हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०७२ ⇒ शेर और शेर दिल ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “शेर और शेर दिल…“।)

?अभी अभी # १०७२ ⇒ आलेख – शेर और शेर दिल ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

शेर तो खैर जंगल का राजा है, और उसका दिल शेर का दिल ही कहलाएगा। हर इंसान जो शेर दिल होता है, किसी राजा से कम नहीं होता। एक शायर भले ही शेर कहता हो, लेकिन उसका दिल कभी शेर दिल नहीं होता। जिसका दिल बार बार टूटे, उसे आप शेर दिल नहीं कह सकते।

शेर दिल को आप दरिया दिल तो कह सकते हैं, लेकिन kind hearted, यानी दयालु नहीं कह सकते। जो आसानी से पिघल जाए, वह कैसा दिल। जिसका दिल दरिया दिल के साथ मजबूत भी हो, वही शेर दिल कहलाने का अधिकारी होता है।

बहादुर बच्चे गिरने पर रोते नहीं, किसी से मार खाने पर घर आकर मम्मी से शिकायत नहीं करते। पूरा हिसाब बराबर करने के बाद ही विजयी मुस्कान लिए घर लौटते हैं, और उनके घर लौटने के पहले ही उनकी बहादुरी के किस्से घर पहुंच जाते हैं। ऐसे होते हैं शेर बच्चे।।

शेर का दिल किसी बच्चे का दिल नहीं होता। एक शायर दिवाना हो सकता है, एक शेर का दीवानगी से क्या काम। हमने नहीं सुना, किसी शेर ने कभी किसी को दिल दिया हो। एक मदारी भले ही पब्लिक में बंदर बंदरिया को रस्सी से बांधकर नचा ले, उनकी शादी करा दे, सर्कस में भी शेर, शेर ही होता है। उसे नचाने के लिए भी हंटर की जरूरत पड़ती है। वैसे असली शेर आजकल जंगल में नहीं संसद में दहाड़ते हैं, जिनकी दहाड़ आज तक में भी सुनी जा सकती है।

कल विश्व शेर दिवस था। हम जंगल तो नहीं जा पाए, लेकिन संसद में कल एक शेर दो घंटे तेरह मिनिट तक दहाड़ा, किसी भी शेर का यह विश्व रेकॉर्ड है। मैने देखा, उसने देखा, सबने देखा, कहां देखा, टीवी पर देखा, अपने मोबाइल में देखा।।

एक शायर बदनाम हो सकता है, लेकिन उसके शेर का भी बहुत नाम होता है। शेर कभी चरित्रहीन नहीं होते, कोई सुंदर हिरनी कभी उसे अपने जाल में नहीं फांस सकती। वह शेर दिल होता है, दिल फेंक नहीं। वह किसी को दिल नहीं देता, उसका कलेजा चीर देता है।

हमने कभी शेर को घास खाते नहीं देखा। गुजरात के गिर में कुछ सफेद शेर होते हैं, जो खेतों में भी घूमते पाए जाते हैं, एक खोजी फोटोग्राफर का तो यह भी कहना है कि ये सफेद शेर इतने शांत होते हैं कि इन्हें वहां मशरूम भी

खाते देखा गया है। हमारे कल के एंग्री यग मैन महानायक और आज के शेर दिल, केबीसी के बिग बी आपको यदा कदा गुजरात आने का निमंत्रण दिया करते हैं।।

अगर आपकी वास्तविक शेर में रुचि हो तो जंगल में नहीं, भारतीय संसद में जाएं, जहां एक अकेला सब पर भारी है और अगर आपकी रुचि शेर दिलों में है तो हमारे पंजाब आइए। यहां आपको शेर, सिंह, सभी मिलेंगे।

जितने शेर आज जंगल में नहीं हैं, उतने सिंह हमारे अकेले पंजाब में हैं और सभी जाबांज, शेरदिल। यहां के सभी सिंह आपको भांगड़ा करते नजर आएंगे। ये सभी सिंह जंगल में मंगल ही करते हैं, दंगल नहीं। अगर ये सिंह गुरुद्वारे में शीश नवाते हैं तो मुल्क के लिए अपना शीश कटाते भी हैं। इनके राज में कोई प्राणी भूखा नहीं सोता, इनका लंगर सबके लिए है। सेवा ही इनकी सीख है, समर्पण ही इनकी सीख है, बलिदान ही इनकी सीख है, मुल्क की रक्षा ही इनकी सबसे बड़ी सीख है।।

जो निर्भय है, निडर है, अपने मुल्क की रक्षा में सक्षम है, वही सच्चा शेर है। आज शेर दिल लायंस क्लब में नहीं, बहादुर इंसानों में पाये जाते हैं, जो खुद भी चैन से रहते हैं, और सबके अमन चैन की चिंता करते हैं। शेर बनें, शेर दिल बनें, भीगी बिल्ली नहीं ..!!

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #३३४ ☆ सहनशक्ति बनाम दण्ड… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख सहनशक्ति बनाम दण्ड। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

(डॉ मुक्ता जी द्वारा रचित एक भजन – मेरे मन आन बसो गिरधारी / स्वर- रुखसार, सौजन्य – तरूनम चैनल)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # ३३४ ☆

