हिंदी साहित्य – कथा कहानी ☆ प्यास… – मराठी लेखिका – उज्ज्वला केळकर ☆ हिन्दी भावानुवाद – जस्मिन शेख ☆

जस्मिन शेख

☆ कथा कहानी ☆ प्यास… – मराठी लेखिका – उज्ज्वला केळकर ☆ हिन्दी भावानुवाद – जस्मिन शेख ☆

उज्ज्वला केळकर

जस्मीन करुना निकेतन क्रेश की सीढ़ियाँ उतरी और उसके पीछे-पीछे क्रेश के सब लोग… गेट तक चले आए।। सुनीता काफी देर से टैक्सी के साथ गेट के बाहर इंतज़ार कर रही थी। हालाँकि, जस्मीन के पैर वहाँ से हटने का नाम नहीं ले रहे थे। उसके कदम मानो थमसे गए थे। क्रेश के लिए यह क्षण ऐतिहासिक महत्व का था। पच्चीस साल पहले क्रेश ने अपनेमें समाए हुए उस छोटीसी बच्ची ने देखते ही देखते एम.बी.बी.एस. की पढ़ाई पूरी की थी। और अब आगे की पढ़ाई के लिए जर्मनी जा रही थी। क्रेश में आज सभी ने उसे अलविदा कह दिया। विदाई और उसकी यात्रा के लिए…… उसकी शिक्षा के लिए….. उसके भावी जीवन के लिए…… जनहित में समर्पित उसके जीवन उद्देश के लिए …. हार्दिक शुभकामनाएँ। इन सभी लोगों की आत्मयता उसके मन पर भारी पड़ रही थी। जैस्मिन को लगने लगा था कि उस भारीपण के नीचे उसका दम घुट रहा है। एक ओर, वह जल्द से जल्द इन सब से बाहर निकलना चाहती थी, लेकिन दूसरी ओर, उसके पैर और मन उन्ही में समा गए थे। उसे यह भी लग रहा था कि जितना ज़्यादा समय वह उनके साथ बिता सके, उतना अच्छा है। वह अपने मन की दुविधा से उलझन में थी। आज सुबह से ही, क्रेश का हर व्यक्ति उससे कुछ कहने के लिए झटपटा रहा था। समय कम था। और बात खत्म ही नही हो रही थी।

‘आज सिस्टर नैंन्सी यहाँ चाहिए थी।’ सिस्टर मारिया मन ही मन सोच रही थी। जैस्मीन को पढ़ाने और उच्च शिक्षा के लिए जर्मनी भेजने का सिस्टर नैंन्सी का सपना था। उन्होने यह बात कई लोगों को कई बार बताया था। वह खुशी से फुली न समाती। उसे और फादर फिलिप को…….

जस्मीन क्रेशने गोद ली हुई पहली बेटी! तब वह साढ़े तीन साल की थी। आज क्रेश परिवार काफ़ी बड़ा हो गया है। अलग-अलग उम्र की तीन साडे तीन सौ लड़कियाँ हैं। कुछ अनाथ बच्चे हैं, कुछ को उनके माता-पिता ने छोड़ दिया है, कुछ को यहाँ इसलिए लाया गया है क्योंकि वे हालात को संभाल नहीं पाईं। कुछ को आपराधिक सुधार गृह से भेजा गया है, कुछ घर से भाग गई हैं। क्रेश ने उन सभी पर अपने ममता की छाँव धरी है। उसने उन्हें जीवन दिया है, उनकी रक्षा की है, उन्हें शिक्षा प्रदान की है, हर एक के शक्ति के अनुसार!

ग्रीन टेम्पल चर्च शहर के एक बेहद ग्रामीण और पिछड़े इलाके में स्थित है। यह चर्च जर्मन मिशन द्वारा समर्थित है। फादर जर्मनसे इस चर्चा के मुख्य बिशप बनकर आए हैं। इस विश्वास के साथ कि गरीबों और ज़रूरतमंदों की सेवा करना प्रभु येशू का कार्य है, इसी विश्वास से उन्होंने अपने आस-पास के लोगों की मदद की। उन्होंने गरीबी से असमय नष्ट हो रही कलियों को जीवनदान दिया। प्रभु यीशु के संदेश को कर्म द्वारा फैलाने के उद्देश्य से उन्होंने चर्च की एक सहयोगी संस्था के रूप में निकेतन की शुरुआत की। फिर सिस्टर मारिया, सिस्टर ज्युथिका जर्मनी से आए। कुछ अन्य स्थानीय ईसाई कलीसियाओं ने भी मदद की।

फादर फिलिप ने क्रेश शुरू करने का फैसला करने के बाद, एक भिखारी दंपति से तीन या चार साल की बच्ची को गोद लिया, जिसे कुष्ठ रोग था। हम उसकी अच्छी देखभाल करेंगे, उसे खूब पढ़ाएंगे, उसका पालन-पोषण करेंगे, उसे जर्मनी भेजेंगे, लेकिन आप उससे बिल्कुल नहीं मिलेंगे, उसको अपना परिचय नहीं देंगे। भिखारी दंपति सहमत हो गए। उन्होंने सोचा होगा कि कम से कम लड़की का जीवन बेहतर होगा। फादरने डॉ. थॉमस से पूरी जांच करने को कहा। लड़की प्रभावित नहीं हुई थी। प्रभु की लीला। उसने अपने हाथों को अपनी छाती पर हाथ से क्रॉस कर लिया। बाद में उसका नमकरण हो गया। सिस्टर नैंन्सीने एक नाम सुझाया। जस्मीन, एक ऐसा फूल जो अपनी उपस्थिति से पूरे वातावरण को सुगंधित कर देता है….. जस्मीन।

जस्मीन…क्रेशने गोद ली हुई पहली लड़की । जस्मीन जो पहले सड़कों पर पली-बढ़ी थी, उस सीमित वातावरण में इतनी घबरा जाती थी कि कोई उसे छूता या कोई अगर वह पास आती भी, तो वह डर से सिकुड जाती, मेमनेकी तरह!।

जस्मीन को अपने जीवन के उन टुकड़ों को इकट्ठा करके अपनी जीवन कहानी गढ़ने का जुनून सवार हो गया था, जो उसने समय-समय पर क्रेशमें दूसरों की बातचीत से इकट्ठा किए थे। दरअसल, उसमें कभी किसी से कुछ पूछने की हिम्मत नहीं हुई। वह बहुत शर्मीली और संकोची थी, लेकिन वह हमेशा सोचती थी कि उसके माता-पिता कौन हैं। फादरने उसे पहली बार कब और कहाँ देखा था? उन्होंने उसे गोद लेने के बारे में कैसे सोचा? अगर उन्होंने यह नहीं सोचा होता, अगर उसके माता पिताने हमें उन्हें देने से इनकार कर दिया होता, तो आज हम कहाँ होते? हमारी ज़िंदगी कैसी होती?

शायद ऊन भिखारी की तरह हमारा शरीरभी सड जाता । शायद नही, यकीनन! हम भी सडा हुआ शरीर लेकर घसीटते हुए जिंगकी काटते रहते। उस स्थिति में हम क्या सोचते? हम सोचते की यही जीवन है, और कुछ नहीं।

हम किसी और की दुहाई देकर जीते या किसी के घृणा के कार बनते।

कई सवाल…… सवालों का एक चक्रव्यूह। हर सवाल उलझाने वाला है। वह अपने मन में जवाब ढूँढ़ने की कोशिश करती रहेगी। वह अपने मन में उस स्थिति में अपना ही रूप देखेगी। उसे हर बार अलग उत्तर मिलेगा।

स्कूल जाते समय, वह सड़क पर भिखारियों को देखती, कोढ़ियों को जो चपटी नाक, टूटी उंगलियाँ, सूजे हुए हाथ-पैर और गंदे कपड़ों के साथ ग्रीन टेम्पल के क्रेश के आसपास घूमते थे। कभी कोई ठेले पर गाड़ी खींचता या बैठकर घूमता हुआ महारोगी। वह उनके प्रत्येक चेहरे को ध्यान से देखती और उनमें अपनी समानता खोजने की कोशिश करती। वह किसकी आँखों को अपनी जैसी समझती? यह किसका रंग है? अपने माता-पिता के बारे में सोचकर उसका पूरा शरीर काँप उठता। उसके शरीर रोमांचित हो जाता था।

स्कूल जाते समय, वह उन्हें देखती हुई धिरे धिरे आगे बढती। जब वह देखती कि वे उस पर ध्यान दे रहे हैं, तो सभी भिखारी शोर मचाते।” बहन, गरीब को दो पैसे दे दो। भगवान तुम्हें अमीर बना देगा। वह तुम्हें खुश कर देगा।” वह हँस पडती। उन्हें पैसे दो और इसीलिए भगवान उन्हें अमीर बना देगा। तो फिर भगवान उन्हें सीधे पैसे क्यों नहीं देते? लेकिन फिर उसके अंतरमन पर हुये प्रभु यीशु के संस्कार उसे याद आते। गरीबों के दुख दूर करो। प्रभु यीशु जीवन भर गरीबों की मदद करते रहे। सिर्फ़ अपने लिए मत जियो। दूसरों के लिए जियो।

उसे फादर फिलिप का मधुर भाषा में दिया गया उपदेश याद आया। फिर उसने मन ही मन सोचा, “इनके फैले हुए हाथों में कुछ पैसे रख दूँ। काश ये मेरे माता-पिता होते, तो चाय की चुस्की लेते। पैसे होते, तो सब्ज़ियाँ लाकर खाते। एक पल के लिए उनके उदास और मेहनती चेहरों पर खुशी की एक चमक आ जाती।

लेकिन उसके पास पैसे नहीं थे। वह क्रेशसे अपनी ज़रूरत की किताबें और कॉपियाँ ले आती। स्कूल में उसे जो पढ़ाई का सामान चाहिए था, वो सभी मिलता, पर पैसे कभी नहीं मिलते। क्रिसमस,इस्टर जैसे मौकों पर क्रेश की तरफ़ से वहाँ जमा भिखारियों को मिठाइयाँ बाँटी जातीं। जैस्मिन उन्हें बाँटने में पहल करती। उसे लगता कि क्रेश में भिखारियोंको भरपेट खाना खिलाना चाहिए। पर वह कुछ नहीं कर सकती थी। रोज़ खाना खाते हुए जस्मिन प्रार्थना करती, “हे प्रभु, जैसे मुझे बढिया खाना मिलता है, वैसे ही मेरे माता-पिता और दूसरे लोग भी मिला दो…..और सभी लोगोंको भी. आमेन…..।”

उसे अपने माता-पिता का ज़िक्र क्यों करना पड़ता है?

कहते हैं कि प्यार और स्नेह संगति से पैदा होता है। बचपन से उसे उनकी संगति नही मिली, फिर भी उसका मन लगातार उनके बारे में क्यों सोचता रहता है? उसकी सोच उनके इर्द-गिर्द क्यों घूमती रहती है? क्या वह नहीं जानती कि इसके पीछे भी कोई ईश्वरी संकेत है? क्रेशमें सभी उसे प्यार करते हैं, लेकिन हम यहाँ अजनबी हैं।…… हम भिखारी हैं।…… उसकी यह जीवनकहानी सुनकर उसके दिल में जो भावना पैदा हुई थी, उसे वह कभी नहीं मिटा पाई।

आज शाम चार बजे क्रेश के मनोरंजन कक्ष में जस्मीनको विदाई देने के लिए एक छोटा सा कार्यक्रम आयोजित किया गया। उसकी पढ़ाई की आदतों, विनम्र और मधुर व्यवहार की खूब प्रशंसा की गई। सिस्टर मारिआने उसकी बहुत प्रशंसा की और कहा कि स्कूल की सभी लड़कियों को उस पर गर्व होना चाहिए। स्कूल की लड़कियों को उसका अनुसरण करना चाहिए। जैस्मिन भी अभिभूत हो गई।

हम कौन हैं? उन्होंने हमारे और हम जैसे कई लोगों के लिए कितना कुछ किया है? उन्होंने हमें अपने पाले में खींचने के लिए इतना कुछ क्यों किया? लोग आलोचना करते हैं। वे कहते हैं कि लोगों को धर्मसे भ्रमित करने के लिएयेसारी साजिश है। लेकिन आलोचक, जो इन्ही को दोष देते हैं, उन्होंने क्या किया है,हम जैसी लड़कियों को आश्रय और सुरक्षा देने के लिए ? उनका आंतरिक उद्देश्य केवल धर्म का प्रसार करना नहीं था। उनके हृदय में शुद्ध मानवता का एक झरना बह रहा था और उन्हें यीशु के दूत के संदेश और शिक्षाओं में अटूट विश्वास था। वह संदेश दूसरों तक पहुँचने अर्थ उन्हें अपने पाले में खिंचना नहीं हो सकता। वे अपनी मातृभूमि से दूर आए और यहीं रहे। उन्होंने यहाँ के लोगों की यथासंभव सेवा की। उन्होंने कहाँ सभी को अपने पाले में खींचा, हम उनके जन्म के ऋणी हैं।

जस्मीन के हृदय में फादर फिलिप और सिस्टर नैंन्सीके लिए कृतज्ञता का एक असीम भाव उमड़ पड़ा। जस्मीन बोलने के लिए उठी, लेकिन आज उसे बोलने के लिए शब्द नहीं मिल रहे थे। उसने बस इतना ही कहा।

इसी क्रेश ने ही मुझे उभारा है, उसके प्रति मेरा भी कुछ कर्तव्य है, लेकिन अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद, मैं यहाँ आऊँगी। इस क्रश में रहकर मैं जनसेवा करुँगी। उसने कुष्ठ रोग पर और अधिक शोध करने की मंशा भी व्यक्त की। उसके मन में फिर से विचारों की लहरें उठीं। वह सपने देखने लगी।

जब हम लौटेंगे, तो हम एक छोटा सा निकेतन, कुष्ठरोगीयोंके लिए एक साफ-सुथरी कॉलोनी और उनके लिए एक आधुनिक अस्पताल बनाएंगे। क्रेश के आसपास कोई ‘लेपर’ नहीं होना चाहिए। कोई भीख न मांगे। सभी को अपनी कॉलोनी में काम करना चाहिए और खाना चाहिए।

प्रभु यीशु, ईश्वर ने हमें अपने दृढ़ संकल्प में दृढ़ रहने की शक्ति दी है।

पर हमें आने में चार या पाँच साल लगेंगे। तब तक यहाँ कौन जीवित रहेगा ? क्या हमारे माता-पिता उनमें से होंगे? क्या हम अपने हाथों से उनकी थोड़ी सी भी सेवा कर पाएंगे?

कोई जस्मीन के बारे में बोल रहा था…,कोई उसकी सहेलियों बारे में..उसके स्कूल के दोस्तों के बारे में बात कर रहा था,…….लेकिन वह कुछ सुन नहीं पा रही थी। सामने हॉल में, एक बड़ा पोस्टर था जिसमें प्रभु यीशु एक महिला को पानी पिला रहे थे। नीचे लिखा था: ‘उन्होने दिये हुए पानी से जो तृप्त होता है, उसे फिर प्यास नहीं लगती।’

उसे फादर फिलिप्स के सर्मन की याद आई। किसी शरमोणी महिला की कहानी। प्रभु ने उस पापी महिला को दर्शन दिया। क्या उसके माता-पिता पापी थे ? तो उन्हें पानी कौन देता? यीशु उस पापी महिला को करीब लाए और उसे जीवन का जल, आध्यात्मिक जल दिया। उसकी प्यास हमेशा के लिए बुझ गई। हम तो प्रभु यीशु द्वारा दिए गए पानी में डूबे रहते हैं।सर से पाँव तक। फादरने हमें इस पानी के करीब लाए, लेकिन फिर भी हम प्यासे थे। हम बहुत प्यासे थे। हम अपने अनदेखे माता-पिता को देखने के लिए प्यासे थे। हमारी आंखें बहुत प्यासी थीं। हमारा गला सूख गया था। हम बहुत प्यासे थे। हमारा जी घबरा गया….इतनी प्यास….

क्रेश सेबाहर आते समय जस्मीन का मन इन सभी विचारों से भर गया।सुनीता उसे बार-बार जल्दी आने के लिए कह रही थी। वह जस्मीन के साथ मुंबई तक जाने वाली थी। जस्मीन टैक्सी के पास पहुँची और जैसे ही बाकी सब गेट के पास खडे रहे। टैक्सीका दरवाज़ा खोलकर अंदर बैठते वक्त उसने सामने फुटपाथ पर जाने-पहचाने भिखारियों को देखा। भिखारी माथे पर अधुरे हाथ रखे राहगीरों से रहम की भीख माँग रहे थे। जस्मीन फिर बाहर आई, टैक्सी का दरवाज़ा बंद किया, भिखारियों के पास गई, पर्ससे कुछ नोट और सिक्के उनकी थाली,कटोरोंमें डाले, और मन ही मन कहा, “मेरे अनजान माता-पिता, मेरे काम में मेरी सफलता के लिए प्रार्थना करो, मुझे आशीर्वाद दो।”

वह टैक्सी में बैठ गई। टैक्सी चल पड़ी। उसने गेट पर खड़े क्रेशके सभी लोगों और सामने फुटपाथ पर बैठे भिखारियों की ओर हाथ हिलाया। बुझ-बुझीसी चार आँखे बेबस होकर जाती हुई टैक्सी की ओर देखती रही।

♥♥♥♥

मूल लेखिका – सौ. उज्ज्वला केळकर

संपर्क – निलगिरी, सी-५ , बिल्डिंग नं २९, ०-३  सेक्टर – ५, सी. बी. डी. –  नवी मुंबई , पिन – ४००६१४ महाराष्ट्र

मो.  836 925 2454, email-id – kelkar1234@gmail.com 

भावानुवाद  – जस्मिन शेख

मिरज. मो 9881584475

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कविता ☆ लोक कथा – लोक देवता ☆ सुश्री मंजिरी “निधि” ☆

सुश्री  मंजिरी “निधि”

(बड़ोदा से सुश्री  मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में  विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल  महिला उद्यमी भी हैं। आज प्रस्तुत है आपकी  लोक कथा – लोक देवता।)

 

? लोक कथा – लोक देवता ☆ सुश्री  मंजिरी “निधि” ? ?

?

राजस्थान के पोकरण में तंवर वंशीय राजपूत राजा अजमल थेl राजा श्री कृष्ण जी के परम भक्त थेl इनका विवाह भाटी राजवंश की मीनल देवी से हुआl विवाह के कई वर्षो तक इन्हें संतान सुख प्राप्त नहीं हुआl भक्त की भक्ति देख कृष्ण जी प्रसन्न हुए और वर मांगने को कहाl राजा ने कृष्ण को अपने पुत्र के रूप में प्राप्त करने की इच्छा रखीl ईश कृपा से राजा को दो पुत्र प्राप्त हुएl वीरमदेव और रामदेव l रामदेव जी का जन्म भाद्रपद की शुक्ल पक्ष की दूज को हुआl इनकी शादी सोढा राजपुतानी नेतलदे से हुआl

रामदेव जी ने समाज से जाती पाती, छुआछूत, सामाजिक कुरुतियों को जहाँ समाज से निष्कासित किया वहीं गरीबों एवं दलितों का उत्थान करने की प्रमुख भूमिका निभाईl यही कारण है कि देश के भिन्न प्रांतों के लोग देवता के रूप में उनकी पूजा करने लगेl मेघवाल समुदाय जो कि राजस्थान और गुजरात में खेती, पशुपालन, कांच के काम की कढ़ाई बुनाई के लिये विशेष रूप से जाने जाते हैं एक अनुसूचित जनजाति है, रामदेव जी ने उनके उद्धार हेतु कई काम कियेl

बाबा रामदेव ने जितना हिन्दु उत्थान हेतु काम किया उतना ही मुस्लिम समाज के उत्थान हेतु भी बहुत काम किये इसलिए इन्हें दोनों ही समुदाय के लोग मानते हैंl भादवा मेला जो कि बाबाजी के जन्मदिन दिवस पर लगता है उसमें दोनों ही समुदाय सम्मिलित होते हैंl ये हिन्दुओं के भगवान और मुस्लिम समुदाय के पीर हैंl

रामसा पीर ने समाज को शान्ति और चैन से जीने की सलाह दीl जहाँ भी आपको पंच रंग का ध्वज दिखे वहाँ आपको रामसा जी का मंदिर देखने को मिलेगाl इनके ध्वज में सफ़ेद रंग – पवित्रता, सादगी और शान्ति लिये, लाल रंग शक्ति, ऊर्जा, साहस और क्रांति लिये, पीला रंग -त्याग सात्विकता, मंगल और आध्यात्मिक शक्ति लिये, नीला रंग- एकता और निष्ठा लिये और हरा रंग -शान्ति, भाईचारा और समृद्धि लिये होता हैl अर्थात ऊंच नीच का अंत और सभी में एक का ही वास हैl

रामसा जी को घोड़े पर बैठा दिखाते हैं क्यूंकि घोड़ा इनकी शक्ति और गति से लोगों तक पहुंचने का प्रतीक हैl

ऐसा कहा जाता है कि रूणिचा में राम सरोवर किनारे भाद्र पक्ष की शुक्ल पक्ष की ग्यारस को इन्होने जीवित समाधि लीl

रणुजा ना राजा, अजमलजी   ना बेटा, वीरामदे ना वीरा,

राणी हेतलना भरथार, म्हारो हेलो सांभड़ो जी

© सुश्री  मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २४७ – लघुकथा- एक और फोन कॉल – ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है  आपकी एक हृदयस्पर्शी कथा “एक और फोन कॉल।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २४७ 

☆ लघुकथा – एक और फोन कॉल ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ 

फोन की घंटी बजती तो पूरे परिवार में सन्नाटा छा जाता। किसी की हिम्मत ही नहीं होती फोन उठाने की। पता नहीं कब, कहाँ से बुरी खबर आ जाए। ऐसे ही एक फोन कॉल ने तन्मय के ना होने की खबर दी थी।  तन्मय कोविड पॉजिटिव होने पर खुद ही गाडी चलाकर गया था अस्पताल में एडमिट होने के लिए। डॉक्टर्स बोल रहे थे कि चिंता की कोई बात नहीं, सब ठीक है। उसके बाद उसे क्या हुआ कुछ समझ में ही नहीं आया।अचानक एक दिन अस्पताल से फोन आया कि तन्मय नहीं रहा।  एक पल में  सब कुछ शून्य में बदल गया। ठहर गई जिंदगी। बच्चों के मासूम चेहरों पर उदासी मानों थम गई।  वह बहुत दिन तक समझ ही नहीं सकी कि जिंदगी  कहाँ से शुरू करे। हर तरह से उस पर ही तो निर्भर थी अब जैसे कटी पतंग। एकदम अकेली महसूस कर रही थी अपने आप को। कभी लगता क्या करना है जीकर ? अपने हाथ में कुछ है ही नहीं तो क्या फायदा इस जीवन का ? तन्मय का यूँ अचानक चले जाना भीतर तक खोखला कर गया उसे।

ऐसी ही एक उदास शाम को फोन की घंटी बज उठी, बेटी ने फोन उठाया।  अनजान आवाज में कोई कह रहा था – ‘बहुत अफसोस हुआ जानकर कि कोविड के कारण आपके मम्मी –पापा दोनों नहीं रहे।  बेटी ! कोई जरूरत हो तो बताना, मैं आपके सामनेवाले फ्लैट में ही रहता हूँ।’

बेटी फोन पर रोती हुई, काँपती आवाज में जोर–जोर से कह रही थी – ‘मेरी मम्मी जिंदा हैं, जिंदा हैं मम्मा। पापा को कोविड हुआ था, मम्मी को कुछ नहीं हुआ है। हमें आपकी कोई जरूरत नहीं है। मैंने कहा ना  मम्मी —‘

और तब से वह जिंदा है।

© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ६२ ☆ कथा-कहानी ☆ सफेद पोश संत… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख  – “सफेद पोश संत“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ६२ ☆

✍ कथा कहानी ☆ सफेद पोश संत… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

वे एक कवि व लेखक। पाठ्य पुस्तकों में उनकी कविताएं व लेख आदि पढ़ाए जाते। सबको बहुत अच्छे लगते थे। परंतु सुरेश उनके लेखन से बहुत प्रभावित था। उनके दर्शन पाने व उनके सानिध्य की बहुत इच्छा थी उसकी। सुरेश चाहता था उनकी तरह लेखक बने, परंतु बारहवीं में उत्तीर्ण न हो पाया। उसकी पढाई रुक गई। उसके भाई भी थोड़े निराश हुए क्योंकि वे उसे डॉक्टर बनाना चाहत रखते थे। इसीलिए फिजिक्स केमिस्ट्री और बायोलॉजी दिलाई थी आर्थिक स्थिति आगे पढ़ने की अनुमति नहीं दे रही थी। बारहवीं में अच्छे् अंक आ जाते तो वजीफा वगैरह का सोचा जाता। इसलिए सोचा गया कि सुरेश नौकरी विशेष कर सरकारी नौकरी पाने के लिए कोशिश करे। उसने टाइपिंग व शार्टहैंड सीखना शुरू कर दिया क्योंकि उन दिनों सरकारी नौकरी के लिए टाइपिंग आना जरूरी था। कुछ महीने बाद उसे एक ट्रस्ट कार्यालय में स्टेनो टाइपिस्ट के पद पर जॉब मिल गया।

सुरेश बहुत परिश्रमी था। जो भी काम दिया जाता वह पूरे मनोयोग से पूरा करता। जिस ट्रस्ट कार्यालय में सुरेश को जॉब मिला था उसका काम ट्रस्ट के संयुक्त सचिव और मैनेजर देखते थे। ट्रस्ट के ट्रस्टी बहुत बड़े बड़े लोग थे और ज्यादातर दिल्ली में रहते थे। ट्रस्ट की वार्षिक बैठक में ही सब आते थे।

ट्रस्ट की वार्षिक बैठक होने वाली थी तो सुरेश का काम बहुत बढ़ गया था। उसी समय उसने ट्रस्टियों की सूची देखी। तब उसे पता चला कि वियोगी जी ट्रस्ट के सचिव थे। वियोगी जी का सुरेश शुरू से ही प्रशंसक था। उसने मैनेजर साहब से अनुरोध किया कि किसी भी तरह उसे वियोगी जी से मिलवा दें। मैनेजर साहब ने कहा कि मुश्किल है फिर भी कोशिश करेंगे। बैठक वाले कक्ष में किसी को जाने की अनुमति नहीं थी। कक्ष में जाते हुए उसने सबको देखा। वियोगी जी सफेद खादी के कुर्ते और धोती में अलग ही दिखते थे। बैठक चलती रही और मैनेजर साहब के साथ एकाउंटेंट, सुरेश व अन्य स्टाफ बाहर खड़े रहे। लंच के बाद सभी ट्रस्टी निकले और गाड़ी में बैठ कर अतिथि गृह चले गए। सुरेश वियोगी जी को प्रणाम भी नहीं कर पाया, इस बात का बहुत अफसोस था।

लेकिन उसका नसीब अच्छा था। वियोगी जी ने अपना एक पत्र टाइप करने के लिए बुलाया था। उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। पर मन में डर भी बना हुआ था कि कहीं टाइप करने में गलती न हो जाए। आखिरकार सुरेश वियोगी जी के कक्ष में गया और चरण स्पर्श किए। उन्होंने हाथ से लिखा पत्र दिया और साथ ही अपना लैटरपैड। पत्र टाइप करके वह वियोगी जी के पास आया तो टाइपिंग देखकर वे काफी खुश हुए और आशीर्वाद दिया। सुरेश ने कमरे से निकलते समय उन्हें पत्र लिखने की अनुमति ले ली। कमरे में उसने एक महिला को भी देखा तो उन्हें भी प्रणाम किया। वह समझा कि उनकी धर्मपत्नी होंगी।

दो तीन महीने बाद सुरेश ने वियोगी जी को पत्र लिखा कि वह कबीर को समझना चाहता है। साथ ही माता जी को भी प्रणाम लिख दिया। वियोगी जी का उत्तर आया कि कबीर साहब को समझने के लिए सत्यरूप परमेश्वर की उपासना करो। साथ ही उन्होंने लिखा कि तुमने माता जी किसके लिए लिखा, मेरे साथ मेरी गोद ली बेटी थी जो मेरी बहू भी है। मैं तो बाल ब्रह्मचारी हूँ। सफेद पोश में संत हूँ। उनके बारे में पूरी जानकारी न होने के कारण सुरेश को अंदर ही अंदर दुख हुआ।

समाचार मिला कि वियोगी जी आने वाले हैं , यह जानकर सुरेश बहुत खुश हो गया। सुरेश से कहा गया कि जब वियोगी जी आ जाएँ तो अतिथि गृह में उनके कमरे में टाइपराइटर लेकर जाए और दिन भर वहीं काम करे। सुरेश ने उनकी दो पुस्तकें टाइप कीं। टाइप करते समय उन पुस्तकों का आनंद भी लेता रहा।

दोनों पुस्तकें टाइप हो गई और सुरेश ने टाइप किए हुए कागज सौंपे तो वियोगी जी ने दस रुपए दिए और कहा जाकर दूध पी लेना। सुरेश ने उनसे विनम्र शब्दों में कहा – “मैं यहाँ नौकरी करता हूँ वेतन लेता हूँ तो आपसे पैसे कैसे ले सकता हूँ”। उन्होंने उसके गाल पर हल्की सी चपत लगाई और कहा -“मेरा कहना नहीं मानोगे। ” सुरेश निरुत्तर हो गया और पैसे रख लिए। इतना प्यार इतने बड़े लेखक कवि से मिलना उसके लिए एक उपलब्धि ही थी।

वियोगी जी दिल्ली चले गए पर सुरेश को अंदर से बदल गए। उसके सोचने का ढंग बदल गया। कविता कहानी लिखने लगा। अपने अंदर इतना बदलाव महसूस करने लगा कि शब्दों में बताया नहीं जा सकता। वह स्वत: स्फूर्त बड़ों को चरण स्पर्श कर अभिवादन करने लगा, जाति की अवधारणा समाप्त हो गई। बड़े बड़े आध्यात्मिक ग्रंथ पढ़ने लगा। साहित्यिक पत्रिकाएँ पढ़ने लगा। यह परिवर्तन उसके जीवन में स्थाई हो गया। जबकि घर और उसके आसपास ऐसा कोई माहौल नहीं था। बुढ़ापे में भी वियोगी जी की छवि अचानक उजागर हो जाती है और सुरेश दनक उठता है। उनकी वह बात कभी नहीं भूलता कि कबीर साहब को समझना है तो सत्यरूप परमेश्वर की उपासना करो।

एक और वजह है। एक वरिष्ठ साथी की बेटी को वनस्थली विद्यापीठ में प्रवेश दिलाना था क्योंकि अंक कुछ कम थे और ट्रस्टी अनुशंसा करें तो प्रवेश मिल सकता था। वियोगी जी ट्रस्टी थे यह सुरेश जानता था पर बिना मिले बहुत वर्ष हो गए थे, पता नहीं उन्हें याद भी होगा या नहीं। वरिष्ठ साथी के बार बार अनुरोध करने पर सुरेश दिल्ली गया और वियोगी जी के निवास पर पहुंच गया। अंदर एक स्लिप पर अपना नाम लिखकर भेजा तो वे अंदर से बोलते हुए आए कि सुरेश मेरा बेटा और अपने सब नाती पोतों को बुला लिया। सुरेश जानता था कि सफेद पोशाक में बाल ब्रह्मचारी संत हैं। एक बार बताया भी था कि उन्होंने एक हरिजन कन्या को गोद लिया और अपने परिवार के युवा से विवाह कराया और अपने पास ही रखा। वे बच्चे उन्हीं की संतान थे। जाति व्यवस्था को समाप्त करने के लिए उनका यह कदम अतुलनीय था। सब देखकर सुरेश की आंखें भर आईं। जब सुरेश ने अपने आने का कारण बताया तो उन्होंने अपना लैटरपैड उसको दे दिया और कहा कि जो चाहो लिख लो मैं हस्ताक्षर कर दूंगा क्योंकि 85 का हो गया हूँ, अब लिख नहीं पाता। ऐसे सुनामधन्य हिंदी साहित्य में अपना विशेष स्थान रखने वाले वियोगी जी को सुरेश आज भी हृदय में संजोए रखता है।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # १११ – बोझिल रिश्ता… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – बोझिल रिश्ता।)

☆ लघुकथा # १११ – बोझिल रिश्ता श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

रोमा और अरुण दोनों एक बड़ी नेशनल कंपनी में नौकरी करते थे। अनिल की मां का देहांत बचपन में ही हो गया था, मौसी ने ही पालपोस के बड़ा किया। पिताजी मर्चेंट नेवी में थे इसलिए अक्सर उन्हें बाहर ही रहना पड़ता था। मौसी ने ही मां पिताजी का प्यार दिया। मौसी बहुत ही धार्मिक एवं कम पढ़ी-लिखी महिला थी। अरुण ने अपनी मरजी से शादी की थी। रोमा भी उसके साथ काम करती थी और दोनों ने साथ में पढ़ाई भी की थी। मौसी के कारण ही दोनों की शादी हुई।वैसे तो मौसी शादी के सख्त खिलाफ थी।

शीशे के सामने बैठकर रोमा इसी विचार में खोई थी कि आज मौसी आ रही है, जाने अब क्या कहेगी?

उसके साथ तो 1 घंटे रहना भी मुश्किल है मैं कैसे रहूंगी?

तभी अचानक घंटी बजती है वह उठकर दरवाजा खोलती है-  “मौसी जी प्रणाम।”

“खुश रहो तुम। रोमा कुछ खाना भी बना कर रखा है पहले एक कप चाय पिला दो।”

“आप खाना खुद बना लेती हो” कमला मौसी ने कहा।

“अनिल को तो मैंने खाना बनाना सिखाया है। अनिल बनाता है या नौकर। तुम तो कुछ नहीं करती होगी?”

“मौसी जी आप मेरे हाथ की चाय पीजिए” रोमा ने कहा।

“चाय पीकर तुम दोनों तैयार हो जाओ आज तुम्हें एक शादी के कार्यक्रम में लेकर चलती हूं देखो हमारे यहां शादियां कैसी होती हैं?”

“मौसी जी जब आपको खाना नहीं खाना था तो हमसे क्यों खाना बनवा कर रखा” रोमा ने कहा।

“तो क्या हो गया” कमला मौसी ने कहा।

“यहां पर मैं अपनी सहेली के पोते की शादी में आई हूं तुम दोनों भी वहां चलो।”

रोमा ने कहा “मौसी मैं तो चलूंगी लेकिन क्या करूंगी वहां जाकर?”

कमला मौसी ने कहा “तू ठीक कह रही है अनिल मेरे साथ चलेगा तेरे बच्चे नहीं है इसलिए जाना अच्छा नहीं लगेगा।”

“मौसी यह कैसी बात कर रही हो” अनिल ने कहा।

“मैं कौन सा गलत बात कह रही हूं” कमला ने कहा “7 साल हो गए हैं कोई बच्चे नहीं है तुम्हारे।”

“तू ही यह रिश्ता ढो रहा है यदि मेरी सगी बहन होती तो उसकी बात तो मानता ना।”

रोमा की आंखों से आंसू निकलने लग गए और वह अंदर चली गई।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६२ – अक्षय मिलन ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “अक्षय मिलन”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६२ ☆

🌻लघु कथा🌻अक्षय मिलन🛕

मोहनी मंदिर की सीढ़ियाँ चढ़ते चली जा रही थी। हाथों में पूजन की थाली, जिसमें गुड़ चना, सत्तू, मेवा, मौसमी फल पूजन का सामान।

मन में वही दृढ विश्वास मेरा अक्षय मिलन अटूट अमर है। सुंदर सादगी से भरा परिधान परन्तु चेहरे पर अब मासूमियत की जगह बेबसी ने ले लिया है। आँखे आज निहार रही है—सुना था अक्षय तृतीया को जो दान पुण्य किया जाता है वह अमर हो जाता है। मोहनी ने तो अपने अक्षय का ही दान कर दिया था।

जानती थी वह अक्षय के बिना नही रह पायेगी। परन्तु अक्षय किसी और का है ये वह कैसे निभा कर जी सकती थी।

नमः पार्वती पतये हर – हर महादेव के उच्चारण से निर्मल जल की धार अर्पण कर रही थी।

लाल चुनरी उसके सिर पर पीछे से सिर ढकते गिरा – – –

अक्षय सुहाग वर शुभ वर पीछे पलट कर देखी कोई और नही अक्षय ही तो थे। जल का लोटा पति चरणों पर अर्पित कर अक्षय मिलन का आनंद लेने लगी।

किसी ने ऊपर लगे घंटे को लगातार बजा कर अक्षय तृतीया की बधाइयाँ दी।

विवाह वर्षगांठ की हार्दिक बधाई से मंदिर परिसर गूँज उठा।।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# १०३ – मौत की फकीरी… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– मौत की फकीरी…” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # १०३ — मौत की फकीरी — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

गरीब और धनवान धरती पर जीवन से बने रहे। धनवान ने खूब पाया और गरीब ने खूब खोया। गरीब कपड़े के लिए तरसता था और धनवान कपड़ों में बादशाह था। पर दोनों दो गज के कफन में लिपट कर भगवान के घर जाते। जाने में गरीब अपने दायरे से होताऔर धनवान इस तरह से होता दो गज से अधिक कफन में जाने की व्यवस्था हो तो वह जाने का रास्ता भूल जाता।

 © श्री रामदेव धुरंधर

14 — 04 — 2024

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिंदी साहित्य – लघुकथा ☆ आभासी… ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

सुश्री इन्दिरा किसलय

☆ लघुकथा ☆ आभासी… ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

राजेशजी मन ही मन बुदबुदा रहे थे–कयामत की धूप है पर जाना तो पड़ेगा। श्रद्धांजलि अर्पित करनी होगी। मन, हां कहे या ना कहे, समाज के कायदे कानून निभाने ही पड़ते हैं। उन्होंने  अल्मारी खोली और एक सफेद पुराना सा कुर्ता पाजामा निकाला। अवसर के अनुकूल परिधान पहनने ही पड़ते हैं। पड़ोसी चन्द्रप्रकाश को फोन किया साथ चलने के लिये। रमन इन दोनों का अच्छा मित्र है। लेखक होने के साथ समाज सेवक भी है।

वे रास्ते में बात करते हुये जा रहे थे। यार राजेश — रमन के पिता की उम्र 90 वर्ष थी ना। पकी उम्र में गये।

–मुझे एक बात समझ में नहीं आती लोग सबसे पहले मरनेवाले की उम्र क्यों पूछते हैं। नब्बे से ऊपर सुनते ही ऐसी मुद्रा बनाते हैं मानों मृतक बेचारा धरती पर रहकर गुनाह कर रहा था। अच्छा हुआ चला गया। ज्यादा जीकर भी क्या करता।

—-राजेश ऐसे सवालों के गणित में उत्तर नहीं दिये जा सकते। मरनेवाला कोई बेहद अपना हो तब भी क्या उनका यही जवाब होगा।

बातों बातों में उन्होंने चार किलोमीटर की दूरी कब तै कर ली पता भी नहीं चला। देखा तो श्मशान घाट सामने था।

रमन के पिता का शव रखा था फूल-मालाओं से सजा हुआ।

कुछ रिश्तेदार और आठ दस पत्रकार /समाज सेवक/ राजनीतिक कार्यकर्ता /लेखक प्रजाति के लोग।

शोक सभा में विलंब था। सब आपस में बतियाने लगे। किसी ने अपने सद्यः प्रकाशित नाटक संग्रह की खासियत बताई। दूसरा कुछ लोगों के कड़क इस्त्रीदार कपड़ों पर टिप्पणी कर रहा था। तीसरा जाति धर्म को लेकर अंत्यविधियों का अंतर बता रहा था। सारे कसमसा रहे थे कि कब कब श्रद्धांजलि सभा खत्म हो और पिंड छूटे।

इतने में नुक्कड़ वाले नेताजी भी आ गये जिनकी प्रतीक्षा हो रही थी।

फोटोग्राफर और माइक का इंतजाम हो चुका था। सभी को फिक्र थी कि कल के अखबार में वे प्रमुखता से नज़र आयें। वर्ना इतनी मशक्कत करके जानलेवा धूप में इतनी दूर आने का क्या फायदा।

वैसे भी दो मिनट खामोश रहकर शोक व्यक्त करना किसी हर्क्युलियन टास्क से कम नहीं लगता।

नेताजी ने बोलना शुरू किया। इतने में एक शव यात्रा श्मशान में प्रकट हुई। बैंड-बाजे के साथ। बैंड-बाजे शोख धुनें बजा रहे थे जैसे किसी शादी में बजाते हैं।

राजेश जी सकपका गये। वे समझ नहीं पाये आखिर माजरा क्या है !

चन्द्रप्रकाश का कहना था – यह मृतक की अंतिम इच्छा रही होगी। या फिर ओशो का अनुगामी रहा होगा।

उधर नेताजी परेशान निगलते बने न उगलते। बैंड बाजे की उग्र तेजतर धुनों के बीच लोगों तक उनकी आवाज नहीं पहुँच पा रही थी। एक तो शोकाकुल चेहरा बनाओ दूसरे सबसे महत्वपूर्ण उनके श्रीवचन अनसुने रह जाने की टीस।

खैर। राजेशजी, रमन से मिले और श्मशान के बाहर निकलते ही चन्द्रप्रकाश से बोले–एक बात का जवाब दोगे ?

–बोलो

— रमन ने पिताजी की मृत्यु की सूचना दी तो fb. पर 400 लोगों ने श्रद्धा सुमन अर्पित किये और श्मशान में केवल आठ ?

–बस इतना जान लो, अब रिश्ते भी आभासी हो गये हैं।

©  सुश्री इंदिरा किसलय 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “चाय पानी” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “चाय पानी” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

-सर…

-कहो। क्या बात है?

-सर, वो अधिकारी हरिजन छात्रवृत्ति पास करने के प्रति छात्र पैसे मांग रहा है।

-कोई जरूरत नहीं इसकी।

-फिर बिल पास नहीं होगा, सर !

-न हो। बोलो जो आब्जेक्शन‌ लगाना हो लगा दो !

वह मेरा संदेश लेकर ऑफिस के अंदर‌ चला गया ! कुछ पल बाद वापस आया।

-सर, वे कहते हैं कि चलो, प्रति छात्र न सही लेकिन एक अच्छी चाय पानी लायक पैसे तो दे दो !

-बोलो! जल्द प्रबंध करके बताते हैं !

वह संदेश दे आया, तब मैंने उसे अपनी बाइक के पीछे बिठाया और जान पहचान वाले मित्र अधिकारी के पास पहुंच गया !

अधिकारी ने स्वागत् किया और चाय पानी पूछा तो मैंने कहा कि चाय पानी तो पीयेंगे लेकिन पहले अपने राजस्व अधिकारी को भी बुला लीजिये।

-क्यों?

-क्योंकि उन्होंने मुझसे चाय पानी की फरमाइश की है। सोचा, जब आप, पिलायेंगे तब उन्हें भी पिला दूंगा ! मेरे पास इतने पैसे कहां कि हरिजन छात्रों के पैसे काट कर अधिकारी को चाय पिला सकूं?

वे मित्र अधिकारी बहुत हंसे और सारा माजरा समझ गये। तुरंत उस राजस्व अधिकारी को फोन कर बुला लिया !

वह मुझे तो पहचानता नहीं था लेकिन क्लर्क को देखकर कुछ चौंका !

-हां भई, ये प्रिंसिपल महोदय चाय पानी पिलाने मेरे पास आ गये हैं ! बोलो चाय मंगवा लूं?

राजस्व अधिकारी हाथ जोड़कर खड़ा हो गया- नहीं सर! बिना चाय के ही ठीक है!

-फिर इनको ऑफिस जाकर चाय पानी पिलाओ और इनके बिल पास कर दे दो।

उस अधिकारी को काटो तो खून नहीं! सिर झुकाये बाहर निकल गये!

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – लघुकथा ☆ “अभिनय का देवता” ☆ श्री घनश्याम अग्रवाल ☆

श्री घनश्याम अग्रवाल

☆ लघुकथा – “अभिनय का देवता” ☆ श्री घनश्याम अग्रवाल

(महान अभिनेता बलराज साहनी के स्मरण दिवस पर प्रणाम स्वरुप यह लघुकथा)

बलराज साहनी  यह लोक छोड़कर देवलोक चले गये। वहाँ नारदमुनी इन्द्र को बता  रहे थे कि आज पृथ्वी लोक से एक बहुत बड़ा अभिनेता आया  है। आप उसे अपने अभिनय विभाग में अभिनय का देवता  बना ले ।”

” हे नारद, हमारे यहाँ तो बड़े-बडे कलाकार रोज ही आते रहते हैं। हमारे विभाग में एक से बढ़कर एक अभिनय सम्भ्राट हैं। यूँ  हर किसी को अभिनय का देवता बनाते रहे तो हो लिया…, फिर भी तुम्हारी बात पर कल हम उसकी परीक्षा लेगे।” कहकर इन्द्र ने अपने अभिनय विभाग के सभी देवताओं को बुलाया और उन्हें बलराज साहनी के सभी फिल्मों की सीडी देते हुए कहा-” तुम इनमें से अपना-अपना किरदार चुन लो। तुम्हें इससे बढ़कर अभिनय करना  है। निर्णायक के लिए बी आर चोपड़ा और  बिमल राय  को बुलाया है। देखो, ये देवताओं की इज्जत का सवाल है। तुम्हें  बलराज साहनी के किरदारों को उससे बढ़कर करके दिखाना है। अब जाओ, और तैयारी में लग जाओ। ” सारे देवता सीडी लेकर चले गए।

दूसरे दिन परीक्षा शुरू हुई। देवताओं ने उनके किरदारों का इतना हूबहू अभिनय किया कि बिमल राय और बी आर चोपडा दोनों “O.K.-O.K  वाह-वाह ” कहते रहे। बस अब एक-दो किरदार ही बचे थे। इन्द्र ने गर्व से नारद की ओर देखते कहा- ” देखा नारद, मेरे देवताओं का कमाल! हमने बहुत देखे ऐसे बलराज – वलराज साहनी को। अब तो परीक्षा भी पूरी  होने को है। “

” पूरी होने को है, पर पूरी  हुई नहीं ” नारद के इतना कहते ही दो देवता सिर झुकाये आये और बोले-” क्षमा  करें देवराज । हम हार गये।

“दो बीघा जमीन ” के शम्भू महतो व काबुलीवाला का रोल कोई देवता करने को तैयार नहीं । तीनों लोक हो आये।

सभी कहते हैं कि ये रोल बलराज साहनी के सिवा इसे कोई  नहीं  कर सकता। हमें क्षमा करे देवराज ।”

इन्द्र  फिर झुकाये  सोचते रहे। तब नारद ने हँसते हुए कहा-” क्या सोच रहै हो इन्द्र ? कहीँ  ऐसा न हो कि ये दो बीघा जमीन व काबुलीवाला के रोल की ताकत लेकर यदि इसने तुम्हारा यानी इन्द्र का रोल कर लिया तो, ब्रम्हा-विष्णु-महेश तीनों इसे ही असली  इन्द्र मानकर इसे तुम्हारा इन्द्रासन सौंप दे। और तुम पर दफा चार सौ..बीस , नहीं -नहीं,श्रीचारसो…बीस लगा दे। “

” नहीं-नहीं । गर ऐसा हुआ तो मैं …., हे देवर्षी हे महर्षी, हे महामुनि अब आप ही कोई रास्ता निकालिये। हाथ जोड़ते हुए  इन्द्र ने कहा।

” ना..रायण-ना..रायण “। नारदजी ने  शरद जोशी की तरह व्यंग्य से मुस्कुराते हुए इन्द्र की ओर देखा। जो कुछ देर पहले तक नारद-नारद बोलता था, जब बोलती बंद हुई तो देवर्षी-महर्षी- महामुनि बोलने लगा। इसे कहते हैं- ” वक्त पड़ा बाँका तो….,हँसते हुए नारदजी  बोले-“

हम तो पहले ही कह रहे वे, इसे अभिनय का देवता बना ले । इससे तुम्हारा देवलोक और भी समृध्द होगा। दिलीप कुमार से भी तो  बात करने वाला कोई तो देवलोक में  होना चाहिए  न। ना..रायण-ना..रायण।”

” आप ठीक कहते हैं  ऋषिराज। ” हाथ जोड़ते हुए इन्द्र बोले।

दोनों  बलराज साहनी के पास आकर कहते हैं-”

हे अभिनय के देवता, देवलोक में आपका स्वागत  है। आइये- पधारिये “

***

© श्री घनश्याम अग्रवाल

(हास्य-व्यंग्य कवि)

मो 94228 60199

 संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares