हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – लबादा ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – लबादा ? ?

(कविता-संग्रह ‘यों ही’ से)

लबादे ओढ़े हुए

लोगों का झुण्ड,

लबादों पर दर्पण चिपकाए,

मेरे शहर तक आ पहुँचा है,

मैं ज़मीन पर उतर आया हूँ,

शामिल हो गया हूँ

उस झुण्ड में,

दर्पण वाला लबादा ओढ़कर।

 

झुण्ड, अब

कंदराओं की ओर बढ़ चला है।

  

कंदरा में छिपा बौना आदमी

भाग रहा है दर्पण की चमक से,

पीछा छुड़ा रहा है चमक से जनते अक्स से,

……बेतहाशा भाग रहा है।

 

झुण्ड का कोलाहल बढ़ रहा है,

बौना आदमी हाँफने लगा है,

थक गया है,

ख़ुद ही लौट रहा है

दर्पण वाले लबादों की ओर।

 

झुण्ड,

अब वापसी की यात्रा पर है,

दर्पण की यहाँ-वहाँ

चमकती किरणों से

चौंधिया रही है कंदरा ।

 

मैं,

अचकचा कर जाग उठता हूँ,

पर्दे से छनकर आती

रोशनी देखता हूँऔर सोचता हूँ-

मुझे कंदरा से

यहाँ तक कौन लाया?

?

© संजय भारद्वाज  

सोमवार दि. 30 .05 .2016, संध्या  7:15  बजे

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 6 नवम्बर से मार्गशीर्ष साधना आरम्भ होगी। इसका साधना मंत्र होगा – ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 🕉️ 

🕉️ इसके साथ ही हम श्रीमद्भगवद्गीता का पारायण करेंगे। इसमें 700 श्लोक हैं। औसत 24 श्लोक या उनके अर्थ का यदि दैनिक रूप से पाठ करेंगे 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार #७३ – नवगीत – गूँज रहीं बूँदों की सरगम… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – गूँज रहीं बूँदों की सरगम

? रचना संसार # ७३ – गीत – गूँज रहीं बूँदों की सरगम…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ?

गूँज रहीं बूँदों की सरगम,

पावन हिय गलियारों में।

चलो सखी झूला झूलें हम,

शीतल सी बौछारों में।।

*

छोड़ घोंसलें भीगे-भीगे,

पंछी आए आँगन में।

नहीं मिला दाना चुगने को,

अब के देखो सावन में।।

चल झरनों से बात करें हम,

झम-झम करें फुहारों में।

गूँज रहीं बूँदों की सरगम,

पावन हिय गलियारों में।।

*

धरती मिलने चली गगन से,

नयनों में काजल डाले।

आलिंगन को व्याकुल सरिता,

प्रीति समंदर-सी पाले।।

सुधि-बुधि खो कलिकाएँ बैठी,

भ्रमरों की गुंजारों में।

गूँज रहीं बूँदों की सरगम,

पावन हिय गलियारों में।।

*

मादक अधर मिलन को व्याकुल,

मोहे पुरवाई प्यारी।

सुलगे देह प्रीति में साजन,

काम -बाण से मैं हारी।।

यौवन प्रेम मगन हो नाचे,

चाहत की झंकारों में।

गूँज रहीं बूँदों की सरगम,

पावन हिय गलियारों में।।

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज #३०२ ☆ भावना के दोहे – मौसम ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे – मौसम)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३०२ – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे – मौसम ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

मौसम बदला आज कुछ, धुंध हुई कुछ साफ।

ठंडी -ठंडी चली हवा, हमने ओढ़ लिहाफ।।

 *

सूरज डूबा देख लो, मोहक होती शाम।

रजनी का आमंत्रण है, सपनों में मुलाकात।।

 *

चादर तम की भीतरी, चाँद झाँकता आज।

कितनी सुंदर चाँदनी, बज उठे हैं साज।।

 *

सूरज कंबल ओढ़ता, उसे लगी है ठंड।

चादर कुहरे की बढ़ी, मिला सभी को दंड।।

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष #२८३ ☆ संतोष के दोहे – (तुलसी माँ की कथा) ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपके संतोष के दोहे आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # २८३ ☆

संतोष के दोहे☆ श्री संतोष नेमा ☆

(तुलसी माँ की कथा) 

तुलसी माँ पिछले जनम, थीं वृंदा का रूप |

ईश विष्णु की भक्ति में, खूब गईं थीं डूब |

जालंधर से जब हुआ, वृंदा का सुविवाह  |

वृंदा पत्नी धर्म का, पूर्ण किया निर्वाह ||

देव-असुर  में जब हुआ, बहुत बड़ा संग्राम |

जालंधर भारी पड़ा, मचा खूब कुहराम ||

वृंदा ने तब ही किया, पूजन वंदन ध्यान |

वृंदा पुण्य प्रताप से, हारे देव महान ||

जगदीश्वर से देवता, करने लगे गुहार |

हमें सुरक्षित कीजिये, जालंधर संहार ||

वृंदा जैसी भक्त से, छल पर करें विचार|

कहें विष्णु इस युद्ध में, विजय मिले या हार ||

देव सभी करने लगे, विनती बारम्बार |

विष्णु जी ने तब लिया, जालन्धर आकार ||

पहुँचे वृंदा महल में, धर जालंधर रूप |

पूजा से वृंदा उठीं, इच्छा हुई विरूप  ||

जब वृंदा ने पग छुए, रूठे सब सत्कर्म |

जालन्धर की मृत्यु का, वृंदा समझीं मर्म ||

वृंदा ने जब क्रोध में, दिया विष्णु को श्राप |

बन जाओ पाषाण तुम, हुईं सती चुपचाप ||

उद्भव पावन स्थान पर, तुलसी पादप आप |

बोल उठे यह देख कर, क्षमा करें सब पाप ||

वृंदा के सुसतीत्व को, दिया बहुत सम्मान |

पूजन मेरे संग हो, सदा मिलेगा मान ||

सतवंती की शक्ति से, चकित स्वयं भगवान |

नारी की महिमा बड़ी, उसका हो सम्मान ||

तुलसी शालिग्राम का, करिए साथ विवाह |

एकादश तिथि में मिले, देवाशीष अथाह ||

आँगन तुलसी राखिये, बिन तुलसी घर सून |

रहता मन “संतोष” तब, खुशियाँ होतीं दून ||

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 70003619839300101799

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # ३ – कविता – बिरज की ग्वालन की व्यथा… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘बिरज की ग्वालन की व्यथा।)

☆ शशि साहित्य # ३ ☆

? कविता – बिरज की ग्वालन की व्यथा…  ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

दो दिन बीते ,कान्हा नहीं पहुंचे,

काहे नहीं आया, माखन चोर.. ?

🍚

ए ललना.. तू कहां रह गयो,!

 अब तक क्यों ना आयो रे..

अब तो मैंने नीची कर दी,

क्या मटकी हाथ ना आई रे…

राह तक रही मोरी अखियां,

क्यों बिसरा दी मोरी गलियां..

बेसुध हो रहे प्राण हमारे,

बाट जोहते चांद सितारे,

खो गई रुनझुन पायल से,

बयार ना आई अमराई से..

कान्हा अब तो आजा तू..

ना करुं कभी शिकायत,

अब तोरी मेहतारी से…‍‍।

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – कविता ☆ स्त्री-वजूद ☆ श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव ☆

श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव 

गोरखपुर, उत्तर प्रदेश की निवासी लेखका व कवयित्री अभिलाषा श्रीवास्तव जी एक प्रेरणादायक महिला हैं। साहित्य की सेवा में निरंतर रत | आपको 2024 में अंतरराष्ट्रीय महिला सम्मान पत्र से नवाजा गया। विशेष सम्मान : एक्सीलेंट कवयित्री अवार्ड से सम्मानित तथा पुरस्कृत |उनके द्वारा संवाद टीवी पर फाग प्रसारण में प्रस्तुत किया गया और विभिन्न राज्यों के प्रमुख अखबारों व पत्रिकाओं में उनकी कविता, कहानी और आलेख प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी लेखनी में समाज के प्रति संवेदनशीलता और सृजनात्मकता का सुंदर संगम देखने को मिलता है।

☆ कविता ☆ स्त्री-वजूद ☆ श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव ☆

वजूद स्त्री का तुम क्या परखोगे?

अनुपस्थिति में तुम्हारी उपस्थिति

माथे पे दर्शायें रखती हूं

कहते हो जिसे देखकर तुम ‘ब्याहता’

सिन्दूर की लाली बना चंद्र सा तुम्हें माथे पे बिठाकर रखती हूं

छोटी-बडी खुशियां क्या?

सौन्दर्य ख्वाहिश और अतंस के पोरों पोर तक सौंप

दूजे आंगन को देखो मैं स्त्री इठलाती हूं

वजूद तेरा चलाने को

पीड़ा सह जाती हूं

धो लेती मैल कपडों संग व कैक्टस गमले में लगा लेती हूं

तकिया- कुशन मे कवर चढा़ कर

बहुत-सी बातों पे मौन मोहर लगा देती हूं

हहहहहह

ब्याहता हूं

स्त्री हूं

अपनी उपस्थिति सदा छुपा लेती हूं

चार भागों में बाँट भाग्य बनके सृष्टि

हर रिश्ता मन से निभा लेती  हूं

माना, हुआ जन्म निराश

थे बाबा

कलाई भरा भाई का तब

वचनबद्ध भाई हुआ तब

अंतिम-सांसो का संवाद हुआ था तब

सांसों के डोर जब तक टूटें ना

हर बेटी का अधिकार

तेरहवीं मे भी मायका पे होगा तब तक’

रीति-रिवाज के नामों पे

मिलना जुलना होगा

मामा भात भरेगा भाई नाना के नहीं रहने पे तब

दहलीज़ भाई का अधिकार

बहन का जन्म मृत्यु तक अटल सत्य है यह

बेटी के जन्म पे प्रांगण

मौन रहता है हरबार

फिर भी, सुनो एक बात

मै-ब्याहता

हूं स्त्री

तुलसी हूं

वृंदा हूं

निश्चित रूप से कर्त्तव्य वेदी पे चढ़ कर

हिस्से की अपनी दूभ लेकर अपनी

बेटी-कुल, खानदान’

का फर्ज निभा जाऊंगी

शुरू किया जो सफ़र गुड़िया से

उफ्फफ

प्रातःकाल से स्वीकृति लेकर सुनो

जेठ की दोपहर की तपिश

भावनात्मक संबंध निभाऊगी

छूटीं छिपी मौन रहेगा वजूद मेरा सदा

मैं स्त्री

स्वयं को खो कर तेरे

नाम से जानी जाऊंगी

पग फेरी के अग्नि से लेकर

मणिकर्णिका तक तेरे हाथों से मुक्ति पाऊंगी।

~ अभिव्यक्ति की स्याही ~

© श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव

गोरखपुर, उत्तरप्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – घनीभूत ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – घनीभूत ? ?

कंठ से फूटता नहीं शब्द

अवाक हो जाता है यकायक,

सोचता हूँ;

कितनी घनीभूत होती होगी

वाणी का अपहरण

करनेवाली पीड़ा,

जो हरे को कर देती है ठूँठ,

अच्छे बोलते-चलते को

कर देती है मूक !

?

© संजय भारद्वाज  

सोमवार दि. 30 .05 .2016, संध्या  7:15  बजे

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

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संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिनंदन करें हम…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

डॉ. रामेश्वरम तिवारी

संक्षिप्त परिचय

  • हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल  (म.प्र).
  • नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए,  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।

आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता – अभिनंदन करें हम…!

☆ ॥ कविता॥ अभिनंदन करें हम…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी

 

अपनी मातृभूमि का, पुण्यभूमि का,

वंदन करें  हम, अभिनंदन  करें हम।

जहाँ पाप-नाशनी सुरसरि बहती हैं,

दुष्ट- दुर्जनों के अत्याचार सहती है,

उसकी रज का सिर लेपन करें हम।

जिसके उत्तुंग शिखर नभ को छू रहे,

जिससे वन-उपवन महक ख़ुश्बू रहे,

उसके लिए सर्वस्व अर्पण करें हम।

इसकी गरिमा का गुणगान करें हम,

आजादी  ख़ातिर बलिदान करें हम,

जीवन  को  सुरभित चंदन करें हम।

जहाँ भिन्न जाति-धर्मी,जन रहते हैं,

मिल-जुलकर बहुवर्णी जन रहते हैं,

देश हितार्थ जिएँ-मरें प्रण करें हम।

© डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सम्पर्क – सागर रॉयल होम्स, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026

मोबाईल – 8085014478

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # २६७ ☆ आस्था और ग्रीन मोटिवेशन… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “आस्था और ग्रीन मोटिवेशन। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – कविता # २६७ ☆ आस्था और ग्रीन मोटिवेशन

आस्था… यह केवल पूजा की थाली में रखे दीपक की लौ नहीं होती,

आस्था वह शक्ति है जो मनुष्य को अंधेरों में भी रोशनी ढूँढने की प्रेरणा देती है।

और हरियाली… यह केवल पेड़-पौधों का समूह नहीं,

यह धरती का प्राण, प्रकृति की धड़कन और हमारे जीवन की ऊर्जा है।

आस्था और हरियाली जब एक साथ जुड़ते हैं,

तो मनुष्य के भीतर एक अद्भुत शक्ति जन्म लेती है।

यही शक्ति है ग्रीन मोटिवेशन।

आस्था हमें जोड़ती है, हरियाली हमें जीवित रखती है

 

जब हम किसी मंदिर, किसी वृक्ष, या किसी पवित्र स्थल पर जाते हैं,

तो मन अपने आप शांत हो जाता है। क्यों?