☆ सहनशक्ति बनाम दण्ड… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

‘युगों -युगों से पुरुष स्त्री को उसकी सहनशीलता के लिए ही दण्डित करता आ रहा है,’ महादेवी जी का यह कथन कोटिश: सत्य है,जिसका प्रमाण हमें गीता के इस संदेश से भी मिलता है कि ‘अन्याय करने वाले से अधिक दोषी अन्याय सहन करने वाला होता है’,क्योंकि उसकी सहनशीलता उसे और अधिक ज़ुल्म करने को प्रोत्साहित करती है। इसलिए एक सीमा तक तो सहनशक्ति की महत्ता स्वीकार्य है,परंतु उसे आदत बना लेना कारग़र नहीं है। इसलिए मानव में विरोध व प्रतिकार करने का सामर्थ्य होना आवश्यक है। वास्तव में वह व्यक्ति मृत के समान है,जो ग़लत बात को ग़लत ठहरा कर विरोध नहीं जताता। इसके प्रमुखत: दो कारण हो सकते हैं– आत्मविश्वास की कमी और असीम सहनशीलता। यह दोनों स्थितियां ही भयावह और मानव के लिए घातक हैं। आत्मविश्वास से विहीन मानव का जीवन पशु-तुल्य है,क्योंकि जो आत्मसम्मान की रक्षा नहीं कर सकता; वह परिवार,समाज व देश के लिए क्या करेगा? वह तो धरती पर बोझ है; न उसकी घर-परिवार में इज़्ज़त होती है,न ही समाज में उसे अहमियत प्राप्त होती है। अत्यधिक सहनशीलता के कारण वह शत्रु अर्थात् प्रतिपक्ष के हौसले बुलंद करता है। परिणामत: समाज में आलसी व कायर लोगों की संख्या में इज़ाफा होने लगता है। प्राय: ऐसे लोग संवेदनहीन होते हैं और उनमें साहस व पुरुषत्व का अभाव होता है।

नारी को सदैव दोयम दर्जे का प्राणी स्वीकारा जाता है, क्योंकि उसमें अपना पक्ष रखने का साहस नहीं होता और वह शांत भाव से समझौता करने में विश्वास रखती है। इसके पीछे कारण कुछ भी रहे हों; पारिवारिक,सामाजिक,आर्थिक या उसका समर्पण भाव– सभी नारी को उस मुक़ाम पर लाकर खड़ा कर देते हैं,जहां वह निरंतर ज़ुल्मों की शिकार होती रहती है। पुरुष दंभ के सम्मुख वह प्रतिकार व विरोध में अपनी आवाज़ नहीं उठा सकती। इस प्रकार पुरुष उस पर हावी होता जाता है और समझ बैठता है कि वह पराश्रिता है; उसमें साहस व आत्म-विश्वास की कमी है। सो! वह उसके साथ मनचाहा व्यवहार करने को स्वतंत्र है। इस प्रकार यह सिलसिला चल निकलता है। अवमानना,तिरस्कार व प्रताड़ना उसके गले के हार अर्थात् विवशता बन जाते हैं और उसके जीने का मक़सद व उपादान बन जाते हैं,जिसे वह नियति स्वीकार अपना जीवन बसर करती रहती है।

यदि हम उक्त तथ्य पर दृष्टिपात करें, तो नियति व स्वीकार्यता-बोध मात्र हमारी कल्पना है,जिसे हम सहजता व स्वेच्छा से अपना लेते हैं। यदि व्यक्ति प्रारंभ से ही ग़लत बात का प्रतिरोध करता है और अपने कर्म को अंजाम देने से पहले सोच-विचार करता है,उसके हर पहलू पर दृष्टिपात करता है– शत्रु के बुलंद हौसलों पर ब्रेक लग जाती है। मुझे स्मरण हो रही हैं, 2007 में प्रकाशित स्वरचित काव्य-संग्रह की अंतिम कविता की पंक्तियां– ‘बहुत ज़ुल्म कर चुके/ अनगिनत बंधनों में बाँध चुके/ मुझ में साहस ‘औ’ आत्म- विश्वास है इतना/ छू सकती हूं मैं/ आकाश की बुलंदियां।’ जी हाँ! यह संदेश है नारी जाति के लिए कि वह सशक्त,सक्षम व समर्थ है। वह आगामी आपदाओं का सामना कर सकती है। परंतु वह पिता,पुत्र व पति के बंधनों में जकड़ी,ज़ुल्मों को मौन रहकर सहन करती रही,क्योंकि उसने अंतर्मन में संचित शक्तियों को पहचाना नहीं था। परंतु अब वह स्वयं को पहचान चुकी है और आकाश की बुलंदियों को छूने में समर्थ है। आज की नारी ‘अगर देखना है मेरी उड़ान को/ थोड़ा और ऊंचा कर दो/ आसमान को’ में झलकता है उसका अदम्य साहस व अटूट विश्वास,जिसके सहारे वह हर कठिन कार्य को कर गुज़रती है और ऐलान करती है कि ‘असंभव शब्द का उसके शब्दकोश में स्थान है ही नहीं; यह शब्द तो मूर्खों के शब्दकोश में पाया जाता है।’

परंतु 21वीं सदी में भी महिलाओं की दशा अत्यंत शोचनीय व दयनीय है। वे आज भी पिता,पति व पुत्र द्वारा प्रताड़ित होती है,क्योंकि तीनों का प्रारंभ ‘प’ से होता है। सो! वे उनके अंकुश से आजीवन मुक्त नहीं हो पाती। घरेलू हिंसा,अपनों द्वारा उसकी अस्मिता पर प्रहार, फ़िरौती, दुष्कर्म, तेज़ाब कांड व हत्या के सुरसा की भांति बढ़ते हादसे उनकी सहनशक्ति के ही दुष्परिणाम हैं। यदि बुराई को प्रारंभ में ही दबाकर समूल नष्ट कर दिया जाता तो परिदृश्य कुछ और ही होता। महिलाएं पहले भी दलित थीं,आज भी हैं और कल भी रहेंगी। उनके अतीत,वर्तमान व भविष्य में कोई परिवर्तन संभव नहीं हो सकता; जब तक वे साहस जुटाकर ज़ुल्म करने वालों का सामना नहीं करेंगी।

