श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”
(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का हिन्दी बाल -साहित्य एवं हिन्दी साहित्य की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 ₹51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य” के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है कहानीकार : अंजना मनोज गर्ग जी द्वारा लिखित पुस्तक – “गुल्लक और उसकी रजाई” की समीक्षा।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २५२ ☆
☆ पुस्तक समीक्षा – गुल्लक और उसकी रजाई – कहानीकार : अंजना मनोज गर्ग ☆ समीक्षक – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆
कहानी-संग्रह : गुल्लक और उसकी रजाई
कहानीकार : अंजना मनोज गर्ग
प्रकाशन सहयोग : राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर
प्रकाशक : बोधि प्रकाशन, जयपुर
प्रथम संस्करण : 2026
ISBN : 978-93-7251-012-6
मूल्य : ₹199/-
समीक्षक : ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’
☆ गुल्लक और उसकी रजाई : बालमन की जिज्ञासा से सामाजिक चेतना तक ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆
बाल साहित्य को लेकर एक सामान्य धारणा यह रही है कि वह बच्चों के मनोरंजन और नैतिक शिक्षण का माध्यम है। किंतु आधुनिक बाल साहित्य ने इस सीमित धारणा से आगे बढ़कर बालक को उसके समय, समाज, पर्यावरण और बदलती जीवन-स्थितियों के बीच देखने का प्रयास किया है। आज का बच्चा केवल परी-कथाओं का पाठक नहीं है; वह तकनीक से परिचित है, प्रश्न करता है, अपने आसपास घट रही घटनाओं को देखता है और अनेक बार बड़ों की स्थापित धारणाओं पर भी सवाल उठाता है। इसलिए आज की बाल कहानी से अपेक्षा है कि वह बालमन की जिज्ञासा को स्वीकार करे और उसे संवेदना, विवेक तथा सामाजिक चेतना से जोड़े।
अंजना मनोज गर्ग का कहानी-संग्रह ‘गुल्लक और उसकी रजाई’ इसी बदलती हुई बाल साहित्यिक चेतना का प्रतिनिधि संग्रह कहा जा सकता है। इसमें बीस कहानियाँ हैं और लगभग प्रत्येक कहानी किसी न किसी समकालीन सरोकार को बालमन के निकट ले आती है। जल-संरक्षण, पर्यावरण, पशु-पक्षी, स्वच्छता, पुस्तकों के प्रति प्रेम, बुजुर्गों की उपेक्षा, पारिवारिक संबंध, त्योहार, प्रकृति और आधुनिक तकनीकी जीवन—ये सभी विषय संग्रह में अपनी अलग-अलग कथात्मक शक्ल में उपस्थित हैं।
इस संग्रह की विशेषता यह है कि लेखिका गंभीर विषयों को बच्चों के सामने सीधे भाषण के रूप में नहीं रखतीं, बल्कि उन्हें कहानी की स्थितियों में बदलने का प्रयास करती हैं। कहीं रजाई कथा का माध्यम बनती है, कहीं पुस्तक स्वयं अपना दर्द व्यक्त करती है, कहीं जंगल एसी की माँग करता दिखाई देता है और कहीं पक्षियों के माध्यम से प्रकृति का मौन संकट सामने आता है। यही रचनात्मक प्रयोग इस संग्रह को सामान्य उपदेशात्मक बालकथाओं से अलग करने का प्रयास करते हैं।
अंजना मनोज गर्ग के आमुख को पढ़ते हुए उनके बाल लेखन की मूल प्रेरणा स्पष्ट होती है। वे बचपन की निर्मलता, अबोधता और जिज्ञासा को अपनी रचनात्मकता का आधार मानती हैं। उनके लिए बालमन प्रश्नों का एक ऐसा संसार है, जहाँ जीवन की साधारण घटनाएँ भी कौतूहल का विषय बन सकती हैं।
उनकी रचनात्मक दृष्टि का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि वे बच्चे को केवल परिवार और विद्यालय के दायरे में नहीं देखतीं। उनके बच्चे जंगल, पक्षियों, पेड़ों, मौसम, जल और घरेलू संसार से भी जुड़े हुए हैं। इसीलिए संग्रह में प्रकृति और मनुष्य का संबंध बार-बार उभरता है।
लेखिका ने यह भी स्पष्ट किया है कि उन्होंने जीवन में काम आने वाले सामान्य किंतु महत्त्वपूर्ण प्रश्नों को बालमन की जिज्ञासा में ढालकर कहानी रचने का प्रयास किया है। यही बात उनके कथा-संसार की आधारभूमि बनती है। वे बड़े प्रश्नों को छोटे प्रसंगों में बदलती हैं और बच्चों को उन प्रसंगों के बीच रख देती हैं।
आज तकनीकी विकास ने बच्चे की दुनिया को अभूतपूर्व रूप से बदल दिया है। मोबाइल, इंटरनेट और डिजिटल माध्यम उसके दैनिक जीवन का हिस्सा हैं। इस स्थिति में बाल साहित्य का दायित्व कम नहीं, बल्कि बढ़ गया है। सूचना के विस्तार के साथ संवेदना का विकास भी आवश्यक है।
तकनीक बच्चे को बहुत कुछ जानने का अवसर देती है, लेकिन साहित्य उसे यह समझने में सहायता करता है कि उस ज्ञान का मानवीय उपयोग क्या है। बाल साहित्य उसे प्रकृति से जोड़ सकता है, दूसरों के दुख को समझने की दृष्टि दे सकता है और उसके भीतर सामाजिक उत्तरदायित्व का भाव पैदा कर सकता है।
जितेन्द्र निर्मोही ने संग्रह की भूमिका में इसी संदर्भ को रेखांकित करते हुए कहा है कि आज बच्चों में तकनीकी समझ तेजी से बढ़ रही है, इसलिए उन्हें संवेदना, सामाजिक सरोकार और संस्कृति से जोड़ना भी आवश्यक है। ‘गुल्लक और उसकी रजाई’ इसी आवश्यकता को अपने कथ्य में ग्रहण करता है।
इस संग्रह की बीस कहानियाँ विषयगत रूप से एक-दूसरे से भिन्न होते हुए भी एक व्यापक सूत्र से जुड़ी हैं—बालमन के माध्यम से जीवन और समाज को देखना।
‘घमण्डी गुलाब’ से संग्रह की शुरुआत होती है। गुलाब जैसे फूल को केंद्र में रखकर निर्मित यह कथा बाल साहित्य में मानवीकरण की परंपरा का उपयोग करती है। फूल को व्यक्तित्व देना बच्चे के लिए प्रकृति को एक जीवंत सत्ता के रूप में देखने की संभावना खोलता है।
शीर्षक कहानी ‘गुल्लक और उसकी रजाई’ में सर्दी और विद्यालय जाने की स्थिति के माध्यम से कर्तव्य-बोध को कथा का आधार बनाया गया है। यहाँ रजाई केवल सर्दी से बचाने वाली वस्तु नहीं रह जाती, बल्कि बालक के आराम और उसके दायित्व के बीच एक रोचक प्रतीकात्मक स्थिति निर्मित करती है। बालक का अपने कर्तव्य की ओर लौटना कथा का केंद्रीय भाव बनता है।
‘मकर संक्रान्ति और बरगद काका की सीख’ में प्रकृति और पक्षियों के प्रति संवेदना का स्वर है। त्योहार को केवल परंपरा के रूप में न लेकर उसके भीतर छिपी प्रकृति-संवेदना को रेखांकित करने का प्रयास कहानी को सामाजिक अर्थ देता है।
‘शुभम की नयी होली’ और ‘पानी की चोरी’ जल-संरक्षण के प्रश्न को बच्चों के सामने रखती हैं। पानी के संकट को यदि केवल तथ्य या आँकड़े के रूप में बताया जाए तो बालक उससे भावनात्मक रूप से नहीं जुड़ता। कहानी इस समस्या को अनुभव में बदल देती है। यही बाल साहित्य की शक्ति है।
‘भोलू का अपना घर’ स्वच्छता के प्रश्न को सामने लाती है। स्वच्छता यहाँ केवल व्यक्तिगत आदत नहीं, बल्कि रहने के परिवेश और जीवन की गुणवत्ता से जुड़ा विषय बनती है।
‘जंगल लौटी चिनचिन गौरैया’ और ‘चिंकी और गौरैया’ में पक्षी बाल साहित्य के माध्यम से प्रकृति के संकट के प्रतिनिधि बनते हैं। गौरैया का उल्लेख विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यह पक्षी भारतीय घर-आँगन और मानवीय जीवन से गहरे जुड़ा रहा है। उसके अस्तित्व को लेकर चिंता स्वयं मनुष्य और प्रकृति के बदलते संबंधों की ओर संकेत करती है।
