हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १३३ – वीआईपी पास का चक्कर – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – सरकारी फ़ाइल की अमरता।)  

☆  चुभते तीर # १३३ – व्यंग्य  – वीआईपी पास का चक्कर ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

शहर में गज़ल गायक उस्ताद मुश्ताक अली का प्रोग्राम था। यह कोई आम महफ़िल नहीं थी; यहाँ प्रवेश का मतलब था कि आप शहर के संभ्रांत और ‘कलाप्रेमी’ वर्ग में गिने जाते हैं। गुप्ता जी के पास प्रोग्राम का कोई टिकट नहीं था, लेकिन उनकी मूंछों का सवाल था। उनके पड़ोसी शर्मा जी सुबह से ही अपने ‘वीआईपी गोल्ड पास’ का रौब झाड़ रहे थे।

गुप्ता जी ने ठान लिया कि वे न सिर्फ़ प्रोग्राम में जाएंगे, बल्कि शर्मा जी से आगे वाली रो (Row) में बैठकर दिखाएंगे। उन्होंने अपने पुराने मित्र और नगर निगम में क्लर्क, रामदीन को फोन घुमाया। रामदीन ने बहुत जुगाड़ बिठाकर गुप्ता जी को एक काले रंग का लिफ़ाफ़ा थमा दिया और कहा, “गुप्ता जी, यह पास सीधा आयोजकों के मुख्य दफ़्तर से आया है। इसे दिखाकर सीधे पहली पंक्ति में बैठना।”

प्रोग्राम की शाम गुप्ता जी कड़क कुरता-पाजामा पहनकर ऑडिटोरियम पहुंचे। दरवाज़े पर सुरक्षाकर्मियों की लंबी कतार थी। शर्मा जी भी अपनी पत्नी के साथ लाइन में खड़े थे। गुप्ता जी ने अपनी मूंछों पर ताव दिया, शर्मा जी को एक विजयी मुस्कान दी और सीधे ‘वीआईपी एंट्री’ गेट की तरफ बढ़ गए।

गेट पर तैनात बाउंसरों ने गुप्ता जी को रोका, “सर, अपना पास दिखाइए।”

गुप्ता जी ने बहुत ही शान से अपनी जेब से वह काला लिफ़ाफ़ा निकाला और बाउंसर के हाथ में थमा दिया। बाउंसर ने लिफ़ाफ़ा खोला, अंदर रखा कार्ड देखा और उसकी आंखें फ़टी की फ़टी रह गईं। उसने तुरंत अपने साथी को इशारा किया। दूसरे बाउंसर ने आकर कार्ड देखा और मुस्कुराते हुए गुप्ता जी को सर झुकाकर प्रणाम किया।

“आइए सर, आपका ही इंतज़ार था,” बाउंसर ने बहुत ही इज़्ज़त के साथ कहा और उन्हें स्टेज के ठीक बगल वाले विशेष कमरे में ले गया।

गुप्ता जी का सीना चौड़ा हो गया। वे मन ही मन सोच रहे थे कि रामदीन ने ज़रूर किसी बड़े अफ़सर का पास दिलवा दिया है। दूर से खड़े शर्मा जी यह सब देखकर हक्के-बक्के रह गए थे।

दस मिनट बाद कार्यक्रम शुरू हुआ। पर्दा उठा, उस्ताद मुश्ताक अली मंच पर पधारे। पूरे हॉल में तालियां गूंज उठीं। तभी आयोजक माइक पर आए और बोले, “सज्जनों, उस्ताद जी की महफ़िल शुरू करने से पहले, हम अपने मुख्य प्रायोजक और इस शाम के विशेष मेहमान का स्वागत करना चाहेंगे, जिन्होंने कलाकारों के जलपान की पूरी व्यवस्था की है—श्रीमान गुप्ता जी! कृपया मंच पर आएं और उस्ताद जी को हार पहनाएं!”

गुप्ता जी के होश उड़ गए। रामदीन ने जो पास दिया था, वह दर्शकों का नहीं, बल्कि ‘कैटरिंग स्पॉन्सर’ (खान-पान के मुख्य ठेकेदार) का वीआईपी पास था, जिसका सारा बिल गुप्ता जी के नाम फटने वाला था!

गुप्ता जी का चेहरा सफ़ेद पड़ गया। लेकिन अब पीछे हटने का कोई रास्ता नहीं था। वे भारी कदमों से मंच पर गए, उस्ताद जी को हार पहनाया और माइक हाथ में लेकर बोले, “कला की सेवा से बड़ी कोई सेवा नहीं है। आज की शाम चाय और समोसे मेरी तरफ से आप सभी के लिए बिल्कुल मुफ़्त हैं!”

पूरा हॉल ज़ोर-ज़ोर से तालियां बजाने लगा। शर्मा जी भी खड़े होकर ताली बजा रहे थे। गुप्ता जी ने मुस्कुराकर मंच से हाथ हिलाया, यह सोचते हुए कि बैंक बैलेंस भले ही साफ़ हो गया हो, लेकिन मोहल्ले में इज़्ज़त का झंडा गाड़ दिया गया है।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १३२ – सोफ़े की गद्दी और गायब नोट – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – सोफ़े की गद्दी और गायब नोट।)  

☆  चुभते तीर # १३२ – व्यंग्य  – सोफ़े की गद्दी और गायब नोट ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

वर्मा जी के घर में दिवाली की सफ़ाई किसी राष्ट्रीय स्वच्छता अभियान से कम नहीं थी। इस अभियान के सेनापति थे वर्मा जी स्वयं, और उनकी एकमात्र सिपाही थीं उनकी पत्नी, जिनकी पारखी नज़र से सोफ़े के पीछे फंसी मकड़ी की जाली भी नहीं बच सकती थी। इस बार का मुख्य लक्ष्य था—ड्रॉइंग रूम का वह पुराना लाल सोफ़ा, जो पिछले दस सालों से एक ही जगह पर अंगद के पैर की तरह जमा हुआ था।

वर्मा जी ने गहरी सांस ली, अपनी धोती कसकर बांधी और सोफ़े को खिसकाना शुरू किया। सोफ़ा थोड़ा सा खिसका ही था कि उसके नीचे से धूल के बादलों के साथ लाल रंग का एक मुड़ा हुआ कागज़ का टुकड़ा बाहर निकला। वर्मा जी ने झट से झुककर उसे उठाया। वह दो सौ रुपये का एक पुराना नोट था। वर्मा जी के चेहरे पर ऐसी चमक आई जैसे किसी गोताखोर को समुद्र की गहराई में मोती मिल गया हो।