वैसे यह नियम बच्चों,युवाओं व वृद्धों सब पर लागू होता है। उन्हें आगामी आपदाओं,विषम व असामान्य परिस्थितियों का डटकर मुकाबला करना चाहिए,क्योंकि हौसलों के सम्मुख कोई भी टिक नहीं सकता। ‘लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती/ कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।’ सोहनलाल द्विवेदी जी इस कविता के माध्यम से यह संदेश देते हैं कि यदि आप तूफ़ान से डर कर व लहरों के उफ़ान को देख कर अपनी नौका को बीच मंझधार नहीं ले जाओगे तो नौका कैसे पार उतर पाएगी? संघर्ष रूपी अग्नि में तप कर ही सोना कुंदन बनता है। इसलिए कठिन परिस्थितियों के सम्मुख कभी भी घुटने नहीं टेकने चाहिएं तथा मैदान-ए-जंग में मन में इस भाव को प्रबल रखने की दरक़ार है कि ‘तुम कर सकते हो।’ यदि निश्चय दृढ़ हो, हौसले बुलंद हों,दुनिया में असंभव कुछ भी नहीं। नैपोलियन बोनापार्ट भी यही कहते थे कि असंभव शब्द मूर्खों के शब्द कोश में होता है। इस नकारात्मक भाव को अपने ज़हन में प्रविष्ट न होने दें –’जैसी दृष्टि,वैसी सृष्टि तथा नज़रें बदलते ही नज़ारे बदल जाते हैं और नज़रिया बदलते ज़िंदगी।’ यदि नारी यह संकल्प कर ले कि वह अकारण प्रताड़ना सहन नहीं करेगी और उसका साहसपूर्वक विरोध करेगी, ‘तो क्या’ और अब मैं तुम्हें दिखाऊँगी कि ‘मैं क्या कर सकती हूं।’ उस स्थिति में पुरुष भयभीत हो जायेगा और अपने मिथ्या सम्मान की रक्षा हेतु मर्दांनगी नहीं दिखायेगा। धीरे-धीरे दु:ख भरे दिन बीत जायेंगे व खुशियों की भोर होगी,जहाँ समन्वय,सामंजस्य ही नहीं; समरसता भी होगी और ज़िंदगी रूपी गाड़ी के दोनों पहिए समान गति से दौड़ेंगे।

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© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०७१ ⇒ मियाँ की तोड़ी ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “मियाँ की तोड़ी…“।)

?अभी अभी # १०७१ ⇒ आलेख – मियाँ की तोड़ी ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

राजनीति जोड़-तोड़ है, गठ-जोड़ है, तोड़-फोड़ है। राजनीति कुर्सी है, जिस पर बैठकर आसमान सर पर उठा लिया जाता है। संगीत केवल जोड़ है, उसका कोई तोड़ नहीं। सङ्गीत ज़मीन से जुड़ा है, जिसके लिए सदा आसमान अदब से झुका है।

राजनीति में कोई किसी का गुरु नहीं होता ! सङ्गीत में गुरु गुड़ ही रहता है, चेला कभी शक्कर नहीं होता। क्योंकि उसका गुरु, कोई योगगुरु नहीं, उस्ताद होता है।

यह उस्ताद किसी बाबा की तरह तावीज़ और भभूत नहीं, शिष्य को गण्डा बाँधता है, सङ्गीत के ज़रिए उसे ईश्वर से जोड़ता है।।

राजनीति में केवल हिन्दू-मुसलमान होता है, संगीत और अध्यात्म के क्षेत्र में गुरु-शिष्य संबंध होता है। आप भले ही तमाम मुल्क की सराय से मुग़लों को खदेड़ फेंकें, ताजमहल को शिवाला बना दें और कुतुब-मीनार को नेस्तानबूद ही क्यों न कर दें, उस्ताद बिस्मिल्लाह खान से शहनाई अलग नहीं कर सकते, बाप-बेटे उस्ताद अल्ला रक्खा और ज़ाकिर हुसैन से तबले की थाप को जुदा नहीं कर सकते।

अकबर के गले से नवरत्नों की माला नोंच लीजिये, तानसेन की संगीत की दुनिया में आग नहीं लगा सकते, रसखान के पदों में से कृष्ण-भक्ति और बांसुरी की धुन अलहदा नहीं कर सकते।

आत्मा को तो आप अमर समझें और रूह को आप मार नहीं सकते, रानी रूपमती को महान और बाज-बहादुर के प्रेम को लव ज़िहाद का दर्ज़ा दे नहीं सकते। कहाँ कहाँ मज़हबी तोड़-फोड़ करेंगे, मियाँ की तोड़ी को तोड़, सुरों की तान छेड़ नहीं सकते। इस धरती की हरियाली से उसकी हरियाली छीन हरा झंडा और कश्मीर के केसर से उसके केसरिया रंग और खुशबू को मिला केसरिया ध्वज आप भले ही बना लें, उन्हें इस खुले आसमान में साथ-साथ लहराने से किसी को रोक नहीं सकते। चाँद हम सबका है, कभी दूज का, तो कभी चौदहवीं का। सूरज अगर खुशियों की सक्रांति है, तो गुरु पूनम हमारी गुरु पूर्णिमा है। हम सूरज चाँद को मज़हबों में बाँट नहीं सकते।।

जुगलबंदी ही जीवन-संगीत है !

जीवन में कहीं लता का स्वर है तो रफी का गीत। पंडित ओंकारनाथ अगर ठाकुर हैं तो बड़े गुलाम अली खां भी उस्ताद है। रविशंकर के सितार के साथ अल्ला रक्खा के तबले की जुगलबंदी होती है, तो मुँह से वाह ताज ही निकलेगा। मुमताज़ को क्यों बीच में लाते हो।

मियाँ की तोड़ी हो, या राग मेघ मल्हार ! जीवन की इन खुशियों में राग शिवरंजिनी हो, या यमन राग ! जहाँ मालकौंस हो, वहाँ मन तड़फत हरि दर्शन को आज।

कोई भी साज़ हो, कोई भी आवाज़ हो, एक ही रंग, एक ही रूप, बस हो एक ही राग,  देस राग।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – बस लिखता हूँ… ? ?

रचना का जन्म सहज उद्वेग से होता है। विचार करके लिखोगे तो विचार नहीं दे पाओगे। किसी दिन या दिनांक विशेष पर बच्चे को जन्म देना है तो सिजेरियन कराना ही होगा। सहज प्रसूति चाहिए तो दिन-दिनांक के बंधनों से मुक्त रहो। सहज लिखो, प्रवाह को उसकी गति, उसकी नीति, उसकी नियति से आने दो। इस प्रवाह से विचार स्वयंमेव अमृत बूँद बनकर छलकेगा।

?