क्योंकि प्रकृति के साथ किया गया हर संपर्क,

हमें हमारे मूल से जोड़ता है।

धरती माता से जुड़ी यह भावना ही आस्था है।

और जब इसी आस्था में हम हरियाली का संकल्प जोड़ते हैं,

तो यह आस्था केवल व्यक्तिगत नहीं, समाज का बल बन जाती है।

 

 हर पौधा एक प्रार्थना है, हर वृक्ष एक आशीर्वाद

 

यदि हम समझ लें कि—

“पेड़ लगाना सिर्फ पर्यावरण का काम नहीं, यह पूजा का एक रूप है।”

तो हर मनुष्य का दृष्टिकोण बदल जाएगा।

एक पौधा लगाना मतलब

धरती को दिया गया श्रद्धा का दीप,

एक वृक्ष को बचाना मतलब

आने वाली पीढ़ियों के लिए आशीर्वाद छोड़ देना।

आस्था का असली अर्थ ही यही है —

जहाँ हम रहते हैं, जिस हवा को साँस लेते हैं,

उसको पवित्र, सुरक्षित और जीवनदायी बनाना।

 

 ग्रीन मोटिवेशन: आत्मा को जगाने वाली प्रेरणा

 

ग्रीन मोटिवेशन बाहरी नहीं,

यह भीतर उठने वाला वह भाव है जो कहता है—

“मैं बदलूँगा, तो संसार बदलेगा।”

जब मन में आस्था हो और हाथों में कर्म…

तब कोई कठिनाई बड़ी नहीं लगती।

आज का समय हमसे यही मांग करता है कि

हम अपनी आस्था को केवल मंदिर की सीढ़ियों तक न रखें,

बल्कि हर पेड़, हर पौधे, हर पत्ते तक पहुँचाएँ।

 

धरती हमारी माता है, और माता को केवल पूजा नहीं, सुरक्षा चाहिए

 

हम रोज़ माँ को प्रणाम करते हैं,

पर उसी धरती-माता के आँगन में

यदि कूड़ा फेंक दें, पेड़ काट दें,

तो यह कैसी आस्था?

सच्ची भक्ति वही है जिसमें

हम धरती को हरा-भरा रखें,

हवा को स्वच्छ और जीवन को संतुलित बनाएँ।

जब आप पौधा लगाते हैं,

धरती आपको आशीर्वाद देती है—

स्वास्थ्य का, मानसिक शांति का, और समृद्धि का।

 

अन्ततः आस्था यदि दीपक है, तो हरियाली उसकी लौ

 

आस्था हमें दिशा देती है।

हरियाली हमें जीवन देती है।

और इन दोनों का संगम ही

एक सुंदर, स्वस्थ और संतुलित भविष्य बनाता है।

आपके मन में जो हरियाली के प्रति सम्मान और प्रेम है,

वह स्वयं में एक साधना है।

ईश्वर आपको यह पुण्य भाव सदैव देता रहे।

आपका हर कदम किसी पौधे की तरह

फलता-फूलता रहे।

आस्था भी बने, हरियाली भी रहे

और जीवन हर दिन अधिक उजला होता जाए।

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©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # २७५ ☆ बाल गीत – मुझे सुनाओ नई कहानी… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मानबाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंतउत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # २७५ ☆ 

गीत – मुझे सुनाओ नई कहानी☆ डॉ राकेश ‘चक्र’

 मीठा-मीठा बोलो नानी।

मुझे सुनाओ नई कहानी।

 *

चीख-चीख कर कभी न बोलो।

वाणी में मिश्री-सी घोलो।

मैं बच्चा करता नादानी।

मुझे सुनाओ नई कहानी।

 *

मम्मी डाँटें , तुम भी डाँटो।

मेरा प्यार कभी मत बाँटो।

चलो पार्क में हवा सुहानी।

मुझे सुनाओ नई कहानी।

 *

नाना कभी-कभी हैं आते।

लेकिन मेरे मन को भाते।

कभी न करते वे मनमानी।

मुझे सुनाओ नई कहानी।

 *

मूड रखें सब हरदम अच्छा।

सभी बड़ों से सीखे बच्चा।

नाना घूँट-घूँट पीते हैं पानी।

मुझे सुनाओ नई कहानी।

 *

मम्मा , नानी संग न खेलें।

नाना के संग चलती रेलें।

नाना – सा ना कोई सानी।

मुझे सुनाओ नई कहानी।।

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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