“अरे वाह! किस्मत हो तो ऐसी,” वर्मा जी ने मूंछों पर ताव देते हुए कहा।

पत्नी ने तुरंत झाड़ू हाथ में संभाली और कड़क आवाज़ में बोलीं, “ज़्यादा खुश मत होइए, यह वही नोट है जो तीन महीने पहले आपके कुरते की जेब से गिरा था और आपने मुझ पर शक किया था कि मैंने चुरा लिया।”

वर्मा जी का उत्साह थोड़ा ठंडा पड़ा, लेकिन सोफ़े के नीचे छिपे खज़ाने की उम्मीद अभी खत्म नहीं हुई थी। उन्होंने सोफ़े को और ज़ोर से धक्का दिया। इस बार सोफ़े के कुशन के बीच की दरार से एक काला लिफ़ाफ़ा नीचे गिरा।

माहौल में अचानक सन्नाटा छा गया। लिफ़ाफ़े पर किसी का नाम नहीं लिखा था। वर्मा जी ने पत्नी की तरफ देखा, पत्नी ने वर्मा जी की तरफ। दोनों की आंखों में जासूसी वाली चमक थी।

“इसे मत खोलना,” पत्नी ने चेतावनी दी, “हो सकता है यह तुम्हारे किसी दोस्त की उधारी का हिसाब हो, जो तुम मुझसे छुपा रहे थे।”

“या फिर हो सकता है कि तुम्हारी उस सुनारी की पर्ची हो, जिसकी किश्त तुमने गुप्त रूप से जमा की थी,” वर्मा जी ने पलटवार किया।

दोनों के बीच बहस इतनी बढ़ गई कि दिवाली की सफ़ाई का युद्ध अब एक पारिवारिक अदालत में बदल चुका था। पड़ोस के शर्मा जी भी शोर सुनकर दरवाज़े पर आ खड़े हुए। मामला बहुत गंभीर हो चुका था। लिफ़ाफ़ा मेज़ पर रखा था और दोनों पक्ष उसे ऐसे घूर रहे थे जैसे वह कोई टाइम बम हो।

आखिरकार शर्मा जी को मध्यस्थ बनाया गया। शर्मा जी ने चश्मा सीधा किया, लिफ़ाफ़ा उठाया और कांपते हाथों से उसकी सील तोड़ी। अंदर से कागज़ का एक छोटा सा पन्ना निकला।

शर्मा जी ने पन्ना पढ़ा और ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगे। वर्मा जी और उनकी पत्नी दोनों एक साथ चिल्लाए, “क्या लिखा है उसमें?”

शर्मा जी ने कागज़ सीधा करके दिखाया। उस पर लिखा था: “यदि आप यह लिफ़ाफ़ा पढ़ रहे हैं, तो इसका मतलब है कि आपने आखिरकार दस साल बाद इस सोफ़े को खिसकाने की ज़हमत उठाई है। धन्यवाद! – सोफ़ा बेचने वाला दुकानदार।”

पूरा कमरा ठहाकों से गूंज उठा। वर्मा जी और उनकी पत्नी ने एक-दूसरे को देखा, अपनी मूर्खता पर मुस्कुराए और ज़ोरदार तालियां बजाने लगे। दिवाली का बोनस भले न मिला हो, लेकिन दस साल पुरानी सुस्ती का जवाब ज़रूर मिल गया था।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ शेष कुशल # ६७ ☆ व्यंग्य – “स्किप : एक राष्ट्रीय बटन…” ☆ श्री शांतिलाल जैन ☆

श्री शांतिलाल जैन

(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो  दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक  ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी के  स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल  में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य  “स्किप : एक राष्ट्रीय बटन…” ।)

बस यूँ ही, बैठे ठाले:-

☆ शेष कुशल # ६७ ☆

☆ व्यंग्य – “स्किप : एक राष्ट्रीय बटन…” – शांतिलाल जैन ☆

थैंक यू मि. स्टीव चेन, आपने स्किप का बटन बनाया. न बनाया होता तो चिढ़, खीज और झुँझलाहट के मारे अपन इतने बाल नोंच चुके होते कि आनेवाले सात जन्मों तक गंजे ही जन्म लेते.

सोचिए श्रीमान्. आप यू-ट्यूब पर हैं. डियर शशांक दुबे की रिकमंडेशन पर, शंकर-जयकिशन की धुन पर, लता मंगेशकर के गाने पर झूम रहे हैं. ‘अज़ीब दास्ताँ है ये, कहाँ शुरू..’ कि एक चीनी मास्टर आपको रोज़ाना 15 मिनट ताई-ची करने को कह रहा है. अनचाहे ही, थोड़ी-थोड़ी देर में वो आपसे मुख़ातिब होता है, बाहर झूलती तोंद से निजात दिलाने का पैकेज आपको बेचना चाहता है. आप खीजते हैं,  झल्लाते हैं,  फिर स्क्रीन पर स्किप बटन के उभरने का बेसब्री से इंतिज़ार करते हैं. अब आपने साँस रोक ली है, चौकन्ने हो गए हैं, पूरी एकाग्रता से तर्जनी तैयार करके रखी है, स्किप का बटन उभरा और आपने दबाया. थैंक गॉड. राहत की एक लम्बी सांस ले पाए आप. कॉकरोच जैसी जीजिविषा वाले विज्ञापनों को आप किल तो नहीं कर पाए मगर कुछ देर के लिए निजात पा लेते हैं. वे फिर आएँगे. बार-बार आएँगे. तर्जनी अभिशप्त है. वो ईवीएम का बटन दबाए कि स्किप का – जिन्हें हटाना चाहती है वे ही बार बार लौट आते हैं.

स्किप एक जिद्दी बटन है श्रीमान्. समय से पहले हटेगा नहीं. टाईमर लगा होता है. स्किप ऐड इन फ़ाईव सेकंड्स. यही पाँच सेकंड्स आपके सुभाव में सेरेनिटी, आपके धैर्य, आपकी सहनशीलता की सबसे बड़ी परीक्षा बन गए हैं. आप फेल भी हो सकते हैं. फिंगर है श्रीमान्, टारगेट से चूकी और एक विज्ञापन सा खुल जाता है, आप संसार के सबसे लक्की फेलो हैं. बस एक क्लिक और!! ये आपकी दुनिया बदल सकता है. जीवन में हर कष्ट स्थायी नहीं होता, कुछ कष्ट केवल पाँच सेकंड्स के होते हैं, लेकिन दिन में कई-कई बार होते हैं. निदान की शर्त बस इतनी कि आपकी नज़र स्क्रीन पर बनी रहे और आपकी अंगुली सही समय पर सही स्थान पर पहुँचे.