‘सोनू की तासीर’ संग्रह की विषय-विविधता का उदाहरण है। यह गर्म तासीर वाले फलों को किस प्रकार खाया जाए, जैसे सामान्य जीवनोपयोगी प्रश्न को बाल कथा का रूप देती है। इससे स्पष्ट होता है कि लेखिका के लिए बाल कहानी का विषय केवल बड़े सामाजिक प्रश्न नहीं, बल्कि बच्चे के दैनिक जीवन की छोटी-छोटी आवश्यकताएँ भी हैं।
‘किताबों का दर्द’ संग्रह की दृष्टि से विशेष उल्लेखनीय है। पुस्तक को मानवीय संवेदना देकर उसके ‘दर्द’ को सामने रखना एक प्रभावी कल्पनात्मक युक्ति है। बच्चों द्वारा पुस्तकों को फाड़ने या खराब करने की आदत को सीधे डाँटने के बजाय यदि पुस्तक स्वयं अपनी पीड़ा व्यक्त करे तो बच्चा उसके साथ भावनात्मक संबंध स्थापित कर सकता है।
‘मेहुल और दादी का वैलेंटाइन’ और ‘दादाजी और धूप’ आधुनिक जीवन और पारिवारिक संबंधों के बीच संवाद स्थापित करती हैं। यहाँ बुजुर्ग केवल ज्ञान देने वाले पात्र नहीं हैं; वे भावनात्मक संबंधों की उस कड़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो आधुनिक व्यस्तता में कमजोर पड़ रही है।
‘गीतु-मीतु की समीरा’ और ‘रसोई बीमार है’ घरेलू और पर्यावरणीय जीवन के अलग-अलग पक्ष सामने लाती हैं। विशेषकर ‘रसोई बीमार है’ का शीर्षक ही अपने भीतर एक मानवीकरण छिपाए हुए है। रसोई का ‘बीमार’ होना वास्तव में उस घरेलू व्यवस्था की उपेक्षा का रूपक बन जाता है, जिसका प्रभाव बच्चों के जीवन पर पड़ता है।
‘जंगल में जब लगा एसी’ संग्रह की सबसे अधिक कल्पनाशील और समकालीन कहानियों में रखी जा सकती है। जंगल में एसी की आवश्यकता क्यों पड़ी—यह असंभव-सी लगने वाली स्थिति बच्चे के भीतर तुरंत प्रश्न पैदा करती है। यही प्रश्न आगे पर्यावरणीय संकट की ओर ले जाता है। एसी और रेफ्रिजरेटर से ओजोन परत को होने वाले नुकसान की ओर संकेत कहानी को वैज्ञानिक चेतना से जोड़ता है।
‘दीपावली और सफाई’ त्योहार और सामाजिक सरोकार के संबंध को रेखांकित करती है। दीपावली केवल सजावट और उत्सव नहीं, बल्कि स्वच्छता तथा सामुदायिक जीवन से जुड़ा अवसर भी है—कहानी इसी दिशा में विचार करती है।
अंतिम कहानियों में ‘नन्हें प्राशु की समझदारी’ और ‘नन्हा जलदू और बेमौसम की बारिश’ जैसी रचनाएँ बाल-बुद्धि और पर्यावरणीय संकट को केंद्र में लाती हैं। ‘नन्हा जलदू और बेमौसम की बारिश’ में कटते जंगल, उत्खनन और नदियों से रेत के दोहन जैसे प्रश्नों को कथा के दायरे में लाया गया है। इस प्रकार संग्रह का पर्यावरणीय पक्ष केवल पेड़-पौधे बचाने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि विकास की उन प्रक्रियाओं पर भी संकेत करता है जो प्रकृति के संतुलन को प्रभावित करती हैं।
बालमनोविज्ञान : संग्रह का केंद्रीय आधार
इस संग्रह की सबसे बड़ी शक्ति इसका बालमनोविज्ञान है। लेखिका ने बच्चों को उपदेश ग्रहण करने वाली निष्क्रिय इकाई नहीं माना है। उनकी कहानियों में बच्चा प्रश्न करता है, देखता है, अनुभव करता है और कई बार समाधान की दिशा भी खोजता है।
यह दृष्टिकोण आधुनिक बाल साहित्य के लिए आवश्यक है। बच्चे को यदि केवल ‘यह करो’ और ‘यह मत करो’ बताया जाए तो कहानी उपदेश बन जाती है। किंतु जब वही बात किसी पात्र की समस्या और उसके अनुभव से निकलती है, तो वह कथा का स्वाभाविक निष्कर्ष बन जाती है।
मानवीकरण : कथा को रोचक बनाने का साधन
लेखिका ने कई कहानियों में मानवीकरण का प्रयोग किया है। गुलाब, किताब, रसोई, गौरैया और जंगल जैसे तत्वों को मानवीय संदर्भ देकर उन्होंने बच्चों की कल्पनाशीलता को सक्रिय किया है।
मानवीकरण बाल साहित्य का पुराना किंतु अत्यंत प्रभावी उपकरण है। इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि लेखक उसके माध्यम से केवल मनोरंजन करता है या कोई नया अर्थ भी निर्मित करता है। इस संग्रह में मानवीकरण का उपयोग अधिकांशतः किसी सामाजिक या पर्यावरणीय प्रश्न को बालमन के निकट लाने के लिए किया गया है।
प्रकृति एक पात्र के रूप में
संग्रह में प्रकृति केवल पृष्ठभूमि नहीं है। कई कहानियों में वह स्वयं कथा की सक्रिय शक्ति बन जाती है। गौरैया, बरगद, जंगल, बारिश, पानी और पेड़ कथानक के भीतर अपना अर्थ निर्मित करते हैं।
यहीं संग्रह की पर्यावरणीय चेतना सबसे प्रभावी रूप में सामने आती है। लेखिका प्रकृति को ‘बचाने योग्य वस्तु’ मात्र नहीं मानतीं, बल्कि उसे मनुष्य के जीवन का सहभागी बनाती हैं।
पारिवारिक संबंध
दा-दादी और बच्चों के संबंध संग्रह में विशेष स्थान रखते हैं। ‘मेहुल और दादी का वैलेंटाइन’ तथा ‘दादाजी और धूप’ जैसी कहानियाँ इस बात की ओर संकेत करती हैं कि आधुनिकता के बीच बुजुर्गों की भूमिका और उनके प्रति भावनात्मक जिम्मेदारी को पुनः समझने की आवश्यकता है।
इन कहानियों का महत्त्व इसलिए भी है कि ये बच्चों को परिवार की बहु-पीढ़ीय संरचना से जोड़ती हैं। बाल साहित्य के माध्यम से पीढ़ियों के बीच संवाद स्थापित करना आज के समय में अत्यंत आवश्यक है।
भाषा और शैली
लेखिका की भाषा सहज और संप्रेषणीय है। बाल पाठक के लिए कठिन शब्दावली या अत्यधिक जटिल वाक्य-विन्यास से बचने का प्रयास किया गया है। कहानियों में कथ्य के अनुसार कल्पनात्मक और संवादात्मक शैली का उपयोग मिलता है।
जहाँ पर्यावरणीय समस्या है वहाँ विचार प्रमुख होता है, जबकि पशु-पक्षियों और वस्तुओं के मानवीकरण वाली कहानियों में कल्पना का पक्ष मजबूत हो जाता है। इस शैलीगत विविधता के कारण संग्रह एकरस नहीं बनता।
शीर्षक और कथात्मक कौतूहल
संग्रह के कई शीर्षक अपने आप में जिज्ञासा उत्पन्न करते हैं—’किताबों का दर्द’, ‘रसोई बीमार है’, ‘जंगल में जब लगा एसी’, ‘पानी की चोरी’ और ‘गुल्लक और उसकी रजाई’।
इन शीर्षकों में एक प्रश्न छिपा हुआ है। किताब को दर्द कैसे हो सकता है? रसोई बीमार कैसे हो सकती है? जंगल में एसी क्यों लगा? पानी की चोरी किसने की? यही प्रश्न बाल पाठक को कथा की ओर खींचते हैं।
नवाचार : संग्रह की केंद्रीय उपलब्धि
‘गुल्लक और उसकी रजाई’ की सबसे बड़ी साहित्यिक विशेषता उसका नवाचार है। नवाचार का अर्थ केवल नए विषय चुनना नहीं, बल्कि परिचित विषय को नई दृष्टि से प्रस्तुत करना भी है।
पर्यावरण पर हजारों रचनाएँ लिखी गई हैं, लेकिन जंगल के पशुओं को एसी की आवश्यकता पड़ने की कल्पना समस्या को एक नए कोण से देखने का अवसर देती है। पुस्तक संरक्षण पर उपदेश देने की जगह ‘किताबों का दर्द’ उनकी भावनात्मक आवाज बन जाता है। घरेलू उपेक्षा को ‘रसोई बीमार है’ के रूपक में बदल देना भी इसी रचनात्मकता का उदाहरण है।
इस प्रकार लेखिका ने कई गंभीर विषयों को बालमन के लिए प्रतीक, कल्पना और मानवीकरण के माध्यम से सुगम बनाने का प्रयास किया है।
आलोचनात्मक सीमाएँ
किसी भी कृति का मूल्यांकन केवल उसकी उपलब्धियों के आधार पर नहीं किया जा सकता। आलोचना का उद्देश्य रचना की संभावनाओं और सीमाओं दोनों को देखना है।
इस संग्रह की प्रमुख सीमा यह कही जा सकती है कि कुछ कहानियों में सामाजिक और नैतिक संदेश इतना स्पष्ट है कि पाठक के लिए निष्कर्ष तक पहुँचने की गुंजाइश कुछ कम रह जाती है। बाल कहानी की शक्ति तब और बढ़ती है जब बच्चा स्वयं कहानी के अनुभव से अर्थ ग्रहण करे।
कुछ कहानियों में पात्रों के मनोवैज्ञानिक विकास की अपेक्षा कथ्य और संदेश अधिक प्रमुख दिखाई पड़ते हैं। यदि पात्रों के आंतरिक द्वंद्व, असमंजस और संघर्ष को थोड़ा अधिक स्थान मिले तो कहानियों का साहित्यिक विस्तार बढ़ सकता है।
इसी प्रकार पर्यावरणीय कहानियों में समस्या और समाधान के बीच का तनाव कुछ और गहरा किया जा सकता था। उदाहरण के लिए जंगल, जल या वर्षा से जुड़े संकट केवल नैतिक प्रश्न नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक जटिलताओं से भी जुड़े हैं। बाल साहित्य में इन जटिलताओं को सरल बनाना आवश्यक है, किंतु उन्हें पूरी तरह सपाट कर देना कथा की संभावनाओं को सीमित कर सकता है। प्रूफ की कमी मखमल में टाट के पैबंद की तरह अखरती है।
फिर भी यह आलोचना संग्रह की मूल रचनात्मक उपलब्धियों को कम नहीं करती। यह लेखिका की आगामी रचनाओं के लिए संभावनाओं की ओर संकेत करती है।
निष्कर्ष
‘गुल्लक और उसकी रजाई’ समकालीन बाल साहित्य की उन रचनाओं में अपना स्थान बनाने की क्षमता रखता है, जो बालमन और सामाजिक सरोकारों के बीच संवाद स्थापित करने का प्रयास करती हैं। यह संग्रह केवल नैतिक शिक्षा देने वाली कहानियों का संकलन नहीं है। इसमें लेखिका ने बालक की जिज्ञासा को प्रकृति, पर्यावरण, परिवार और समाज के व्यापक प्रश्नों से जोड़ने का प्रयास किया है।
इसकी कहानियों में पानी है तो उसके साथ जल-संकट का प्रश्न भी है; गौरैया है तो उसके साथ प्रकृति-संरक्षण की चिंता भी है; पुस्तक है तो उसके साथ ज्ञान और पुस्तक-संस्कृति का प्रश्न भी है; दादा-दादी हैं तो उनके साथ पारिवारिक संवेदना का प्रश्न भी है; जंगल है तो उसके साथ पर्यावरणीय संकट भी है।
यही इस संग्रह की सार्थकता है।
अंजना मनोज गर्ग ने बालमन की छोटी-छोटी जिज्ञासाओं को सामाजिक और पर्यावरणीय सरोकारों से जोड़ने का जो प्रयास किया है, वह उल्लेखनीय है। उनकी कहानियाँ यह विश्वास जगाती हैं कि बाल साहित्य केवल बच्चों के लिए लिखा गया साहित्य नहीं, बल्कि भविष्य के नागरिक के मन और संवेदना को आकार देने वाला साहित्य भी है।
‘गुल्लक और उसकी रजाई’ का महत्त्व इस बात में है कि यह बच्चे को केवल कहानी सुनाकर छोड़ नहीं देता; वह उसके आसपास की दुनिया को देखने की उसकी दृष्टि में हल्का-सा परिवर्तन करने का प्रयास करता है।
अंततः कहा जा सकता है कि यह संग्रह बालमन की निर्मलता, प्रकृति की पुकार और सामाजिक संवेदना को एक साथ समेटे हुए बीस कहानियों का ऐसा गुलदस्ता है, जिसमें मनोरंजन के साथ विचार और विचार के साथ संवेदना भी खिलती है। अंजना मनोज गर्ग की यह कृति बाल साहित्य की वर्तमान धारा में अपने विषय-नवाचार और समकालीन सरोकारों के कारण ध्यान आकर्षित करती है और लेखिका के आगामी रचनात्मक विकास के लिए एक आशाजनक आधारभूमि तैयार करती है।
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© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”
08/10/2026
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≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





















