हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – ह्रास ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – ह्रास ? ?

इसने कहा,

उसके भीतर

कुछ कम हो रहा है,

उसने कहा,

उसके भीतर

कुछ कम हो रहा है,

सबने कहा,

सबके भीतर

कुछ कम हो रहा है,

हरेक को भीतर

कुछ कम होने का भास है,

मनुज! संभवत: यही

मनुष्यता का ह्रास है..!

?

© संजय भारद्वाज   

14 जुलाई 2020प्रात: 11:13 बजे

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

गुरु साधना 19 जुलाई से बुधवार 29 जुलाई तक चलेगी। 🕉️ 

इसका मंत्र होगा-

ॐ गुं गुरुभ्यो नम:

(उच्चारण- ओम गुम गुरुभ्यो नमह)

💥 आप अपने गुरु / मानस गुरु / मार्गदर्शक / माता /पिता / प्रेरक व्यक्तित्व आदि जिस किसी में भी आपकी श्रद्धा हो, को स्मरण कर इस मंत्र का पाठ कर सकते हैं। यदि ऐसा कोई व्यक्तित्व आपके जीवन में नहीं है तो भी अपनी सैद्धांतिक / वैचारिक प्रतिबद्धता को यह मंत्र समर्पित कर सकते हैं। सनातन ठहराव नहीं बहाव है। अतः प्रवाह की दिशा स्वयं तय करें। 💥

इसके साथ नीचे दिए श्लोक का भी अपनी सुविधा के अनुसार 11 /21 /31 /51 बार पाठ करें। 

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ सबकी जुदा गेल है…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

डॉ. रामेश्वरम तिवारी

संक्षिप्त परिचय

  • हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल  (म.प्र).
  • नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए,  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।

आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – सबकी जुदा गेल है…!

☆ ॥ कविता॥ सबकी जुदा गेल है…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी

 

कुदरत का भी अजीब खेल है,

कहीं सूखा, कहीं रेलमपेल है।

*

ये कौन है जो जुल्म ढा रहा है,

कौने हाथों मेघों की नकेल है।

*

फकत जमीं पर ही नहीं होता,

ऊपरे चलता सियासी खेल है।

*

तालीमशुदा सड़कें नाप रहे हैं,

मुक़द्दर लिख रहे 5वीं फेल हैं।

*

दोषी आवारा साँड़-से घूम रहे,

निरीह- निर्दोषी भीतर जेल हैं।

*

जाना सभी को एक जगह पर,

पर सबकी जुदा-जुदा गेल है।

© डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सम्पर्क – सागर रॉयल होम्स, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026

मोबाईल – 8085014478

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # ३०४ ☆ पाँच शिशु कविताएँ… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मानबाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंतउत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # ३०४ ☆ 

☆ पाँच शिशु कविताएँ ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ 

 १. सूरज नारंगी 

साँझ ढली सूरज नारंगी

चले जा रहे पश्चिम ओर।

करें नमस्ते हाथ जोड़कर

कल को आकर करें सुभोर।।

 २. चिड़ियाँ आकर हमें जगातीं 

 

सूरज करते रोज सवेरा।

दूर भगाते रोज अँधेरा।

चिड़ियाँ आकर हमें जगातीं

आलस सारा दूर भगातीं।।

३. हाथी जैसी सूंढ़ न मेरी 

भिन – भिन – भिन – भिन ,

भिन – भिन – भिन ।

मच्छर हूँ कानों से सुन ।

गज जैसी सूंढ़ न मेरी,

काटूँ जैसे चुभती पिन।।

☆☆☆☆

४. इन्हें न तोड़ो नटखट बंदर 

फूल बड़े होते हैं सुंदर।

इन्हें न तोड़ो नटखट बंदर।

तोड़ेगे तो पाप पड़ेगा।

कहतीं नदियाँ कहे समुंदर।।

५ . दाना खातीं फुदक – फुदक कर 

चीं – चीं – चीं – चीं गीत सुनातीं।

सूरज के उगते आ जातीं।

दाना खातीं फुदक – फुदक कर।

पानी पीतीं मटक – मटक कर।।

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १५३ ☆ कोल्हू का बैल ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “कोल्हू का बैल” ।)

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १५३ ☆

☆ कोल्हू का बैल ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

निरंतर एक ही पथ पर

घूमता रहता है

आँखों पर बँधी होती है पट्टी

बस इसी आशा में

कि एक दिन निश्चित ही

पा जाऊँगा अपनी मंजिल

और नियति है जो घुमाती रहती है

आदमी भी घूमता रहता है

अपने द्वारा रचे गए चक्रव्यूह में

अभिमन्यु की जिसे

घुसना तो आता था चक्रव्यूह में

निकलना नहीं सीखा था

इसलिए मारा गया

मनुष्य भी कोल्हू का बैल

और अभिमन्यु की तरह ही

अपने आपको बेबस और लाचार

पाकर अभिशप्त है मरने को

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (३४) ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (३४) ? ?

चुप हो जाना चाहता हूँ

जाना ही इनकी नियति है

सो चुप्पियों को

विदा कहना चाहता हूँ,

पर जाने क्या हो गया है

वे निरंतर आ रही हैं

मायके आई बेटी की तरह

लगातार बतिया रही हैं,

भरी आँखों से

निहारता हूँ इनका चेहरा

क्या करुँ

इनका पिता जो ठहरा!

?

© संजय भारद्वाज   

(2.9.2018, 1:16 बजे)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

गुरु साधना 19 जुलाई से बुधवार 29 जुलाई तक चलेगी। 🕉️ 

इसका मंत्र होगा-

ॐ गुं गुरुभ्यो नम:

(उच्चारण- ओम गुम गुरुभ्यो नमह)

💥 आप अपने गुरु / मानस गुरु / मार्गदर्शक / माता /पिता / प्रेरक व्यक्तित्व आदि जिस किसी में भी आपकी श्रद्धा हो, को स्मरण कर इस मंत्र का पाठ कर सकते हैं। यदि ऐसा कोई व्यक्तित्व आपके जीवन में नहीं है तो भी अपनी सैद्धांतिक / वैचारिक प्रतिबद्धता को यह मंत्र समर्पित कर सकते हैं। सनातन ठहराव नहीं बहाव है। अतः प्रवाह की दिशा स्वयं तय करें। 💥

इसके साथ नीचे दिए श्लोक का भी अपनी सुविधा के अनुसार 11 /21 /31 /51 बार पाठ करें। 

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १६० ☆ देखकर इक फ़क़ीर का हुज़रा… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “देखकर इक फ़क़ीर का हुज़रा“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १६० ☆

✍ देखकर इक फ़क़ीर का हुज़रा… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे 

ग़म हुए दूर हम ख़ुशी से मिले

आप आये तो ज़िंदगी से मिले

 *

इश्क़ में क्या बड़ा है क्या छोटा

काश सागर भी आ नदी से मिले

 *

बेअदब बेटे का करुँ तो क्या

बाप की आज बेबसी से मिले

 *

देखकर इक फ़क़ीर का हुज़रा

ऐसा लगता कि सादगी से मिले

 *

गिर गया कितना आदमी लगता

जब भी मसली गई कली से मिले

 *

ब जिसमें मिले हो उस रंग का

आदमी ऐसा ही किसी से मिले

 *

करता दावा मिला वो दुनिया से

आदमी काश आप ही से मिले

 *

अश्क़ कितने अरुण छुपे इसमें

खिलखिलाती तेरी हँसी से मिले

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ हेमंत साहित्य # ६४ – स्वतंत्र पहचान… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – स्वतंत्र पहचान।)

☆ हेमंत साहित्य # ६४ ☆

✍ स्वतंत्र पहचान… ☆ श्री हेमंत तारे  

इससे पहले कि,

खो जाये स्वतंत्र पहचान,

और हो जाये विलय,

किसी डबरे,

पोखर,

तालाब,

नदी या नाले में

 

पानी के हर टपके ने

बनाया

वर्तुल वलय एक

और,

मना लिया उत्सव

अपनी सम्भावित

विस्तारित सम्प्रभुता का ।

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ७२ ☆ हम और जीवन ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – “हम और जीवन“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ७२ ☆

✍ कविता – हम और जीवन ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

औरों का श्रम खरीदते हैं हम

और महंगे दामों पर बेचते हैं हम

जितना सस्ता खरीदे महंगा बेचे,

उसी को बड़ा आदमी कहते हैं हम।

*

वही बड़े आदमी नीतियाँ बनाते हैं

गरीबों के नाम पर स्वहित साधते हैं

विकास करते हैं और खूब कमाते हैं,

श्रम करने वाले श्रम करते ही जाते हैं।

*

मन के श्रम को कीमत सदा मिलती

शरीर को श्रम करते बीमारी मिलती

दोनों से ऊपर समझता है अब आदमी,

ईश्वर समझने की सदा इच्छा है रहती।

*

सब सुनाना चाहते हैं पर सुनना नहीं

फोलोवर चाहते हैं, फोलो करना नहीं

कोई हम से मैं कोई मैं से हम बनता है

पर आदमी बनना कोई चाहता नहीं।

*

क्षण भंगुर जीवन को जी न पाते हम

धरती आसमान पर कब्जा जमाते हम

और कर्ता बन समझ इठलाते हैं हम,

जड़ चेतन पर फिर भी बतियाते हैं हम।

*

कुछ नाटक करके जागरूक कर रहे

कुछ जागरूकता का नाटक कर रहे

पता ही नहीं कुछ नाटक के पात्र बने,

हम ऐसे ही अब जीवन यापन कर रहे।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

एम.ए. विद्यावाचस्पति(मानद)

दिनांक 28 मार्च, 2026

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १५६ – बुन्देली कविता – ”बे तौ चादर तानें सो रय ” ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – बे तौ चादर तानें सो रय ।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १५६ ☆

☆  बुन्देली कविता – बे तौ चादर तानें सो रय  ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

बे तौ चादर तानें सो रय

जिनकी चिन्ता में हम खो रय

 *

जिनके लाने फूल बिछाये

बेइ गैल में काँटे बो रय

 *

जाँच-परख के करौ भरोसो

अपनइ आज पराये हो रय

 *

सगे हमाये हितू रये जुन

बेइ हमाई नाव डुबो रय

 *

गैरी नदिया नाव पुरानी

उतावले चढ़बे हो रय

 *

बरन लगो घर, कुँआ खोद रय

उर अपनी किस्मत पे रो रय

 *

भगवतपोसत रये जिन्हें हम

ओइ हमाये बैरी हो रय

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ राजनीति शास्त्र / राजनैतिक शस्त्र ☆ हेमन्त बावनकर ☆

हेमन्त बावनकर

☆  राजनीति शास्त्र / राजनैतिक शस्त्र ☆ हेमन्त बावनकर ☆

(१७ जनवरी १९८२)

प्रश्न था

राजनीति शास्त्र की परिभाषा?

 

लोकतंत्र में जन्में,

राजनैतिक छात्रावास में पले

विचारशील,

क्रान्तिकारी छात्र का

उत्तर था

’राज’ नेताओं के लिये

’नीति’ जनता के लिये

और

’शास्त्र’ छात्रों के लिये।

 

अब यदि

आप पूछेंगे उससे

छात्र की परिभाषा

तब निःसन्देह  

उसका उत्तर होगा

’राजनैतिक शस्त्र’।

 

©  हेमन्त बावनकर

पुणे (महाराष्ट्र)  

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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