© संजय भारद्वाज   

प्रातः 6:07 बजे, 12 अगस्त 2025

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  श्रावण साधना गुरुवार दि. 30 जुलाई से आरंभ होकर शनिवार 28 अगस्त (रक्षाबंधन) तक चलेगी 🕉️

  💥 

इस साधना में-

ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगा।

गोस्वामी तुलसीदास रचित रुद्राष्टकम् का पाठ करेंगे।

इस बार हम आदि शंकराचार्य के निर्वाण षटकम् / वैराग्य षटकम् का भी प्रतिदिन कम से कम एक पाठ अवश्य करेंगे।

मालाजप, रुद्राष्टकम्, निर्वाण षटकम् के साथ आत्मपरिष्कार व ध्यानसाधना भी नियमित रूप से चलेंगे।

हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।

≈≈

≈ संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २९७ ☆ धरा की मुस्कान, जीवन का सम्मान… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “धरा की मुस्कान, जीवन का सम्मान…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २९७ ☆

☆ धरा की मुस्कान, जीवन का सम्मान… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

धानी चूनर ओढ़े धरती,

मंद-मंद मुस्काती।

हरित धरा की अनुपम छवि पर,

मेघ सुधा बरसाती।।

भारतीय संस्कृति में प्रत्येक पर्व केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि जीवन-मूल्यों का संदेश भी देता है। हरियाली अमावस्या ऐसा ही एक पर्व है, जो हमें प्रकृति के प्रति प्रेम, संवेदना और उत्तरदायित्व का बोध कराता है। श्रावण मास की अमावस्या को मनाया जाने वाला यह उत्सव वर्षा ऋतु के मध्य धरती के नवजीवन का अभिनंदन है।

मान्यता है कि इस दिन वृक्षारोपण और पौधों की सेवा का विशेष पुण्य प्राप्त होता है। किंतु इसका वास्तविक महत्व केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि वृक्ष ही जीवन के आधार हैं। वे हमें शुद्ध वायु, जल संरक्षण, जैव विविधता और संतुलित पर्यावरण प्रदान करते हैं। यदि हर व्यक्ति अपने जीवन में एक वृक्ष लगाकर उसका संरक्षण करे, तो यह पर्व अपनी सार्थकता स्वयं सिद्ध कर देगा।

आज जब बढ़ते शहरीकरण, प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन के कारण पर्यावरण संकट गहराता जा रहा है, तब हरियाली अमावस्या का संदेश पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो उठता है। यह केवल पौधे लगाने का नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ आत्मीय संबंध स्थापित करने का अवसर है। वृक्षों की छाया में केवल धरती ही नहीं, मानव का भविष्य भी सुरक्षित रहता है।

आइए, इस हरियाली अमावस्या पर हम केवल पौधारोपण का संकल्प न लें, बल्कि लगाए गए प्रत्येक पौधे को वृक्ष बनने तक स्नेह और संरक्षण देने का दायित्व भी निभाएँ। यही प्रकृति के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धा होगी और आने वाली पीढ़ियों के लिए सबसे मूल्यवान उपहार भी।

**

वन-उपवन पुलकित हो उठते,

जीवन-वीणा गाती।

प्रकृति स्वयं उत्सव बनकर,

सृष्टि-सुगंध लुटाती।।

**

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ रुद्राभिषेक का धार्मिक, दार्शनिक और वैज्ञानिक महत्व ☆ डाॅ राकेश सक्सेना ☆

डाॅ राकेश सक्सेना

(डाॅ राकेश सक्सेना जी पूर्व सदस्य हिंदी सलाहकार समिति, खान मंत्रालय, भारत सरकार, जेएलएन पी०जी० काॅलेज, एटा से हिंदी विभागाध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त हैं। कनाडा, भूटान, नेपाल, श्रीलंका, ताशकंद आदि देशों की विदेश यात्राएँ। 07 मौलिक कृतियां, 20 सम्पादित, अनगिनत पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित.  आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख  – रुद्राभिषेक का धार्मिक, दार्शनिक और वैज्ञानिक महत्व।)

☆ आलेख – रुद्राभिषेक का धार्मिक, दार्शनिक और वैज्ञानिक महत्व ☆ डाॅ राकेश सक्सेना ✍

रुद्राभिषेक रुद्र व अभिषेक दो शब्दों से मिलकर बना है। ‘ रुद्र ‘ भगवान शिव का एक नाम है। इसका अर्थ है रुद् धातु से रुदन या दु:ख को दूर करने वाला। शिव को रुद्र इसीलिए कहा जाता है क्योंकि वे भक्तों के दु:खों, कष्टों व रोगों को हर लेते हैं। ‘ अभिषेक ‘ अभि+सिच् अर्थात् चारों ओर से स्नान कराना। इसका तात्पर्य है कि जल, दूध,घी, शहद, गंगाजल, बेलपत्र, आक, चंदन आदि से शिव को स्नान कराना। इस प्रकार इसका शाब्दिक अर्थ हुआ- भगवान शिव का अभिषेक। भारतीय सनातन परम्परा में यह अनुष्ठान सर्वाधिक प्रभावशाली माना जाता है, जो प्रकृति, चेतना, आत्मशुद्धि और लोककल्याण की भावना से जुड़ा है। इस आध्यात्मिक संस्कार व पूजा पद्धति का धार्मिक, दार्शनिक व वैज्ञानिक दृष्टि से अत्यधिक महत्व रहा है। सनातन परम्परा में भगवान शिव सर्वोच्च शक्ति हैं, जिनको आशुतोष भी कहा गया है। वे शीघ्र प्रसन्न होने वाले देव हैं। श्रद्धा, विनम्रता और निष्काम भाव से किया गया रुद्राभिषेक ईश्वर के प्रति आत्मसमर्पण का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक दृष्टि से यह अभिषेक आत्मशुद्धि का माध्यम है। जल की प्रत्येक धारा भक्त को संदेश देती है कि अपने भीतर के क्रोध, अहंकार, लोभ, ईर्ष्या व द्वेष को धोने का प्रयास करें। भगवान शिव समस्त सृष्टि के अधिपति हैं, इसलिए बेलपत्र, जल, पुष्प, चंदन, आक, धतूरा आदि प्राकृतिक सामग्री इस भाव की सूचक है कि प्रकृति की रक्षा ही शिव पूजा है। श्रावण मास वर्षा के द्वारा प्रकृति को नवजीवन देता है,मनुष्य को आत्मचिंतन हेतु प्रेरित करता है, इसलिए संयम,तप,जप शिवोपासना व रुद्राभिषेक हेतु यही समय सर्वाधिक उपयुक्त है।

भारतीय दर्शन में शिव परम चेतना के प्रतीक हैं, इसलिए रुद्राभिषेक मूर्तिपूजा से आगे बढ़कर ब्रह्मांडीय चेतना के प्रति समर्पण का द्योतक बन जाता है। यह अनुष्ठान सृष्टि, स्थिति और संहार का संतुलन करना भी सिखाता है। शिव संहार के देवता अवश्य हैं किन्तु भारतीय दर्शन में संहार केवल विनाश के लिए नहीं अपितु नवसृजन के लिए आवश्यक परिवर्तन है, जो नई सम्भावनाओं के द्वार खोलता है। रुद्राभिषेक में जल ऊपर से नीचे प्रवाहित होता है। यह इस बात का प्रतीक है कि मनुष्य कितना भी ऊँचा हो जाए लेकिन विनम्र रहे। भगवान शिव के समक्ष सभी भेद समाप्त हो जाते हैं तथा पद, प्रतिष्ठा,जाति,धन आदि गौण हो जाते हैं। भारतीय दर्शन के अनुसार सृष्टि पंचमहाभूतों से निर्मित है,इसलिए ये अनुष्ठान इनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का भी एक सांस्कृतिक माध्यम है। जलाभिषेक जल के महत्व को, दीप अग्नि को, धूप वायु को, भस्म पृथ्वी को तथा मंत्रों की ध्वनि आकाश तत्व का प्रतीक मानी जाती है। अद्वैत वेदांत के अनुसार परमात्मा और आत्मा का मूल स्वरूप एक ही है। रुद्राभिषेक का उद्देश्य बाह्य पूजन से आगे बढ़कर आंतरिक शिवत्व को जाग्रत करना है।

वैज्ञानिक दृष्टि से रुद्राभिषेक का प्रमुख आधार वैदिक मंत्रों का उच्चारण है, जो स्वर, लय और छन्द में गाए जाते हैं। ध्वनि विज्ञान के अनुसार नियमित लयबद्ध ध्वनि मन को एकाग्र करने एवं नियंत्रित श्वास- प्रश्वास के साथ मंत्रोच्चारण तनाव कम करने में सहायक बनते हैं। मनोविज्ञान की दृष्टि से जलाभिषेक चिंताओं का मानसिक विसर्जन करते हैं, सकारात्मक संकल्प लेते हैं। रुद्राभिषेक के समय भक्त का ध्यान एक बिन्दु पर केन्द्रित रहता है। यह प्रक्रिया ध्यान के अनेक सिद्धांतों से मेल खाती है, मानसिक तनाव में कमी आती है और क्रोध व आवेग पर नियंत्रण होता है। आज के भौतिकवादी युग में जहाँ मानसिक तनाव, सामाजिक विघटन, पर्यावरण संकट,उपभोक्तावाद, नैतिक मूल्यों का ह्रास है वहाँ रुद्राभिषेक प्रकृति के साथ संतुलित जीवन, संयमित उपभोग, विनम्रता, आत्मचिंतन, लोकमंगल के सार्थक भाव को सिखाता है।

सारत: रुद्राभिषेक भारतीय आध्यात्मिक परम्परा का ऐसा अमूल्य अनुष्ठान है,जो धार्मिक दृष्टि से भगवान शिव के प्रति श्रद्धा और समर्पण का प्रतीक है। दार्शनिक दृष्टि से अहंकार,त्याग, आत्मबोध और ब्रह्मांडीय चेतना से जुड़ने की साधना है तो वहीं पर वैज्ञानिक दृष्टि से ध्यान, नियंत्रित श्वसन,लयबद्ध मंत्रोच्चारण,सामूहिक सहभागिता आदि में हितकर है, सामाजिक समरसता, लोकसंस्कृति का संरक्षण आदि का सार्थक व सशक्त माध्यम भी है। इस अनुष्ठान के द्वारा मनुष्य के व्यक्तित्व को परिष्कृत करके उसे समाज, सृष्टि व सृष्टा के प्रति उत्तरदायी बनाया जा सकता है।

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©  डाॅ राकेश सक्सेना

पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष, 68, शान्तीनगर, एटा ( उ०प्र० ) 207001

मोबाइल: 94122 82235

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०७० ⇒ रिश्ता और संपर्क ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “रिश्ता और संपर्क…“।)

?अभी अभी # १०७० ⇒ आलेख – रिश्ता और संपर्क ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

°Relation & contact°

रिश्ता केवल खून का ही नहीं होता। हम यहां इंसानियत के रिश्ते की बात भी नहीं कर रहे। बिना जान पहचान के कोई रिश्ता नहीं पनपता। मेल जोल और मेल मिलाप किसी भी रिश्ते की बुनियाद है। रिश्ते हवा में नहीं बनाए जाते। वर वधू की तलाश में अखबारों में मेट्रिमोनियल और क्लासीफाइड विज्ञापन तो दिए जा सकते हैं, लेकिन बात तो पत्र व्यवहार और मिलने जुलने के बाद ही आगे बढ़ती है।

पहले चिट्ठी पत्री उन जान पहचान के लोगों में होती थी, जिनके बीच में किसी कारण भौगोलिक दूरियां होती थी। अनजान लोगों से कौन पत्र व्यवहार करता था। जब किसी अजनबी से पहली बार मुलाकात होती थी, तो सबसे पहले परिचय प्राप्त किया जाता था। आपका शुभ नाम ? अच्छा, आप हमारे पड़ोसी हैं। पहले परिचय, पश्चात् मेलजोल।।

जैसे जैसे इंसान के बीच भौगोलिक दूरियां बढ़ने लगी, संचार के साधन भी विकसित होते चले गए, जिन परिचित चेहरों की जानकारी डायरी में नोट की जाती थी, उनको मोबाइल में स्थान मिलने लगा और बाद में संचार क्रांति के बाद तो सारा संपर्क ही फोन के माध्यम से होने लगा। जहां डायरी में जान पहचान के २५-५० नाम होते थे, वहां फोन के कॉन्टैक्ट की संख्या सैकड़ा पर कर हजार की संख्या में पहुंचने लगी। आज अगर आपके व्हाट्सएप, फेसबुक और ट्विटर के संपर्क जोड़ लिए जाएं, तो आप ही दांतों तले उंगली दबाने लगें।

क्या आज सोशल मीडिया पर हमारे जितने कॉन्टैक्ट हैं, उतने हमारे रिश्ते हैं ?आप नहीं समझते, आपका जवाब होगा। कब किससे क्या काम पड़ जाए आज के इस मशीनी युग में। वह जमाना गया जब बात बात पर साइकिल उठाकर बाजार जाना पड़ता था। आज फोन से कितनी सुविधा है, आप नहीं जानते। धीरे धीरे सभी काम ऑनलाइन होने लग गए हैं। अमेजिंग अमेजान है न।

न जान न पहचान, फिर भी अलादीन के चिराग की तरह मुंहमांगी चीज हाजिर और वह भी 24×7।।

क्या हमारे रिश्ते यंत्रवत और आभासी नहीं होते जा रहे। अपने काम से काम, और दूर की राम राम ! यह कैसी विडंबना है, जितनी जनसंख्या बढ़ती जा रही है, उतनी ही इंसान की आपस में दूरियां बढ़ती जा रही हैं। जो रिश्ते कभी जीवंत थे, वे आजकल औपचारिक होते जा रहे हैं। आज हर बच्चे के हाथ में मोबाइल है और उसके मोबाइल में मोबाइल गेम्स हैं। बस यही उसकी दुनिया है। समझ में नहीं आता, मोबाइल ने हमें जोड़ा है, या हम सिर्फ मोबाइल से ही जुड़े हैं।

कभी ये आंसू मेरे दिल की जुबान होते थे, आजकल फेसबुक ही मेरी जुबान है।

फेसबुक पर बैठकर मोबाइल के बारे में ऐसी बातें करना बिल्कुल ऐसा ही है, जैसे पानी में रहने वाली कोई मछली किसी को पानी से दूर रहने की हिदायत दे। मोबाइल की उपयोगिता हमने कोविड काल में देख ली। जब पूरे संसार हमारे लिए अछूता था, तब एक यह मोबाइल ही तो था, जिसने न सिर्फ गले से लगाया था, हर पल, हर क्षण हमारी मदद की थी। हमारे अकेलेपन का यह सहारा भी बना और एक उपयोगी संगी साथी भी। थैंक्स टू डिजिटल इंडिया।।

आप मानें या ना मानें, आज यह फोन हमारे शरीर का ही हिस्सा हो गया है। अब हमें शरीर के साथ इसकी भी देखभाल करनी है। जिस तरह अच्छे स्वास्थ्य के लिए हमें कई सावधानियां रखनी पड़ती हैं, फेसबुक और सोशल मीडिया की बुराइयों के प्रति हमें जागरूक, सावधान, और सतर्क रहना है। अगर आपने और विशेषकर आज की पीढ़ी ने मात्र इसे मनोरंजन का साधन समझ लिया तो मान लीजिए, आपने अपने लिए और युवा पीढ़ी के लिए नर्क का द्वार खोल लिया है।

पोर्न साइट्स और वैसी ही फिल्में आजकल आपके एंड्राइड फोन का हिस्सा हो गई हैं। बच्चों के वीडियो गेम्स दुस्साहसी ही नहीं, खतरनाक भी हैं। कई लोग तो महज सेल्फी के चक्कर में अपनी जान गंवा चुके हैं। अगर कोई बिल्डर अथवा प्रॉपर्टी ब्रोकर है तो उसका फोन टू व्हीलर हो अथवा फोर व्हीलर, कभी बंद नहीं हो सकता। जब कि ड्राइविंग के साथ मोबाइल का उपयोग अपराध ही नहीं, खतरनाक भी है।।

हम तो रसोई में चाकू का इस्तेमाल भी सावधानी से करते हैं, फिर मोबाइल के साथ लापरवाही क्यूं ? क्या हमारा सामाजिक जीवन मोबाइल द्वारा छीना नहीं जा रहा है। पहले रिश्तों में दरार आई और अब मोबाइल की बारी आई।

कितना अच्छा हो, जिस तरह कभी कभी जबान को लगाम देना सुखद लगता है, दोस्तों के बीच, परिवार के सदस्यों के बीच और इष्ट मित्रों के बीच, इस मोबाइल का मुंह भी बंद कर दिया जाए, ताकि हमारे रिश्ते जीवंत हों, खुली सांस ले सकें। फेसबुक पर स्वस्थ संवाद हो। साहित्य और अध्यात्म की चर्चा हो। आपसी समझ हो। रिश्तों की अहमियत हो, स्वार्थ और खुदगर्जी की नहीं। चाकू से सब्जी ही काटें, अपना हाथ नहीं।

खयाल रहे, बंदर के हाथ में कभी तलवार नहीं दी जाती।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०६९ ⇒ तो बुरा मान गए ! ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “तो बुरा मान गए !…“।)

?अभी अभी # १०६९ ⇒ आलेख – तो बुरा मान गए ! ? श्री प्रदीप शर्मा  ? 

हम इंसान हैं ! हमें अच्छा भी लगता है, और बुरा भी लगता है।

अच्छे से कभी हम आहत नहीं होते लेकिन बुरा हमें केवल लगता ही नहीं, हम बुरा मान भी जाते हैं। कोई हमें बुरा मानने का कहता नहीं, हम खुद ही बुरा मान जाते हैं।

अच्छा-बुरा लगना, अक्सर हमारे मूड पर निर्भर करता है। अच्छे मूड में सब अच्छा लगता है, हँसी मज़ाक, छींटाकशी सब चलती है। लेकिन अगर मूड ठीक न हुआ, तो पत्नी के हाथ की चाय स्वाद खो बैठती है। ब्यूटी पार्लर से सजी-धजी आई पत्नी खाने को दौड़ती है। यह सब एकांगी नहीं होता ! जब पति पत्नी के जन्मदिन की तारीख भूल जाता है, तो सदन में भूचाल आ जाता है। राजा दशरथ रानी कौशल्या के आगे घुटने टेक देते हैं।।

अच्छे माहौल में हमारा स्वभाव भी अच्छा रहता है। हर बड़े-छोटे को गले लगाने की इच्छा होती है, लेकिन अगर वातावरण अप्रिय हो, तो सबसे पीछा छुड़ाने का मन करता है। आखिर हम बुरा मानते ही क्यूँ हैं।

इंसान का मिज़ाज़ भी किसी मौसम से कम नहीं ! एक अच्छे मौसम की तरह कुछ लोग हमेशा खुशनुमा, मुस्कुराहट लिए नज़र आते हैं तो कुछ बेईमान मौसम की तरह चिड़चिड़े, मुँह लटकाए हुए। कुछ लोग इसे इंसान की फ़ितरत कहते हैं। किसी का चेहरा हमेशा एक ताज़े गुलाब की तरह खिला हुआ होता है, तो कुछ का एक बासी, मुरझाई हुई फूलगोभी की तरह फूला;फूला। जब पाँचों उंगलियाँ बराबर नहीं, तो सभी इंसानों का स्वभाव एक जैसा कैसे हो सकता है।।

बुरा मानने वाले भी दो तरह के होते हैं, एक जिनके बुरा मानने की कोई वजह होती है, और दूसरे, जो बिना वज़ह बुरा माने बैठे रहते हैं। बिना वजह बुरा मानने वालों में अक्सर मौसाजी और फूफाजी का नंबर आता है।

उनके एक शादी में बुरा मानने की वज़ह दूसरी शादी में जाकर पता चलती है, और तब तक वे पुनः बिना वज़ह बुरा मान बैठ गए होते हैं। वैसे भी जिनकी बुरा मानने की कोई वजह भी होती है, वह अक्सर बेवज़ह ही होती है।

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है !

सबसे मिल-जुलकर हँसते-खेलते, सबके लिए प्रेम और उदारतापूर्वक दृष्टिकोण रख, ज़िन्दगी जीना ही उसका मक़सद होता है, लेकिन अगर कोई रूठा है, नाराज़ है, किसी कारण बुरा मान बैठा है, तो उसे मनाना भी पड़ता है। बच्चे अगर ज़ल्दी रूठते हैं, तो ज़ल्दी मान भी जाते हैं। मान-मनव्वल तो बड़ों के साथ करनी पड़ती है।।

जब कोई फितरती इंसान अचानक किसी बात को बिना समझे बुरा मान बैठता है, तो उसका मान-सम्मान, इज़्ज़त, स्वाभिमान

सभी दाँव पर लग जाता है।

महामना चाणक्य, महर्षि दुर्वासा और परशुराम का क्रोध उस्में फनफनाने लगता है। उस्का बस चले तो धरती को श्राप दे दे, आसमान में आग लगा दे। लेकिन जब उसे वस्तुस्थिति से अवगत कराया जाता है, तब

जाकर अपनी ही लंका को जलाने वाले ये वीर पुरूष, पश्चाताप के सागर में अपनी जलती पूँछ को बुझा पाते हैं। और कहीं कहीं तो देर होने पर लंका जलकर ख़ाक भी हो जाती देखी गई है।

रूठना मनाना, बुरा मानना, अगर सहज और बच्चों जैसा हो, तो जीवन का आनंद ही कुछ और है। किसी की बात को दिल पर ले लेना, किसी से न कहना, मन ही मन घुटना, जीवन में अवसाद की स्थिति निर्मित कर देता है। खुलकर कहना, मन की गाँठों को खोलना और हर बात का सकारात्मक अर्थ निकालना ही

एक खुशहाल व्यक्तित्व की निशानी है। ऐसे भी लोग हैं दुनिया में, जो बुरा लगे, तो एक रोटी ज़्यादा खा लेते हैं।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १८७ – देश-परदेश – हर दिन ना होत एक समान ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १८७ ☆ देश-परदेश – हर दिन ना होत एक समान ☆ श्री राकेश कुमार ☆

उपरोक्त चित्र वर्षा ऋतु में होने वाली वर्षा से ठंडे खाद्य पदार्थों की बिक्री को प्रभावित करता हुआ बता रहा हैं।अब समय बदल चुका हैं।हम सब तो प्रकृति के विरुद्ध शंखनाद बजा चुके हैं। सर्दी के मौसम में रजाई में बैठ कर हीटर की गर्मी के पूरे मज़े लेने के लिए आइसक्रीम खाना आम बात हो चुकी है।

छाता खरीद कर अब लोग आइसक्रीम खाते हैं, इससे छाता विक्रेता भी खुश रहता है, और आइसक्रीम विक्रेता भी खुश। हम सब ने प्रकृति को नीचा दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।

कोल्ड ड्रिंक आदि ठंडे पेय का अब कभी भी ऑफ सीज़न नहीं होता है। ठंड में विवाह के समय मुफ्त के गर्म गुलाब जामुन के साथ वनिला आइसक्रीम की जुगलबंदी कुछ दशकों से लोक प्रिय हो चुकी हैं। गर्म खाद्य पदार्थ के बाद चिल्ड पानी पीना हो या ठंडी बियर के बाद  गरमा गर्म मुर्गा हलक से नीचे करने में हमारा स्वास्थ्य भी खराब नहीं होता है।

हमारा शरीर भी विचार करता होगा, हमें क्या जो करेगा वो ही ना भरेगा। रोग होने पर मौसम और हवा पर दोषारोपण कर हम  पाक साफ बन जाते हैं।

साठ के दशक यानि हमारे बचपन की बाते यदि आज के किसी जेन ज़ी से करो तो उल्टा जवाब मिलता है, “यू ओल्डीज़” हमेशा आदि मानव की तरह क्यों बिहेव करते हैं?

हमारी दादी तो गर्म भोजन करने के पश्चात तुरंत ठंडे जल से हाथ तक धोने के लिए मना करती थी। किसी भी मौसम में बाहर से घर प्रवेश के दस मिनट के बाद ही साधारण जल तक ग्रहण करने दिया जाता था। कारण पूछने पर परिवार के बड़े, बाहर और घर के टेम्प्रेचर के अंतर को शरीर को एडजेस्ट करने का कूलिंग पीरियड बता कर घर के छोटे बच्चों की जिज्ञासा को वैज्ञानिक तथ्य से शांत कर दिया करते थे। आज की युवा पीढ़ी तो गूगल की दलीलों से बुजर्गों की खिल्ली उड़ा देते हैं।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०६८ ⇒ अट्टहास ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “अट्टहास …“।)

?अभी अभी # १०६८ ⇒ आलेख – अट्टहास ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

(HEE HAW )

हँसने के कई तरीके होते हैं। जब हँसी छूटती है, तब वह भीड़ की तरह दिशाहीन होती है। कहीं मंद मंद हँसी, तो कहीं हँसी के फव्वारे। कभी कभी तो भरे हुए बादलों की तरह हँसी फूट पड़ती है। आखिर हँसी में ऐसा क्या है, कि जब यह वेग में होती है, तो रोके नहीं रुकती।

हमारे अंदर गम और खुशी के गोदाम हैं, आप चाहें तो उन्हें गोडाउन भी कह सकते हैं। गोदाम अक्सर भरते रहते हैं, और खाली होते रहते हैं। आजकल इन्हें कोल्ड स्टोरेज भी कहा जाने लगा है। जब चीजों के दाम बढ़ते हैं, तब गोदाम भरे रहते हैं, और जब चीज़ों के दाम घटने लगते हैं, तो गोदाम खाली होते चले जाते हैं। गोदाम का भरना और खाली होना, वस्तुओं के दाम बढ़ने और घटने, से जुड़ा रहता है। दाम के अप और डाउन होने, अर्थात् घटने बढ़ने से गोडाउन की सेहत पर असर पड़ता है।।

हँसना सेहत के लिए अच्छा है। सेहत सुधारने के लिए आजकल लोग हेल्थ क्लब की तरह लाफ्टर क्लब भी जाने लग गए हैं। रोना तो इंसान जन्मजात लेकर आया है, लेकिन वह बड़ा होकर हँसना भूल गया है। हँसने की कोचिंग क्लास है लाफिंग क्लब, जहां हँसना सिखाया जाता है।

गम के गोदाम अक्सर भरे हुए ही रहते हैं और खुशी के खाली, क्योंकि गम के खरीददार कम होते हैं, और खुशी तो इंसान हर कीमत पर खरीदने को तैयार होता है। पहले खुशी खरीदने के लिए ढेर सारा पैसा लेकर बाजार जाना पड़ता था, आजकल खुशी भी ऑनलाइन पेमेंट पर अमेजान और फ्लिपकार्ट पर चढ़कर घर चली आती है। गम पर डिस्काउंट बढ़ता जा रहा है, पर कोई खरीद नहीं रहा। खुशी, लोग खुशी खुशी अपने घर ले जा रहे हैं।।

हँसना, खुशी जाहिर करने का पारंपरिक तरीका है। यूं तो हँसी के कई भेद हैं, लेकिन प्रमुख भेद पुरुष और स्त्री की हँसी का है। महिलाएँ, हँसती नहीं, खिलखिलाती हैं। लगता है, कहीं घंटियाँ बज रही हों।

चूड़ी की खनक और पायल की झंकार उनकी हँसी में शामिल होती है, क्योंकि ईश्वर ने उनके गले में सुर और स्वर दिया है।

पुरुष का स्वर खुरदुरा होता है क्योंकि रिश्ते में वे किसी के बाप लगते हैं। जितनी मोटी आवाज़, उतनी ही मर्दानी आवाज़ और ऊपर से हँसी के ठहाके। हा, हा, हि ही और हु हू की पूरी बारहखड़ी हं, ह:, ह : ह :। बिना कुछ कहे, कहकहे ही कहकहे के ऐसे फव्वारे छूटते हैं, कि लोग भीग जाने के अंदेशे से, चार कदम दूर ही खड़े रहते हैं।।

एक और धांसू हँसी होती है, जिसे अट्टहास कहते हैं। अट्टहास शब्द से ही ऐसा प्रतीत होता है, मानो अचानक कोई चट्टान की हँसी फूट पड़ी हो। हमारे धार्मिक सीरियल में अक्सर राक्षसों को हँसते हुए दिखाया जाता है। वह हँसी थमने का नाम ही नहीं लेती। हर एक दो डायलॉग के बाद फिर वही हँसी का टेप। आप इस हँसी को अट्टहास का परिहास भी कह सकते हैं, क्योंकि इस हँसी पर किसी को हँसी नहीं आती।

कभी कभी हँसते हँसते भी, आँखों में आँसू निकल आते हैं तो कभी रोते रोते भी हँसी निकल आती है। हँसना, रोना सहजता की निशानी है। किसी बात पर हँसना, किसी घटना पर हँसना अथवा परिस्थिति पर हँसना बुरा नहीं लेकिन किसी पर हँसना मना है। जो झरने की तरह फूटे, वह हँसी। फिर चाहे वह ठहाका हो, कहकहा हो, या फिर अट्टहास। लेकिन इस बात का जरूर रखें खयाल, कोई बीमार, दुखी, लाचार ना हो आसपास।।

खुशियों में शामिल हों, लोगों को अपनी खुशी में शामिल करें। गम के गोदाम खाली पड़े रहें, खुशियों को कैद ना करें, आज़ाद करें। सुना है खुशी बांटने से बढ़ती है और हँसी की फुहार भी तो रंगबिरंगी होली की फुहार ही होती है। जिस चेहरे पर हंसी ना,

वह काहे की हसीना। अब तो हँसी ना, हँसी ना …!!

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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