इन दिनों राष्ट्रीय प्रतीकों के बदलने की बहस सी चल रही है. स्किप बटन को राष्ट्रीय बटन घोषित करने का यही सही समय है. स्किप सही मायनों में समाजवादी, लोकत्रांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष बटन जो ठहरा. संविधान के अनुच्छेद 15 का अनुपालन करता है. धर्म, नस्ल, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव नहीं करता. स्त्री पुरुष, गरीब अमीर, शहरी ग्रामीण, अगड़ों-पिछड़ों के, सबके फोन में समभाव से उभरता है. ये भजन के बीच भी उसी शिद्दत से उभर आता है जिस शिद्दत से गुरबानी, कव्वाली या साम-गीत के दौरान उभरता है. जाने किस धातु का बना है, रात में भी आराम नहीं करता. जब आप भारत में सो रहे होते हैं तब ग्लोब के दूसरी ओर की दुनिया के लोग इसे दबा रहे होते हैं. ईडन गार्डन से सिलिकॉन वैली तक मानव सभ्यता के सफ़र में सबसे ज्यादा दबाए जानेवाला बटन कोई है तो वो स्किप का बटन है. आदम और हव्वा के बीच सेब तो अब भी एक ही है,  मोबाईल दो हो गए है. सेब तो बाद में भी खा लेंगे फ़िलवक्त दोनों अपने अपने स्किप दबाने में बिजी हैं. अंगुली और स्किप बटन के बीच जुगलबंदी कुदरत की सबसे बड़ी सौगात है. 

एक अनुमान है कि दुनियाभर में तर्जनियाँ एक दिन में कोई टेन मिलियन टाईम्स तो स्किप का बटन दबा ही लेती हैं. इंसा इन दिनों परमात्मा को कम याद करता है, स्किप ज्यादा दबाता है. लोग सारांश पढ़ते हैं, किताबें स्किप कर जाते हैं. रील देखते हैं, व्याख्यान स्किप कर जाते हैं. हेडलाइन पढ़ते हैं, विश्लेषण स्किप कर जाते हैं. स्किप संस्कृति की जकड़ में है समय समाज. बाज़ार ने सभ्यता के दाएँ कोने में एक अदृश्य स्किप बटन लगा दिया है, जहाँ सिर्फ मैं और मेरी पसंद ही मायने रखती हैं बाकी कसमें-वादे, प्यार-वफ़ा, रिश्ते-नाते सब कुछ स्किप किए जा सकते हैं.

स्किप स्कूल के जमाने में अपन का सबसे पसंदीदा एक्शन हुआ करे था, क्लास स्किप करना सबसे पसंदीदा शग़ल था, बेंत की मार पड़ा करती थी. पिताजी को भी हमें जुतियाने का चाहत भरा अवसर मिल जाया करता. इसके बावजूद स्किप अपन का पसंदीदा एक्शन बना रहा. आज भी सबसे पसंदीदा एक्शन है. थैंक यू मि.स्टीव चेन.

-x-x-x-

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© शांतिलाल जैन 

बी-8/12, महानंदा नगर, उज्जैन (म.प्र.) – 456010

9425019837 (M)

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १३१ – इंटरव्यू की नीली टाई – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – इंटरव्यू की नीली टाई।)  

☆  चुभते तीर # १३१ – व्यंग्य  – इंटरव्यू की नीली टाई ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

विकास के पास नौकरी का सिर्फ एक आखिरी मौका बचा था। ‘एपेक्स ग्रुप’ का इंटरव्यू शहर का सबसे कड़ा इंटरव्यू माना जाता था, जहाँ पैनल के लोग जवाब से ज़्यादा उम्मीदवार के जूते की पॉलिश और टाई की गांठ देखकर फैसला सुनाते थे। विकास ने अपनी अलमारी का कोना-कोना छान मारा, लेकिन उसे अपनी पुरानी नीली टाई कहीं नहीं मिली।

समय हाथ से रेत की तरह फिसल रहा था। सुबह नौ बजे का इंटरव्यू था और आठ बज चुके थे। मजबूरी में विकास ने अपने छोटे भाई की एक चमकीली रेशमी टाई उठाई, जिस पर छोटे-छोटे पीले कार्टून बने हुए थे। वह दिखने में किसी गंभीर कॉर्पोरेट अफ़सर की टाई कम और बच्चों के जन्मदिन की सजावट ज़्यादा लग रही थी।

विकास जब इंटरव्यू रूम के बाहर पहुँचा, तो वहाँ बैठे बाकी उम्मीदवारों को देखकर उसका बचा-कुचा आत्मविश्वास भी उड़ गया। सब काले सूट और गंभीर चेहरों के साथ ऐसे बैठे थे जैसे किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी का विलय करने आए हों। सब विकास की कार्टून वाली टाई देखकर मन ही मन हंस रहे थे।

कमरे के अंदर से बुलावा आया। विकास ने गहरी सांस ली, भगवान का नाम जपा और अंदर प्रवेश किया। सामने तीन पैनलिस्ट बैठे थे, जिनके चेहरों पर इतनी गंभीरता थी कि मानो उन्होंने आखिरी बार मुस्कुराहट दस साल पहले देखी हो।

मुख्य इंटरव्यूअर, मिस्टर मेहरा ने विकास की फ़ाइल देखी, फिर चश्मा नीचे करके उसकी टाई पर नज़र टिका दी। पूरे दो मिनट तक कमरे में सन्नाटा छाया रहा। विकास के दिल की धड़कन ऐसे चल रही थी जैसे किसी पुरानी बस का इंजनों चालू हो रहा हो।

मिस्टर मेहरा ने कड़क आवाज़ में पूछा, “विकास, यह इंटरव्यू देश की शीर्ष टेक कंपनी के लिए है। क्या आप हमें बता सकते हैं कि इस गंभीर माहौल में ऐसी बचकानी टाई पहनकर आने के पीछे आपकी क्या रणनीति है?”

