श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव
गोरखपुर, उत्तर प्रदेश की निवासी लेखिका व कवयित्री श्रीमती अभिलाषा श्रीवास्तव जी एक प्रेरणादायक महिला हैं। साहित्य की सेवा में निरंतर रत | आपको 2024 में अंतरराष्ट्रीय महिला सम्मान पत्र से नवाजा गया। विशेष सम्मान : एक्सीलेंट कवयित्री अवार्ड से सम्मानित तथा पुरस्कृत |उनके द्वारा संवाद टीवी पर फाग प्रसारण में प्रस्तुत किया गया और विभिन्न राज्यों के प्रमुख अखबारों व पत्रिकाओं में उनकी कविता, कहानी और आलेख प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी लेखनी में समाज के प्रति संवेदनशीलता और सृजनात्मकता का सुंदर संगम देखने को मिलता है।
☆ आलेख ☆🌷अस्सी का वो दौर🌷
आजकल सोशल मीडिया के पन्नों पर अस्सी और नब्बे के दशक की तस्वीरें 📷 बनाने का जैसे बाढ़ सा आया है। फिल्टर और एआई के इस दौर में जब पुरानी धुंधली यादें नए रंगों में सामने आती हैं, तो सीने में एक मीठा सा दर्द और होठों पर अनचाही मुस्कान तैर जाती है। टेलीविजन का वो पुराना बक्सा, антенना की जुगाड़बाजी और गलियों में गूंजती साइकिल की घंटियाँ—सब कुछ आँखों के आगे किसी घूमते बायोस्कोप सा आ जाता है। यह तकनीक का करिश्मा हमें खींचकर सीधे हमारे गाँव-गिराव की उन कच्ची गलियों और पक्के रिश्तों वाले बचपन में ले जाता है।
गाँव की चौपाल से सिनेमाई परदे तक, अपने-अपने नायक
गाँव की उस सोंधी धूप और छांव में हर घर की अपनी एक कहानी थी। घर की बड़ी-बुजुर्ग या मौसी जब आँगन में बैठती थीं, तो कभी मीना कुमारी के दर्द को जीती थीं, तो कभी साधना के उस खास, दिलकश काजल की नकल करने की कोशिश करती थीं। आस-पास की सयानी होती लड़कियाँ माधुरी दीक्षित की मुस्कान पर जान छिड़कती थीं। सबका अपना रंग था, अपनी शैली थी।
पर मेरी दास्तान इन सबसे जरा हटकर, थोड़ी बागी और बड़ी मज़ेदार थी। मैं उन दिनों किरण बेदी की दीवानगी की हद तक असर में थी। उनके खाकी लिबास, निडर तेवर और दबंग अंदाज ने ऐसा जादू किया कि पूरे स्कूल लाइफ में मेरे बाल कभी लंबे हुए ही नहीं! हमेशा बड़े भैया—यानी हमारे संजय भैया—के कपड़ों पर मेरी तिरछी निगाह रहती थी। उनकी टी-शर्ट पहनने के लिए घर में जो महाभारत मचती, उसकी याद आज भी हँसा देती है। तंग आकर भैया आखिर में बाजार से मेरे लिए लेडीज टी-शर्ट ले आते, पर भला वो मुझे कहाँ रास आती! मेरी नजर तो हमेशा उनकी उस जींस वाली कॉटन जैकेट पर होती थी। जैसे ही मैं उसे पहनती, भैया झुंझलाकर तान मारते— “हट पगली, ये आमिर खान की है!”—सच कहें तो उस वक्त मेरा भैया किसी चलते-फिरते आमिर खान का कॉपीराइट लग1ता था।
सोंधेपन की महक और वो अतरंगी शौक
उस दौर की आबोहवा में एक अजीब सी ठंडक और अपनापन था। गाँव की पगडंडियों से लेकर चौपाल तक, हर इंसान का पहनावा और तेवर बिना कहे बता देता था कि उसका दिल किस पर आया है। कोई कपिल देव के घुंघराले बालों और ऑलराउंडर अंदाज़ का दीवाना था, तो कोई संजय दत्त के उस रफ-टफ हेयर स्टाइल पर फिदा था।
और हमारे पतिदेव? वो तो जनाब सबसे एक कदम आगे थे! उन्हें अपनी मूँछें बिल्कुल अनिल कपूर जैसी घनी और उठी हुई रखनी थीं। सिर पर बाल अजय देवगन वाले और मुँह पर अनिल कपूर जैसी रोबीली मूँछें—
‘इन दोनों का ऐसा खतरनाक कॉम्बिनेशन था ‘
क्या वक्त के साथ वो सोंधापन लौट पाएगा?
आज तकनीक ने हमें वो दौर और वो तस्वीरें तो लौटा दी हैं। हम पुरानी यादों की इस नदी में डुबकी लगाकर खुद को तरोताज़ा भी महसूस कर रहे हैं। मगर दिल के किसी कोने में एक सवाल कसकता है— तस्वीरें और तकनीक तो लौट आई हैं, पर क्या वो मिट्टी की सोंधी खुशबू और वो निश्छल भावनाएँ भी लौट पाएँगी?
आज तो हर पल नया ट्रेंड बदल जाता है, सब कुछ तेज और डिजिटल हो गया है। तब साधन कम थे, पर दिलों में अपनापन बहुत था। आज तस्वीरें मोबाइल की स्क्रीन पर हैं, पर वो बचपन की गली, वो पेड़ों की छांव, और वो एक दूसरे के लिए धड़कता अपनापन… कहीं पीछे छूट गया है।
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© श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव
गोरखपुर, उत्तरप्रदेश
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






