श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “गणेश चतुर्थी — दूर्वा पूजन…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # ३०१ ☆
☆ गणेश चतुर्थी — दूर्वा पूजन… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆
☆
मास भादों की चतुर्थी, शुक्ल का चंदा सजा।
मातु गौरी के गजानन, राग मंगलमय बजा।।
नाम लंबोदर कहाया, तात शिव शंकर कहे।
नाथ! पूजा आपकी हो, लाभ संगत शुभ रहे।।
☆
गणपति बप्पा को हम बुद्धि, विवेक और मंगल के देवता मानते हैं। दूर्वा उन्हें प्रिय है और दूर्वा स्वयं प्रकृति की उस सहज हरियाली का प्रतीक है, जो बिना किसी आडंबर के धरती को जीवन और सौंदर्य प्रदान करती है। फिर क्यों न इस बार गणेश आराधना के साथ प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारी का संकल्प भी लिया जाए?
गणेश उत्सव केवल पूजा, आराधना और सजावट का पर्व नहीं, बल्कि नई शुरुआत का उत्सव भी है तो क्यों न इस नई शुरुआत में एक पौधा लगाया जाए, उसके संरक्षण का संकल्प लिया जाए और अपने आसपास की हरियाली को थोड़ा और बढ़ाया जाए?
एक गणेश जी के नाम एक पौधा…
एक पौधे के नाम एक जिम्मेदारी…
और हर घर के नाम थोड़ी-सी हरियाली।
गणेश जी की पूजा में दूर्वा अर्पित करते समय हम यह भी स्मरण करें कि प्रकृति हमारे जीवन का अभिन्न अंग है। सजावट में फूल-पत्तियों और अन्य प्राकृतिक सामग्री का उपयोग करें तथा प्लास्टिक और अनावश्यक कचरे से बचें। गणेश प्रतिमा के विसर्जन में भी पर्यावरण की संवेदनशीलता का ध्यान रखें। संभव हो तो मिट्टी की प्रतिमा और घर पर सुरक्षित विसर्जन जैसे पर्यावरण-अनुकूल विकल्प अपनाएँ।
क्योंकि विघ्नहर्ता गणेश जी की आराधना करते हुए हम प्रकृति के लिए स्वयं कोई नया विघ्न क्यों उत्पन्न करें?
आइए, इस गणेश उत्सव पर केवल गणपति को घर न लाएँ—
उनके साथ हरियाली का एक संकल्प भी घर लाएँ।
एक पौधा, एक भाव…
एक पौधा, एक जिम्मेदारी…
हर पौधा कुछ कहता है।
दूर्वा, गुड़हल, पुष्प सुहाएँ, मोदक भोग लगे।
नित्य जपें जो नाम तुम्हारा, उनके भाग्य जगे।।
तीर्थ सभी फलवान हों, भक्ति की गंगा बहे।
प्रेम से जयकार करें हम—
जय विघ्नहर्ता! जय गणेश कहे।।
**
© श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’
माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020
मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






