श्री शांतिलाल जैन
(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी के स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य “स्कूली तालीम के निज़ाम पर इतराने के सबब…” ।)
☆ शेष कुशल # ७१ ☆
☆ व्यंग्य – “स्कूली तालीम के निज़ाम पर इतराने के सबब…” – शांतिलाल जैन ☆
एक आदर्श नागरिक से सबसे अधिक उम्मीद यही जा सकती है कि वह गर्व करे, गर्व करता रहे, गर्व करने के अवसर की तलाश में रहे और जब भी उसका आह्वान किया जाए वह गर्व से इस कदर फूल जाए कि शर्ट के बटन टूट जाने को मचल-मचल उठें. इस लेख में हम आपके सामने फ़्रांस में सरकारी स्कूलों की दुर्दशा को लेकर मचे बवाल के बरक्स अपने देश की तस्वीर तरतीब से रखने की कोशिश करेंगे. गरज़ यह श्रीमान् कि आप स्कूली तालीम के निज़ाम पर इतरा सकें और लेख के खतम होते-होते आपकी शर्ट के बटन भी टूट जाने को मचल-मचल उठें.
‘एन इवनिंग इन पेरिस’ वाले देश से खबर है कि विद्यार्थी स्कूलों की जर्जर इमारतों की दीवारों में छेद, छत से पानी टपकने और गर्मी में अत्यधिक गर्म हो जाने वाली कक्षाओं में सुधार के लिए बवाल काट रहे हैं. समस्या की जड़ में है स्कूल की इमारतें, हमारे स्कूलों में वे सामान्यतः नहीं होती. बच्चे दालान में या पेड़ की छाँव में पढ़ लेते हैं. न छत के टपकने की समस्या से रू-ब-रू होना पड़ता है न गर्मी लगने की. बारिश हो जाए तो स्कूल भैंस के तबेले में शिफ्ट हो जाता है. टॉयलेट एक विलासिता है. लड़कियाँ स्कूल आती नहीं, लड़के स्कूल जाते नहीं. मास्टरजी स्कूल से सटे खेत में निवृत्त हो लेते हैं. अब ऐसा भी नहीं है कि हर स्कूल खुले में ही लगता है, कुछ में छत होती भी है जो यथासमय गिरकर शिशु आत्माओं को बैकुंठधाम प्रस्थान करवाने के काम आती है. हमारे यहाँ ब्लैक को अशुभ माना जाता है इसलिए बजट में ब्लैक बोर्ड का प्रॉविजन नहीं किया गया है.
एफिल टॉवर वाले देश में असंतोष का एक बिंदु यह कि प्रति क्लास विद्यार्थी तीस से ज्यादा हो गए हैं. गर्व करें आप कि इत्ते तो आपके देश में क्लास बंक करकेई घूमते रहते हैं. स्कूल खुलने का यह मतलब तो नहीं कि कक्षाएँ सच में लगें हीं, समय-सारणी में लगतीं रहे, इनफ़. पश्चिम के मुक़ाबिल हमारे यहाँ परीक्षाएँ लीक से हटकर होती हैं, आई मीन पर्चे थोड़ा हटकर लीक होते हैं. बरस-दर-बरस विद्यार्थी अगली क्लास में प्रमोट तो होते हैं, लिख-पढ़ नहीं पाते. प्रमोट होने और पढ़े-लिखे होने में आंकड़ा छत्तीस का है. जरूरत भी नहीं. कौनसा सरकारी स्कूल के बच्चों को कलेक्टर बनना है, बेचेंगे तो नून-तेल-मिर्ची ही. हमने हज़ारों बरस पहले संसार को ‘जीरो का ज्ञान’ दिया, गर्व करें आप कि हमारे स्कूल आज भी विद्यार्थियों को ‘जीरो ज्ञान’ देने में मुब्तला हैं.
विकसित देशों में एक गलत अवधारणा व्याप्त है कि टीचर का असली काम पढ़ाना होता है. हमने इसे ध्वस्त किया है. एक आदर्श टीचर को पशु-गणना में निष्णात और मिड-डे मील पकाने में प्रवीण होना चाहिए. टीचर होने का मतलब टीचर होना नहीं होता, संविदा का एक पक्षकार होना होता है, शिक्षा का दिहाड़ी मज़दूर. जिस दिन पढ़ाने के काम पर आओ उस दिन की मजदूरी पाओ. तालीम के मनरेगा का कार्ड-होल्डर. स्थायी टीचर का पे-स्केल पाना भी समय से ‘पे’ पाने की गारंटी नहीं होता. कभी कभी वह महीनों तक न ‘पे’ पाता है न ‘स्केल’.
उधर को बवाल शिक्षकों की कमी पर भी मचा हुआ है. इशू ये कि लंबे समय तक अनुपस्थित रहने वाले शिक्षकों के स्थान पर फ़्रांस की सरकार वैकल्पिक शिक्षक उपलब्ध नहीं करा पाती. अपन के देश में यह समस्या नहीं है. अनुपस्थित हो शिक्षक तो स्कूल की छुट्टी हो जाती है. एक शॉट में बारह क्लास के विद्यार्थी खुश!!!! आख़िर पहली से बारहवीं तक की क्लास को सँभालने के लिए टीचर एक ही जो होता है. शिक्षालय बंद, तो अधिकारी खुश!! मंत्रीजी और भी खुश!!! गर्व कीजिए कि हमारे यहाँ स्कूल खुलवाने के लिए कोई बवाल नहीं काटता.
बहरहाल, जब जब दुनिया में कोई संकट आया है समाधान की राह भारत ने ही दिखाई है. इस बार भी हम ही! हमारी सरकार ने स्कूलों में संसाधनों की कमी से निपटने का आसान सा फ़ॉर्मूला बनाया भी है और सफलतापूर्वक आजमाया भी है. वो समस्याग्रस्त स्कूल को स्थायी तौर पर बंद कर देती है. पिछले दस सालों में एक लाख से ज्यादा स्कूल बंद करके हमने दुनिया को ये करके दिखाया है. अब आप तालीम के निज़ाम पर नाज़ से इतना तो फूलकर कुप्पा हो ही सकते हैं कि आपकी शर्ट के बटन टूट जाने को मचल-मचल उठें.
-x-x-x-
(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)
© शांतिलाल जैन
बी-8/12, महानंदा नगर, उज्जैन (म.प्र.) – 456010
9425019837 (M)
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