विकास जानता था कि सच बोलने पर उसकी नौकरी का पत्ता हमेशा के लिए कट जाएगा। उसने अपनी आंखें बंद कीं, एक पल सोचा और सीधा होकर बोला, “सर, आजकल की कॉर्पोरेट दुनिया तनाव से भरी पड़ी है। जब आपकी टीम रात को दो बजे तक काम कर रही होगी और हर तरफ़ दबाव होगा, तब मेरा काम सिर्फ़ कोडिंग करना नहीं होगा। जब भी मेरी टीम तनाव में मुझे देखेगी, इस टाई को देखकर उनके चेहरे पर एक सेकंड की मुस्कान आ जाएगी। यह टाई मेरी असफलता का डर भगाने का चिन्ह है।”

तीनों पैनलिस्ट ने एक-दूसरे की तरफ देखा। मिस्टर मेहरा धीरे से अपनी कुर्सी से उठे। विकास को लगा कि अब उन्हें बाहर का रास्ता दिखाया जाएगा। लेकिन मिस्टर मेहरा ने आगे बढ़कर विकास से हाथ मिलाया और बोले, “हमे ऐसे लोग चाहिए जो ज्ञान के साथ-साथ कठिन से कठिन स्थिति में भी तनाव कम करना जानते हों। यू आर हायर्ड!”

बाहर बैठे बाकी उम्मीदवार यह देखकर चौंक गए कि कार्टून वाली टाई पहनकर गया लड़का खुशी से झूमता हुआ बाहर आ रहा था। सबने विकास के इस अनोखे आत्मविश्वास के लिए ज़ोरदार तालियां बजाईं।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १३० -सोसायटी का जिम और मिश्रा जी की कमर – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – सोसायटी का जिम और मिश्रा जी की कमर।)  

☆  चुभते तीर # १३० – व्यंग्य  – सोसायटी का जिम और मिश्रा जी की कमर ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

ग्रीन पार्क सोसायटी में नया जिम खुलना किसी साधारण घटना की तरह नहीं था। यह उस मोहल्ले के मध्यवर्गीय सपनों के पंख लगने जैसा था, जहाँ लोग शक्कर की बोरी उठाने में कमर पकड़ लेते थे, लेकिन मुफ़्त के ट्रॉयल के नाम पर पहाड़ चढ़ने को तैयार रहते थे। जिम के उद्घाटन के दिन सोसायटी के सबसे बुजुर्ग और भारी-भरकम सदस्य मिश्रा जी भी टी-शर्ट पहनकर पहुँचे। उनका मुख्य उद्देश्य सेहत बनाना नहीं, बल्कि गुप्ता जी को यह दिखाना था कि साठ की उम्र में भी उनके डोले किसी से कम नहीं हैं।

जिम के ट्रेनर रोहन ने सबको कसरत के नियम समझाने शुरू किए। मिश्रा जी ने ट्रेडमिल पर नज़र दौड़ाई और बोले, “रोहन बेटा, यह मशीन तो मेरे घर के पंखे से भी धीमी चलती है। इसे ज़रा पूरी रफ्तार पर चलाओ।”

रोहन ने मना किया, लेकिन मिश्रा जी की ज़िद्द के आगे किसकी चली है। उन्होंने मशीन पर पैर रखा और रफ्तार बढ़ते ही उनकी टांगें इस तरह भागने लगीं जैसे दफ़्तर में छुट्टी का सायरन बजते ही कर्मचारी घर की तरफ भागते हैं। दो मिनट में मिश्रा जी के माथे से पसीने की धारा ऐसे बही जैसे पहली बारिश में छज्जे से पानी टपकता है।

अचानक ट्रेडमिल से एक कड़क की आवाज़ आई। मिश्रा जी ने पेट पकड़ लिया और ज़मीन पर बैठ गए। पूरा जिम सन्नाटे में डूब गया। लोग भागे-भागे आए। गुप्ता जी ने चुटकी लेते हुए कहा, “कहा था मिश्रा जी, उम्र के हिसाब से चला करो, अब बैठो दो महीने बिस्तर पर।”

मिश्रा जी का चेहरा पीला पड़ चुका था। वे कुछ बोल नहीं पा रहे थे, बस अपनी जेब की तरफ इशारा कर रहे थे। सबको लगा कि मिश्रा जी को दिल का दौरा पड़ा है या कमर की हड्डी खिसक गई है। तुरंत एम्बुलेंस को फोन घुमाया गया। पूरी सोसायटी जमा हो गई। गुप्ता जी मन ही मन अपनी जीत का जश्न मनाने लगे कि अब कम से कम छह महीने मिश्रा जी पार्क में टहलने नहीं आएंगे।

तभी मिश्रा जी ने बहुत मुश्किल से अपनी जेब से अपना हाथ निकाला। उनके हाथ में एक मुड़ा हुआ कागज़ और बीस रुपये का नोट था। उन्होंने हांफते हुए ट्रेनर रोहन को कागज़ थमाया। रोहन ने कागज़ खोलकर पढ़ा, उसमें लिखा था, “ट्रेडमिल के नीचे मेरा तीन साल पुराना छुपाया हुआ बीस का नोट गिर गया था, वही उठाने के चक्कर में पैर फिसल गया। एम्बुलेंस रद्द करो, मुझे सिर्फ एक कड़क चाय पिलाओ।”

सारे लोग हैरान होकर एक-दूसरे का मुंह देखने लगे। गुप्ता जी का मुंह खुला का खुला रह गया। मिश्रा जी तुरंत खड़े हुए, अपनी टी-शर्ट सीधी की और मुस्कुराकर बोले, “सेहत तो बनती रहेगी, लेकिन अपने खून-पसीने की कमाई का बीस रुपया गंवाना हमारी डिक्शनरी में नहीं लिखा।”

पूरे जिम में ठहाके गूंज उठे और सबने मिश्रा जी की इस बेमिसाल फुर्ती और कंजूसी के मेल पर ज़ोरदार तालियां बजाईं।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०८० ⇒ वचन, एकवचन बहुवचन ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका व्यंग्य- “वचन, एकवचन बहुवचन…“।)

?अभी अभी # १०८० ⇒ व्यंग्य – वचन, एकवचन बहुवचन ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

वचन तो वचन होता है, जब किसी को दिया तब वह वचन होता है, किसी महापुरुष ने दिया हुआ वचन भी वचन ही होता है लेकिन यही वचन जब किसी महात्मा के मुख से प्रकट होता है, तो यह प्रवचन हो जाता है। हिंदी व्याकरण में यही एकवचन, बहुवचन भी हो जाता है।

जिस घर में सास और अकेली बहू होती हैं, वहां भी अक्सर प्रवचन तो सास का ही होता है और बहू वचनबद्ध होती है लेकिन जब बहुओं का बहुमत हो जाता है और सास अकेली पड़ जाती है तब बहुओं के वचन सास के प्रवचन पर भारी पड़ जाते हैं।।

हिंदी और अंग्रेजी व्याकरण में काल और वचन को लेकर बड़ी समानता है। हमारी तरह उनके भी तीन ही काल होते हैं। हमारा भूत, उनका past है और हमारा वर्तमान उनका present. जो हमारा भविष्य है, वही उनका future है। वे भी हमारी तरह ही एकवचन यानी singular number और बहुवचन यानी plural number में विश्वास करते हैं। जब कि हमारी देव भाषा संस्कृत का व्याकरण थोड़ा अलग और उन्नत है।

संस्कृत में दो नहीं तीन वचन होते हैं। रामायण के महाराज दशरथ के तीन वचन अलग हैं। यहां संस्कृत में एकवचन और बहुवचन के साथ द्वि वचन भी है। राम: रामौ रामा: प्रथमा।।

जीवन व्याकरण नहीं। व्याकरण दोष भाषा की विकृति है और व्यक्ति दोष चरित्र की विकृति। जब आज का इंसान अपने वचन के प्रति ही सजग और ईमानदार नहीं तो एकवचन और बहुवचन के प्रति कैसे रह सकता है।

हम अपनी आजकल की भाषा में अंग्रेजी शब्दों का धड़ल्ले से प्रयोग कर रहे हैं। कैसे कैसे एकवचन, बहुवचन हो जाते हैं, हमें कुछ भान ही नहीं रहता। लगता है, सरलीकरण से हम सिम्प्लीकरण के रास्ते पर चल निकले हैं। लेबरों की समस्या कोई नई नहीं। रेलवे स्टेशनों की भीड़ का हमारे पास कोई विकल्प नहीं। कारों, ट्रकों और टू व्हीलरों ने ट्रैफिक को जाम कर रखा है।।

मोबाइलों और कंप्यूटरों की दुनिया ने इंसान से उसकी असली जिंदगी छीन ली है। टाकीजों की फिल्में लोग आजकल टेलीविजनों में देखने लगे हैं। लेडिसों और जेंट्सों का पहनावा भी एक जैसा ही होने लगा है। लव मैरिजों की तो जैसे बाढ़ ही लगी हुई है।

वचन तो वचन, कैसे कैसे बहुवचन ! जब से डिजिटलीकरण हुआ है, बैंकों के कस्टमरों में कमी हुई है, पैसों का लेनदेन एटीएमों और पेटीएमों से ही होने लग गया है। महंगाई की मार के कारण लोग मल्टीस्टोरियों में टू BHK और वन BHK के फ्लैटों में रहने लगे हैं। सरकारी स्कूलों के होते हुए महंगे कॉन्वेंट स्कूलों की ओर भाग रहे हैं। जॉब्स का पता नहीं, कॉलेजों में भीड़ बढ़ती जा रही है। बस एक वचन अच्छे दिनों का, सभी टेंशनों को दूर कर देता है।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ शेष कुशल # ६६ ☆ व्यंग्य – “प्रदर्शनकारियों का मक्का : जंतर-मंतर…” ☆ श्री शांतिलाल जैन ☆

श्री शांतिलाल जैन

(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो  दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक  ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी के  स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल  में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य  “प्रदर्शनकारियों का मक्का : जंतर-मंतर…” ।)

☆ शेष कुशल # ६६ ☆

☆ व्यंग्य – “प्रदर्शनकारियों का मक्का : जंतर-मंतर…” – शांतिलाल जैन ☆

आईए श्रीमान्, ये जो आप देख रहे हैं, आज़ाद भारत में इसे प्रदर्शन करने की सबसे मुफ़ीद जगह माना जाता हैं. प्रदर्शनकारियों का मक्का : दिल्ली का जंतर-मंतर. समझ लें कि ये चित्रकार के सपनों की ‘जहाँगीर आर्ट गैलेरी’ है जहाँ वह जीवन में कम से कम एकबार अवश्य नुमाइश लगाना चाहता है. किए होंगे आपने जिंदगीभर प्रदर्शन हर जगह, मगर जंतर-मंतर पर नहीं किया तो आपकी प्रोटेस्टर-लाइफ फ़िज़ूल है. जंतर-मंतर देश में पाँच जगह पर हैं, बट डेल्ही इज डिफरेंट. बाकी जगह जंतर-मंतर हैं मगर प्रोटेस्टर्स नहीं हैं. जहाँ प्रोटेस्टर्स हैं वहाँ जंतर-मंतर नहीं हैं. दिल्ली में जंतर-मंतर भी हैं, प्रोटेस्टर्स भी हैं, कवर करनेवाला मेनस्ट्रीम मीडिया भी है और दोगला निज़ाम भी. वह दिन के उजाले में प्रदर्शन की अनुमति देता है, रात के अँधेरे में तम्बू उखाड़ फैंकता है. दिन में लोकतंत्र मज़बूत होता है. लोकतंत्र मज़बूत करने का काम देश में अगले दिन भी बचा रहे इसलिए रात में इसे फिर से कमज़ोर कर देता है.

लोकतंत्र में प्रोटेस्ट्स का होना जितना जरूरी है उसे कुचला जाना उससे भी ज्यादा जरूरी है. प्रोटेस्ट करने से डेमोक्रेसी ऑक्सीजन पाती हैं, कुचल दिए जाने से मज़बूत होती है. इसलिए हर सरकार की पहली जिम्मेदारी होती है कि वो लोकतंत्र को पहले कुछ प्राणवायु पा लेने दे फिर उसे कीलें ठुकी हुई लाठियों से मज़बूत बनाने के लिए दौड़ पड़े. प्रहरी ड्रेस पहन पाए तो ठीक, नहीं पहन पाए तो सादी वर्दीवाले साथ में ले जाकर भी डेमोक्रेसी को ताकत दी सकती है. लोकतंत्र सभ्यता के चरम पर तब पहुँचता है जब कोई ‘ही’ पुलिसवाला किसी ‘शी’ प्रोटेस्टर के निजी अंगों में करंट छोड़नेवाली बेटन पुश करता है. पत्थर कभी पुलिसवालों को लगता है कभी प्रदर्शनकारियों को. और कोई घायल हो न हो लोकतंत्र लहूलुहान अवश्य होता है.

जंतर-मंतर निज़ाम के लिए भी मुफीद जगह है. जब वह लोकतांत्रिक दिखना चाहता है, तब प्रदर्शन की अनुमति देता है. जब अधिक लोकतांत्रिक  दिखना चाहता है तब उसी प्रदर्शन को कुचल देता है. प्रदर्शनकारियों को निज़ाम से डर नहीं लगता, उसके अधिक लोकतांत्रिक हो उठने से लगता है. जंतर-मंतर पर एक सूर्यघड़ी है जो परछाई के झुकाव से बता देती है कि किस प्रोटेस्टर को कब लाठी खिलाना है, कब जूस पिलाना है. इंटेलिजेंस के खगोलशास्त्री सूर्यघड़ी की परछाई देखकर सरकार को बता देते हैं – कौन कब खतरनाक हो सकता है उसे किस दिन, कितने बजकर कितने मिनट्स, कितने सेकंड्स पर जेल में डालने के योग बन रहे हैं.

एक जंतर-मंतर मेरे शहर उज्जैन में भी है. आलसी और सुस्त. मैंने वहाँ लोकतंत्र मज़बूत होते हुए शायद ही कभी देखा हो. इसीलिए हमारे शहर के पुलिसवाले जब जब दिल्ली के जंतर-मंतर पर लोकतंत्र मज़बूत होता हुआ देखते हैं तो मज़बूती के यज्ञ में आहुति देने को मचल मचल उठते हैं. हरबार उनकी मचलन निराशा में बदल जाती है. उनके पास लाठी है मगर चार्ज करने के पॉइंट्स नहीं हैं, पैलेट्स हैं, गन हैं, मगर सब्जेक्ट नहीं है. उनकी अपनी आँख का पानी भले सूख गया हो मगर दूसरों की आँखों से आँसू निकल आए, दागने को गैस के गोले हैं. वाटर केनन है मगर चलाने के मौके नहीं है. किस्मतवाली है दिल्ली की पुलिस, लोकतंत्र मज़बूत करने में योगदान दे पा रही है. उसके पास जंतर-मंतर भी है, प्रोटेस्टर्स भी, झूठ बोल जाने की बेशर्मी  भी है. और लाठी, गन, गोले तो हैं ही. इसी बरस रिटायर होने जा रहे एक पुलिस अंकल ने कहा – ‘लगता है आँसू गैस का गोला छोड़ पाने की हसरत मन में लिए लिए ही रिटायर होना पड़ेगा.’

मैंने कहा – “अन्याय तो शेष मुल्क में भी कम नहीं हैं पुलिस अंकल, मगर क्या है कि आमजन ने अन्याय के साथ जीना सीख लिया है. समझदार लोग विरोध, निजता और मानवाधिकार जैसी बातों पर लेक्चर सुनने ज़रूर जाते हैं, चच्च-चच्च करते हैं, फिर आत्मतुष्ट होकर बैठ जाते हैं. टीवी पर मंजर देखकर उबलते तो हैं लेकिन शहर के जंतर-मंतर पर पहुँचकर लोकतंत्र बचाने उपायों में शरीक नहीं हो पाते.”

बहरहाल, धैर्य रखे जयपुर, बनारस, उज्जैन की पुलिस और लाठी को तेल नियमित रूप से पिलाती रहे, कौन जाने कब उन्हें उनके जंतर-मंतर पर लोकतंत्र मज़बूत करने के असाइनमेंट में लगा दिया जाए.

-x-x-x-

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© शांतिलाल जैन 

बी-8/12, महानंदा नगर, उज्जैन (म.प्र.) – 456010

9425019837 (M)

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ४२६ ☆ व्यंग्य – गुरु गुड़, चेला शक्कर ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४२६ ☆

?  व्यंग्य – गुरु गुड़, चेला शक्कर  ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

कहावत पुरानी है, मगर शिक्षा की आवश्यकता की तरह सदा प्रासंगिक है, गुरु गुड़ रह गया, चेला शक्कर हो गया।

पहले गुरु के चरण छूकर ज्ञान मिलता था। अब गुरु के पास पहुंचने से पहले विद्यार्थी उसका सोशल मीडिया प्रोफाइल छानता है। गुरु की योग्यता क्या है, यह बाद की बात है, फॉलोअर कितने हैं,रेटिंग क्या है यह पहले देखा जाता है।

कभी शिक्षक ज्ञान का स्रोत था। आज ज्ञान हर जेब में है,गूगल , ए आई और मोबाइल के रूप में।

आज का परिष्कृत मंत्र है,गूगल , मोबाइल दोनों खड़े काके लागूं पाँव, बलिहारी मोबाइल आपकी जिन गूगल दियो बताये ।

शिक्षक कहता है, “बच्चों, ध्यान से सुनो।” बच्चा मोबाइल खोलकर कहता है, “सर, यह तो गूगल पर कुछ और लिखा है।”इसी से परेशान एक

डाक्टर साहब ने क्लीनिक के बाहर बोर्ड लगवा रखा है, गूगल का ज्ञान और जूते बाहर ही रखें।

गुरु समझाने लगता है, चेला स्क्रीन पर अंगुली घुमाकर समझा देता है।

गुरु ने जीवन भर पढ़कर ज्ञान पाया, चेले ने पाँच मिनट में ज्ञान डाउनलोड कर लिया है।

शिक्षक दिवस पर अचानक गुरु का महत्व बढ़ जाता है। स्कूल में फूल आते हैं, कार्ड आते हैं, भाषण होते हैं। विद्यार्थी कहते हैं, “सर, आप हमारे जीवन के आदर्श हैं।”गुरु भावुक हो जाता है।

अगले ही दिन वही आदर्श , ऑनलाइन शिकायत पोर्टल पर बच्चों के शोषण के रूप में दर्ज किया जाता है।

5 सितम्बर को गुरु भगवान होता है, 6 सितम्बर को ‘फीडबैक’ का विषय बन जाता है।

यूं यदि शिक्षक दिवस की परम्परा नई सरकार के समय शुरू होती तो डा सर्व पल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिन की जगह उसके संदर्भ गुरु वशिष्ठ या गुरु सानदीपनि के समय से जोड़ निकाले जाते ।

हमारे जमाने में सोंटी वाले मास्साब होते थे , अद्धा , पौना का पहाड़ा होता था, अब तो बच्चों की शिक्षा को आसान बनाने के लिए इतने नियम बना दिए गए हैं, कि  शिक्षक को शाला जाने से पहले नियम पढ़ने पड़ते हैं।

कभी शिक्षक पूछता था, “होमवर्क क्यों नहीं किया?”

विद्यार्थी बहाना बनाता था।

आज विद्यार्थी कहता है, “सर, होमवर्क तो एआई ने किया है, बस कोई यह मत पूछिए कि मैंने समझा भी है या नहीं।”

अब कक्षा में गुरु और एआई आमने-सामने हैं। गुरु के पास अनुभव है, एआई के पास उत्तर।

गुरु कहता है, “मैंने तीस साल पढ़ाया है।”

एआई कहता है, “मैंने तीस करोड़ दस्तावेज पढ़े हैं।”

गुरु चुप है।

अनुभव का मुकाबला आँकड़ों से हो जाए तो गुरु भी अपडेट माँगता है।

पहले विद्यार्थी गुरु से पूछता था, “सर, यह कैसे होगा?”

अब गुरु विद्यार्थी से पूछता है, “बेटा, यह ऐप कैसे चलेगा?”

चेला मुस्कुराता है।

गुरु ने शिष्य को ज्ञान दिया था, शिष्य गुरु को पासवर्ड दे रहा  है।

शिक्षा का बाजार भी बदल गया है। कभी स्कूल में फीस देकर पढ़ाई होती थी। अब फीस देखकर लगता है कि बच्चा पढ़ने नहीं, किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी में निवेश करने जा रहा है। विदेशों में हालत ये देखने मिल रही है कि कई माता पिता बच्चे को घर में पढ़ाना पसंद करते हैं। दूसरा बच्चा इसलिए नहीं करते कि पढ़ाई का खर्च कैसे करेंगे।

स्कूल की इमारत चमक रही है, वेबसाइट चमक रही है, यूनिफॉर्म चमक रही है, विज्ञापन चमक रहा है।बस  शिक्षा गुमशुदा  है। परीक्षा , पेपर लीक चर्चा में हैं, वास्तविक ज्ञान , नैतिकता और व्यक्तित्व का विकास , लापता है।

शिक्षा मिशन नहीं व्यवसाय बन गई है। भव्य स्कूल बिल्डिंग , एसी क्लास रूम, सीसी टीवी , लक्जरी बस ने शिक्षा को ऊँचा किया है, इतना कि वह आम लोगों की पहुंच से ऊपर जा रही दिखती है। व्यवस्था ने स्कूल को धंधा बना कर रसीद धारी पूंजीपति को मोटा किया है।

और शिक्षक?

वह आज भी वही है। कक्षा में खड़ा है। हाथ में चॉक हो या स्मार्ट बोर्ड की पेन, चिंता वही है।

बच्चा पढ़ेगा या नहीं?

माता-पिता संतुष्ट होंगे या नहीं?

परिणाम अच्छा आएगा या नहीं?

और सबसे बड़ी चिंता, कहीं किसी ने उसकी कक्षा का वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर तो नहीं डाल दिया?

शिक्षक अब केवल शिक्षक नहीं है। उसे काउंसलर होना है, प्रशासक होना है, तकनीकी विशेषज्ञ होना है, मोटिवेशनल स्पीकर होना है और कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि उसे विद्यार्थी के माता-पिता की अपेक्षाओं का भी होमवर्क करना है।

 5 सितम्बर को मंच पर कहा जाएगा, “शिक्षक राष्ट्र निर्माता है।”

शिक्षक मुस्कुराएगा।

राष्ट्र निर्माण की जिम्मेदारी उसी की है।

इसलिए उसे जनगणना भी करना है, चुनाव भी करवाना है।

शिक्षक दिवस पर फूल दीजिए, भाषण दीजिए, सम्मान दीजिए, स्मृति-चिह्न दीजिए।

मगर सिर्फ एक दिन के लिए नहीं। वर्तमान स्थिति में गुरु गुड़ रह गया है, चेला शक्कर हो गया है।

 ☆

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

लंदन प्रवास पर

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

 

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १२९ – अध्यक्ष पद का समोसा – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – अध्यक्ष पद का समोसा।)  

☆  चुभते तीर # १२९ – व्यंग्य – अध्यक्ष पद का समोसा ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

शांति नगर वेलफेयर एसोसिएशन का चुनाव किसी राष्ट्रीय चुनाव से कम रोमांचक नहीं होता था। इस बार मुकाबला दो दिग्गजों के बीच था, पुराने अध्यक्ष कूपर साहब और मोहल्ले के नए-नवेले बिल्डर भल्ला जी। कूपर साहब का दांव अपनी पुरानी साख और ईमानदारी पर था, जबकि भल्ला जी का मुख्य हथियार था चुनाव की शाम को दी जाने वाली ‘शाही समोसा और जलेबी पार्टी’।

सोसायटी के ऑडिटोरियम में चुनावी बहस का आयोजन किया गया था। पूरा हॉल दो गुटों में बंटा हुआ था। एक तरफ वरिष्ठ नागरिकों की फ़ौज थी जो कूपर साहब के समर्थन में नारे लगा रही थी, तो दूसरी तरफ नौजवानों की टोली थी जो भल्ला जी के मुफ़्त वाई-फ़ाई और जिम के वादों पर फ़िदा थी।

बहस अपने चरम पर थी। भल्ला जी ने माइक हाथ में लिया और बुलंद आवाज़ में कहा, “भाइयों और बहनों, अगर मैं अध्यक्ष बना तो सोसायटी के पार्क में इटालियन मार्बल लगवाऊंगा और स्विमिंग पूल का पानी हर हफ्ते बदला जाएगा!”

भीड़ ने जमकर तालियां बजाईं। कूपर साहब की बारी आई। उन्होंने अपना पुराना चश्मा ठीक किया और धीमी आवाज़ में बोले, “मार्बल और स्विमिंग पूल तो ठीक है, लेकिन पिछले छह महीने से हमारे मेन गेट का ताला टूटा हुआ है और सिक्योरिटी गार्ड को दो महीने से तनख्वाह नहीं मिली है। पहले बुनियादी समस्याएं तो सुलझें।”

माहौल अचानक गंभीर हो गया। तभी भल्ला जी के समर्थकों ने ऑडिटोरियम के पीछे समोसे के पैकेट बांटना शुरू कर दिए। गरमा-गरम समोसे की महक हवा में तैरने लगी और लोगों का ध्यान भाषण से हटकर खाने की प्लेटों पर चला गया। ऐसा लग रहा था कि कूपर साहब की ईमानदारी पर भल्ला जी का समोसा भारी पड़ने वाला था।

वोटिंग की प्रक्रिया शुरू हुई। हर व्यक्ति अपनी पर्ची बक्से में डाल रहा था। कूपर साहब शांति से एक कोने में बैठे चाय पी रहे थे। उन्हें अपनी हार तय लग रही थी। शाम सात बजे मतों की गिनती शुरू हुई।

जब अंतिम नतीजे की घोषणा की गई, तो मंच पर मौजूद मुख्य अतिथि की आंखें भी फटी रह गईं। कूपर साहब को कुल नब्बे प्रतिशत वोट मिले थे, जबकि भल्ला जी को मात्र दस वोट मिले। भल्ला जी हैरान होकर खड़े हो गए और चिल्लाए, “यह बेईमानी है! जब सबने मेरे समोसे खाए, तो वोट कूपर साहब को कैसे दे दिए?”

तभी सोसायटी के सबसे वयोवृद्ध निवासी गुप्ता जी मंच पर आए, उन्होंने माइक संभाला और बोले, “भल्ला जी, आपकी जलेबी और समोसा बहुत स्वादिष्ट था, धन्यवाद! लेकिन हमारे शांति नगर की परंपरा रही है कि हम खाना अमीर प्रत्याशियों का खाते हैं और वोट उस ईमानदार इंसान को देते हैं जो रात को दो बजे भी गेट का ताला ठीक कराने खड़ा हो सके।”

पूरा ऑडिटोरियम तालियों की गड़गड़ाहट और ठहाकों से गूंज उठा। भल्ला जी ने भी हार मानते हुए कूपर साहब को गले लगा लिया और कहा, “अध्यक्ष महोदय, अगली बार समोसे के साथ चटनी भी मेरी तरफ से मुफ़्त रहेगी!”

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

Please share your Post !

Shares

हिंदी साहित्य – व्यंग्य ☆ निरीह जीव की पिटाई… ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

सुश्री इन्दिरा किसलय

☆ व्यंग्य ☆ निरीह जीव की पिटाई… ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

(हाफ लाइनर)

☆

आखिर पीटा भी तो किसे, निरीह जीव कवि को और वो भी कहाँ डबरा में।

खबर पढ़ते ही लतीफा याद आ गया। मकान मालिक ने किराएदार को इसलिए निकाल दिया कि जब वो रात में लिखता है तो उसकी पेन किर्र किर्र करती है। इसलिए मालिक की नींद में खलल पड़ता है।

 लेखक / कवि होना जैसे गुनाह हो गया। माँ बाप की नज़र में नकारा और लोग— लोगों का काम है कहना— जो कुछ नहीं बन सकता वह नेता या तो कवि बन जाता है।

प्रमाण बिखरे पड़े हैं। पुरातत्वविदों को तलब करने की जरूरत नहीं है।

अब कोई दीदे होकर भी न दिखने का ढोंग करे उसका तो परमात्मा भी कुछ नहीं कर सकता।

 एक कविता ही तो सुनाई बेचारे ने। इतनी सी बात पर उसके कपड़े फाड़ डाले। दयनीय दशा में पहुँचाया यहां तक तो ठीक है फिर फोटो भी खींच ली(उसने कब कहा था– खींच्च मेरी फोटो—)

फोटो खींची यहां तक भी ठीक है फिर उसे अखबार में छपवा भी दिया। घोर बेइज्जती।

अखबार की बात समझ में आती है, सोशल मीडिया पर भी डाल दिया। इतना जघन्य अपमान। कवि को चाहिए वह एक करोड़ की मानहानि का दावा करे। इससे कम का तो कतई नहीं। समूची कवि बिरादरी की इज्जत का सवाल है।

या फिर सारे कवि मिलकर इस घनघोर अपमान के विरोध में मीम बनाएं, स्लोगन लिखें, जेन जी की तरह विरोधात्मक नृत्य करें या पैरोडी गाएं।

कुछ न कुछ तो करना पड़ेगा। अत्याचार सहने की भी सीमा होती है।

मारनेवाले जितना मार खानेवाला भी अपराधी है।

काश कवियों को इतनी सी बात समझ में आ जाती।

हर घटना के दो पहलू होते हैं। दूसरा पहलू न पूछिए— जो भी पढ़ रहा है, मंद मंद मुस्कुरा रहा है। इतना आनंद तो शायद ही कभी नसीब हो। इतना बेचैन है देश पर इस दशा में भी गदगदायमान हो रहा है।

ऐसे तो कारण अकारण कई पीटते /पिटते/ पिटवाते हैं। किसी किसी के भाग्य में ही होता है स्वयं दुःख सहकर दूसरों को आनंद प्रदान करना। कवि के सामाजिक सरोकारों पर गौर फरमाने की जरूरत है।

उस कवि पर तरस खाने की बजाय उसके लिये पुरस्कार की व्यवस्था करनी चाहिए। इस नेक काम के लिये चंदा आसानी से मिल जाएगा।

अगर आयोजक चंदा चुराएगा तो भी कितना।

दो सौ करोड़ तो नहीं ना।

ऐसे तो बेवजह बेसबब सत्कार के कारनामे नित्य होते हैं। यहां तो कवि की बेइज्जती का सवाल है। कोई गा के कविता पढ़ता है कोई दहाड़कर। कोई अभिनय के साथ। उसे तो याद भी रखना पड़ता है। इतने कमसिन जीव को कोई टेलीप्राॅम्प्टर तो देगा नहीं। न पुष्पवर्षा करेगा।

चिंघाड़ना कवि का संवैधानिक अधिकार है। इसे चुनौती देना ठीक नहीं।

परिसर में रहनेवालों को नींद नहीं आती। कवि की दहाड़ से नींद उड़ जाती है। हैरानी है जो गहरी नींद में सोये हैं उनपर किसी कवि के गरजने बरसने का असर होने से रहा। होता ही नहीं।

भविष्य में कवि जैसे हानिरहित प्राणी (प्राणधारक) को हानि न पहुँचाई जाए अन्यथा ——-सौ करोड़ याद रखना। ।

☆

©  सुश्री इंदिरा किसलय 

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares