(प्रख्यात कवि, नाटककर, शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता श्री मंजीत सिंह जी, ‘ख़ान मंजीत भावड़िया “मजीद”’ के नाम से प्रसिद्ध हैं। वर्तमान में वे पंजाबी यूनिवर्सिटी, पटियाला से भाषा विज्ञान में पी एच डी कर रहे हैं और कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में सहायक प्राध्यापक के रूप में कार्यरत हैं और उर्दू भाषा के संरक्षण व प्रचार प्रसार के प्रति समर्पित हैं। उनकी प्रमुख साहित्यिक कृतियों में “हरियाणवी झलक” (काव्य संग्रह) और “बिराणमाट्टी” (नाटक), रम्ज़ ए उर्दू, हकीकत, सच चुभै सै शामिल हैं, जो हरियाणा की संस्कृति और सामाजिक जीवन की झलक प्रस्तुत करती हैं। उनके साहित्यिक कार्यों को हरियाणा साहित्य अकादमी, हरियाणा उर्दू अकादमी, वैदिक प्रकाशन और अन्य प्रतिष्ठित संस्थानों द्वारा सम्मानित किया गया है। साहित्य और शिक्षा के साथ-साथ, ख़ान मनजीत अपने पारिवारिक परंपरा से जुड़े हुए एक कुशल कुम्हार (पॉटर) भी हैं।)
आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख “दलित समाज की पीड़ा को व्यक्त करती जयपाल की कविताएं”।
☆ आलेख/पुस्तक चर्चा ☆ दलित समाज की पीड़ा को व्यक्त करती जयपाल की कविताएं ☆ श्री मनजीत सिंह ☆
पुस्तक – बंद दरवाजे ( दलित-चिंतन की कविताएं)
कवि – जयपाल
समीक्षक – मनजीत सिंह
प्रकाशन – यूनिक पब्लिशर्स, कुरुक्षेत्र
क़ीमत –150/- पेपर बैक
पिछले दिनों हरियाणा के चर्चित कवि जयपाल जी द्वारा लिखित काव्य पुस्तक-‘बन्द दरवाज़ें’–पढ़ने का अवसर मिला । इस पुस्तक में दलित चिंतन की कविताएं हैं। दलित चिंतक/कवि ओमप्रकाश वाल्मीकि और सूरजपाल चौहान को समर्पित “जूठी पत्तल’ की पंक्तियों में भूख का यथार्थ देखिए–
जूठी-पत्तल
हम तो बस टूट पड़ते थे
मिली-जुली सतरंगी मिठाइयों पर
घुली-मिली दाल-सब्जियों पर
कटे-फटे फल-फ्रूटों पर
कभी कभार ही मिलते थे हमें ये छत्तीस व्यंजन
माँ बहुत खुश होती थी
कभी-कभी दुःखी भी होती थी
दलित साहित्य के बारे में अलग-अलग लेखक अलग-अलग राय रखते हैं। हर लेखक ने अपनी हर रचना में बदलाव और विकास को अलग-अलग तरीके से दिखाया है। कुछ दलित लेखक ऐसे भी हैं जो देवी-देवताओं को मज़ाक के साथ नकारते हैं । कुछ लेखक ऐसे हैं जो आम लोगों की लोक संस्कृति को एक नई ज़िंदगी देने वाली दुनिया के तौर पर देखते हैं। कुछ दलित लेखक ऐसे हैं जो मिथकों और कहानियों को समुदाय की क्रिएटिविटी से बने रूपक मानते हैं ,उन्हें पूरी ज़िम्मेदारी और संवेदनशीलता के साथ देखते हैं। कुछ दलित लेखक ऐसे हैं जो मार्क्सवाद को बहुत नफ़रत से देखते हैं, और कुछ दलित ऐसे हैं जिन्हें इस बात का अफ़सोस है कि मार्क्सवादी अभी तक हमारी मदद के लिए क्यों नहीं आए l कुछ सोचते हैं कि मार्क्सवाद ही एकमात्र रास्ता है जो जात-पात को सही अर्थों में समाप्त कर सकता है और गैर-बराबरी मिटा सकता है lसभी लेखकों की अलग-अलग सोच है लेकिन सारे लेखकों में कहीं न कहीं एक जगह जाकर समानता देखने को मिलती है कि जाति पर आधारित अमानवीय भेदभाव और जाति समाप्त होनी चाहिए।
श्री जयपाल
‘उसका गांव’ कविता आज के सन्दर्भ में पूर्णतया सटीक बैठती है… उदाहरणार्थ यदि मैं गांव जाता हूं तो सबसे पहले मेरा नाम पूछा जाता है फिर मोहल्ला , पाना,ठोला,ठिकाना, बाप,दादा आदि ताकि जाति का पता चल जाए। शहर में भी यही हाल है, केवल मकान नं की पहचान काफी नहीं है जाति तो शहर में भी देखी जाती है । कुछ पंक्तियां आप भी देखिये–
वे जाति नहीं पूछते
आज कल कोई किसी से जाति नहीं पूछता
जाति मिट सी गई है मानो
जैसे पढ़ लिख से गए हैं सब
इसीलिए जाति नहीं पूछते
हालांकि बाकी सब अते-पते,
आग्गा- पिच्छा गली-मौहल्ला
वे अच्छी तरह पूछ लेते हैं
बार-बार पूछते हैं
पूछते ही रहते हैं कुछ न कुछ
जब तक पानी पूरी तरह साफ ना हो जाए
और पता ना लग जाए
कौन कितने पानी में हैं!
‘हम क्या करते रहे’ कविता में कवि ने दलित वर्ग से प्रश्न पूछे हैं कि वे क्या करते रहे ? जयपाल जी सीधे तौर पर कविता के माध्यम से अनेक सवाल कर रहे हैं–
वे गा रहे थे
हम नाच रहे थे
वो बोल रहे थे
तो हम सुन रहे थे
सदियां गुज़र गई
कुछ इसी तरह
पता ही नहीं चला
वे क्या कहते रहे
हम क्या करते रहे
दलितों-पिछड़ों और वंचित समाज ने कभी नहीं सोचा आखिरकार वे कर क्या रहे थे! अर्थात केवल अनुसरण कर रहे थे ! आदेश मान रहे थे!!
‘दलित बस्ती’ कविता एक बेहतरीन कविता है जिसमें दलित बस्ती स्वयं अपने बारे में कहती है कि मेरे पास तो न तो ढंग से सूर्य पहुंचा है न ही ढंग से कोई कवि । ‘आशा’ नामक कविता में दलित-स्त्री कहती है कि बीता हुआ कल मेरा कभी नहीं हुआ और जो चल रहा है वह किसी और का है और भविष्य पहले ही तय हो चुका है।
दलित स्त्री का दुःख कवि के शब्दों में—
मैं तोड़ देना चाहती हूँ वे पैर
जो दलकर मुझे दलित बनाते हैं
दफ़न कर देना चाहती हूँ उस बचपन को
जो मेरे जख्मों पर नमक छिड़कता है
भूल जाना चाहती हूँ वह जवानी
जो मुझ पर बिजली बन कर गिरी थी
बंद कर देना चाहती हूं वे पवित्र कुएं
जिनमें मेरी लाश तैरती रहती है
पटक देना चाहती हूँ वे व्यवस्थाएं
जो मेरा सिर सबके पैरों में रख देती है
छोड़ देना चाहती हूं वे रास्ते
जो सिर्फ मेरे लिए ही बनाए गए हैं
मोड़ देना चाहती हूं वे हवाएं
जो मेरे सवालों को उड़ा ले जाती हैं
पलट देना चाहती हूं वे सारी परंपराएं
जो मेरे गले में लटका दी गई हैं
इसी तरह ‘मैं किसको क्या कहूं’- कविता में भारतीय गांव में दलित महिला की स्थिति देखिए —
मैं क्या कहूं
उस गांव को
जो सबका है पर मेरा नहीं
उन गांव के कुत्तों को
जो मुझे ही देखकर भौंकते हैं
उन गाय भैंसों को
जिनका गोबर-मूत भी मेरे हाथों से पवित्र है
उस गाय- माता को
जिसके के नाम पर माबलिंचिंग हुई
और मैं विधवा हो गई
क्या कहूँ
उन देवताओं को
जो मुझे हमेशा शाप ही देते हैं
उन पवित्र पुजारियों को
जिनका धर्म मेरी परछाई पर टिका है
उन धार्मिक चरणों को
जिनके नीचे मुझे कुचला ही गया
उस हवेलियों को
जिसके दरवाजे हमेशा बन्द ही रहते हैं
उन महाजनों को
जिनके पास मेरी आत्मा गिरवी है
वर्ण-व्यवस्था को लेकर उपरोक्त कविता कुछ तीखे सवाल उठाती है और बेचैन करती है।
संस्कृत से लिया गया “दलित” शब्द का शाब्दिक अर्थ है “टूटा हुआ,” “कुचला हुआ,” “बिखरा हुआ,” या “उत्पीड़ित,” जो भारत में इन समुदायों द्वारा झेली गई ऐतिहासिक अधीनता, हाशिए पर धकेले जाने और अधिकारों से वंचित किए जाने को दर्शाता है, जिन्हें ऐतिहासिक रूप से “अछूत” माना जाता था और जाति व्यवस्था से बाहर रखा गया था । यह शब्द अब सामाजिक/ राजनीतिक पहचान का प्रतीक बन गया है,जो ज्यादातर कविताओं में झलकता है। इन कविताओं में दलित समाज की पीड़ा को गहरी संवेदनशीलता और प्रतिबद्धता के साथ व्यक्त किया गया है । देश के वर्तमान जातिवादी और साम्प्रदायिक माहौल में ये कविताएं बहुत ही महत्वपूर्ण सवाल उठाती हैं । मनुष्यता को बचाने का आह्वान करती हैं और मानवीय गरिमा को प्रतिष्ठित करती हैं।
आशा है पाठकों को श्री जयपाल जी की पुस्तक बंद दरवाजे की कविताएं दलित समस्या पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित करेंगी ।
श्री मनजीत सिंह
सहायक प्राध्यापक (उर्दू), कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय कुरुक्षेत्र
manjeetbhawaria@gmail.com
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के आभारी हैं जो साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं।
आज प्रस्तुत है डॉ. कमल किशोर दुबे जी द्वारा लिखित “मानव जीवन की सार्थकता…” पर चर्चा।
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# १९४ ☆
☆ “मानव जीवन की सार्थकता…” – लेखक..डॉ. कमल किशोर दुबे☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
☆ जीवन दर्शन, नैतिकता और व्यवहारिक आध्यात्मिकता का समन्वित पाठ – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
यह पुस्तक मूलतः चिंतन प्रधान निबंधों का संकलन है, जिनमें मानव जन्म की दुर्लभता, सही गलत के विवेक, धर्म और नैतिकता, सामाजिक दायित्व, तथा आत्मिक साधना जैसे मुद्दों पर क्रमिक और संतुलित विमर्श प्रस्तुत हुआ है।
जीवन को केवल भोग या उपभोग की प्रक्रिया न मानकर, उसे जिम्मेदार, सजग और मूल्यनिष्ठ आचरण का अवसर मानते हुए ,लेखक उपदेशात्मक होते हुए भी बोझिल नहीं हैं ।
कमल किशोर जी मनुष्य को केवल भौतिक नहीं, बल्कि चेतन सत्ता के रूप में चिन्हित करते हुए कहते हैं कि विवेक, मूल्य-बोध और संवेदना ही वह विशेषता है जो पशु और मनुष्य के बीच की दूरी को तय करती है , यह दूरी केवल वाणी या बुद्धि से नहीं, बल्कि कर्म के स्तर पर दिखाई देनी चाहिए।वे बार‑बार प्रश्न उठाते हैं किहम क्यों जी रहे हैं? हमारे जीवन का लक्ष्य क्या है? क्या हमारा पूरा समय केवल धन संचय, प्रतिष्ठा और प्रतिस्पर्धा में बीत जाना ही पर्याप्त है? या इसके पार भी कुछ है जिसके लिए काम करना चाहिए? इन प्रश्नों के उत्तर ढूंढते हुए लेखक पाठक को तैयार जवाब बताने की बजाय, उसे स्वयं सोचने पर मजबूर करते हैं ।
पुस्तक की रचनाएँ जीवन के विभिन्न आयामों को इस तरह स्पर्श करती हैं कि व्यक्तिगत साधना और सामाजिक सरोकार एक-दूसरे से अलग नहीं, बल्कि परस्पर पूरक दिखते हैं। धार्मिक आडंबर, कर्मकांड और बाह्य दिखावे की आलोचना भी है, तो कहीं आचरण प्रधान धर्म, करुणा, सेवा और ईमानदारी की प्रतिष्ठा की प्रशंसा भी की गई है।लेखक बार‑बार स्पष्ट करते हैं कि यदि धर्म से मनुष्यता, करुणा और न्याय लुप्त हो जाएँ तो वह केवल एक आवरण बचा रह जाता है। लोककथाओं, साधारण गृहस्थ की दिनचर्या और प्रचलित जीवन स्थितियों के माध्यम से वो बताते हैं कि जीवन की सार्थकता किसी विशेष वेशभूषा, स्थान या आश्रम की मोहताज नहीं, बल्कि उसी घर परिवार, नौकरी, बाज़ार और समाज में भी गृहस्थ जीवन के साथ सम्भव है, जहाँ हम प्रतिदिन संघर्षरत हैं।
उदाहरण देते हुए लेखक एक ऐसे व्यक्ति की कल्पना करते हैं जो आर्थिक रूप से समृद्ध, सामाजिक रूप से प्रतिष्ठित और बाहरी रूप से सफल है, परंतु उसके व्यवहार में संवेदना, विनम्रता और सेवा भाव का अभाव है । ऐसे व्यक्ति को वे ‘सफल’ तो कह सकते हैं, किन्तु उसका जीवन‘सार्थक’ नहीं मानते।
इसके विपरीत, सीमित साधनों वाला, लेकिन ईमानदार, सहृदय और दूसरों के लिए उपयोगी व्यक्ति, जो अपनी सुविधा से पहले दूसरों की पीड़ा को महत्व देता है, लेखक के लिए अधिक सार्थक जीवन का उदाहरण है। इस तुलना से पुस्तक का मंतव्य स्पष्ट हो जाता है कि जीवन का मापदंड धन या सत्ता नहीं, बल्कि उपयोगिता, करुणा और नैतिकता हैं।
इसी तरह क्रोध, ईर्ष्या, लोभ और अहंकार की चर्चा करते हुए वे इन्हें किसी दैवी दंड का कारण कहकर भय उत्पन्न नहीं करते, बल्कि दिखाते हैं कि ये भाव हमारे अपने मन की शांति, संबंधों की मधुरता और समाज की समरसता को नष्ट करते हैं । इस प्रकार ‘पाप’ और ‘दंड’ की पारंपरिक भाषा के स्थान पर ‘परिणाम’ और ‘जिम्मेदारी’ की उनकी आधुनिक व्याख्या प्रभावी है।
समीक्षात्मक दृष्टि से देखें तो पुस्तक की सबसे बड़ी शक्ति इसकी सरल, भावपूर्ण और प्रवाही भाषा है, जो कहीं कहीं लोकधर्मी मुहावरे, धर्मग्रंथ के सूत्र और लोककथाओं से समृद्ध है । लेखक का दृष्टिकोण भी संतुलित है, वे एक ओर अंधविश्वास, संकीर्णता और बाह्य धार्मिकता की आलोचना करते हैं, तो दूसरी ओर व्यवहारिक आध्यात्मिकता, आचरण प्रधान धर्म और सामाजिक जिम्मेदारी की अनुशंसा करते हैं । यह संतुलन पुस्तक को व्यवहारिक बनाता है।
संन्यास के बजाय गृहस्थ जीवन के भीतर ही कर्म साधने की बात लेखक करते हैं, गृहस्थ को “रोजमर्रा के संघर्षों के बीच भी आत्मा की आवाज सुनने वाला साधक” मानकर उसके जीवन को गरिमा पूर्ण दिशा देते हैं । आज के भ्रम भरे विचलित समय में पाठक के भीतर इस दृष्टिकोण से सकारात्मक ऊर्जा आती है।
यद्यपि कई जगह नैतिक आग्रह की तीव्रता इतनी बढ़ जाती है कि विशेष रूप से युवा, तर्कप्रधान या संशयात्मक प्रवृत्ति वाले पाठक को भाषा आदर्शवादी लग सकती है।
आधुनिक मनोविज्ञान, समाजशास्त्र या समकालीन शोधों के संदर्भ अपेक्षाकृत कम हैं, यदि लेखक ने इनसे भी कुछ उदाहरण जोड़े होते, तो तर्क की प्रभावशीलता और वैज्ञानिकता और बढ़ सकती थी।
कुछ अध्यायों में भाव प्रवणता के कारण विचारों की पुनरावृत्ति का अनुभव भी होता है।
इन सीमाओं के बावजूद “मानव जीवन की सार्थकता” उन पाठकों के लिए अत्यंत उपयोगी और प्रेरक कृति सिद्ध होती है, जो अपने जीवन के उद्देश्य, दिशा और मूल्य-चयन को लेकर गंभीर आत्म चिंतन करना चाहते हैं और जीवन की राह पर व्यावहारिक मार्गदर्शन खोज रहे हैं।
छात्र, शिक्षक, सामाजिक कार्यकर्ता, धार्मिक सांस्कृतिक मंचों से जुड़े व्यक्ति तथा सामान्य गृहस्थ , सबके लिए यह पुस्तक जीवन दर्शन, नैतिकता और व्यवहारिक आध्यात्मिकता का समन्वित पाठ प्रस्तुत करती है।
पुस्तक लगभग 128 पृष्ठों में, 28 चैप्टर्स में विन्यस्त है, इसका मूल्य 199/- रुपये अंकित है, तथा इसे भाषा भारती प्रकाशन, J-610, दिल्ली 110053 द्वारा प्रकाशित किया गया है। संपर्क के लिए मोबाइल 7428732689 और ई-मेल bhashabharti99@gmail.com दिया गया है।
इस प्रकार, यह कृति आज के भटकाव, अव्यवस्था और स्वार्थ की संस्कृति के बीच मनुष्यता, करुणा और उत्तरदायी जीवन बोध का सजग दिशा दर्शक दस्तावेज है।
☆ पुस्तक चर्चा ☆ जयप्रकाश पांडेय का व्यंग्य संग्रह – रुप बदलते सांप ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆
आज जब मैं श्री जयप्रकाश पांडेय के व्यंग्य संग्रह रुप बदलते सांप का अध्ययन और मनन करने के बाद उस पर कुछ लिखने बैठा हूं तो मेरा ध्यान सबसे पहले तो इस कृति की भूमिका पर जा रहा है जिसमें सुप्रसिद्ध साहित्यकार डा . रमेश तिवारी ने ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया शीर्षक से अपनी भूमिका में कुछ ऐसी सारगर्भित और निष्पक्ष बात कही है जिससे पाठक वर्ग की उत्सुकता इस संग्रह की व्यंग्य रचनाओं को पढ़ने के प्रति बढ़ जाती है। श्री रमेश तिवारी लिखते हैं कि जहां तक इनकी व्यंग्य रचनाओं की बात करें तो इनके लेखन में एक अलग ही मिजाज दिखाई देता है जो इन्हें एक अलग रचनात्मक पहचान देता है।इस संग्रह की रचनाओं में भी हम इनके इस मिजाज को भली भांति देख सकते हैं। चाहे वह तकदीर में तूफान व्यंग्य रचना हो या बैठे ठाले, मूर्ति की महिमा, तीन मौसम के दंगल , थोड़े में थोड़ी सी बातचेक का चक्कर आदि रचनाएं।
प्रायः सभी रचनाओं को पढ़ते हुए यह बात बहुत अच्छी तरह समझ में आती है कि इनके व्यंग्य के स्वर बहुत लाउड या तल्ख नहीं हैं। हालांकि इस सन्दर्भ में हमें यह भी स्मरण रखना चाहिए कि लेखक का परिवेश लेखन को प्रभावित करता है।अगर डा . रमेश तिवारी जी की भूमिका की कुछ और बातों पर ध्यान दें तो इस कृति की व्यंग्य रचनाओं में वाकपटुता का कमाल, लेखकीय अभिव्यंजना औशल का बेहतरीन उदाहरण भी देखने को मिलता है हम अगर एक अन्य व्यंग्य रचना सेल की शाल के आरंभिक वाक् य को देखें तो उसमें व्याप्त व्यंग्य हमें आज के व्यापारिक छल छध्म को अनावृत करता दिखाई देता है। करेला और नीम चढ़ा की तरह सेल में डिस्काउंट चढ़ बैठता है और पुरुष सेल और डिस्काउंट से चिढ़ते हैं और महिलाएं सेल और डिस्काउंट के चक्कर में दुकान की सीढ़ी चढ़ती हैं ।
देखा जाए तो एक व्यंग्यकार अपने आसपास जो देखता है और महसूस करता है वह कलम के माध्यम से कागज पर उतार देता है और चूंकि व्यंग्यकार की नजर अत्यंत पैनी होती है इसलिए उसके तीखे कटाक्ष के साथ उसका पाठकों को वह पठनीय भी लगता है ।पांडेय जी एक बैंक अधिकारी रहे हैं इसलिए कार्यालयीन अव्यवस्थाओं को उन्होंने काफी नजदीक से देखा समझा है इसलिए उन्होंने सफलता पूर्वक इस कड़वे सच को अपने व्यंग्य रचनाओं में व्यक्त भी किया है । रुप बदलते सांप नामक इस कृति में उन्होंने बैंक में सांप के घुसने से लेकर उसके पकड़ने और हेड आफिस के हस्तक्षेप को काफी तीखे अंदाज में व्यक्त किया है जो कि आज की अव्यवस्थाओं को उजागर करता है ।इस व्यंग्य संग्रह की रचनाओं से हमें श्री जय प्रकाश पांडेय की गहरी और व्यापक सोच का पता भी चलता है। पांडेय जी की इस पुस्तक में राजनीतिक, आध्यात्मिक, सामाजिक और पारिवारिक स्थितियों के प्रति उनके व्यापक नजरिए का पता चलता है और इसलिए पाठक वर्ग को इन सभी रचनाओं से गहरे अपनापन का अहसास होता है ।इस कृति में कुछ ऐसी रचनाएं हैं जो कि अपनी रोचकता के कारण पाठकों को बेहद प्रभावित करती हैं जैसे – चौक का चक्कर, नींबू मिर्ची के टोटके, कोहरे में किल्लत,बंगला बने न्यारा , बारिश तुम कब आओगी, बाप रे बाप , गांधी का भूगोल, मोहल्ले में मंदिर, दिल्ली और दिलेरी, ए टी एम में खुचड इत्यादि रचनाओं में पाठकों को अपनी अपनी पसंद की ऐसे व्यंग्य पढ़ने को मिल सकते हैं जो कि उन्हें कुछ सोचने समझने का अवसर दे सकते उपरोक्त बातों के संबंध में जयप्रकाश जी पांडेय का यह कथन भी यहां उल्लेखनीय है कि इस संग्रह में जो व्यंग्य लेख लिए गए हैं उनके विषय सर्वथा अलग अलग तरह के हैं । कहीं सामाजिक जीवन की विसंगतियों पर, कहीं आडंबर और कुरीतियों पर ,तो कहीं रंग बदलती राजनीति के अलावा मानवीय मूल्यों क्षरण पर ध्यान आकर्षित किया गया है।हैं।श्री जयप्रकाश पांडेय ने अपने नाम को पूरी तरह सार्थक किया था। साहित्य जगत में उन्होंने प्रकाश पुंज के रूप में अपनी पहचान बनाई और अपने उल्लेखनीय योगदान से जय के अधिकारी बने । जय प्रकाश जी की का व्यंग्य रचनाओं का एक बड़ा पाठक वर्ग था जो उनकी रचनाओं को उत्सुकता से पढ़ता था और पसंद भी करता था।
जय प्रकाश जी के व्यंग्य लेखन का अनूठा अंदाज था और मेरी ये पंक्तियां उस अंदाज को थोड़े में व्यक्त करने के लिए गागर में सागर का उदाहरण बन सकती हैं-
☆ पुस्तक चर्चा ☆ “समकालीन क्षणिकाकार”– बारूद के शहर में माचिसों के घर… ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆
☆
कृति- समकालीन क्षणिकाकार
संपादक- डाॅ. शैलेष गुप्त ‘वीर‘
समीक्षक- इन्दिरा किसलय
प्रकाशक- इरा पब्लिशर्स, कानपुर
पृष्ठ- 132
मूल्य- 240/- रू
☆सन्नाटे का अजगर कमसिन देह निगल जाता है ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆
इरा पब्लिशर्स, कानपुर द्वारा प्रकाशित “समकालीन क्षणिकाकार”, यह कृति क्षणिका जगत के सूक्ष्म स्पंदन और भावैश्वर्य को लेकर पाठकों को गहन चिन्तन हेतु उत्प्रेरित करती है। जिसके संपादक हैं बहुभाषाविद् साहित्यकार डाॅ. शैलेष गुप्त ‘वीर’। उनका विश्वास है कि “शीर्षकविहीन सूक्ष्म कविताएँ पाठक या श्रोता को सोचने-समझने हेतु अधिक स्पेस प्रदान करती हैं।” अर्थात् वैचारिक मंथन को विवश करने की सामर्थ्य उनमें होती है।
अधिकतम 30 शब्दों में क्षणिका अपनी यात्रा संपन्न करती है। अपने संपादकीय में डाॅ. वीर ने कम शब्दों में अर्थ के घनत्व को रेखांकित किया है। जो डाॅ. परमेश्वर गोयल उर्फ़ काका बिहारी की क्षणिका में ध्वनित होता है-
“चिड़िया
चिड़े से बोली
जंगल से मन ऊब गया है
चलो! किसी गाँव
या शहर चलते हैं
चिड़ा बोला- नहीं-नहीं!
वहाँ आदमी रहते हैं!”
अनुभूति की गहराई एवं व्यंग्यात्मक रूप ग्रहण करने पर क्षणिका चिरजीवी हो जाती है। उसमें एक कौंध उत्पन्न होती है। प्रगल्भ चिन्तन एवं जगत जीवन के प्रति सतत चैतन्य क्षणिकाओं को उर्जित करता है। इन्हीं कसौटियों पर देश विदेश के 64 क्षणिकाकारों ने प्रस्तुत कृति में अपने हस्ताक्षर दर्ज़ किये हैं।इसके पहले भी डाॅ. वीर “बिन्दु में सिन्धु” एवं “शब्द-शब्द क्षणबोध” के माध्यम से क्षणिका विधा का सौंदर्य प्रकाशित कर चुके हैं।
विवेच्य कृति में डॉ. परमेश्वर गोयल, डाॅ. सरोजिनी प्रीतम, डाॅ. मिथिलेश दीक्षित, डाॅ. उमेश महादोषी, चक्रधर शुक्ल, रमेश कुमार भद्रावले, संदीप सृजन, डॉ. घमंडीलाल अग्रवाल, अविनाश ब्यौहार, डॉ. वेद प्रकाश अंकुर, पुष्पा सिंघी, कैलाश वाजपेयी, डाॅ. मीनू खरे जैसे कितने ही लब्धप्रतिष्ठ रचनाकार विधा को गौरव प्रदान कर रहे हैं। क्षणिका, फ्रीवर्स यानी मुक्त छन्द है। मात्राओं का कोई बंधन नहीं। सपाटबयानी, सृजन की दीर्घजीविता पर ग्रहण लगाती है। संप्रेषणीयता ऐसी हो कि मन में खलबली मचा दे। चक्रधर शुक्ल कहते हैं-
“कंडक्टर ने खाया दस
परिवहन मंत्री
पचा गया/पूरी बस।”
कुछ भी ऐसा नहीं है, जो क्षणिका की परिधि में समा न सके। अशोक आनन की बानगी द्रष्टव्य है-
“बारूद के शहर में/माचिस के घर/आदमी को है/हवाओं से डर।”
जीवन के अनगिन पार्श्व हैं। यथा- प्रेम-प्रणय, संवेदनहीनता, पर्यावरण ध्वंस, बिखरते रिश्ते, भ्रष्टाचार, मूल्यहीन राजनीति, युद्धोन्माद एवं न जाने क्या-क्या। इन्दिरा किसलय व्यथित हैं-
“नयी सदी का
नया चलन है
जाने कैसा अनगढ़ मन है
लोग पूजते हैं बुद्ध
और शान्ति के लिए
करते हैं युद्ध।”
अनाचार का दैत्य आतुर है सब कुछ निगल जाने को। डाॅ. शैलेष गुप्त ‘वीर’ इस ज्वलन्त सत्य को कुछ यों बयाँ करते हैं-
“सन्नाटे का अजगर
कमसिन देह
निगल जाता है,
बिकाऊ मीडिया
बस! शोर मचाता है।”
एक और विकट व्यंजना संदीप सृजन की कलम से निःसृत है-
“वे वेबिनार में/भूख की/ व्याख्या कर रहे हैं,
जो लाॅकडाउन में/रोज़
नया व्यञ्जन/चख रहे हैं!
132 पृष्ठों का यह संकलन नवांकुरों के लिये पाथेय सिद्ध होगा तो स्वनामधन्य रचना शिल्पियों के गौरव का उद्गाता। जेट एज में रफ़्तार का कहर विधाओं पर भी टूट रहा है। संक्षिप्त विधाओं की उपयोगिता निःसंदिग्ध हो चली है।
उत्कृष्ट संपादन, निर्दोष मुद्रण, इन्द्रधनुषी मुखपृष्ठ एवं वाणी का वैभव पाठकों से प्राप्त सराहना एवं विश्वास को निश्चय ही प्रमाणित करेगा।
□
समीक्षक – सुश्री इंदिरा किसलय
नागपुर, महाराष्ट्र
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के आभारी हैं जो साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं।
आज प्रस्तुत है डॉ. कमल किशोर जी द्वारा लिखित “जीवन को श्रेष्ठ कैसे बनायें…” पर चर्चा।
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# १९३ ☆
☆ “जीवन को श्रेष्ठ कैसे बनायें” – लेखक … डॉ. कमल किशोर ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
पुस्तक चर्चा
पुस्तक – जीवन को श्रेष्ठ कैसे बनायें
लेखक – डॉ. कमल किशोर दुबे
चर्चाकार – विवेक रंजन श्रीवास्तव
☆ डॉ. कमल किशोर दुबे की अभिनव कृति– – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
यह किताब मूलतः ,जीवन की गरिमा का पुनः स्मरण कराती हुई ऐसी कृति है, जो व्यक्ति को भीतर से बदलकर उसके जीवन को उद्देश्यपूर्ण और साधनामय बनाने की प्रेरणा देती है। इसमें विद्यार्थी जीवन से वृद्धावस्था तक जीवन यात्रा के हर पड़ाव पर लेखक ने व्यक्तित्व विकास हेतु आवश्यक आयामों को छोटे छोटे, , सारगर्भित आलेखों के माध्यम से उद्घाटित किया है।
जीवन की श्रेष्ठता , केवल सुविधाओं से नहीं, संस्कारों से होती है।
प्राक्कथन में ही लेखक स्पष्ट करते हैं कि मानव जीवन की श्रेष्ठता केवल भौतिक उपलब्धियों, वैभव और ऐश्वर्य से नहीं, बल्कि आत्मविश्वास, मानवता, प्रेम, सेवा, सद्भाव और परोपकार जैसे उच्च शाश्वत मूल्यों के से बनती है। सनातन दृष्टि से मनुष्य योनि को “देवताओं को भी दुर्लभ” बताकर यह रेखांकित किया गया है कि मानव जीवन कर्म योनि है, जहाँ मनुष्य अपने पुरुषार्थ से जीवन को ईश्वरीय उद्देश्य की ओर मोड़ सकता है।लेखक बार-बार इस तथ्य को रेखांकित करते हैं कि मनुष्य की सच्ची पूँजी उसका आंतरिक संस्कार, उसकी संवेदना और उसकी कर्मशीलता है, न कि केवल स्थिति, पद या बैंक में जमा पूंजी ।
पुस्तक का केंद्रीय स्वर यह है कि जीवन तभी वास्तव में श्रेष्ठ है, जब वह किसी उच्च उद्देश्य के साथ जिया जाए और उस उद्देश्य की पूर्ति के लिए व्यक्ति स्वयं को लगातार ढालता और परिष्कृत करता रहे।लेखक के अनुसार, अपने भीतर की कमियों, दुष्प्रवृत्तियों और दुर्बलताओं की पहचान करके उन्हें रूपांतरित करना ही आत्म विकास का वास्तविक प्रारंभ है।
पहला आलेख “सुयोग्य विद्यार्थी कैसे बनें?” इस कृति का स्वर और दिशा दोनों निर्धारित करता है।यहाँ शिक्षा को केवल डिग्री और रोज़गार का साधन न मानकर, चरित्र निर्माण और संस्कार संवर्धन की प्रक्रिया के रूप में वर्णित किया गया है।लेखक प्राचीन गुरुकुल प्रणाली का उदाहरण देते हैं, जहाँ श्रीराम और श्रीकृष्ण जैसे अवतार भी वशिष्ठ और सांदीपनि जैसे गुरुओं के आश्रम में रहकर शिक्षा ग्रहण करते हैं, ताकि यह स्पष्ट हो कि ज्ञान के साथ विनय, स्वावलंबन, प्रेम, करुणा और सामाजिक सद्भाव अनिवार्य अंग हैं। यद्यपि ये आदर्श स्थितियां सामाजिक ताने बाने में आज व्यवहारिक नहीं लगती । लेखक आधुनिक शिक्षा संस्थानों में प्रतियोगिता, वैभव प्रदर्शन और धन केंद्रित दृष्टिकोण की आलोचना करते हैं, जो विनय, दया, त्याग और करुणा जैसे गुणों को पीछे छोड़ देता है।
रामचरितमानस की यह पंक्ति “बरसहिं जलद भूमि नियराये। जथा नवहिं बुध विद्या पाये।” उद्धृत करके वे बताते हैं कि जिस प्रकार बादल पृथ्वी के समीप आकर बरसते हैं, उसी प्रकार सच्चा विद्वान जितना अधिक ज्ञान पाता है, उतना ही विनम्र होता जाता है।इस तरह पुस्तक में विद्या और विनय के संबंध को विद्यार्थी जीवन के आदर्श स्वरूप का केंद्रीय सूत्र माना गया है।
“विचार संयम या सकारात्मक सोच!” शीर्षक आलेख पुस्तक के वैचारिक ढाँचे का मेरुदंड है। यहाँ महाभारत के वनपर्व से उद्धृत श्लोक के माध्यम से बताया गया है कि वेदों का सार “सत्य” और सत्य का सार “दम” अर्थात् संयम है; और वही संयम “त्याग” के रूप में सज्जनों के आचरण में प्रकट होता है।लेखक विचार संयम को इन्द्रिय संयम की मानसिक अवस्था बताते हैं । इसे आधुनिक भाषा में “पॉज़िटिव थिंकिंग” का भारतीय रूपक कह सकते हैं।
वे विचार-संयम को दो भागों में बाँटते हैं—
विचार निग्रह: बिखरे हुए विचारों को समेटकर एक दिशा में लगा देना, जिसे वे सकारात्मक सोच का व्यावहारिक रूप बताते हैं।
निकृष्ट चिंतन से मुक्त होना: कुविचारों को हटाकर सद्विचारों में नियोजन करना, ताकि मनोभूमि में श्रेष्ठ वैचारिक बीज बोए जा सकें।
लेखक अत्यंत सहज उदाहरण से कहते हैं कि जैसे किसान जोते हुए खेत में उत्तम बीज बोकर उत्कृष्ट फसल पाता है, वैसे ही मनुष्य यदि प्रत्येक दिन आत्मचिंतन के लिए समय निकालकर आलस्य, आवेश, कटुभाषण, निराशा और कायरता जैसी प्रवृत्तियों की समीक्षा करे और उनके प्रतिपक्षी सद्गुणों को स्थापित करने का पुरुषार्थ करे, तो उसका व्यक्तित्व स्वतः उज्ज्वल होने लगेगा।
इस क्रम में स्वाध्याय, सत्संग और चिंतन मनन को विचार संयम के व्यावहारिक साधन के रूप में रेखांकित किया गया है।
पुस्तक के कई आलेखों का केन्द्रीय विषय आत्मविश्वास और पुरुषार्थ है “आत्मविश्वास सफलता का प्रथम सोपान”, “सफलता का पर्याय , दृढ़-आत्मविश्वास”, “सफलता की सही कसौटी .. पुरुषार्थ” आदि।गीता के प्रसिद्ध श्लोक “उद्धरेदात्मनात्मानं…” को आधार बनाकर लेखक यह प्रतिपादित करते हैं कि मनुष्य स्वयं ही अपना मित्र है और स्वयं ही अपना शत्रु । इसलिए उसे अपने उद्धार की जिम्मेदारी किसी बाहरी सहारे पर नहीं, अपने आत्मबल पर रखनी चाहिए।
इन आलेखों में दो महत्त्वपूर्ण बिंदु उभरकर सामने आते हैं—
आत्मविश्वास केवल बाहरी प्रशंसा से नहीं, आत्म मूल्यांकन और अपने ध्येय के प्रति दृढ़ निष्ठा से जन्म लेता है।
सफलता की सही कसौटी परिणाम नहीं, बल्कि ईमानदार पुरुषार्थ और सतत परिश्रम है। विरासत या अनैतिक साधनों से प्राप्त वैभव को लेखक नैतिक दृष्टि से “असफलता” तक कहने में संकोच नहीं करते।
“सफलता के लिए जीवन में संतुलन बनाएँ” आलेख में ऋतु-परिवर्तन और झूले का उदाहरण देकर लेखक बताते हैं कि जीवन में सुख दुःख, लाभ हानि, अनुकूल प्रतिकूल स्थितियाँ स्वाभाविक उतार चढ़ाव हैं, जिनका संतुलित विवेक से स्वागत करना ही मानसिक स्वास्थ्य का आधार है। यहाँ वे “कमल के पत्ते” की उपमा देते हैं, जो जल में रहते हुए भी उससे ऊपर रहते हैं । ठीक वैसे ही जीवन के मध्य में रहते हुए व्यक्ति को भीतर से निर्लिप्त और साक्षीभाव अपनाकर हर्ष और विषाद दोनों को समभाव से ग्रहण करना सीखना चाहिए।
“आशा और उत्साह मनुष्य जीवन के मुख्य सम्बल” तथा “प्रसन्न रहना अथवा उद्विग्न होना, हमारे दृष्टिकोण पर निर्भर” जैसे आलेख जीवन की भावनात्मक बुनियाद पर हैं। लेखक आशा को भविष्य की बेहतर संभावना की ऊर्जा और उत्साह को उसे साकार करने का जीवंत संबल बताते हैं, जो व्यक्ति को विषमता, अवसाद और शोक से उबारकर संघर्ष की राह पर सक्षम बनाता है। इतिहास और युद्धभूमि के संदर्भों के माध्यम से यह विचार सामने आता है कि कई बार औषधियों से अधिक आशा ही रोगी के लिए जीवनदायी सिद्ध होती है और निराशा तिनके जैसी समस्या को भी पर्वत बना देती है।
दृष्टिकोण की चर्चा में “गरीबी अमीरी” को सापेक्ष बताते हुए लेखक संकेत करते हैं कि तुलना का मानक बदलते ही हमारी संतुष्टि या असंतोष की भावना बदल जाती है। यदि हम सदैव अपने से अधिक संपन्न व्यक्ति से तुलना करेंगे, तो स्वयं को दरिद्र महसूस करेंगे; वहीं अपने से कम सुविधा युक्त लोगों को देखकर कृतज्ञता का भाव आएगा। इस प्रकार पुस्तक यह बताती है कि प्रसन्नता बाहरी स्थिति से अधिक, अंदरूनी दृष्टिकोण है।
“अपने व्यक्तित्व और जीवन को उत्कृष्ट कैसे बनायें?” पुस्तक का एक केंद्रीय और दार्शनिक आलेख है, जिसमें लेखक आस्था, श्रद्धा, स्वभाव, गुण और कर्म के परस्पर संबंध को व्यवस्थित ढंग से स्पष्ट करते हैं। वे कहते हैं कि व्यक्तित्व का ढाँचा “अंतरात्मा” में जमी आस्थाओं पर निर्भर है , वहीं से चिंतन को दिशा मिलती है, और धीरे-धीरे आदतें, स्वभाव और व्यवहार बनते जाते हैं। सुख दुःख, प्रसन्नता उद्विग्नता को वे परिस्थितियों की नहीं, मनःस्थिति की उपज मानते हैं। ठीक वैसे ही जैसे ऋतुएँ बाहरी हैं, पर हमें कैसा महसूस होगा, यह हमारे शरीर और हमारी तैयारी पर निर्भर करता है।
यहाँ लेखक परिष्कार की संभावना पर भी स्पष्ट हैं, यदि व्यक्ति में भीतर से बदलने की तीव्र आकांक्षा और संकल्प-शक्ति हो, तो वह अपने स्वभाव और कर्म पद्धति को पुनः गढ़ सकता है। “समुद्र की गहराई से मोती” निकालने की उपमा देकर वे बताते हैं कि जीवन रूपी समुद्र में उतरने के लिए बाहरी यंत्रों से अधिक धैर्य, साहस और सतत प्रयास की आवश्यकता है। प्रबल संकल्प, धैर्य और साहस के संघटन को वे सफल व्यक्तित्व निर्माण की त्रिधारा के रूप में स्थापित करते हैं।
कर्म-सिद्धांत पर लिखे गए “कर्म प्रधान विश्व करि राखा” और “कर्मदेव का सम्मान करें” जैसे आलेख पुस्तक को एक स्पष्ट नैतिक आधार प्रदान करते हैं। तुलसीदास की चौपाई “कर्म प्रधान विश्व करि राखा…” के माध्यम से यह प्रतिपादित किया गया है कि संसार में सब कुछ उपलब्ध है, पर कर्महीन व्यक्ति को कुछ नहीं मिलता, और पाप पुण्य दोनों का प्रतिफल तात्कालिक रूप से मनःस्थिति और जीवनानुभव में झलकने लगता है। लेखक सरकारी न्याय व्यवस्था की धीमी फाइलों का व्यंग्यात्मक उदाहरण देकर यह संकेत करते हैं कि ईश्वर की व्यवस्थाएँ “उधारी” पर नहीं चलतीं। ईर्ष्या, द्वेष, झूठ और अभिमान व्यक्ति को तत्काल “नारकीय” अनुभव में धकेल देते हैं, जबकि स्नेह, करुणा और दया उसे “स्वर्ग ” जैसा आंतरिक सुख प्रदान करते हैं।
कुल मिलाकर, “जीवन को श्रेष्ठ कैसे बनायें” एक ऐसी कृति के रूप में सामने आती है जो भारतीय अध्यात्म, वेद, गीता,रामचरितमानस और गायत्री विचारधारा से सार लेकर आधुनिक भाषा एवं शैली में व्यक्तित्व विकास की एक समन्वित जीवन पद्धति प्रस्तुत करती है।
यह केवल ‘क्या करें’ वाली नसीहतनुमा पुस्तक नहीं, बल्कि उदाहरणों, शास्त्रीय संदर्भों और चिंतनशील व्याख्याओं के माध्यम से पाठक को आत्म-संशोधन, सकारात्मक सोच, कर्मठता और प्रेमपूर्ण मनुष्यता की ओर प्रवाहित करने वाला तार्किक प्रवाही निबंध संग्रह है, जो सचमुच “मनुष्य जीवन की श्रेष्ठता का दस्तावेज” कहे जाने योग्य है।
ये भिन्न बात है कि व्यवहार के स्तर पर इसे वर्तमान वैश्विक एक्सपोजर के साथ कितना और कैसे अपनाया जाए यह सवाल उठ खड़ा होता है, जिसके उत्तर पाठक को स्वयं ही ढूंढने होंगे ।
☆ पुस्तक चर्चा ☆ पतवार तुम्हें दे जाऊंगा – श्री विजय नेमा ‘अनुज’ ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆
सुप्रसिद्ध साहित्यकार डा. राजकुमार जी सुमित्र ने एक जगह लिखा था कि – “मन कभी चंदन सा महकता है और कभी ज्वालामुखी सा दहकता है. कवि मन जानता और पहचानता है अपनी भाव संपदा, अपनी ऋतुएँ और रंग. कवि होने के आवश्यक है संवेदना”. सुमित्र जी की इसी भाव अभिव्यक्ति को सार्थकता प्रदान की है वर्तिका संस्था के संयोजक आत्म प्रिय भाई श्री विजय नेमा अनुज ने अपने काव्य संग्रह पतवार तुम्हें दे जाऊंगा, में.
श्री विजय नेमा ‘अनुज’
इस पुस्तक में सुप्रसिद्ध साहित्यकार आचार्य पं. कृष्णकांत चतुर्वेदी , आचार्य श्री संजीव वर्मा सलिल, श्री हरेराम समीप, डा. राजकुमार सुमित्र, आचार्य डा. हरिशंकर दुबे, आचार्य पं. भगवत दुबे, श्री विजय बागरी विजय और श्री राजेश पाठक प्रवीण की शुभकामनाओं के रुप में इतनी सशक्त और सारगर्भित प्रतिक्रियाएं हैं कि पाठक वर्ग पुस्तक की कविताओं के प्रति बरबस आकर्षित और प्रभावित होकर सभी कविताएँ उत्साह और उत्सुकता से पढ़ डालता है और इन्हीं में से एक पाठक मैं भी हूँ जिसने इस संग्रह की कविताओं को न केवल उत्सुकता से पढ़ा बल्कि उस पर चिंतन भी किया.
इस संग्रह की कविताएँ जब हम पढ़ते हैं तो लगता है कि ये कविताएँ राष्ट्रीय, सामाजिक और पारिवारिक परिवेश में लिखी हुईं ऐसी कविताएँ हैं जो व्यक्ति को कुछ सार्थक रुप से सोचने, कुछ करने और आगे बढ़ने के लिए मार्गदर्शन करती हैं और प्रेरणा देती हैं. कवि ने काव्य रचना के समय मानवीय संवेदनाओं को पूरी तरह ध्यान में रखा है और अपने आत्म निवेदन में इसे स्वीकार भी किया है. अनुज जी लिखते हैं कि साहित्य सृजन तभी संभव और सार्थक माना जाता है, जब साहित्यकार अपनी संवेदना और अपनी अनुभूति को पूरी कलात्मकता के साथ सुन्दर शब्दों में पिरोकर प्रस्तुत करता है.
कवि का मानना है कि कविताओं में समाज के लिए विरासत में दी गई प्रेरणा का होना आवश्यक है और उन्होंने अपनी कविता में भी यही बात कही है
बस रैन बसेरा कर लूँ मैं
फिर भोर हुए उठ जाऊँगा
ले जाना नाव किनारे तुम
पतवार तुम्हें दे जाऊंगा
कविवर ने समाज में बेटियों के मंगलमय भविष्य की कामना करते हुए उन्हें ससुराल में सुखद और सुन्दर जीवन के निर्वाह हेतु कल्याणकारी संदेश भी दिया है
दिल जीतना परिवार का
सेवा मुदित करना वहाँ
पति धर्म पालन कर
सुखद लज्जावती बनना वहाँ
82 कविताओं का यह संग्रह श्री विजय नेमा अनुज ने अपने पिता तुल्य बड़े भैया श्री पुरुषोत्तम दास जी नेमा और बड़ी भाभी जी श्रीमती केशर नेमा जी को सादर समर्पित किया है.
सारगर्भित, सुन्दर और प्रेरणा दायक इन कविताओं का यह संग्रह पाठकों के बीच पठनीय और प्रशंसनीय सिध्द होगा, ऐसा मेरा पूर्ण विश्वास है.
(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जीका हिन्दी बाल -साहित्य एवं हिन्दी साहित्य की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 ₹51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य” के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है लेखिका: डॉ. श्रीमती युगल सिंहजी द्वारा लिखित – “हाड़ौती अंचल का बाल साहित्य: उद्भव एवं विकास” की समीक्षा।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २३३ ☆
☆ पुस्तक चर्चा ☆ हाड़ौती अंचल का बाल साहित्य: उद्भव एवं विकास – लेखिका: डॉ. श्रीमती युगल सिंह☆ समीक्षा – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆
पुस्तक : हाड़ौती अंचल का बाल साहित्य: उद्भव एवं विकास
लेखिका: डॉ. श्रीमती युगल सिंह
प्रकाशक: जीएस पब्लिशर डिस्ट्रीब्यूटर्स, नवीन शाहदरा, दिल्ली
पृष्ठ संख्या:161
मूल्य: 595/- रुपये
समीक्षक: ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश‘
डॉ. श्रीमती युगल सिंह द्वारा रचित पुस्तक ‘हाड़ौती अंचल का बाल साहित्य: उद्भव एवं विकास’ (2025) न केवल एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ है, बल्कि राजस्थानी और हिंदी साहित्य के क्षेत्र में इसकी अत्यधिक उपादेयता (महत्व) भी है। यह कृति इस दृष्टि से अत्यंत उपयोगी है कि यह एक उपेक्षित रहे क्षेत्र ‘हाड़ौती’ के बाल साहित्य को मुख्यधारा में लाने का गंभीर प्रयास करती है।
पाँच वर्षों के कठिन परिश्रम और शोध के बाद तैयार की गई यह पुस्तक भविष्य के शोधार्थियों के लिए एक आधार स्तंभ का कार्य करेगी, जिससे प्रेरित होकर इस अंचल पर और भी गंभीर शोध कार्य किए जा सकेंगे। इसकी सबसे बड़ी उपादेयता यह है कि लेखिका ने बिखरे हुए साहित्य और साहित्यकारों को एक सूत्र में पिरोकर 45 रचनाकारों का एक प्रामाणिक संदर्भ ग्रंथ तैयार किया है, जो पहले कभी उपलब्ध नहीं था।
ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से यह पुस्तक हाड़ौती की भाषाई जड़ों को समझने के लिए अनिवार्य है। यह रेखांकित करती है कि हाड़ौती की प्रथम मुद्रित कृति बाइबिल का अनुवाद थी और सूर्यमल्ल मिश्रण की ‘राम रंजाट’ से इस अंचल के बाल साहित्य की नींव पड़ी। पुस्तक की संरचना विधा-वार (कविता, कहानी, नाटक, ज्ञान-विज्ञान, पहेलियाँ) होने के कारण यह पाठकों को साहित्य की विविध प्रवृत्तियों से परिचित कराती है। काव्य क्षेत्र में सुरेशचंद्र सर्वहारा, श्यामा शर्मा, जितेन्द्र निर्मोही, रामगोपाल राही, डॉ. कृष्णा कुमारी, महेश पंचोली, राधेश्याम मेहर, शशि सक्सेना, सुरेश चंद्र निगम, शिवराज श्रीवास्तव, अक्षयलता शर्मा, भगवती प्रसाद गौतम, डॉ. सुश्री लीला मोदी, ममता महक, प्रीतिमा पुलक, विष्णु शर्मा ‘हरिहर’, विश्वामित्र दाधीच, जयसिंह आशावत, देवकी दर्पण, शिवचरण सेन ‘शिवा’, डॉ. प्रेम जैन, डॉ. गिरि गिरिवर, उमानंदन चतुर्वेदी और योगीराज योगी जैसे कवियों के योगदान का विस्तार से वर्णन है। लेखिका ने कविताओं के माध्यम से यह भी दिखाया है कि कैसे मातृभाषा से जुड़ाव बच्चों में संस्कार और अनुशासन का बीजारोपण करता है।
गद्य और नवीन विधाओं के संकलन के कारण भी इस कृति की महत्ता बढ़ जाती है। इसमें डॉ. नरेंद्र नाथ चतुर्वेदी, संतोष पारिक ‘निरव’, विजय जोशी, विजय शर्मा , टीकमचंद ढोडरिया, किशन रतनानी, डॉ. क्षमा चतुर्वेदी, कालीचरण राजपूत, रोचिका अरुण शर्मा और रेखा पंचोली की कहानियों और उपन्यासों का विवरण है, जो बाल-मनोविज्ञान पर आधारित हैं।
वैज्ञानिक चेतना के विकास में जितेन्द्र निर्मोही और प्रज्ञा गौतम का योगदान, तथा नाटक के क्षेत्र में योगेश ‘यथार्थ’ और राम शर्मा (कापरैन) के कार्यों की चर्चा इसकी बहुआयामी उपादेयता को सिद्ध करती है। झालावाड़ के अब्दुल मलिक खान के साहित्य को ‘रत्न’ मानकर उन्हें संरक्षित करना इस पुस्तक की एक बड़ी उपलब्धि है। साथ ही, अपर्णा पाण्डेय, श्वेता शर्मा, अरनी राबर्ट्स, सी.एल. साँखला और प्रभात सिंघल के योगदानों को शामिल कर यह पुस्तक हाड़ौती अंचल के बाल साहित्य की एक पूर्ण और जीवंत तस्वीर पेश करती है, जो आने वाली पीढ़ियों को उनकी साहित्यिक विरासत से जोड़े रखेगी।
(प्रख्यात कवि, नाटककर, शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता श्री मंजीत सिंह जी, ‘ख़ान मंजीत भावड़िया “मजीद”’ के नाम से प्रसिद्ध हैं। वर्तमान में वे पंजाबी यूनिवर्सिटी, पटियाला से भाषा विज्ञान में पी एच डी कर रहे हैं और कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में सहायक प्राध्यापक के रूप में कार्यरत हैं और उर्दू भाषा के संरक्षण व प्रचार प्रसार के प्रति समर्पित हैं। उनकी प्रमुख साहित्यिक कृतियों में “हरियाणवी झलक” (काव्य संग्रह) और “बिराणमाट्टी” (नाटक), रम्ज़ ए उर्दू, हकीकत, सच चुभै सै शामिल हैं, जो हरियाणा की संस्कृति और सामाजिक जीवन की झलक प्रस्तुत करती हैं। उनके साहित्यिक कार्यों को हरियाणा साहित्य अकादमी, हरियाणा उर्दू अकादमी, वैदिक प्रकाशन और अन्य प्रतिष्ठित संस्थानों द्वारा सम्मानित किया गया है। साहित्य और शिक्षा के साथ-साथ, ख़ान मनजीत अपने पारिवारिक परंपरा से जुड़े हुए एक कुशल कुम्हार (पॉटर) भी हैं।)
आज प्रस्तुत है श्री विनोद सिल्ला जी द्वारा संपादित पुस्तक “लघु कविता व्योम” पर चर्चा।
☆ “लघु कविता व्योम” – सम्पादक – श्री विनोद सिल्ला☆ चर्चा – श्री मनजीत सिंह ☆
पुस्तक चर्चा
किताब – लघु कविता व्योम
सम्पादक – विनोद सिल्ला
कीमत-300 रूपये
प्रकाशन – विपिन पब्लिकेशन ,रोहतक
पृष्ठ -120
समीक्षक -मनजीत सिंह
☆ 108 कवि-कवयित्री को मिला लघु कविता सम्मान – श्री मनजीत सिंह ☆
लघु कविता व्योम जोकि एक ज्ञानवर्धक कविताओं का संग्रह है जिसको सम्पादित किया है विनोद सिल्ला व सहयोगी मीना सिल्ला जी ने इस कविता संग्रह की खूबसूरती यह है कि इसमें 108 कवि-कवयित्री शामिल हैं। जोएक तरह से अध्यात्म से जुड़ा हुआ है। हिंदू धर्म, बौद्ध धर्म और योग में, इस्लाम में 108 संख्या का गहरा आध्यात्मिक महत्व है। यह आध्यात्मिक पूर्णता, ब्रह्मांड और दिव्य चेतनाका प्रतीक है, जो ब्रह्मांडीय मापों (सूर्य/पृथ्वी की दूरी), पवित्र ग्रंथों (108 उपनिषद) और प्रथाओं (माला में 108 मनके, देवताओं के 108 नाम) में दिखाई देती है। यह समग्रता का प्रतीक है, जिसकी विभिन्न सांस्कृतिक व्याख्याएं हैं, जैसे हृदय चक्र पर अभिसरित होने वाली 108 ऊर्जा रेखाएं या बौद्ध धर्म में 108 दोष, जो आध्यात्मिक सद्भाव के मार्ग का प्रतीक हैं। वहीं जो व्योम शब्द सम्मिलित किया है उसका अर्थ है व्योम (Vyom) नाम का अर्थ मुख्य रूप से आकाश, अंतरिक्ष, या आसमान होता है, जो विशालता, स्वतंत्रता, और अनंत संभावनाओं का प्रतीक है, और यह संस्कृत मूल का एक लोकप्रिय नाम है जो लड़कों के लिए इस्तेमाल होता है। इसके अन्य अर्थों में मेघ (बादल), जल, और हवा भी शामिल हैं।
सिरसा से आए हुए वरिष्ठ कवि डा रूप देवगुण न कहा कि – जब कभी मैं कविता संग्रह पढ़ता था तो उसमें बड़ी कविताओं के साथ छोटी कविताएं भी होती थी। इन दोनों को ही कविता कहा जाता था। मुझे दुख इस बात का होता था कि छोटी कविताओं को कोई पूछता नहीं था। वे घुटनमय जीवन व्यतीत कर रही थी। इस दुखमय जीवन से उन्हें छुटकारा दिलवाने के लिए मैंने लघुकविताओं के संग्रह प्रकाशित करवाने आरम्भ किए, अब तक मेरे 20 लघुकविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। आरम्भ में लघुकविता के तत्व निर्धारित नहीं हुए थे। तब कोई 5 पंक्तियों की तो कोई 12 पंक्तियों की लघुकविता लिख रहा था। सन् 2019 में मैंने हरियाणा की प्रतिनिधि लघुकविता का प्रकाशन किया। जिसके तीन लघुअध्यायों में मैंने ‘लघुकविता की आवश्यकता, ‘लघुकविता का स्वरूप’ तथा ‘लघुकविता के तत्व’ पर अपने विचार व्यक्त किये। लघुकविता के तत्व निर्धारित किये 6 से 10 पंक्तियां (बाद में केवल 10 पंक्तियां), मुक्त छंद, भावनाओं का प्राधान्य, कल्पना का प्राचुर्य, सकारात्मक विचार तथा अन्य तत्व कविता जैसे। इन तत्वों को मैंने साहित्यकारों तक पहुंचाया और अब तक 100 से अधिक साहित्यकारों ने 250 लघुकविता संग्रहों से हिन्दी साहित्य को समृद्ध किया है।
प्रारम्भ में डॉ. प्रद्युम्न भल्ला, विनोद सिल्ला आनंद प्रकाश आर्टिस्ट, जनक राज शर्मा, ने अपने-अपने शहरों में लघुकविता सम्मेलन करवा कर, इस विधा को आगे बढ़ाया। इन्होंने लघुकविताकारों को सम्मानित किया तथा विमोचन भी करवाये। आनंद प्रकाश आर्टिस्ट ने अपने प्रकाशन से 100 से अधिक लघुकविता संग्रह प्रकाशित किये तथा अपने संपादन में ‘आनंद मार्ग’ पत्रिका के लघुकविता विशेषांक निकाले। डॉ. रामकुमार घोटड़ ने भी अपने संपादन में सारा पत्रिका का लघुकविता विशेषांक निकाला। डॉ. शील कौशिक ने लघुकविता में प्रकृति आलोचनात्मक दृष्टि समालोचनात्मक पुस्तक में केवल प्रकृति से संबंधित 51 लघुकविता संग्रहों की समीक्षा करके शोधपरक संग्रह प्रकाशित किया। डॉ. मधुकांत व पवन मित्तल ने लघुकविता प्रतियोगिता करवाई। इस बार 18 मई 2025 को सिरसा में तीसरा अखिल भारतीय लघुकविता सम्मेलन भी करवाया। जिसमें 51 लघुकविता संग्रहों का विमोचन हुआ तथा 51 लघुकविताकारों को सम्मानित किया गया।
सम्पादक महोदय विनोद सिल्ला ने बताय कि ‘लघुकविता व्योम’ संकलन आपको सौंपते हुए अतीव प्रसन्नता हो रही है। जब मैंने ‘लघुकविता व्योम’ के संपादन का कार्य अपने हाथ में लिया तो मुझे लगा कि यह काम अत्यंत महत्वपूर्ण है, लेकिन उतना ही मुश्किल भी। लघुकविता के पुरोधा प्रोफेसर रूप देवगुण ने जब मेरा होंसला बढ़ाया तो मुझे लगा कि यह कार्य भले ही मुश्किल हो लेकिन असंभव नहीं है। उसके बाद लोग जुड़ते गए, कारवां बनता गया। एक-एक करके 108 रचनाकार इस संकलन में शामिल हो गए। वो भी पूरे उत्साह के साथ। इन रचनाकारों में 48 महिला लघुकविताकार शामिल हैं। जिन्होंने नारी विमर्श पर बेबाकी से कलम चलाई है। इनके अतिरिक्त 60 पुरुष लघुकविताकारों ने भी सामाजिक सरोकारों पर लेखन करके प्रगतिशील सृजन किया है। इस संकलन में 79 लघुकविताकार हरियाणा, 12 राजस्थान, 8 दिल्ली, 5 पंजाब और एक-एक रचनाकार क्रमशः उत्तर प्रदेश, चंडीगढ़, गुजरात व मध्य प्रदेश से शामिल हैं। जबकि हरियाणा के फतेहाबाद, सिरसा, हिसार, सोनीपत, जीन्द, रोहतक, झज्जर, गुरुग्राम, फरिदाबाद, चरखी दादरी, भिवानी, नारनौल, रेवाड़ी, कुरुक्षेत्र, कैथल, करनाल, पंचकूला सहित 17 जिलों के लघुकविताकारों ने सहभागिता की। यहीं नहीं संकलन के प्रकाशन में जाने के बाद भी अनेक रचनाकारों की लघुकविताएं प्राप्त हुई। जिन्हें अगले संकलन में शामिल करने का प्रयास करूंगा।
इस संकलन में जहां डॉ. मधुकांत, डॉ. रूप देवगुण, डॉ. अशोक कुमार मंगलेश, डॉ. प्रद्युम्न भल्ला, डॉ. शील कौशिक, डॉ. तेजिंदर, जैसे वरिष्ठ रचनाकार हैं। वहीं अनेक नवोदित रचनाकार भी सम्मिलित हैं। इस संकलन के संपादन का एकमात्र उद्देश्य हिन्दी भाषा, हिन्दी साहित्य की सेवा करना और हिन्दी साहित्य की नई-नवेली विधा लघुकविता को स्थापित करने में अपना योगदान देना है। अनेक रचनाकार अपने-अपने ढंग लघुकविता के आंदोलन में अपना योगदान दे रहे हैं। कोई समीक्षा करके, कोई सृजन करके, कोई प्रकाशन करके तो कोई सृजनरत प्रतिभाओं को सम्मानित करके। मैंने संपादन का रास्ता चुना।
इस कविता संग्रह में निम्नलिखित कवियों ने हिस्सा लिया
अनिल खर्ब,डॉ. गौरी अरोड़ा,अनिल शर्मा वत्स,गीतकार गुरप्रीत,अनील शूर ‘आजाद’,डॉ. घमंडी लाल अग्रवाल,अंजु कपूर गांधी,डा चन्द्रभान चन्द्र,अंजु दुआ जैमिनी,डॉ. चन्द्रदत्त शर्मा,अर्चना कोचर, चंद्रवती दिक्षित, डॉ. अशोक कुमार, छत्र छाजेड़,अशोक मलंग, जय भगवान यादव
आनन्द कुमार आशोधिया,जय भगवान सिंगला,डॉ. आरती बंसल, जयसिंह ‘जीत’, आशमा कौल,ज्ञान प्रकाश पीयूष
आशा खत्री ‘लता’,डाली हरमन,आशा विजय विभोर, पवन गहलोत, आशा सिंगला, पवन मित्तल,आशीष कुमार मीणा
डॉ. प्रद्युम्न भल्ला,डॉ. इन्दु शुप्ता,प्रेम कुमार शर्मा,ऋचा वैद,प्रवीण पारीक ‘अंशु’,ओमप्रकाश लांग्यान,प्रीत भरपूर, कश्मीर मौजी,डॉ. पुष्पा कुमारी, कांशी राम,पूजा आबाद
कुमार शर्मा अनिल,बलबीर सिंह वर्मा ‘वागीश’,डॉ. कैलाश कौशल,बलविन्द्र सिंह सरपंच, कौशल समीर (सोनू),बलवंत सिंह मान, कृष्णलता यादव,बिंदु शर्मा ‘नेहा’
खुशबू जैन हांसी, डॉ. बी. एल. सैनी,गरिमा राकेश ‘गर्विता’
बृज बाला गुप्ता,बसन्ती पंवार,भूप सिंह भारती,मदन लाल राज,मधुलिका सिन्हा,डॉ. मधुकांत,मनजीत शर्मा ‘मीरा’,मीना रानी,मीनाक्षी पारीक,मुकेश दुहन ‘मुकू,मुकेश पासवान,मुनीष शाद,मुरारी लाल अरोड़ा ‘आजाद’
डॉ. तेजिंद्र,डॉ. तृप्ति गोस्वामी,दर्शना जांगड़ा, दलबीर फूल’,दिलबाग अकेला,डॉ. धर्मपाल साहिल,डॉ. नीना छिब्बर,नीलम व्यास स्वयंसिद्धा,डॉ. नीरू पारीक ‘नीर’, डॉ. नीरू मित्तल नीर,नीरू मेहता,एडवोकेट नीलम नारंग,डॉ. रमाकांता,राजेंद्र कुमार शर्मा,डॉ. रामअवतार कौशिक
राकेश कुमार जैनबन्धु, रीतू रुत,डॉ. रूप देवगुण,रेणु सिंह राधे्ल,ललिता विम्मी्लाडो कटारिया,डॉ. विकास आनंद, विजय भारद्वाज,विनोद सिल्ला,सचिन सुरबरा,सत्यप्रकाश भारद्वाज,संतोष अग्रवाल सागर,सरदानंद राजली,सरोज दहिया,सरोज कुमार श्वेता,सावित्री धारीवाल,सीमा शर्मा
सीमा जोशी मूथा,सुकीर्ति भटनागर, सुदेश कुमारी, सुरेन्द्र कल्याण,सुरेश कुमार ‘कल्याण’, सुरेश पंचारिया, सूबे सिंह सुबोध, बरवाला,डा. मेजर शक्तिराज, डॉ. शील कौशिक
प्रो. श्यामलाल कौशल,हरीश झंडई,हरीश सेठी ‘झिलमिल’ आदि ने कविता को बहुत सुंदर शब्दों में पिरोया है। सभी की कविता देना सम्भव नहीं है। इसलिए नाम देने की कोशिश की है बहुत खूबसूरत किताब के लिए विपिन पब्लिकेशन,रोहतक का आभार व लघु कविता सम्मान समारोह में सम्मानित हुए आप सभी को हार्दिक बधाई।
चर्चाकार… श्री मनजीत सिंह
सहायक प्राध्यापक (उर्दू), कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय कुरुक्षेत्र
manjeetbhawaria@gmail.com
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जीका हिन्दी बाल -साहित्य एवं हिन्दी साहित्य की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 ₹51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य” के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है कहानीकार: डॉ. रघुराज सिंह ‘कर्मयोगी’ जी द्वारा लिखित बाल कहानी संग्रह – “नानी-दादी की वैज्ञानिक अनमोल कहानियां” की समीक्षा।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २३२ ☆
☆ पुस्तक चर्चा ☆ नानी-दादी की वैज्ञानिक अनमोल कहानियां – कहानीकार: डॉ. रघुराज सिंह ‘कर्मयोगी’ ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆
पुस्तक: नानी-दादी की वैज्ञानिक अनमोल कहानियां
कहानीकार: डॉ. रघुराज सिंह ‘कर्मयोगी‘
प्रकाशक: स्वयं कहानीकार
पृष्ठ: 151 (सजिल्द)
मूल्य: ₹300
समीक्षक: ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश‘
☆ तकनीकी विषयों पर बालकों के लिए एक बेहतरीन पुस्तक ☆
बच्चों के लिए तकनीकी विषयों पर बहुत कम लिखा गया है। इसका मुख्य कारण यह है कि तकनीकी भाषा कठिन, क्लिष्ट और दुरूह होती है। उस पर कितनी ही सहजता और सरलता से कलम चलाई जाए, फिर भी पूर्ण सरलता नहीं आ पाती, क्योंकि तकनीकी शब्दों का उपयोग उसी भाषा के अनुरूप करना पड़ता है। हिंदी में ऐसे शब्दों के सहज विकल्प कम प्रचलित हैं।
दूसरा कारण यह है कि तकनीकी शब्दावली अक्सर अंग्रेजीनिष्ठ व वैज्ञानिक होती है। हिंदी में अभी तक इतने वृहद स्तर पर प्रयास नहीं किए गए हैं कि इन शब्दों के लिए सरल व प्रचलित हिंदी शब्द उपयोग में लाए जा सकें। इन कारणों से, जब कोई रचनाकार वैज्ञानिक और तकनीकी विषयों पर लिखता है, तो रचना रोचक और रोमांचक तो होती है, मगर उसमें भाषागत जटिलता आ जाती है और बाल-सुलभ सहजता की कमी रह जाती है।
इन चुनौतियों के बावजूद, डॉ. रघुराज सिंह ‘कर्मयोगी’ ने इस दिशा में एक अभिनव प्रयास किया है ताकि बच्चों को तकनीकी विषयों पर बाल-सामग्री उपलब्ध हो सके। उन्होंने वैज्ञानिक उपलब्धियों, भारत में विज्ञान और अंतरिक्ष के क्षेत्र में बढ़ते कदमों जैसे अनेक विषयों को सहजता से उठाया है।
डॉ. कर्मयोगी ने विविध तकनीकी विषयों को चुनकर उन पर रचनाएं तैयार की हैं। उन्होंने धातु विज्ञान, अंतरिक्ष विज्ञान, चंद्र अभियान (रोवर, लैंडर, दक्षिणी ध्रुव), कृषि, हरित क्रांति, खाद्य समस्या, मिसाइल कार्यक्रम, अणु-परमाणु, और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) जैसे अनेक विषयों पर अपनी कलम चलाई है।
समीक्ष्य पुस्तक में रचनाओं के शीर्षक न केवल विषय-वस्तु को, बल्कि उसके मर्म को भी प्रदर्शित करते हैं। रचनाकार ने विशेष ध्यान रखा है कि रचना बोझिल न हो। इसी उद्देश्य से ‘नानी-दादी’ के संवादों के माध्यम से तकनीकी जानकारी को सरल और ग्राह्य बनाया गया है।
रचनात्मक क्षेत्र में ऐसे प्रयास कम ही देखने को मिलते हैं। चूंकि डॉ. रघुराज सिंह का जुड़ाव रेलवे से रहा है, इसलिए उन्होंने रेलवे की तकनीकी जानकारी पर भी काफी लिखा है और उन्हें इसके लिए पुरस्कृत भी किया गया है।
कुल मिलाकर, यह पुस्तक तकनीकी विषयों को रोचकता के साथ प्रस्तुत करती है। बच्चों द्वारा विज्ञान को जानने, समझने और आत्मसात करने के लिए यह एक बेहतरीन पुस्तक है। आशा है कि तकनीकी क्षेत्र की रचना होने के कारण इसका खुले दिल से स्वागत किया जाएगा। पुस्तक की छपाई उत्तम है, हालाँकि कहीं-कहीं जल्दबाजी में संपादन की कमी (सफाई) अखरती है। मूल्य उचित है।
☆ पुस्तक चर्चा ☆ समकालीन कथा-साहित्य 2025 : एक सिंहावलोकन ☆ समीक्षक – श्री दीपक गिरकर ☆
समकालीन हिंदी कथा साहित्य समाज और जीवन के बदलते यथार्थ का सजीव दर्पण है। समकालीन कथाकारों ने पारिवारिक, सामाजिक और सांस्कृतिक संबंधों में हो रहे तनाव, विघटन और जटिलताओं को गहराई और ईमानदारी के साथ प्रस्तुत किया है। वे न केवल बाहरी घटनाओं, बल्कि पात्रों के आंतरिक संघर्ष, मानसिक और भावनात्मक उथल-पुथल को भी उजागर करते हैं। स्त्री विमर्श, दलित और अल्पसंख्यक प्रश्न, भूमंडलीकरण, बाजारवाद और दो पीढ़ियों के वैचारिक अंतर जैसे विषयों को कथाएँ केंद्र में लाती हैं। समकालीन कहानी जीवन के भोगे हुए सत्यों और सामाजिक असमानताओं से सीधे टकराती है, पाठकों को सोचने और सामाजिक यथार्थ का मूल्यांकन करने के लिए प्रेरित करती है। इस दौर की कहानी न केवल यथार्थवाद पर आधारित है, बल्कि भाषा, शैली और शिल्प में नवाचार और प्रयोगशीलता के माध्यम से जीवन की जटिलताओं को सजीव और प्रामाणिक रूप में चित्रित करती है। प्रमुख कथाकार जैसे गीतांजलि श्री, चित्रा मुद्गल, नासिरा शर्मा, बलराम, संजीव, पंकज सुबीर, डॉ. हंसा दीप, सुधा ओम ढींगरा, तेजेन्द्र शर्मा, प्रज्ञा रोहिणी, अशोक वाजपेयी, उदय प्रकाश, ममता कालिया, आशा शर्मा ‘विपुला’, सुषम बेदी, प्रभा खेतान, मुद्राराक्षस, निलय उपाध्याय, शशिभूषण द्विवेदी, विजयदान देथा, रामस्वरूप किसान, ज्ञानरंजन, नैना जायसवाल, सूर्यबाला, मधुरेश, विनोद कुमार शुक्ल, काशीनाथ सिंह, सत्य व्यास, मानव कौल, मृदुला गर्ग, उषा प्रियंवदा, अस्ग़र वजाहत, अनामिका, रत्नकुमार सांभरिया, गंगाराम राजी, बसंती पंवार, नंदकिशोर आचार्य, सांवर दइया, डॉ. अजय शर्मा, गीता श्री, मनीषा कुलश्रेष्ठ, मनीष वैद्य, तेज प्रताप नारायण, गुलाब कोठारी, सुधा अरोड़ा, संतोष दीक्षित, ज्ञानचन्द बागड़ी, अलका सरावगी, जया जादवानी, डॉ. उर्मिला शिरीष, निधि अग्रवाल, डॉ. राजेंद्र रत्नेश, लक्ष्मी शर्मा, शिवेंद्र, मृदुला श्रीवास्तव, ममता सिंह, अनिता रश्मि, पल्लवी विनोद, मुकेश पोपली, संतोष श्रीवास्तव, सुधा जुगरान, प्रितपाल कौर, जयंती रंगनाथन, एम.एम. चन्द्रा, पारमिता षड़ंगी, कविता वर्मा, आभा श्रीवास्तव, सूर्यकांत नागर, अश्विनी कुमार दुबे, ज्योति जैन, सीमा व्यास, अरुण अर्णव खरे, दिलीप जैन, शेर सिंह आदि ने अपने कथ्य और शैली के माध्यम से समकालीन जीवन की यथार्थता और मानवीय संवेदनाओं को उभारते हुए हिंदी कथा साहित्य को समृद्ध किया है।
वर्ष 2025 में प्रकाशित समकालीन हिंदी कथा साहित्य जो मेरे द्वारा पढ़ा गया :
राजपाल एंड संस से प्रकाशित कथाकार पंकज सुबीर का कहानी संग्रह “ख़ैबर दर्रा” मानवीय संवेदनाओं, सामाजिक यथार्थ और मनोवैज्ञानिक गहराई का प्रभावशाली दस्तावेज़ है। उनकी किस्सागोई की शैली आम जिंदगी के निकट है, जिसमें पात्र, परिवेश और घटनाएँ अत्यंत जीवंत और सजीव प्रतीत होती हैं। राजनीति, साम्प्रदायिकता, मूल्यहीनता, अवसरवाद, पितृसत्ता, भ्रष्ट व्यवस्था, प्राकृतिक सौंदर्य, थर्ड जेंडर और होमोफोबिया जैसे विविध सामाजिक मुद्दे उनकी कहानियों में सहज रूप से उपस्थित होते हैं। कथाकार इंसानी भावनाओं, स्मृतियों और जीवन–संघर्षों को इतनी बारीकी से उकेरते हैं कि पाठक हर कहानी के साथ खुद को जुड़ा हुआ महसूस करता है। इस संग्रह की कहानियाँ – “एक थे मटरू मियाँ एक थी रज्जो”, “हरे टीन की छत”, “ख़ैबर दर्रा”, “वीरबहूटियाँ चली गईं”, “देह धरे का दंड”, “निर्लिंग”, “आसमान कैसे–कैसे”, “कबीर माया पापणीं” और “इजाज़त@घोड़ाडोंगरी”—केन्द्र में इंसानी जटिलताएँ, मासूम प्रेम, सामाजिक विसंगतियाँ और बदलते मूल्य आते हैं। सुबीर सामाजिक अन्याय, मीडिया की दिखावटी दुनिया, प्रकृति से बढ़ती दूरी, लिंग–पहचान की पीड़ा और रिश्तों में आए बदलाव को बेहद संवेदनशीलता और प्रभावशीलता से प्रस्तुत करते हैं। संग्रह की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसकी हर कहानी न सिर्फ विचार जगाती है, बल्कि पाठक को भीतर तक छू जाती है। पंकज सुबीर का कथा-शिल्प, भाषा का सहज प्रयोग और कथानक की पकड़ उन्हें समकालीन हिन्दी कहानीकारों में विशिष्ट बनाती है।
राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित गीतांजलि श्री का “सह-सा” उपन्यास छोटे-छोटे प्रसंगों से निर्मित मानव-नियति और विविध जीवन-संदर्भों के सह-अस्तित्व की कथा है, जिसमें एक परिवार के भीतर की खामोश संघर्ष-स्थितियाँ और दिशाहीनता संवेदनशीलता से उभरती हैं। सेतु प्रकाशन समूह से प्रकाशित रत्नकुमार सांभरिया का उपन्यास “नटनी” केवल एक उपन्यास नहीं, बल्कि साहित्य की वह प्रकाश-रेखा है जो अँधेरे में डूबे समुदायों पर प्रकाश डालकर उन्हें उनकी आत्मगाथा कहने का साहस देती है। यह कृति हाशिये के समाज को केंद्र में रखकर मानवीय गरिमा, सामाजिक न्याय और सांस्कृतिक पहचान के प्रश्नों को नई तीव्रता के साथ उभारती है। सेतु प्रकाशन समूह से प्रकाशित कथाकार तेज प्रताप नारायण के उपन्यास ‘बदलते अक्षांश’ की कथा का केन्द्र पूर्वांचल का एक गाँव है लेकिन इसके कथा-क्षेत्र का विस्तार अमेरिका और यूरोप तक है। तकनीक के क्षेत्र में उच्च शिक्षा प्राप्त कुछ युवाओं के सामाजिक अनुभवों, जीवन संघर्षों और भविष्य की सम्भावनाओं के माध्यम से कथा को विस्तार दिया गया है। सेतु प्रकाशन समूह से प्रकाशित राजू शर्मा के उपन्यास “हलफनामे” में भारतीय समाज का असाधारण आख्यान रचा है। यहाँ एक तरफ शासनतन्त्र की निर्दयता और उसके फरेब का वृत्तान्त है तो दूसरी तरफ सामान्यजन के सुख-दुख-संघर्ष की अनूठी छवियाँ हैं। इस उपन्यास में यथार्थ के भीतर बहुत सारे यथार्थ हैं, शिल्प में कई-कई शिल्प हैं, कहानी में न जाने कितनी कहानियाँ है। राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित अलका सरावगी का उपन्यास “कलकत्ता कॉस्मोपॉलिटन : दिल और दरारें” कॉस्मोपॉलिटन कलकत्ता की जटिल गाथाओं और विविध जीवन-स्थितियों को उजागर करता है। यह ‘सुनील बोस/मोहम्मद दानियाल’ की पहचान, संघर्ष और सच-झूठ के द्वंद्व के माध्यम से शहर के सामाजिक, सांस्कृतिक और मानवीय विविधताओं को मार्मिक और प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करता है।
सेतु प्रकाशन समूह से प्रकाशित संतोष दीक्षित के उपन्यास “ख़लल” आज की एक विकट समस्या की शिनाख्त करता है। उपन्यास सियासत और पूँजी के गठजोड़ को उजागर करता है, जो गरीबों को विस्थापित कर कंपनियों के लिए भूमि हड़पना चाहती हैं। मुआवज़े और रोजगार के सब सपने छल साबित होते हैं, और समुदाय दोहरे विस्थापन – ज़मीन और सौहार्द दोनों के खोने का शिकार बनता है। राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित अनामिका का उपन्यास “दूर देश के परिन्दे” स्वतंत्रता-पूर्व और आसपास के वर्षों में विश्व-प्रसिद्ध पुरुषों के जीवन में आई स्त्रियों की कथा प्रस्तुत करता है। ये स्त्रियाँ उस समय की महिलाओं के लिए प्रेरणा बनती हैं, क्योंकि उनके सहचर्य में धैर्य, ममता, सहिष्णुता और त्याग जैसे गुण स्त्री और पुरुष दोनों में संतुलित रूप से विकसित होने की संभावना दिखती है। सेतु प्रकाशन समूह से प्रकाशित ज्ञानचन्द बागड़ी का उपन्यास “दिल्ली दयार” मुण्डका गाँव के एक परिवार के माध्यम से 1977 से वर्तमान तक हुए सामाजिक बदलावों – जाति, परंपरा और संबंधों के रूपांतरण को दिखाता है। बेबे की जीवन-यात्रा भेदभाव से इंसानियत की ओर बढ़ते समाज का प्रतीक बनकर उभरती है। सरल भाषा और व्यापक सामाजिक संदर्भ इसे पूरे गाँवों की बदलती कथा बना देते हैं। राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित प्रत्यक्षा का उपन्यास “शीशाघर” विभाजन और बिखराव के बावजूद अंदरूनी मानवीय एकता की कथा कहता है, जो पात्रों को दूरियों और देशों के बावजूद आपस में गहरे रूप से जोड़ती है। यह आज के समय की संवेदनाओं की प्रतिध्वनि है। राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित वन्दना राग का उपन्यास “सरकफंदा” भारत के अतीत और वर्तमान के बीच फैली कथा कहता है, जहाँ भविष्य पर लगातार शिकंजा कसता है। यह उपन्यास हमारे समय के यथार्थ की सघन, आवेग-भरी कलात्मक दुनिया का आईना है।
राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित जया जादवानी का उपन्यास “इस शहर में इक शहर था” विभाजित सिन्ध और उसके लोगों की गहरी कसक एवं पीड़ा का मार्मिक आख्यान प्रस्तुत करता है। राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित सुजाता का उपन्यास “दरयागंज वाया बाज़ार फ़त्ते ख़ाँ” तीन पीढ़ियों के माध्यम से विभाजन झेलने वाले मुल्तानी लोगों की अनकही दास्तान खोलता है – उनकी ज़बान, तहज़ीब और अपनी पहचान खोने के भय सहित। उपन्यास विभाजन की ज्ञात त्रासदी से आगे बढ़कर इन छिपी कथाओं को उजागर करता है। राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित सविता भार्गव का उपन्यास “जहाज़ पाँच पाल वाला” तीन स्वयंमुख़्तार स्त्रियाँ – वर्तिका, चारुचित्रा और एमिली की कथा कहता है, जिन्होंने पितृसत्तात्मक बाधाओं, घर-परिवार और परंपरा के विरोध के बावजूद अपनी राह बनाई और रंगमंच एवं जीवन दोनों में एक क़ाबिले-रश्क स्थान स्थापित किया। राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित शोभा लिम्बू का उपन्यास “शुकमाया हांगमा” लिम्बू आदिवासी समुदाय की एक सशक्त, स्वाभिमानी स्त्री की वास्तविक कहानी पर आधारित है। बर्मा युद्ध की पृष्ठभूमि में यह कृति विस्थापित लोगों की पीड़ा और क्षत-विक्षत मन को मार्मिक रूप से प्रस्तुत करती है, साथ ही हिन्दी पाठकों के लिए कम परिचित ऐतिहासिक और सांस्कृतिक परिदृश्य उजागर करती है। राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित बलराम का कहानी संग्रह “शुभ दिन” में “शुभ दिन” कहानी पति-पत्नी के संवेदनशील दाम्पत्य का मार्मिक चित्र प्रस्तुत करती है, जहाँ प्रेम, संवेदनशीलता और करुणा का समाहार है। कथा का नायक स्त्रीचेता पुरुष है, जो पत्नी के संकेतों को समझता है और उसके भावों का सम्मान करता है। यह कहानी ओ हेनरी की ‘द गिफ्ट्स ऑफ द मेजाई’ जैसी मार्मिकता लिए हुए है। समकालीन हिन्दी कहानी में “शुभ दिन” और बलराम की अन्य कहानियाँ ऐसे संवेदनशील पुरुषों की कल्पना करती हैं, जो स्त्री की भावनाओं को समझकर उसके साथ सजीव, सामंजस्यपूर्ण संबंध बनाए रख सकते हैं।
राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित डॉ. राजेंद्र रत्नेश का उपन्यास “निर्लेप नारायण” श्रावक उमरावमल ढढ्ढा की जीवनी पर आधारित है, जिनका जीवन सरल, सीधा और उदाहरणीय था। बड़े परिवार और पुरखों की संपत्ति के बावजूद उन्होंने भोग-विलास में नहीं रहकर अपने जीवन को दान, नैतिकता और इंसानियत के मार्ग पर समर्पित किया। वे धर्म, जाति और संप्रदाय से ऊपर मानवीय मूल्य को प्राथमिकता देते थे और सम्यक् अर्थों में महावीर मार्ग के अनुयायी थे। व्यवसाय, वकालत और वृत्तिका में सफलता न मिलने के बावजूद उन्होंने अमीरी छोड़कर साधारण जीवन अपनाया, और अपनी भव्य हवेली के बावजूद सीधी-सादी, निर्विकारी जिंदगी जिया। शिवना प्रकाशन से प्रकाशित लक्ष्मी शर्मा का उपन्यास “लीला गाथा-एक कुप्रसिद्ध इंदौरी औरत की” लीला इंदौर की एक निम्न मध्यम वर्गीय बस्ती की सच्ची, संघर्षशील महिला की कथा है। लक्ष्मी शर्मा ने अपनी भावभीनी लेखनी से सन सत्तर के इंदौर की उस बस्ती और उसके निवासियों के जीवन, संघर्ष और संस्कृति को जीवंत किया है। कथा में लीला के कठिन वैवाहिक और सामाजिक अनुभवों के बावजूद उसका व्यक्तित्व और संघर्ष उसे और उज्जवल बनाते हैं। उपन्यास इंदौर को स्वयं एक पात्र बनाकर पाठक को उसी समय-काल में ले जाता है और पात्रों के सुख-दुख को महसूस करने का अवसर देता है।
अद्विक प्रकाशन से प्रकाशित “11 कहानियाँ सूर्यकांत नागर” वरिष्ठ साहित्यकार सूर्यकांत नागर के कहानी संग्रह में संकलित कहानियाँ सामान्य, निम्न और निम्न-मध्यवर्गीय व्यक्ति के जीवन-संघर्ष, नैतिक द्वंद्व और मनोवैज्ञानिक उलझनों को संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत करती हैं। लेखक पात्रों की बाहरी परिस्थितियों के साथ उनके आंतरिक मनोभावों को भी गहराई से उकेरते हैं, जिससे कथाएँ जीवंत और विश्वसनीय बनती हैं। ‘त्रिशंकु’, ‘तमाचा’, ‘कायर’, ‘तबादला’ और ‘खबर से बाहर’ जैसी कहानियाँ ईमानदारी, कायरता, पूर्वाग्रह, व्यवस्था की विफलता और टूटते विश्वास पर तीखे प्रश्न उठाती हैं। सरल, सहज और व्यंग्यात्मक भाषा में लिखी गई ये कहानियाँ मानवीय मूल्यों और सामाजिक चेतना को केंद्र में रखती हैं। यह संग्रह समकालीन हिंदी कथा-साहित्य में नागर की सशक्त और प्रतिबद्ध रचनात्मक उपस्थिति को रेखांकित करता है। शिवना प्रकाशन से प्रकाशित सुधा जुगरान का उपन्यास “मन के चौहट्टे पर बोनसाई” मध्यम वर्गीय परिवार और कामकाजी युवाओं के जीवन का सामाजिक यथार्थ दर्शाता उपन्यास है। सुधा जुगरान ने आठ मुख्य पात्रों – सुनंदा, समर, सोमी, रोमिल, रियाना, अनुपम, रिजुल और मेहुल के माध्यम से दाम्पत्य, परिवार और मित्र संबंधों में उत्पन्न द्वंद्व और संवादहीनता का मार्मिक चित्रण किया है। उपन्यास उत्तराखंड के प्राकृतिक और सांस्कृतिक परिवेश में भी गहराई से सेट है, जिससे पाठक कथानक में पूरी तरह डूब जाता है। लेखिका की मनोवैज्ञानिक समझ, पात्रों की स्वाभाविकता और सामाजिक सरोकार उपन्यास की प्रमुख विशेषताएँ हैं। शिवना प्रकाशन से प्रकाशित प्रियंका ओम का उपन्यास “साज़-बाज़” केवल एक प्रेम-कथा नहीं, बल्कि आत्म-प्रतिबिंबित दस्तावेज़ है, जिसमें नायिका देविका के माध्यम से लेखिका ने अपने भीतर की संवेदनाओं और द्वंद्वों को व्यक्त किया है। यह उपन्यास भावनात्मक, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक यात्रा है, जो आधुनिक स्त्री की स्वतंत्रता, प्रेम और आत्म-अस्तित्व की जटिलताओं को संवेदनशीलता से चित्रित करता है।
न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन से प्रकाशित आभा श्रीवास्तव का कहानी संग्रह “पच्चीसवां प्रेम पत्र” की कहानी “पच्चीसवां प्रेम पत्र” स्त्री जीवन, प्रेम और सामाजिक यथार्थ का संवेदनशील चित्रण है। कहानी में मीना अपने लॉकर में हार खोजते हुए अतीत की परतों को खोलती है और राहुल, उसका पहला प्रेम, स्मृति में जीवित हो उठता है। चौबीस प्रेम पत्र माँ द्वारा जला दिए गए थे, लेकिन माउथ ऑर्गन में लिपटा पच्चीसवां पत्र अतीत की यादों और अधूरे प्रेम को पुनर्जीवित करता है। यह केवल मीना की कहानी नहीं, बल्कि उस पीढ़ी की कथा है, जिनके पहले प्रेम को सामाजिक और पारिवारिक प्रतिबंधों ने पीछे छोड़ दिया। कहानी में प्रेम केवल रोमांस नहीं, बल्कि भावनात्मक संघर्ष, विरह और संवेदनाओं का जटिल मिश्रण है। सरल, स्पष्ट और संवादप्रधान भाषा के माध्यम से लेखिका ने प्रेम, वियोग, आत्म-सम्मान और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की मार्मिकता को प्रभावशाली ढंग से कथानक में पिरोया है। यह संग्रह न केवल प्रेम और वियोग की दास्तान है, बल्कि स्त्री की अस्मिता, संवेदनशीलता और संघर्ष का सजीव चित्रण भी प्रस्तुत करता है। राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित निधि अग्रवाल का कहानी संग्रह “प्रेम एक पालतू बिल्ली” जीवन की जटिलताओं, संघर्ष और मानवीय संवेदनाओं का मार्मिक चित्रण प्रस्तुत करता है। कहानियाँ पात्रों के भीतर की लड़ाई, अकेलेपन, पीड़ा और आशा को जीवंत रूप में दिखाती हैं। उनकी लेखनी सरल, संवेदनशील और प्रभावशाली है। यह संग्रह केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि जीवन, प्रेम और मानवीय संघर्षों की गहन विचार यात्रा कराता है।
शिवना प्रकाशन से प्रकाशित मनीष वैद्य के कहानी संग्रह “गुलाबी इच्छाएँ” में स्वच्छंद, निश्छल और संवेदनशील प्रेम की जीवंतता प्रस्तुत होती है। ये कहानियाँ पाठक को प्रेम की गहराइयों, अधूरी इच्छाओं और बचपन की मासूम यादों से जोड़ती हैं। हर कहानी अपने प्रतीकात्मक और भावपूर्ण स्वरूप से प्रेम के विभिन्न आयामों को उजागर करती है। ग्रामीण परिवेश और प्राकृतिक दृश्य पात्रों की अनुभूतियों के साथ सहज रूप से गूंथे गए हैं। यह संग्रह प्रेम को नए दृष्टिकोण और कलात्मक अभिव्यक्ति के साथ प्रस्तुत करता है, जिसमें जीवन, स्मृति और मानवीय संवेदनाओं का सुंदर मिश्रण है। शिवना प्रकाशन से प्रकाशित “एक ख़ला है सीने में” (किन्नर विमर्श की कहानियाँ) किन्नर समुदाय के जीवन, संघर्ष और सामाजिक बहिष्कार को उजागर करता है। इस संकलन की 22 कहानियाँ किन्नरों के अधिकार, आत्म-सम्मान और मानवीय संवेदनाओं को सामने लाती हैं। परिवार और समाज द्वारा त्याग और भेदभाव झेल रहे किन्नरों की पीड़ा, आशा और संघर्ष को कथाकारों ने यथार्थ और संवेदनशीलता के साथ चित्रित किया है। संपादक सुधा ओम ढींगरा ने इन कहानियों में समाज के प्रति सक्रिय दृष्टिकोण और किन्नरों के जीवन की जटिलताओं को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है। यह संग्रह पाठक को अंत तक बांधे रखता है और किन्नर जीवन की हृदयस्पर्शी वास्तविकता से रूबरू कराता है। संकलन का संपादन सुपरिचित प्रवासी साहित्यकार, कथाकार सुधा ओम ढींगरा ने किया हैं।
शिवना प्रकाशन से प्रकाशित तेजेंद्र शर्मा का कहानी संग्रह “गोद उतराई” की कहानियाँ भारतीय प्रवासियों के संघर्ष, पश्चिमी समाज की जटिलताओं और मानवीय संबंधों की गहराइयों को यथार्थवादी ढंग से उजागर करती हैं। जीवन और अनुभवों – जैसे लंदन प्रवास, विमान परिचालन, कैंसर पीड़ित पत्नी का संघर्ष से प्रेरित, उनकी रचनाएँ भावनात्मक और संवेदनशील हैं। पात्रों के आंतरिक द्वंद्व, संवादों और परिवेश का सजीव चित्रण उनकी कहानियों की खासियत है। संग्रह की 7 कहानियाँ जीवन के यथार्थ, सामाजिक और पारिवारिक जटिलताओं, अकेलेपन, मानसिक संघर्ष और मानवीय संवेदनाओं को उद्घाटित करती हैं। उदाहरण के लिए, “गोद उतराई” कहानी दंपत्ति द्वारा बच्चे को गोद लेने और एजेंसी की धोखाधड़ी से उत्पन्न भावनात्मक संघर्ष को संवेदनशीलता से प्रस्तुत करती है। शिवना प्रकाशन से प्रकाशित डॉ. हंसा दीप का कहानी संग्रह “अधजले ठुड्डे” में 17 कहानियाँ हैं, जिनमें जीवन की विविध परिस्थितियों, मानसिक संघर्षों, अकेलेपन और मानवीय संवेदनाओं का सटीक चित्रण मिलता है। उदाहरण के लिए, “अधजले ठुड्डे” कहानी में पात्र की आंतरिक उथल-पुथल, गुस्सा और मानसिक शांति की तलाश प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत की गई है। उनका कथा-संसार यथार्थवाद, काव्यात्मकता, भाषा की सुंदरता और भावनात्मक गहराई से भरा है।हंसा दीप की लेखनी समाज की जटिलताओं और मानवीय भावनाओं को बेहद सूक्ष्म और प्रभावशाली ढंग से उजागर करती है। वे अपने पात्रों को आम जीवन और परिवेश से उठाकर जीवंत बनाती हैं, जिनमें व्यक्तिगत, पारिवारिक और सामाजिक द्वंद्वों की गहरी छाया दिखाई देती है। उनके पास गहरी मनोवैज्ञानिक समझ है, जो पात्रों के अंतस को स्पष्ट रूप से चित्रित करती है।
डॉ. परिधि शर्मा के कहानी संग्रह “प्रेम के देश में” में 15 कहानियाँ शामिल हैं, जिनमें “प्रेम के देश में” रीमा के प्रेम और परिवार के बीच संघर्ष, “आर्थिक सर्वेक्षण” में सरकारी योजनाओं और समाज की विफलता, “उम्मीद” में वृद्ध दंपत्ति का अकेलापन, “तोहफा” में बच्चों की असुरक्षा और समाज की असंवेदनशीलता, तथा “वजूद” में रोजा की आत्म-पहचान और आंतरिक द्वंद्व जैसे विषय प्रभावशाली रूप से प्रस्तुत किए गए हैं। डॉ. परिधि शर्मा की लेखनी जीवन और समाज की जटिलताओं को सूक्ष्म और संवेदनशील ढंग से चित्रित करती है। उनका यह संग्रह नारी मन की पीड़ा, सामाजिक दबाव, पारिवारिक जिम्मेदारियाँ, आंतरिक द्वंद्व, प्रेम, त्याग और मानवीय संवेदनाओं की गहराई को उजागर करता है। नीरज बुक सेंटर से प्रकाशित शेर सिंह का कहानी संग्रह “चेन्ना माया” में 17 कहानियाँ संकलित है। शेर सिंह अपनी कहानियों में जीवन के छोटे-छोटे प्रसंगों को बड़ी सहजता और सर्जनात्मक क्षमता के साथ प्रस्तुत करते हैं। उनके पात्र यथार्थवादी और जीवंत हैं, जिन्हें ऐसा लगता है कि लेखक उनके साथ रहा हो। कहानियाँ पहाड़ी परिवेश, खासकर कुल्लू और उसके आसपास के ग्रामीण जीवन, सामाजिक समस्याओं, गरीबी, स्त्री पीड़ा, अंधविश्वास और शोषण की वास्तविक झलक पेश करती हैं। डायमंड बुक्स से प्रकाशित अनिल गोयल का उपन्यास “नया सवेरा” 1975 में लगे आपातकाल की घटनाओं पर आधारित एक मर्मस्पर्शी कथा है, जो इतिहास, तथ्य और हृदयस्पर्शी नेहाख्यान के माध्यम से उस काली रात का यथार्थ उजागर करती है। इक्कीस माह तक चले आपातकाल में जेलों में बंद किए गए लाखों लोगों की पीड़ा, असंवैधानिक अत्याचार और समाज पर पड़े संकटों को यह उपन्यास जीवंत करता है।
शिवना प्रकाशन से प्रकाशित अर्चना पैन्यूली के कहानी संग्रह “पुराने घर में आखिरी दिन” प्रवासी जीवन, स्त्री विमर्श और मानवीय संवेदनाओं को चित्रित करता है, जिसमें डेनमार्क और भारत के बीच के सांस्कृतिक अनुभवों का गहरा चित्रण है। शिवना प्रकाशन से प्रकाशित उजाला लोहिया का उपन्यास “नींद और जाग” जुड़वाँ भाई-बहन की कथा है, जिन्हें विज्ञान और अध्यात्म दोनों विरासत में मिली है। दोनों की जीवन दृष्टि और लक्ष्य भिन्न हैं, लेकिन समय और अनुभव उनके लक्ष्यों को भी बदल देते हैं। यह उपन्यास अध्यात्म और विज्ञान के मिश्रण, आधुनिकता और परंपरा, मानसिक और भौतिक क्षमताओं की तुलना और संभावनाओं पर विचार करने के लिए प्रेरित करता है। नेशनल बुक ट्रस्ट से प्रकाशित गुलाब कोठारी के उपन्यास “स्त्री देह से आगे” में दर्शाया है कि मां, बहन, पत्नी और पुत्री सभी रूपों में स्त्री की दिव्यता शाश्वत है; उसका रौद्र रूप भी उतना ही प्रभावशाली और विध्वंसक है। आज यह अंतर्निहित दिव्यता शिक्षा और संचार माध्यमों के आवरणों में दब गई है। लेखक ने प्राचीन वाङ्मय के उदाहरणों के आधार पर वैज्ञानिक दृष्टि से इन आवरणों को उद्भासित किया है। सर्व भाषा ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित “नंदिता अभिनव” कथाकार अशोक लव द्वारा लिखित एक चर्चित समकालीन हिंदी उपन्यास है, जो आधुनिक भारतीय समाज, राजनीति और युवाओं के बदलते मूल्यों को दर्शाता है, जिसमें नंदिता नामक मुख्य पात्र के संघर्षों और समाज के कटु यथार्थ को दिखाया गया है; यह उपन्यास वैश्विक परिदृश्यों (जैसे रूस-यूक्रेन युद्ध) और देश की सामयिक समस्याओं को छूता है और सशक्तिकरण व सामाजिक बदलाव की बात करता है। वाणी प्रकाशन से प्रकाशित अश्विनीकुमार दुबे के कहानी संग्रह “सफल प्रेम विवाह की असफल दाम्पत्य कथाएँ” की कहानियाँ किसी प्रकार का अंतिम निर्णय या फैसला नहीं सुनातीं। वे न तो सही-गलत का कठोर निष्कर्ष प्रस्तुत करती हैं और न ही किसी न्यायालय की तरह आदेश देती हैं। वास्तव में, ये कहानियाँ किसी भी अदालती फैसले से कहीं अधिक व्यापक और मानवीय हैं। क्योंकि अदालतें कानून की भाषा में निर्णय करती हैं, जबकि ये कहानियाँ भावनाओं, परिस्थितियों और संबंधों की जटिलताओं को सामने रखती हैं, जहाँ हर उत्तर के साथ कई नए प्रश्न जन्म लेते हैं। भारतीय समाज में विवाह केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि दो परिवारों, परंपराओं और अपेक्षाओं का बंधन माना जाता है। इसी कारण जब कोई विवाह असफल होता है, तो उसे सामाजिक विफलता के रूप में देखा जाता है, न कि मानवीय अनुभव के रूप में। कहानी संग्रह स्त्री-विमर्श के क्षेत्र में भी एक महत्त्वपूर्ण हस्तक्षेप करता है। यह पुरुषसत्ता को बहुत पीछे छोड़ते हुए कथित नारीवादी आग्रहों से आगे बढ़ता है और ‘पॉप फ़ेमिनिज़्म’ पर गंभीर विमर्श के द्वार खोलता है। यहाँ स्त्री केवल विमर्श का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक संरचनाओं को प्रश्नांकित करने वाली चेतन सत्ता के रूप में उपस्थित है।
संजीव की कहानी “यह दुनिया अब भी सुन्दर है” एक मार्मिक कहानी है जो कोरोना काल की भयावहता के बीच इंसानियत और प्रेम की मिसाल पेश करती है। पुलिसकर्मी श्रीनिवासन अपनी बीमार पत्नी कन्नीमनी के साथ साइकिल यात्रा पर निकलता है, कठिनाइयों का सामना करता है, पर आपसी प्रेम, त्याग और उम्मीद के सहारे मंजिल तक पहुँचता है। कथा विषम परिस्थितियों में मानवीय रिश्तों की गहराई और जीवन की सुंदरता को उजागर करती है। पंकज सुबीर की कहानी “समय‑नदी के उस पार” उस “समय की नदी” के प्रतीक के माध्यम से बुज़ुर्गों, यादों, पारिवारिक टूटन जैसी संवेदनशील विषयों को सामने लाती है। कहानी एक बेटे की नज़र से अपने बूढ़े पिता की असहज वापसी, परिवार में दूरी, बदलती पीढ़ी व परिवेश, स्मृति और भूल के बीच अंतर जैसी बातों को बयां करती है। पंकज सुबीर की कहानी “प्रेम क्या होता है?” प्रेम को केवल रोमांटिक रूप में नहीं, बल्कि मानवीय जुड़ाव, देखभाल और संवेदना के रूप में प्रस्तुत करती है। पंकज सुबीर की कहानी “रपटना ख़ुल्द से आदम का सुनते आये थे लेकिन …” जो कि वनमाली कथा पत्रिका के नवम्बर – दिसम्बर 2025 अंक में प्रकाशित हुई है, में पूरे सरकारी तंत्र की पोल व्यंग्यात्मक तरीके से खोली है। हंस में प्रकाशित मनीष वैद्य की कहानी “रक्तबीज” मनुष्य के भीतर छुपी हिंसा, क्रूरता और प्रतिशोध की प्रवृत्तियों को संवेदनशील और सजीव तरीके से उजागर करती है। पुराणिक प्रतीक बकासुर के माध्यम से यह दिखाती है कि ये भावनाएँ हमारे भीतर स्वाभाविक रूप से जन्म लेती हैं। कहानी का वर्णन इतना प्रभावशाली है कि यह पाठक के मन में लंबे समय तक गूंजती रहती है और बार-बार पढ़ने की इच्छा जगाती है। “काजली” कहानी जो कि वनमाली कथा पत्रिका के नवम्बर – दिसम्बर 2025 अंक में प्रकाशित हुई है, में मनीष वैद्य ने अनवेकर बाबू के पात्र के माध्यम से कार्यालय की पूरी दुनिया को पाठक के सामने खोल दिया है। इस पात्र के दृष्टिकोण और अनुभवों के जरिए लेखक ने कार्यालय के भीतर छिपी जटिल मानवीय स्थितियों, संघर्ष, तनाव, लालच और कमजोरियों का सजीव चित्रण किया है। अनवेकर बाबू जैसे पात्र हमें दिखाते हैं कि कार्यालय केवल कागज़ों और नियमों का ढांचा नहीं है, बल्कि यह मानव मन की विभिन्न प्रवृत्तियों – ईर्ष्या, लालच, अहंकार, भय और प्रतिशोध का एक अदृश्य खेल भी है। मनीषा कुलश्रेष्ठ की कहानी “हरा समन्दर गोपी चन्दर” जो कि वनमाली कथा पत्रिका के नवम्बर – दिसम्बर 2025 अंक में प्रकाशित हुई है, नायक के भीतर भावनात्मक और रचनात्मक बदलाव को दर्शाती है। मारिया से हुई मुलाकात ने लार्स के अंदर के खालीपन को भर दिया और उसे अपने उपन्यास को पूरा करने की संभावना दिखाई। यह पाठक को मानवीय अनुभव, संवेदनाएँ और सृजनात्मक प्रेरणा के सूक्ष्म पहलुओं से अवगत कराता है। पल्लवी विनोद की कहानी “ब्रह्मकमल” जो कि वनमाली कथा पत्रिका के नवम्बर – दिसम्बर 2025 अंक में प्रकाशित हुई है, स्त्री को केवल पदार्थ समझने और स्त्री को स्त्री के रूप में समझने के बीच के अंतर को बड़े ही प्रभावशाली ढंग से उजागर करती है। यह कहानी सामाजिक और मनोवैज्ञानिक दृष्टि से स्त्री के अस्तित्व, उसकी भावनाओं, उसकी पहचान और उसके अधिकारों को सामने लाती है।