हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – एकाक्षी ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

श्रावण मास निमित्त पुनर्पाठ में पढ़िए ‘निर्वाणषटकम्‘ पर  छह अंकों की यह शृंखला-

? संजय दृष्टि – एकाक्षी ? ?

एकाक्षी होना चाहता हूँ,

आवश्यक नहीं

एक आँख बंद कर लूँ,

वांछित है; दोनों में

समत्व विकसित कर लूँ!

?

© संजय भारद्वाज   

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  श्रावण साधना गुरुवार दि. 30 जुलाई से आरंभ होकर शनिवार 28 अगस्त (रक्षाबंधन) तक चलेगी 🕉️

  💥 

इस साधना में-

ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगा।

गोस्वामी तुलसीदास रचित रुद्राष्टकम् का पाठ करेंगे।

इस बार हम आदि शंकराचार्य के निर्वाण षटकम् / वैराग्य षटकम् का भी प्रतिदिन कम से कम एक पाठ अवश्य करेंगे।

मालाजप, रुद्राष्टकम्, निर्वाण षटकम् के साथ आत्मपरिष्कार व ध्यानसाधना भी नियमित रूप से चलेंगे।

हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।

≈≈

≈ संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २३० – बरगद बनकर छाँव बनाई… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “सजल – बरगद बनकर छाँव बनाई...”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २३० ☆

☆  बरगद बनकर छाँव बनाई… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

(समांत—- पदांत -आना, मात्रा भार-16, (चौपाई छंद))

☆

सोते को है सरल जगाना।

पर जगते को कठिन उठाना।।

*

जीवन दाँव लगाया फिर भी।

मात-पिता का लुटा खजाना।।

*

बरगद बनकर छाँव बनाई।

चिड़िया उड़ती सुना बहाना।।

*

उँगली थामे बड़े हुए पर।

सबल पैर का नहीं ठिकाना।।

*

उमड़-घुमड़ कर आँसू सूखे।

पर मुखड़े को है हर्षाना ।।

*

प्रश्न चिन्ह तब लगा हुआ है।

कैसा आया नया जमाना।।

*

संस्कृति और सभ्यता रूठी।

जागो मानव क्यों पछताना।।

☆

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २९७ – प्रायमरी का मास्टर…२ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता –  प्रायमरी का मास्टर…२।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २९७ ☆

☆ –  प्रायमरी का मास्टर…२ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ✍

और

जो प्रायमरी का मास्टर है

वो तो है और भी अधिक असहाय।

 

कोई धनी धोरी नहीं है उसका

उससे ज्यादा रुतबेदार होता है

सिपाही पुलिस का।

 

जाने उसकी किस्मत में

क्या बदा है,

आज वो गुरू नहीं

सिर्फ गधा है

जिसके ऊपर अनावश्यक

आदेशों और प्रतिबन्धों का

भारी बोझा लदा है।

वो जाता है स्कूल

तपती दोपहर में

या कि फिर तड़के।

थोड़ी सी जगह में बैठकर

उससे कोई दीक्षा नहीं लेता,

वो किसी को शिक्षा नहीं देता।

वो तो बढ़ाता है भीड़ को।

 

पढ़ाता है वो पचास लड़के।

और आगे चलकर

वही भीड़ नष्ट करने लगती है

प्रजातांत्रिक नीड़ को।

 

छूटता है स्कूल

तो लगता है जैसे

छूटा हो कोई खिरका,

कोई ठेका नहीं ले सकता क्या

इनकी फिकर का ?

क्रमशः…

स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २९४ – “ताप रहे हैं दुख अपने सब…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत “ताप रहे हैं दुख अपने सब...”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २९४ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “ताप रहे हैं दुख अपने सब...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

☆

सहज उमीदों के आँगन में

पगड़ी लिये पिता ।

ताप रहे हैं दुख अपने सब

सिगड़ी लिये पिता ॥

 

रहा वेग आँसू का

तय फिर कैसे कर लेते ।

बाहों में आकार नदी का

कैसे कर लेते ।

 

ऊँचाई पर जा सकने की

चाह रही उनकी –

सुविधाओं की कितु नसेनी

लँगड़ी लिए पिता ॥

 

दर्द नहीं रोया कितना हो

आगे कठिन समय ।

पास नहीं फटका उनके ज्यों

अप्रत्याशित भय ।

 

जीवनराग रहे वे गाते

बस प्रसन्न होकर –

नये हौसलों की छोटी सी

खँजडी लिये पिता ॥

 

प्रतिभायें सब उनके

पद चिन्हो पर थीं चलती ।

सबकी आशायें प्रकाश में

थीं उनके पलती ।

 

उनके ही संदर्भ सभी को

रहे मार्ग दर्शक –

चलते रहे व्यवस्थायें

सब पिछड़ी लिये पिता ॥       

☆

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

01-08-2026

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २७६ ☆ # “सावन आ गया है…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “सावन आ गया है…”।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २७६ ☆

☆ # “सावन आ गया है…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

☆ 

यह सावन का मौसम

यह रिमझिम फुहारें

भीगा हुआ तन मन

अब तुमको पुकारें

 

यह तरुवर से कैसी

लिपटती हुई बेलें

प्रीत का नया

सावन में खेल खेलें

यह अठखेलियां

कर रही तुमको इशारे

भीगा हुआ तन मन

अब तुमको पुकारें

 

वर्ष कि यह

लंबी लंबी झड़ियाँ

बूंदों की यह

लंबी-लंबी लड़ियाँ

यह लड़ियाँ यह झड़ियाँ

सब रंग है तुम्हारे

भीगा हुआ तन मन

अब तुमको पुकारे

 

सावन है मधुरस

पीने का मौसम

मदहोशी में गाफिल

जीने का मौसम

रस से भरे हैं

तुम्हारे नैन कटोरे

भीगा हुआ तन मन

अब तुमको पुकारे

 

सावन आ गया है

अब तुम भी आ जाओ

व्याकुल है मन

अब ना तरसाओ

भीगकर बारिश में

संग कुछ वक्त गुज़ारें

भीगा हुआ तन मन

अब तुमको पुकारे

 

यह सावन का मौसम

यह रिमझिम फुहारें

भीगा हुआ तन मन

अब तुमको पुकारे /

☆

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # -१२० – घिर आई काली काली बदरी… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ‘घिर आई काली काली बदरी…‘।)

☆ अभिव्यक्ति # १२० ☆

☆ घिर आई काली काली बदरी… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

☆ 

घिर आई काली काली बदरी,

खाली गागर, वाली बदरी.

न धरती की प्यास बुझेगी,

सूखी सूखी काली बदरी.

घिर आई काली काली बदरी,

*

प्यासी धरती, बंजर धरती.

किसका पेट भरेगी धरती,

धरती को कैसे सहलाए.

खुद भी तो है प्यासी बदरी,

घिर आई काली काली बदरी.

*

हम सब तुमसे,यही मनायें,

सागर से गागर, भर लायें.

फिर धरती पर बरस बरस कर,

इस धरती की प्यास बुझायें.

बन जाओ जीवन दाता बदरी,

घिर आई काली काली बदरी.

 ☆

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ इरफ़ान ☆ डॉ.सोनिया कस्तुरे ☆

डॉ. सोनिया कस्तुरे

? कविता ?

🍃 इरफ़ान … 🍃 डॉ.सोनिया कस्तुरे ☆

☆

सच को सच कहना ज़रूरी है,

भाइयों और बहनों, इरफ़ान होना ज़रूरी है।

*

​चाहे आप शिक्षित हों या अशिक्षित,

अपनी आवाज़ बुलंद होना ज़रूरी है,

भाइयों और बहनों, इरफ़ान होना ज़रूरी है।

*

​ज़ुल्म देखकर तड़प उठना ज़रूरी है,

और ज़ुल्म को ज़ुल्म कहना ज़रूरी है,

भाइयों और बहनों, इरफ़ान होना ज़रूरी है।

*

​लोकतंत्र और संविधान की रक्षा के लिए,

बाबासाहेब और गांधी के विचार ज़रूरी हैं,

भाइयों और बहनों, इरफ़ान होना ज़रूरी है।

*

​बेबस और पीड़ितों की आवाज़ बनना ज़रूरी है,

भारतीय एकता की मिसाल बनना ज़रूरी है,

भाइयों और बहनों, इरफ़ान होना ज़रूरी है।

*

​इरफ़ान सिर्फ़ एक व्यक्ति का नाम नहीं,

सही और गलत की पहचान, एक गहरा ज्ञान है,

यह जागरूकता और मानवता का अहसास है,

भाइयों और बहनों, इरफ़ान होना ज़रूरी है।

*

​सच को सच कहना ज़रूरी है,

भाइयों और बहनों, इरफ़ान होना ज़रूरी है।

☆

© डॉ.सोनिया कस्तुरे

विश्रामबाग, जि. सांगली

भ्रमणध्वनी:- 9326818354

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २८९ – जिंदगी गिरवी रखी☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है  – सामयिक गीत – जिंदगी गिरवी रखी।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २८९ ☆

☆ सामयिक गीत – जिंदगी गिरवी रखी ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

☆

जी लिए लम्हे

विवश हो

जिंदगी गिरवी रखी।

आबे जमजम

चाहते थे

जहर की बूँदें चखी।।

.

सात जन्मों के लिए

हों साथ हम

वादा किया।

चंद दिन में जुदा हो,

बतला उसे

जुमला दिया।

कह रहा मन चा

हिए तन नवल नूतन

नित सखी।

जी लिए लम्हे

विवश हो

जिंदगी गिरवी रखी।

.

कह रहा काक्रोच

पीड़ित को

अकड़ काजी जहाँ।

कहो कैसे राहतें

पाए दलित-पीड़ित वहाँ।

अशिक्षा ने भूख सह

शिक्षा गही

अब है दुखी।

जी लिए लम्हे

विवश हो

जिंदगी गिरवी रखी।

.

देश-हित को गौड़,

दल-हित को

प्रथम माना सदा।

अहंकारी वृत्ति

पद-मद, खुदी पर

खुद हैं फिदा।

लड़ पड़ोसी से

परेशां रात-दिन

मिथ्या मुखी।

जी लिए लम्हे

विवश हो

जिंदगी गिरवी रखी।

☆

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

१९.११.२०२५

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ४१ – सावन… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में – “पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “तो जानें…“.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ४१  ?

? सावन… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

=1=

आग लिए तुम बदन में अपने,मुझे जलाने आ जाओ

अपनी रेशम सी ज़ुल्फ़ों में,मुझे सुलाने आ जाओ

=2=

हरियाली चहुँ ओर  छा गई,आया देखो सावन

अधरों से रस छलक न जाए, मुझे पिलाने आ जाओ

=3=

लता वृक्ष उपवन मदमाए, झूम उठी अमराई

अपनी बाहों के झूले में, मुझे झुलाने आ जाओ

=4=

पक्षी लगे मारने ताने,दर्द पपीहा बढ़ा रहा

अपनी कोकिल बोली से,मुझे बुलाने आ जाओ

=5=

आ भी जाओ सजनी अब,ये विरह सताये

चंद ख़ुशी की चाह में ‘राजेश’, ग़म को भुलाने आ जाओ ll

☆

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # २१५ ☆ मुक्तक – ।। एक दिन कहानी बन कर रह जाता है आदमी ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

☆ “श्री हंस” साहित्य # २१५ ☆

☆ मुक्तक ।। एक दिन कहानी बन कर रह जाता है आदमी ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

☆

=1=

जीवन में इतना भी नहीं   होना   सामान चाहिए।

क्यों भर रहे इतना कि कुछ लेना आराम चाहिए।।

जीवन के अंत समय बस दुआएं ही हैं साथ जाती।

जीवन में कुछ  अच्छा कमाया हुआ नाम चाहिए।।

=2=

क्रोध में वह सब मत गवाओं कि जो पास आया है।

शांत रह कर के जिन रिश्तों को    आपने कमाया है।।

संघर्ष को  बनाएं अपना दोस्त येआगे ले जाएगा।

बुद्धिविवेक धैर्य परिश्रम सेआदमी ने सब पाया है।।

=3=

संसार में जो भी समस्या उसका बना निदान भी है।

मत गवाओं अपना जीवन जो अनमोल महान भी है।।

एक दिन हम सब   कहानी  बन कर ही रह जाएंगे।

लोग कहें बाद में कि यह  एक अच्छा इंसान भी है।।

=4=

जिसने मुश्किलों का    सामना किया वो आगे बढ़ा है।

जिसने भाग्य को ही   कोसा वह आज वहीं खड़ा है।।

यह जीवन प्रभु  वरदान जैसा कि एक बार है मिलता।

वही बनता विजेता जाकर कि जो हालातों से लड़ा है।।

☆

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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