में। मेरा मन का सैटेलाइट कभी ना कभी खोज ही निकालेगा, संगीत के सागर में गोता मारकर। आखिर हाथ तो मुझे मोती ही लगना है।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 655 ⇒ जानवर और इंसान ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “जानवर और इंसान।)

?अभी अभी # 655 ⇒ जानवर और इंसान ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

जानवर और इंसान की तुलना नहीं की जा सकती। जब इंसान से इंसान की तुलना में राजा भोज और गंगू तेली आमने सामने आ खड़े होते हैं तो बेचारे एक जानवर की क्या बिसात ! देवताओं को दुर्लभ यह मानव देह। बड़े भाग मानुस तन पायो। लख चौरासी बाद यह मौका हाथ आता है मनुष्य जन्म का। और बेचारा जानवर, नगरी नगरी द्वारे द्वारे की तरह, योनि योनि भटकता, कीट पतंग, खग, कभी जलचर तो कभी नभचर। या फिर जानवर बन जंगल में घास चर – विचर।

यह सब मानव बुद्धि का ही तो खेल है। कभी विश्व विजय तो कभी सम्राट। तीनों लोकों तक जिसकी कीर्ति का गुणगान होता है, स्वयं ईश्वर जब मानव देह धारण कर अवतरित होता है। दुनिया का इतिहास भरा पड़ा है, मनुष्य के पुरुषार्थ और उपलब्धियों से। उसकी कैसी तुलना किसी जानवर से।।

उसके बुद्धि कौशल और बाजुओं की ताकत का क्या कोई मुकाबला करेगा। सबसे पहले उसने अपने लिए रोटी, कपड़ा और मकान तलाशा। उसने बस्ती और परिवार की नीव डाली। जब कि जानवर अपने तन ढांकने के लिए दो सूत कपड़े की व्यवस्था तक नहीं कर पाया। इंसान ने भोजन पकाकर खाना सीखा जब कि जानवर, जानवर ही रहा। बंदर तो अदरक का स्वाद नहीं जानता बाकी सृष्टि के प्राणी तो बेचारे फल, फूल, वनस्पति, कीट पतंग खा खाकर ही अपना भरण पोषण करते रहे।

जीव: जीवस्य भोजनं।

उधर शेर जंगल का राजा बन शिकार करने लगा। उसके जंगल राज में बड़ी मछली छोटी मछली को निगल जाती और उसकी व्यवस्था को पर्यावरण के लिए श्रेष्ठ ही नहीं माना गया, उसे मनुष्य ने प्रोजेक्ट टाइगर का नाम दे दिया।

और इधर अपनी सुविधा के लिए उसने जंगल काट डाले, पर्वतों पर टूरिस्ट सेंटर खोल डाले। नदियों पर बांध बना बिजली तक बना डाली। जितना जरूरी पर्यावरण, उतना ही जरूरी मानव विकास।।

जानवर ने हमेशा जानवर को ही खाया। जब भूख लगी तब ही खाया। रोज अपने दाने पानी की व्यवस्था की। अपने भोजन को किसी कोल्ड स्टोरेज में नहीं रखा। भले ही शेर जंगल का राजा रहा हो। उसने अपने रहने के लिए किसी आलीशान सुविधासंपन्न पंच सितारा गुफा की व्यवस्था नहीं की। आखिर जानवर है, जानवर ही रहेगा।

और इधर मनुष्य को देखिए उसके खेल देखिए !

गुलाम, बेगम, बादशाह।

कभी शेर का शिकार करते थे तो कभी तीतर बटेर का ! और यह इंसान इतना शक्तिशाली हो गया कि जानवर को ही खाने लग गया। जानवर बेचारे के पास तो सिर्फ नुकीले दांत और नुकीले पंजे, लेकिन इंसान के पास तीर कमान और बंदूक। बेचारा जानवर क्या मुकाबला कर पाता इंसान से।।

इंसान जाग उठा और जानवर सोता ही रह गया। जानवर अगर जाग भी जाए तो कभी इंसान नहीं बन सकता और शायद बनना भी नहीं चाहता लेकिन इंसान को जानवर बनने में अधिक समय नहीं लगता। क्या भरोसा कब उसके अंदर का जानवर जाग जाए ! यह अंदर का जानवर बाहर के किसी भी जानवर से अधिक खतरनाक है। काम, क्रोध, लोभ और मोह जानवर में कहां ? लेकिन बदनाम तो जानवर को ही होना है, क्योंकि इंसान तो दूध से धुला हुआ है और जानवर क्या पता नहाता, धोता अथवा ब्रश भी करता है या नहीं। शराब पीकर आदमी अपनी पत्नी को मारे तो वह जानवर हो जाता है। वाह रे चतुर मानव और तेरी बुद्धि। युद्ध तुम लड़ो और बलि हम जानवर की। पूजा तुम करो तो भी गर्दन हमारी। कभी हम वफादार कुत्ते, तो कभी कुत्ते कमीने। वाह क्या स्तर है इंसानियत का।

बकरे की अम्मा आज भी कब तक खैर मनाएगी, घर की मुर्गी तो दाल बराबर ही कहलाएगी। वाह रे इंसान, और तेरी इंसानियत ! आसमान के पंछी तू मारकर खा जाए, समंदर की मछली भी तेरे लिए फिश करी और बातें अहिंसा और विश्व शांति की। जीव दया और गऊ सेवा की। धन्य हो हे मानव श्रेष्ठ तुम धन्य हो।

बड़ी दया होगी अगर हमारे लिए अपनी स्मार्ट सिटी में चरने के लिए थोड़ी घास छोड़ दो, अपने स्विमिंग पूल में हम पक्षियों को भी प्यास बुझाने दो। हमें अभय दो। हमें भी जीने दो। आपके ही अनुसार हममें भी ईश्वर का ही वास है।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # 127 – देश-परदेश – पुरानी यादें: हमारा बजाज ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # 127 ☆ देश-परदेश – पुरानी यादें: हमारा बजाज ☆ श्री राकेश कुमार ☆

साठ के दशक में इटली का लैंब्रेटा, देश की सड़कों का बेताज बादशाह हुआ करता था। देश के औद्योगिक घराने “बजाज ग्रुप” ने लैंब्रेटा को ऐसी टक्कर दी, वो देश से नौ दो ग्यारह हो गया।

बजाज स्कूटर एक समय में मिनी कार का काम किया करता था। सत्तर के दशक में जब परिवार नियोजन का नारा “हम दो हमारे दो” का प्रचार आरंभ हुआ, तो बजाज ने नए परिवार की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए, “हमारा बजाज” स्कूटर लंबे समय तक देश की सड़कों का सरताज बना रहा। कई खिलाड़ी उसके मुकाबले में आए जैसे कि विजय सुपर, फाल्कन आदि, लेकिन बजाज का सामना करने में असफल रहे। वो तो बाद में मोटर साइकिल ने स्कूटर को तो प्राय-प्राय सड़कों से शून्य तक पहुंचा दिया।

हमने भी बजाज के “चेतक” नामक ब्रांड को सिल्वर जुबली मना कर विदा किया था। उसके साथ के कुछ स्कूटर आज भी जुगाड के रूप में “मालवाहक” के रूप में सेवाएं प्रदान कर रहे हैं।

हमारे एक मित्र तो बजाज का “प्रिया” ब्रांड का स्कूटर चार दशक से अधिक पुराने मॉडल को प्रतिदिन घर से बाहर निकाल कर इसलिए रख देते हैं, ताकि उनके घर के बाहर कोई दूसरा अपनी कार पार्क ना कर सके। वैसे उनका स्कूटर स्टार्ट हुए भी दो दशक हो चुके हैं। हद तो तब हो गई, जब उन्होंने अपने बच्चों के वैवाहिक बायो डाटा में एसेट्स के नाम पर अपने स्कूटर तक का जिक्र भी कर दिया था।

उपरोक्त फोटो एक कॉलेज के पुराने मित्र ने मियामी (अमेरिका) से प्रेषित की है, जो वहां के एक स्थानीय अमरीकी भोजनालय की है। वहां पर बजाज स्कूटर एक शो पीस का काम कर रहा है। उसने तो मज़ाक मज़ाक में ये भी कह दिया कि यदि हमारा चार दशक पुराना चेतक स्कूटर उपलब्ध हो तो उसे भी अमेरिका के किसी भोजनालय में उचित सम्मान और दाम मिल जायेगा।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – आलेख ☆ श्रापित गर्भ… ☆ श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव ☆

श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव 

अल्प परिचय 

गोरखपुर, उत्तरप्रदेश से श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव जी एक प्रेरणादायक महिला हैं, जिन्होंने अपनी लेखनी से समाज में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उन्हें 2024 में अंतरराष्ट्रीय महिला सम्मान से नवाजा गया। उनके द्वारा संवाद टीवी पर फाग प्रसारण प्रस्तुत किया गया और विभिन्न राज्यों के प्रमुख अखबारों व पत्रिकाओं में उनकी कविता, कहानी और आलेख प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी लेखनी में समाज के प्रति संवेदनशीलता और सृजनात्मकता का सुंदर संगम देखने को मिलता है।

☆ आलेख ☆ श्रापित गर्भ… ☆ श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव ☆

अक्सर घरों में किसी के निधन के बाद उसकीं पुण्यतिथि मनाई जाती हैं और सार्मथ्य अनुसार दान-पुण्य किया जाता हैं ताकि आत्मा को शांति मिले।

मगर हर तबके में एक मृत्यु के बाद ना तो पुण्यतिथि मनाई जाती हैं न ही आँसू बहाये जाते हैं और ना ही दान पुण्य होता है क्योंकि मृतका माँ के कोख में ही दम तोड़ देती है।

बात कड़वी हैं लेकिन 100% सही है।

जी हाँ मैं बात कर रहीं हूँ माँ के उस गर्भ की जो पुत्र मोह के लिए पुत्री के हत्या से रंग जाते हैं।

कहते है कंस अपनी बहन के बच्चों की हत्या जन्म के बाद कारागार में करता रहा क्योंकि उसे डर था अपने प्राणों का।

मगर माँ के गर्भ गृह में मारने वाला कंस कौन है?

वह भी अपने अबोध अंश का, उसे किसी का डर नहीं।

बस पुत्र रत्न प्राप्ति की अभिलाषा और यही से शुरू होने लगता है, पाप-पुण्य का वह खेल जो मानव रुपी पिता से वह अपराध करवाने लगता है जो ना चाह कर भी माता पिता कर बैठते हैं।  

खैर मेरा काम था लिखना।

क्योंकि गीता -कुरान बाकी धार्मिक किताबों में केवल लिखा गया है बाकी तो सभी समझदार हैं ही।

 

अपने आंगन के नन्ही दूब को फैलने दें।

कोई फर्क नहीं पड़ता समाज को कि आपके घर बेटा है या बेटी!

उन्हें अपने हाथों से कुचलने की चेष्टा ना करें🙏

सृष्टि हैं तभी शिव हैं वरना पत्थरों पे फूल खिलते नहीं।

 

अजन्मा- भ्रूण हत्या

व्यक्तिगत सोच है, मजबूरी नहीं

फिर खुद के हाथों

अपनी उस कली को कैसे कुचल सकते हैं?

जिसके अंदर हमारा रक्त यहाँ तक कि धडकन भी साथ-साथ धड़क रही हो और वह नन्ही सी जान हाथों में आने के लिए पल- पल प्रतीक्षा कर रही हो।

माँ तो मिट्टी से बनी हुई दुर्गा की वह प्रतिमा होती है जिसका स्वभाव ही मातृत्व फिर अपने कोख की रक्षा करने में असर्मथ कैसे हो सकती है? क्योंकि पुरुष के साथ साथ वंश की चाहत प्रंचड हावी स्त्री मन में भी होती है।

और अंधकार में छोटी सी पवित्र लौ अपनी अस्तित्व खो देती है।

अगर स्त्री स्वयं के भ्रूण हत्या को होने से नहीं बचा सकती तो उसे फिर माँ कहलाने का हक कैसा?

माँ तो जननी होती है। उसके लिए पुत्र और पुत्री का क्या भेद?

© श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव

गोरखपुर, उत्तरप्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # 284 – पुनरपि जननं पुनरपि मरणं… ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # 284 पुनरपि जननं पुनरपि मरणं… ?

श्मशान में हूँ। देखता हूँ कि हर क्षेत्र की तरह यहाँ भी भारी भीड़ है। लगातार कोई ना कोई निष्प्राण देह लाई जा रही है। देह के पीछे सम्बंधित मृतक के परिजन और रिश्तेदार हैं।

दहन के लिए चितास्थल खाली मिलना भी अब भाग्य कहलाने लगा है। दो देह प्रतीक्षारत हैं। कुछ समय बाद दो खाली चितास्थलों पर  चिता तैयार की जाने लगी हैं। मृतक के परिजन और रिश्तेदार केवल ज़बानी निर्देश तक सीमित हैं। सारा काम तो श्मशान के कर्मचारी कर रहे हैं।

पुरोहित अंतिम संस्कार कराने में जुटे हैं। हर संस्कार की भाँति यहाँ भी उनसे शॉर्टकट की अपेक्षा है। मृतक के पुत्र, पौत्र, निकटवर्ती अपने केश अर्पित कर रहे हैं। उपस्थित लोगों में से अधिकांश के चेहरे पर घर या काम पर जल्दी जाने की बेचैनी है। ज़िंदा रहने के लिए महानगर की शर्तें, संवेदनाओं को मुर्दा कर रही हैं। इन मृत संवेदनाओं की तुलना में मरघट मुझे चैतन्य लगता है। यूँ भी देखें तो महानगरों के मरघट की अखंड चिताग्नि ‘मणिकर्णिका’ का विस्तार ही है।

मानस में जच्चा वॉर्ड के इर्द-गिर्द भीड़ का दृश्य उभरता है। अलबत्ता वहाँ आनंद और उल्लास है, चेहरों पर प्रसन्नता है। प्रसूतिगृह में जीव के आगमन का हर्ष है, श्मशान मेंं जीव के गमन का शोक है।

बार-बार आता है, बार-बार जाता है, फिर-फिर लौट आता है। जीव अन्यान्य देह धारण करता है। चक्र अनवरत है। विशेष बात यह कि जो शोक या आनन्द मना रहे हैं, वे भी उसी परिक्रमा के घटक हैं। आना-जाना उन्हें भी उसी रास्ते है। जीवन का रंगमंच, पात्रोंं से निरंतर भूमिकाएँ बदलवाता रहता है। आज जो कंधा देने आए हैं, कल उन्हें भी कंधों पर ही आना है।

‘भज गोविंदम्’ के 21वें पद में आदिशंकराचार्य जी महाराज कहते हैं-

पुनरपि जननं पुनरपि मरणं पुनरपि जननी जठरे शयनम्।

इह संसारे बहुदुस्तारे कृपयाऽपारे पाहि मुरारे॥

भावार्थ है कि बार-बार जन्म होता है‌। बार-बार मृत्यु आती है। बार-बार माँ के गर्भ में शयन करना होता है। बार-बार का यह चक्र अनवरत है। यही कारण है कि संसार रूपी महासागर पार करना दुस्तर है। वस्तुत: काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, ईर्ष्या, राग-द्वेष, निंदा सभी तरह के राक्षसी विषयों का यह संसार महासागर है। यह अपरा है, यहाँ किनारा मिलता ही नहीं। ऐसे राक्षसों के अरि अर्थात मुरारि, भवसागर पार करने की शक्ति प्रदान करें।

श्मशान से श्मशान तक की यात्रा से मुक्त होने का पहला चरण है भान होना। भान रहे कि सब श्मशान की दिशा में यात्रा कर रहे हैं। यह पंक्तियाँ  लिखनेवाला और इन्हें पढ़नेवाला भी। श्मशान पहुँँचने के पहले निर्णय करना होगा कि पार होने का प्रयास करना है या फेरा लगाते रहना है।..इति

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

💥 12 अप्रैल 2025 से 19 मई 2025 तक श्री महावीर साधना सम्पन्न होगी 💥  

🕉️ प्रतिदिन हनुमान चालीसा एवं संकटमोचन हनुमन्नाष्टक का कम से एक पाठ अवश्य करें, आत्मपरिष्कार एवं ध्यानसाधना तो साथ चलेंगे ही 🕉️

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों  को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 654 ⇒ निःशुल्क ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “पंचवटी।)

?अभी अभी # 654 ⇒ निःशुल्क ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

निःशुल्क कहें या मुफ़्त ! क्या कोई फर्क पड़ता है। मुफ़्तखोर पहले तो मुफ्त का माल ढूँढते हैं और बाद में निःशुल्क शौचालय तलाश करते हैं। 25 %डिस्काउंट और बिग बाजार के महा सेल में एक के साथ एक फ्री को आप क्या कहेंगे। वहाँ छूट भी है, मुफ्त भी है और शुल्क भी। लेकिन निःशुल्क कुछ भी नहीं है।

हमारे घर अखबार आता है, उस पर शुल्क लिखा होता है। वही अखबार अगर आप पड़ोसी के यहाँ अथवा वाचनालय में पढ़ते हैं, तो निःशुल्क हो जाता है।।

गर्मी में दानदाता और पारमार्थिक संस्थाएँ जगह जगह ठंडे पानी की प्याऊ खोलते थे, वे निःशुल्क होती थी लेकिन उन पर ऐसा लिखा नहीं होता था, क्योंकि तब पीने के पानी के पैसे नहीं लिए जाते थे। जब से पीने का पानी बोतलों में बंद होने लगा है, वह बिकाऊ हो गया है।

घोर गर्मी और पानी के अभाव में नगर पालिका पानी के टैंकरों से निःशुल्क जल-प्रदाय करती थी। लोग पानी के टैंकर के आगे बर्तनों की लाइन लगा दिया करते थे। सार्वजनिक स्थानों के नल और ट्यूब वेल की भी यही स्थिति होती थी। लेकिन पानी बेचा नहीं जाता था।।

समय के साथ पानी के भाव बढ़ने लगे। नई विकसित होती कालोनियों के बोरिंग सूखने लगे। पानी बेचना व्यवसाय हो गया। प्राइवेट पानी के टैंकर सड़कों पर दौड़ने लगे। अब पानी निःशुल्क नहीं मिलता।

शहरों में चिकित्सा बहुत महँगी है ! एलोपैथी के डॉक्टर कंसल्टेशन फीस लेते हैं, वे मुफ्त में इलाज नहीं करते। आयुर्वेदिक चिकित्सा में निःशुल्क परामर्श उपलब्ध होता है। पातंजल औषधालय हो अथवा कोई आयुर्वेदिक दुकान, निःशुल्क चिकित्सा के बोर्ड लगे देखे जा सकते हैं। बस दवाइयों की कीमत मत पूछिए।।

कुछ नागरिक, समाजसेवी संस्थाओं को अपनी स्वैच्छिक सेवाएँ प्रदान करते हैं। मुफ़्त सलाह और निःशुल्क सेवाएं देने वाले को मानद भी कहते हैं। उनकी निःशुल्क सेवाओं को सम्मान प्रदान करने के लिए अंग्रेज़ी में एक शब्द गढ़ा गया है, ऑनरेरी।

समाज की विभिन्न विधाओं में निःस्वार्थ सेवाएं प्रदान करने वाले विशिष्ट व्यक्तियों को ऑनरेरी डॉक्टर ऑफ लॉज़ की डिग्री से विभूषित किया जाता है। इनमें ललित कलाओं में पारंगत विद्वानों और कलाकारों को बिना डिग्री के डॉक्टर बना दिया जाता है। किसी भी सेलिब्रिटी को ऐसा डॉक्टर बनने में ज़्यादा वक्त नहीं लगता।।

क्या मनुष्य जीवन हमें माँगने से मिला है, या फिर हमने इसकी कोई कीमत चुकाई है ? मुफ़्त में कहें, या निःशुल्क मिली यह ज़िन्दगी कितनी अनमोल है। ‌अक्सर लोग बड़े शिकायत भरे लहजे में कहते हैं, हमने पूरी ज़िंदगी निःस्वार्थ सेवा और त्याग में बिता दी और बदले में हमें क्या मिला।

‌वे भूल जाते हैं, इतना बहुमूल्य मानव जीवन उन्हें बिना कौड़ी खर्च किये मिला है। जिसने आपको यह जीवन दिया है, यह उसकी अमानत है। इसमें खयानत न करते हुए, कबीर की तरह इस चदरिया को ज्यों की त्यों रख देंगे तो यही एक बड़ा अहसान होगा। जो ज़िन्दगी आपको मुफ्त में मिली, आप उसकी क़ीमत लगा रहे हैं। मुझको क्या मिला।।

कुछ लोग निःशुल्क खुशियाँ बाँटते हैं। कितनी भी परेशानियां हों, हमेशा मुस्कुराहट उनके चेहरे पर नज़र आती है। दो शब्द मीठा बोलने में पैसे नहीं लगते।

व्यक्तित्व की महक, तड़क-भड़क और महँगे प्रसाधनों से नहीं होती। प्रसन्नता travel करती है। बस में यात्रा करते समय, किसी माँ की गोद में खिलखिलाता बच्चा, बरबस सबका ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लेता है। वह जिसकी ओर मुस्कान फेंकता है, वह मुग्ध हो जाता है। यह सब बस किराये में शामिल नहीं होता। निःशुल्क होता है।

गर्मियों में जब सुबह ठंडी हवा चलती है, और आप सैर के लिए निकलते हैं, तो वातावरण में रातरानी की खुशबू शामिल होती है। प्रकृति ने यह सब व्यवस्था आपके लिए निःशुल्क की है। आप इसकी कीमत केवल खुश रहकर, प्रसन्न रहकर, और औरों को प्रसन्न रखकर ही चुका सकते हैं। जो निःशुल्क मिला है, उसे अपने पास नहीं रखें, निःशुल्क ही आपस में बांट लें।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – आलेख ☆ आज की सुविधा कल की दुविधा… ☆ श्री संजय आरजू “बड़ौतवी” ☆

श्री संजय आरजू “बड़ौतवी” 

अल्प परिचय 

नाम – श्री संजय कुमार (उपनाम संजय आरजू “बड़ौतवी”)

पदनाम: उप महाप्रबंधक (सिविल) भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण, भोपाल

शिक्षा: (1) सिविल इंजीनियरिंग में स्नातक (2) जर्नलिज्म और मास कम्युनिकेशन में डिप्लोमा (3) M. A. (हिन्दी साहित्य)

अन्य रुचि:  कहानीकार, लघुकथाकार, कवि, स्तम्भकार, समाजसेवक,पर्यावरणविद.

☆ आलेख ☆ आज की सुविधा कल की दुविधा…📱☆ श्री संजय आरजू “बड़ौतवी” ☆

ट्रेन में बैठी “सुनीता” ने अपने काम को निपटाने के लिए है पास ही बैठे तीन साल के अपने छोटे बच्चे “तक्ष” को मोबाइल दे रखा है सुनीता चाहती है कि वह अपने ऑफिस का काम ट्रेन में बैठकर ही निपटाले, इस दौरान उसका बच्चा उसे परेशान ना करें इसके लिए उसने अपना एंड्राइड मोबाइल भी उसके हाथ में पकड़ा दिया है। बेटा तक्ष खुशी से झूमता है और सुनीता के गाल पर पप्पी देते हुए कहता है “मम्मी आई लव यू”।

एक मुस्कुराहट के साथ सुनीता अपने ऑफिस के काम में लग जाती है फिर ट्रेन में स्टेशन के बाद स्टेशन आते जाते हैं तक्ष अपने मोबाइल में अपनी पसंद का गेम खेलने लग जाता है। थोड़ी देर में तक्ष की यस यस की आवाजें आने लगती है बीच-बीच में वह सुनीता को बस इतना ही कहता” मम्मी देखो मैंने छटा लेवल पार कर लिया है अब मेरा लेवल आठ निकल गया है”। और सुनीता मुस्कुराते हुए कहती है ठीक है बेटा खेलो पर मुझे डिस्टर्ब ना करो।

ऐसी ही एक कहानी दुकान पर बैठे “सुमित” की भी है सुमित की तीन बच्चे हैं सबसे छोटी बेटी छः महीने की है उसे संभालने और घर के काम में लगी उसकी पत्नी “सुमित्रा” को ऐसे में अपने ढाई साल की मंझली बेटी”ईशा की देखभाल भी सुमित को ही करनी रहती है इसलिए वह दुकान में बैठे-बैठे कई बार ग्राहकों से बातें करने की जल्दी में बेटी ईशा को मोबाइल पकड़ा देता है।

 ईशा मोबाइल लेते ही एकदम खुशी से झूम उठती है”थैंक यू पापा” और उसके बाद वह अपना मनपसंद कार्टून टीवी देखती रहती है।

सुमित अपनी दुकानदारी में लग जाता है।

 यह छोटी-छोटी घटनाएं बाजार में हमारी आंखों के सामने से अक्सर गुजरती हैं और हम उन बच्चों को हल्का सा मुस्कुरा कर देखते है फिर उनके पेरेंट्स को कहते हैं “आपका बच्चा बहुत स्मार्ट है”।

पैरेंट्स भी मुस्कुरा कर कहते हैं जी शुक्रिया।

इक्कीसवीं सदी की यह नए पढ़े – लिखे मां-बाप की अक्सर इकलौती या दो संतानों में से एक हुआ करती है।

जहां दंपति अक्सर अपनी रोजमर्रा के जीवन की समस्याओं जैसे प्रोन्नत विकास, आर्थिक लाभ, महंगी कार या फिर महंगे सामान से घर भर लेने की तीव्र चाह से जूझते हैं।

कई बार हम खुद भी इन्ही की तरह जाने अंजाने में अपने हिस्से की जिम्मेदारियां कुछ इसी तरह निभा रहे होते है।

हमें लगता है कि बच्चों को मोबाइल पकड़ा देने से समस्याएं तात्कालिक रूप से बेहद कम या खत्म हो जाती हैं, और बहुत आसान हो जाता है बच्चों को संभालना और साथ में अपने रोजमर्रा के काम करना भी।

यह मानवीय प्रवृत्ति है कि अक्सर वह छोटे तात्कालिक लाभ के लिए कई बार और दूरगामी संभावित दुखों को अपनी तरफ आकर्षित कर लेता है।

तात्कालिक आर्थिक लाभ को समाज में लालच कहते हैं, इक्कीसवीं सदी की युवा अभिभावक अक्सर अपनी सुविधाओं के लिए बच्चों को मोबाइल में बिजी कर देना आसान माध्यम समझते हैं।

बाहर खेलने में सुरक्षा का अभाव, साथ ही अपने काम से ध्यान हटाकर बच्चे पर ध्यान लगाए रखने की एक, स्वाभाविक आवश्यकता, शारीरिक उठापटक, बच्चों के झगड़े, और न जाने क्या- क्या संभावनाएं है तो वहीं मोबाइल एक सुविधाजनक, सुरक्षित, एवम सीमित जगह पर बिना अतिरिक्त खर्च के बच्चों पर कम ध्यान देने से भी काम चलने के सुखद भाव से परिपूर्ण एक व्यवस्था है।

सभी अभिभावक जो काम कर रहे हैं, वह या तो आजीविका के लिए कर रहे हैं, या अपनी अगली पीढ़ी का भविष्य सुरक्षित करने के लिए।

अपनी सुविधा के लिए बच्चों को दिए मोबाइल पर तेजी से चलती उंगलियों और घूमती आंखों से बच्चा एक विशेष खेल के एक विशेष खिलाड़ी को बचाने के लिए तो तेजी से बटन तो दबा कर बचा सकता है, मगर क्या वो बच्चा सड़क पर, सामने से आने वाली साइकिल से अपने आप को बचा पाएगा?क्योंकि साइकिल से बचना एक प्रायोगिक प्रक्रिया है जो प्रयोग से ही सीखी जा सकती है।

जबकि मोबाइल गेम में वह बच्चा अपने मोबाइल के हीरो को सिर्फ बटन दबाने मात्र से बचाता है।

उसका दिमाग और शरीर एक विशेष रूप की प्रक्रिया करने का आदी हो जाता है, जो कि बटन दबाने तक ही सीमित होकर रह जाती है, भौतिक रूप से सभी अंगों को एक साथ लेकर चलने को ही शरीर की प्रतिक्रिया कहा जाता है। अंगूठा या उंगली चलाने को नही और न ही उससे सामने से आ रही साईकल ही रुकेगी।

साईकल से बचने के लिए पूरे शरीर को काम करना होगा क्या हम अभिभावकों को इस बात का अहसास है?

क्या हम जानते हैं इस सदी की नई पीढ़ी को हम मोबाइल के साथ खेलने दिए जाने वाले अवसर के साथ-साथ अपनी सुविधाओं को भविष्य में एक बहुत बड़ी दुविधा के रूप में विकसित कर रहे हैं। यह कोई छोटी – मोटी घटना नहीं है अगली पीढ़ी के सार्वभौमिक विकास की आवश्यकता को देखते हुए, ये चिंता का गंभीर विषय है।

धीरे-धीरे 21 वीं सदी अब 24वें साल में प्रवेश कर चुकी है।

जिसका मतलब है नए – नए बन रहे मात-पिता भी, 20वीं सदी के अंतिम दशक या 21 वीं सदी में ही पले बढ़े हैं 21 वीं सदी विकास की सदी रही है, इस युवा पीढ़ी ने अपने साथ-साथ देश को परिवर्तित, होते हुए देश और समाज को कृषि प्रधान देश से तकनीकी प्रधान देश की तरफ विकसित एवं अग्रसित होते हुए देख रहा है।

 यह वह पीढ़ी है जिसने अपने माता – पिता को खेतों में काम करते हुए भी देखा है पढ़ लिख कर नई सदी के नए भारत को बनाने में अपना योगदान भी दे रहे हैं। इन्होंने संभवतः यह भी सीखा है कि जो संसाधनों की कमी उन्होंने खुद के जीवन में महसूस की है वह अपनी अगली पीढ़ी को न होने देंगे।

लेकिन यहां एक छोटा सा प्रश्न इस नवयुवा पीढ़ी के लिए है कि जिन संसाधनों की कमियों ने उन्हें नए रास्ते सोचने के लिए मजबूर किया था क्या उन संसाधनों की पूर्ति के लिए इन्होंने नए-नए रास्ते निकालने की युक्तियां नहीं लगाई थी? जिसके चलते 21वीं सदी की इस युवा पीढ़ी ने आज अपने आप को शारीरिक रूप से सुदृढ़ एवं मानसिक रूप से बहुत समृद्ध पाया है। आवश्यकता आविष्कार की जननी है यह पुरानी कहावत है जब आवश्यकता आई ही नहीं होगी तो अविष्कारी सोच कहां से आएगी?, बाहर खुले मैदान में खेलना, पेड़ पर चढ़कर एक छोटा सा आम तोड़ना खेत में जाते वक्त गीली मिट्टी में पैर का धंसना, साइकिल की चेन उतरना हैंडल का मुड़ जाना दोस्त की साइकिल पर बैठकर घर तक आना जीवन को तराशने के औजार थे न की सिर्फ संसाधनों की कमी।

यह सच है कि हर व्यक्ति की अपनी अपनी ज़रूरतें और समस्याएं होती है जिनका हल भी उसी व्यक्ति को अपने, संसाधन एवं परिस्थितियों को देखते हुए निकलना होता है।

आज घर-घर में हो रही अनजानी गलतियों की तरफ ध्यान दिलाते हुए यहां पिछले दस वर्षों के आंकड़ों का विवरण करना आवश्यक है 

वर्ष 2011 से 2019 के बीच नेशनल इंस्टीट्यूट आफ हेल्थ (NIH) अमेरिका द्वारा 15 वर्ष से कम आयु के बच्चों पर मोबाइल के प्रयोग से हुए प्रभावों पर कराए गए 25 अध्यनों में से 16(64%) में मोबाइल का बच्चों के मानसिक विकास पर बेहद खतरनाक, 5 (20%)में खतरनाक एवम 4 (16%)में कम खतरनाक बताया गया है .इस तरह कुल 84%बच्चों पर खतरनाक से बेहद खतरनाक स्तर के लक्षण जैसे आंखें खराब होना, शरीर के अंगों का सामंजस्य न होना, अल्प विकसित दिमाग, भूख न लगना, उल्टियां होना, कंपकपी आना, अत्यधिक डरना, झगड़ालू होने से लेकर मानसिक रूप से विक्षिप्त होने जैसे गंभीर प्रभाव पड़ने की संभावना है। ऐसे में आज के समय में बच्चो को मोबाइल से पूरी तरह दूर तो नही रखा जा सकता परन्तु कुछ नियंत्रित नियमों के तहत सीमित जरूर किया जा सकता है अथवा कहें कि किया जाना चाहिए।

थोड़े से साकारात्मक प्रयास ओर सोच से बच्चों की इस आदत का सदुपयोग भी किया जा सकता है जैसे – उन्हे निश्चित अवधि के लिए ही मोबाइल पर खेलने की अनुमति देने के बदले में स्कूल का होम वर्क करवाना, उन्हे नई नई तकनीकियों से परिचित कराना। उन्हे इंटरनेट से जानकारी परक खगोल, विज्ञान, स्पेस जैसे विषयों पर जानकारी परक कंटेंट के लिए प्रोत्साहित करना। उनसे खुदके लिए कुछ उपयोगी सामग्री निकलने के लिए कहना, आदि। साथ ही अभिभावकों को अपनी प्राथमिकता में बच्चों से बात करना, उनसे समसामयिक विषयों पर विचार जानना अपने व्यक्तिगत अनुभवों को बच्चों को बताना आदि भी दिनचर्या का आवश्यक अंग होना चाहिए न कि वैकल्पिक।

अपने घर के दरवाजे पर खड़ी इस भयानक त्रासदी के लिए, अपनी आज की सुविधाओं को देखते हुए बच्चों के हाथ में सिर्फ मोबाइल पकड़ा कर अपनी जिम्मेदारियां से इति श्री करने की सरलता के बजाय युवा अभिभावको को किसी वैकल्पिक व्यवस्था पर ध्यान देना समय की आवश्यकता है, जिनमें विकल्प के रूप में घर के बाहर आँगन में खेलना है, पार्क आदि में खेलते हुए बच्चों को खेलने के लिए प्रेरित करना जिससे शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ इम्यूनिटी भी बढ़ती है। , यदि बाहर खेलना संभव न हो तो बच्चों के साथ ताश खेलने, कॉमिक्स पढ़ाने, अंताक्षरी खेलना, छोटे-छोटे चिड़िया उड़, तोता उड़ जैसे खेल, किसी सुरक्षित पालतू जानवर को रख कर भी मोबाइल जैसी चीजों से बच्चों को दूर रखा जा सकता हैं। साथ ही ऑनलाइन समान मंगाने के बजाए बच्चो को दुकान पर भेज कर समान मंगवाने की आदत डालने से, बच्चे अनजान लोगों से बात करना सीखेंगे, खरीदी हुए चीज की कीमत समझेंगे, मोल भाव करना सीखेँगे और खराब और सही चीज का फर्क करना सीखेंगे, पैदल या साइकिल पर चलेंगे, इसलिए उनसे घर के छोटे छोटे काम करवाकर भी बिजी रखा जा सकता है।

दिन रात मेहनत करने के साथ बच्चों को सिर्फ सुविधा ही नही समय भीं देंने को भी प्राथमिकता रखेंगे ज्यादा अच्छा होगा। प्रतिस्पर्धा का कोई अंत नहीं है न ही संसाधनों को एकत्र करने की ही कोई सीमा है ये सच हमें ध्यान में रखकर अपनी प्रतीकताएं निर्धारित करनी होंगी।

अक्सर अभिभावक एक बात कहते है “हम जो कुछ भी कर रहे है इन बच्चों के लिए ही तो कर रहे है” एक बार सोचना चाहिए क्या सच में हम सिर्फ बच्चों के लिए कर रहे है ? या अपने दिखावटी स्वभिमान और स्टेटस की प्रति पूर्ति के लिए ? कितने बच्चे है जो अपने पिता या मां को ज्यादा कमाकर लाने को कहते है? जिस उम्र में हम इनकी इच्छाएं पूरी कर रहे होते है उन्हे पता भी नही होता वो जिद किस चीज के लिए कर रहे है, ये बात अभिभावकों को खुद समझना होगा की आज अपनी सुविधा के लिए बच्चों को मोबाइल देकर उन्हें मोबाइल की आदत डालना एवम उनके कीमती बचपन को निष्क्रिय करने से उनके और परिवार के लिए भविष्य में मानसिक विकास की कमी, कमजोर सेहत, जैसी समस्याओं का सामना करते हुए उनके आने वाले कल को खराब तो नही कर रहे!

©  श्री संजय आरजू “बड़ौतवी”

ईमेल –  sanjayarjoo@gmil.com

 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 653 ⇒ त्याग पत्र उर्फ इस्तीफा ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “त्याग पत्र उर्फ इस्तीफा।)

?अभी अभी # 653 ⇒ त्याग पत्र उर्फ इस्तीफा ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

भोग से विरक्ति को त्याग कहते हैं, और पद से त्याग को त्याग पत्र कहते हैं। जिस तरह निवृत्ति से पहले प्रवृत्ति आवश्यक है, उसी प्रकार त्याग पत्र से पहले किसी पद पर नियुक्ति आवश्यक है। सेवा मुक्त भी वही हो सकता है जो कहीं सेवारत हो। सेवा से रिटायरमेंट और टर्मिनेशन से बीच की स्थिति है यह त्याग पत्र।

सेवा चाहे देश की हो अथवा समाज की, शासकीय हो अथवा गैर सरकारी, जिसे आजकल सुविधा के लिए प्राइवेट जॉब कहते हैं।

जॉब शब्द से काम, धंधा और मजदूरी की गंध आती है, जब कि सेवा शब्द में ही त्याग, सुकून और चारों ओर सुख शांति नजर आती है। शासकीय सेवा, भले ही सरकारी नौकरी कहलाती हो, लेकिन कभी शादी के रिश्ते की शर्तिया गारंटी कहलाती थी। लड़का शासकीय सेवा में है, यह एक तरह का चरित्र प्रमाण पत्र होता था। ।

वैसे तो सेवा अपने आप में एक बहुत बड़ा त्याग है, लेकिन कभी कभी परिस्थितिवश इंसान को इस सेवा से भी त्याग पत्र देना पड़ता है। जहां अच्छे भविष्य की संभावना हो, वहां वर्तमान सेवा से निवृत्त होना ही बेहतर होता है। ऐसी परिस्थिति में औपचारिक रूप से त्याग पत्र दिया जाता है और साधारण परिस्थितियों में वह मंजूर भी हो जाता है। आधी छोड़ पूरी का लालच भी आप चाहें तो कह सकते हैं।

एक त्याग पत्र मजबूरी का भी होता है, जहां आप व्यक्तिगत कारणों के चलते, स्वेच्छा से त्याग पत्र दे देते हैं। लेकिन कुछ देश के जनसेवकों पर लोकसेवा का इतना दायित्व और भार होता है, कि वे कभी पद त्यागना ही नहीं चाहते। अतः उनके पद भार की समय सीमा बांध दी जाती है। उस समय के पश्चात् उन्हें इस्तीफा देना ही पड़ता है।।

जो सच्चे देशसेवक होते हैं, वे कभी देश सेवा से मुक्त होना ही नहीं चाहते। जनता भी उन्हें बार बार चुनकर भेजती है। ऐसे नेता ही देश के कर्णधार होते हैं। इन्हें सेवा में ही त्याग और भोग के सुख की अनुभूति होती है।

लेकिन सबै दिन ना होत एक समाना। पुरुष के भाग्य का क्या भरोसा। कभी बिल्ली के भाग से अगर छींका टूटता है, तो कभी सिर पर पहाड़ भी टूट पड़ता है। अच्छा भला राजयोग चल रहा था, अचानक हायकमान से आदश होता है, अपना इस्तीफा भेज दें। आप हवाले में फंस चुके हैं। ।

एक आम इंसान जब नौकरी से रिटायर होता है तो बहुत खुश होता है, अब बुढ़ापा चैन से कटेगा। लेकिन एक सच्चा राजनेता कभी रिटायर नहीं होता। राजनीति में सिर्फ त्याग पत्र लिए और दिए जाते हैं, राजनीति से कभी सन्यास नहीं लिया जाता।

आज की राजनीति सेवा की और त्याग की राजनीति नहीं है, बस त्याग पत्र और इस्तीफे की राजनीति ही है। जहां सिर्फ सिद्धांतों को त्यागा जाता है और अच्छा मौका देखकर चलती गाड़ी में जगह बनाई जाती है।

अपनों को छोड़ा जाता है, और अच्छा मौका तलाशा जाता है। जहां त्याग पत्र एक हथियार की तरह इस्तेमाल होता है, और इस्तीफा, इस्तीफा नहीं होता, धमाका होता है।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #271 ☆ सोSहम् शिवोSहम्… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख सोSहम् शिवोSहम्। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # 271 ☆

सोSहम् शिवोSहम्… ☆

Sहम् शिवोSहम्…जिस दिन आप यह समझ जाएंगे  कि ‘मैं कौन हूं’  फिर जानने के लिए  कुछ शेष नहीं रहेगा। इस मिथ्या संसार में मृगतृष्णा से ग्रसित मानव दौड़ता चला जाता है और उन इच्छाओं को पूर्ण कर लेना चाहता है, जो उससे बहुत दूर हैं। इसलिए वे मात्र स्वप्न बन कर रह जाती हैं और उसकी दशा तृषा से आकुल-व्याकुल उस मृग के समान हो जाती है, जो रेत पर विकीर्ण सूर्य की किरणों को जल समझ भागता चला जाता है और अंत में अपने प्राण त्याग देता है। यही दशा आधुनिक मानव की है, जो अधिकाधिक सुख-संपदा पाने का हर संभव प्रयासरत रहता है; राह में आने वाली आपदाओं व दुश्वारियों की परवाह तक नहीं करता और संबंधों को नकारता हुआ आगे बढ़ता चला जाता है। इस स्थिति में उसे दिन-रात में कोई अंतर नहीं भासता। वह अहर्निश कर्मशील रहता है और एक अंतराल के पश्चात् बच्चों के मान-मनुहार, पत्नी व परिजनों के सान्निध्य  से  वंचित रह जाता है। वह उसी भ्रम में रहता है  कि पैसा व सुख-सुविधाएं स्नेह व प्रेम का विकल्प हैं। परंतु बच्चों को आवश्यकता होती है…माता के स्नेह, प्यार-दुलार व सानिध्य-साहचर्य की, पिता के सुरक्षा-दायरे की, जिसमें बच्चे स्वयं को सुरक्षित अनुभव करते हैं और माता-पिता के संरक्षण में वे ख़ुद को किसी बादशाह से कम नहीं समझते। परंतु आजकल बच्चों व बुज़ुर्गों को एकांत की त्रासदी से जूझना पड़ रहा है, जिसके परिणाम-स्वरूप  बच्चे ग़लत राहों पर अग्रसर हो जाते हैं और टी• वी•, मोबाइल व मीडिया की गिरफ़्त में रहते हुए कब अपराध-जगत् में प्रवेश कर जाते हैं;  जिसका ज्ञान उनके माता-पिता को बहुत देरी से होता है। घर के बड़े-बुज़ुर्ग भी अक्सर स्वयं को असुरक्षित अनुभव करते हैं। वे आंख, कान व मुंह बंद कर के जीने को विवश होते हैं,  क्योंकि कोई भी माता-पिता अपने व अपने बच्चों के बारे में, एक वाक्य भी सुन कर हज़म नहीं कर पाते। इतना ही नहीं, यदि वे बच्चों के हित में भी कोई सुझाव देते हैं, तो उन्हें उसी पल उनकी औक़ात का अहसास दिला दिया जाता है। अपने अंतर्मन में उठते भावोद्वेलन से जूझते हुए, वे मासूम बच्चे अवसाद के शिकार हो जाते हैं और बच्चों के माता-पिता भी आत्मावलोकन करने को  विवश हो जाते हैं; जिसका ठीकरा वे एक-दूसरे पर फेंक कर अर्थात् दोषारोपण कर निज़ात पाना चाहते हैं। परंतु यह सिलसिला थमने का नाम ही नहीं लेता। अक्सर ऐसी स्थिति में वे अलगाव की स्थिति तक पहुंच जाते हैं।

संसार में मानव के दु:खों का सबसे बड़ा कारण है… विश्व के बारे में पोथियों से ज्ञान प्राप्त करना, क्योंकि यह भौतिक ज्ञान हमें मशीन बना कर रख देता है और हम अपनी हर हसरत को पूरा कर लेना चाहते हैं – चाहे हमें उसके लिए बड़ी से बड़ी कीमत ही क्यों न चुकानी पड़े तथा बड़े से बड़ा त्याग ही क्यों न देना पड़े। यह मानव-जीवन की त्रासदी है कि हम अंधाधुंध बेतहाशा दौड़ते चले जाते हैं, जबकि हम अपने जीवन के लक्ष्य से भी अवगत नहीं होते। सो! यह सब तो अंधेरे में तीर चलाने जैसा होता है। हमारा दुर्भाग्य है कि हम यह जानने का प्रयास ही नहीं करते कि ‘मैं कौन हूं, कहां से आया हूं और मेरे जीवन का प्रयोजन क्या है?’

वास्तव में इस आपाधापी के युग में, यह सब सोचने का समय ही कहां मिलता है… जब हम अपने बारे में ही नहीं जानते, तो जीव-जगत् को समझने का प्रश्न ही कहां उठता है? आदि-गुरु शंकराचार्य पांच वर्ष की आयु में घर छोड़ कर चले गए थे… इस तलाश में कि ‘मैं कौन हूं’ और उन्होंने ही सबसे पहले अद्वैत दर्शन अर्थात् परमात्मा की सत्यता से अवगत कराया कि ‘ब्रह्म सत्यम्, जगत् मिथ्या’ है।  संसार में जो कुछ भी है…माया के कारण सत्य भासता है और ब्रह्म सृष्टि के कण-कण में व्याप्त है। केवल वह ही सत्य है, निराकार है, सर्वव्यापक है, अनादि है, अनश्वर है। परंतु समय अबाध गति से निरंतर चलता रहता है, कभी रुकता नहीं। प्रकृति के विभिन्न उपादान सूर्य, चंद्रमा, तारे व पृथ्वी आदि सभी निरंतर क्रियाशील रहते हैं। इसलिए सब कुछ निश्चित है; समयानुसार निरंतर घटित हो रहा है और वे सब नि:स्वार्थ व निष्काम भाव से दूसरों के हित में कार्यरत हैं। वृक्ष अपने फल स्वयं नहीं खाते; जल व वायु प्राणदायक हैं…अपने तत्वों का उपयोग व उपभोग स्वयं नहीं करते। श्री परमहंस योगानंद जी का यह सारगर्भित वाक्य ‘खुद के लिए जीने वाले की ओर कोई ध्यान नहीं देता; परंतु जब आप दूसरों के लिए जीना सीख लेते हैं, तो वे आपके लिए जीते हैं’ बहुत सार्थक संदेश देता है। ‘आप जैसा करते हैं, वही लौट कर आपके पास आता है।’ नि:स्वार्थ भाव से किया गया कर्म सर्वोत्तम होता है। गीता के  निष्काम कर्म का संदेश मानवतावादी भावनाओं से ओत-प्रोत व आप्लावित है।

स्वामी विवेकानंद जी का यह वाक्य हमें ऊर्जस्वित करता है कि ‘किस्मत के भरोसे न बैठें, बल्कि पुरुषार्थ यानि मेहनत के दम पर ख़ुद की किस्मत बनाइए।’  परमात्मा में श्रद्धा, आस्था व विश्वास रखना तो ठीक है, परंतु हाथ पर हाथ धर कर बैठ जाने का औचित्य नहीं है। अब्दुल कलाम जी के विचार विवेकानंद जी के उक्त भाव  को पुष्ट करते हैं कि ‘जो लोग परिश्रम नहीं करते और भाग्य के सहारे प्रतीक्षारत रहते हैं, तो उन्हें जीवन में उन बचे हुए फलों की प्राप्ति होती है, क्योंकि पुरुषार्थी व्यक्ति तो अपने अथक परिश्रम से यथासमय उत्तम फल प्राप्त कर ही लेते हैं।’ सो! आलसी लोगों को मन-चाहा फल कभी भी प्राप्त नहीं होता।

‘अपने सपनों को साकार करने का सर्वश्रेष्ठ तरीका यही है कि आप जाग जाएं’— पाल वैलेरी का यह कथन बहुत सार्थक है और अब्दुल कलाम जी भी मानव को यह संदेश देते हैं कि ‘खुली आंखों से सपने देखो, अर्थात् यदि आप सोते रहोगे, तो परिश्रमी, पुरूषार्थी लोग आप से आगे बढ़कर वांछित फल प्राप्त कर लेंगे और आप हाथ मलते रह जायेंगे।’ समय बहुत अनमोल है, लौट कर कभी नहीं आता। सो! हर पल की कीमत समझो। ‘स्वयं को जानो और पहचानो।’ जिस दिन आप समय की महत्ता को अनुभव कर स्वयं को पहचान जाओगे…अपनी बलवती इच्छा से वैसे ही बन जाओगे। सो! आवश्यकता है–अपने अंतर्मन में निहित सुप्त- शक्तियों को जानने की, पहचानने की, क्योंकि पुरुषार्थी लोगों के सम्मुख, तो बाधाएं भी खड़ा रहने का साहस नहीं जुटा पातीं…इसलिए अच्छे लोगों की संगति करने का संदेश दिया गया है, क्योंकि उस स्थिति में बुरा वक्त आएगा ही नहीं। जब आपके विचार अच्छे होंगे, तो आपकी सोच भी  सकारात्मक होगी और आप सत्य के निकट होंगे। सत्य सदैव कल्याणकारी होता है, शुभ होता है, सुंदर होता है और सबका प्रिय होता है। दूसरी ओर सकारात्मक सोच आपको निराशा रूपी गहन अंधकार में भी भटकने नहीं देती। आप सदैव प्रसन्न रहते हैं और खुश-मिज़ाज लोगों की संगति सबको प्रिय होती है। इसलिए ही रॉय गुडमैन के शब्दों में ‘हमें हमेशा याद रखना चाहिए कि खुशी जीवन की यात्रा का  एक तरीका है, न कि जीवन की मंज़िल’ अर्थात् खुशी जीने की राह है; अंदाज़ है, जिसके आधार पर आप अपनी मंज़िल पर सहजता से पहुंच सकते हैं।

मानव व प्रकृति का निर्माण पंच-तत्वों से हुआ है…  पृथ्वी, जल, आकाश, वायु व अग्नि और अंत में मानव इनमें ही विलीन हो जाता है। परंतु दुर्भाग्यवश, वह आजीवन काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार के  द्वंद्व से मुक्ति नहीं प्राप्त कर सकता तथा इसी ऊहापोह में उलझा रहता है। हमारे वेद, उपनिषद्, शास्त्र, तीर्थ-स्थल व अन्य धार्मिक – ग्रंथ समय-समय पर हमारा ध्यान जीवन के अंतिम लक्ष्य की ओर दिलाते हैं… जिसका प्रभाव स्थायी होता है। कुछ समय के लिए तो मानव निर्वेद अथवा निरपेक्ष भाव से इनकी ओर आकर्षित होता है, परंतु फिर माया के वशीभूत होने के पश्चात् सब कुछ भुला बैठता है। जीवन के अंतिम पड़ाव में वह प्रभु से ग़ुहार लगाता है कि वह उसका नाम-सिमरन व ध्यान करना चाहता है, परंतु उस स्थिति में पांचों कर्मेंद्रियां आंख, कान, नाक, मुंह, त्वचा उसके नियंत्रण में नहीं होतीं। उसका शरीर शिथिल हो जाता है, बुद्धि कमज़ोर पड़ जाती है तथा नादान मानव सबसे अलग-थलग पड़ जाता है, क्योंकि वह अहंनिष्ठ  स्वयं को आजीवन सर्वश्रेष्ठ समझता रहा। आत्मचिंतन करने पर  ही उसे अपनी ग़लतियों का ज्ञान होता है और वह उस स्थिति में प्रायश्चित करना चाहता है। परंतु उसके परिवार-जन भी अब उससे कन्नी काटने लग जाते हैं। कुछ समय गुज़र जाने के पश्चात् उन्हें उसकी आवश्यकता अनुभव नहीं होती और वे सब उसे नकार देते हैं। सो! अब उसे अपना जीवन रूपी बोझ स्वयं अकेले ही ढोना पड़ता है।

बेंजामिन फ्रैंकलिन का यह कथन ‘बुद्धिमान लोगों को सलाह की आवश्यकता नहीं होती और मूर्ख लोग इसे स्वीकार नहीं करते’ विचारणीय है। इसके माध्यम से मानव में आत्मविश्वास की महत्ता का प्रतिपादन किया गया है। यदि वह बुद्धिमान है, तो शेष जीवन का एक-एक पल स्वयं को जानने-पहचानने में लगा देता है… और प्रभु का नाम-स्मरण करने में रत रहता है। ‘हरि अनंत, हरि कथा अनंता’ अर्थात् प्रभु की सत्ता व महिमा अपरंपार है। मानव चाह कर भी उसका पार नहीं पा सकता। उस स्थिति में उसे प्रभु-कथा सत्य और शेष सब जग-व्यथा प्रतीत होती है। सो! मानव सदैव मौन रहना अधिक पसंद करता है और वह निंदा-स्तुति, स्व-पर व राग-द्वेष से बहुत ऊपर उठ जाता है। उसे किसी से कोई शिक़वा व शिकायत नहीं रहती, क्योंकि उसकी भौतिक इच्छाओं का तो पहले ही शमन हो चुका होता है। इसलिए वह सदैव संतुष्ट रहता है… स्वयं में स्थित रहता है और प्रभु को प्राप्त कर लेता है। वह कबीर की भांति संसार में उस सृष्टि-नियंता की छवि के अतिरिक्त किसी अन्य को देखना नहीं चाहता…’नैना अंतर आव तू, नैन झांप तोहि लेहुं/ न हौं देखूं और को, न तुझ देखन देहुं’ अर्थात् वह प्रभु को देखने के पश्चात् नेत्र बंद कर लेता है, ताकि वह उसके सानिध्य में रह सके। यह है प्रेम की पराकाष्ठा व तादात्म्य की स्थिति…जहां आत्मा-परमात्मा में भेद समाप्त हो जाता है। सूरदास जी की गोपियों का कृष्ण को दिया गया उपालंभ भी इसी तथ्य को दर्शाता है कि ‘भले ही तुम नेत्रों से तो ओझल हो गए हो और गोकुल से मथुरा में जाकर बस गए हो, परंतु उनके हृदय से दूर जाकर दिखलाओ, तो मानें’ गोपियों के प्रगाढ़ प्रेम व अगाध विश्वास को दर्शाता है। ‘प्रेम गली अति सांकरी, जा में दो न समाय’ अर्थात् प्रेम की तंग गली में उसी प्रकार दो नहीं समा सकते, जैसे एक म्यान में दो तलवार। अत: जब तक आत्मा-परमात्मा का मिलन नहीं हो जाता, तब तक वह कैवल्य की स्थिति को प्राप्त नहीं कर सकता, क्योंकि जब तक मानव विषय-वासनाओं…काम, क्रोध, लोभ, मोह व अहंकार का त्याग कर, ‘मैं और तुम’ की स्थिति से ऊपर  नहीं उठ जाता…वह ‘लख चौरासी अर्थात् जन्म- जन्मांतर तक आवागमन के चक्कर में फंसा रहता है।’

अंत में मैं यह कहना चाहूंगी कि सोSहम् शिवोSहम् अर्थात् मैं ही ब्रह्म हूं और सम्पूर्ण प्राणी-जगत् सत्यम्, शिवम्, सुंदरम् की भावनाओं से ओत-प्रोत है। सो! उस सृष्टि-नियंता की सत्ता को जानना-पहचानना ही मानव का प्रथम उद्देश्य होना चाहिए। मानव जब स्वयं को जान जाता है…समस्त सांसारिक बंधन व भौतिक सुख- सुविधाएं उसे त्याज्य प्रतीत होती हैं। वह पल भर भी उस प्रभु से अलग रहना नहीं चाहता। उसकी यही कामना, उत्कट इच्छा व प्रबल आकांक्षा होती है कि एक भी सांस बिना प्रभु-सिमरन के व्यर्थ न जाए और स्व-पर व आत्मा-परमात्मा का भेद समाप्त हो जाए। यही है–मानव जीवन का प्रयोजन व अंतिम लक्ष्य… सोSहम् शिवोSहम्– जिसे प्राप्त करने में मानव को जन्म-जन्मांतर तक प्रतीक्षा करनी पड़ती है।

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© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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