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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ मुक्तक – किसी के काम आना ही…☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस”☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस” (बहुमुखी प्रतिभा के धनी  श्री एस के कपूर “श्री हंस” जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवा निवृत्त अधिकारी हैं। आप कई राष्ट्रीय पुरस्कारों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। साहित्य एवं सामाजिक सेवाओं में आपका विशेष योगदान हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना किसी के काम आना ही…।) ☆ मुक्तक – ।। किसी के काम आना ही जीवन की परिभाषा है।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस”☆  [1] जाने क्यों आदमी इतना मगरूर रहता है। जाने कौन से नशे में वो चूर रहता है।। पानी के बुलबुले सी होती है जिंदगी। फिर भी अहम में भरपूर रहता है।। [2] हर काम स्वार्थ को नहीं सरोकार से करो। मत किसी का अपमान तुम अहंकार से करो।। उबलते पानी मेंअपना चेहरा भी दीखता नही है। जो भी करो बस तुम सही व्यवहार से करो।। [3] कुछ पाकर इतरांना ठीक होता नहीं है। अपनो से ही कतराना ठीक होता नहीं है।। जाने कौन किस मोड़ पर काम आ जाये। किसी को यूँ ठुकराना ठीक होता नहीं है।। [4] तुम्हारी वाणी ही तुम्हारे दिल की भाषा है। किसी के...
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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – तत्त्वमसि ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज (श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। )  संजय दृष्टि – तत्त्वमसि अनुभूति वयस्क तो हुई पर कहन से लजाती रही, आत्मसात तो किया किंतु बाँचे जाने से कागज़ मुकरता रहा, मुझसे छूटते गये पन्ने कोरे के कोरे, पढ़ने वालों की आँख का जादू , मेरे नाम से जाने क्या-क्या पढ़ता रहा...!   © संजय भारद्वाज प्रात: 9:19 बजे, 25.7.2018 अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय ☆संपादक– हम लोग ☆पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆   ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ मोबाइल– 9890122603 संजयउवाच@डाटामेल.भारत writersanjay@gmail.com ≈ संपादक –...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # 110 ☆ बाल कविता – क्यों न मैं तुलसी बन जाऊँ… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘ चक्र’ (हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक 120 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।  जिनमें 7 दर्जन के आसपास बाल साहित्य की पुस्तकें हैं। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत। इनमें प्रमुख हैं ‘बाल साहित्य श्री सम्मान 2018′ (भारत सरकार के दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी बोर्ड, संस्कृति मंत्रालय द्वारा डेढ़ लाख के पुरस्कार सहित ) एवं उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा ‘अमृतलाल नागर बालकथा सम्मान 2019’। उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिया जाना सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ (धनराशि ढाई लाख सहित)।  आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें  संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी। आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य आत्मसात कर सकेंगे।) ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # 110 ☆ ☆ बाल कविता – क्यों न मैं तुलसी बन जाऊँ… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆ क्यों न मैं तुलसी...
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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “श्री रघुवंशम्” ॥ हिन्दी पद्यानुवाद सर्ग # 17 (76-81)॥ ☆ प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

॥ श्री रघुवंशम् ॥ ॥ महाकवि कालिदास कृत श्री रघुवंशम् महाकाव्य का हिंदी पद्यानुवाद : द्वारा प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’॥ ☆ “श्री रघुवंशम्” ॥ हिन्दी पद्यानुवाद सर्ग #17 (76 - 81) ॥ ☆ रघुवंश सर्ग : -17   यदपि दिग्विजय कामना थी पर हित प्रतिकूल। तदपि अश्वमेघ चाह थी उचित धर्म-अनुकूल।।76।।   शास्त्रविहित पथ मानकर चल नियमों के साथ। इंद्र-देव के देव सम बना राज-अधिराज।।77।।   गुण समानता से हुआ वह पंचम दिक्पाल। महाभूत में षष्ठ औं अष्ट्म भू भृतपाल।।78।।   जैसे सुनते देव सब विनत इंद्र आदेश। तैसेहि सब राजाओं को थे उसके संदेश।।79।।   अश्वमेघ में याज्ञिकों को कर दक्षिणा प्रदान। ‘अतिथि’ धनद अभिधान से बना कुबेर समान।।80।।   इंद्र ने वर्षा की, यम ने रोगों का रोका बढ़ाव। वरूण ने जलमार्ग दे दिखाये मित्रभाव। कोष में रघु-राम के युग सी कुबेर ने वृद्धि की, लोकपालों ने अतिथि की, भय से सब समृद्धि की।।81।। सत्रहवां सर्ग समाप्त   © प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’    A १, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर. म.प्र. भारत पिन ४८२००८ ≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈ ...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ तन्मय साहित्य#132 ☆ अदले-बदले की दुनियाँ… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ (सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी अर्ध शताधिक अलंकरणों /सम्मानों से अलंकृत/सम्मानित हैं। आपकी लघुकथा  “रात  का चौकीदार”  महाराष्ट्र शासन के शैक्षणिक पाठ्यक्रम कक्षा 9वीं की  “हिंदी लोक भारती” पाठ्यपुस्तक में सम्मिलित। आप हमारे प्रबुद्ध पाठकों के साथ  समय-समय पर अपनी अप्रतिम रचनाएँ साझा करते रहते हैं। आज प्रस्तुत है एक भावप्रवण रचना “अदले-बदले की दुनियाँ…”।) ☆  तन्मय साहित्य # 132 ☆ ☆ अदले-बदले की दुनियाँ… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆ साँझ ढली सँग सूरज भी ढल जाए फिर ऊषा के साथ लौट वह आये।   अदले-बदले के दुनियाँ के रिश्ते हैं जो न समझ पाते कष्टों में पिसते हैं कठपुतली से रहें नाचते परवश में स्वाभाविक ही मन को यही लुभाए....   थे जो मित्र आज वे ही प्रतिद्वंद्वी हैं आत्मनियंत्रण कहाँ सभी स्वच्छंदी हैं अतिशय प्रेम जहाँ ईर्ष्या भी वहीं बसे प्रिय अपने ही दिवास्वप्न दिखलाये.....   चाह सभी को बस आगे बढ़ने की है कैसे भी हों सफल, शिखर चढ़ने की है खेल चल रहे हैं शह-मात अजूबे से वक्त आज का सबको यही सिखाये.....   आदर्शों के हैं अब भी कुछ अभ्यासी कीमत उनकी कहाँ आज पहले जैसी अपनों के ही...
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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ संपादक के नाम ☆ श्री कमलेश भारतीय

श्री कमलेश भारतीय  (जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी, बी एड, प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । ‘यादों की धरोहर’ हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह – ‘एक संवाददाता की डायरी’ को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह- महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता) ☆ कविता  ☆ संपादक के नाम ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆ संपादक जी, इक बात कहूं बुरा तो नहीं मानोगे जी? आपका अखबार स्याही से नहीं लहू से छपता है जी । कहीं गोली न चले बम न फटे, आगजनी न हो तब आप क्या करेंगे जी ? संपादक जी, इक बात पूछ लूं ? देर गए रात तक अखबार के दफ्तर में बैठकर अखबार की हेडलाइन बनाने के लिए अखबार की बिक्री बढाने के...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलमा की कलम से # 26 ☆ बुंदेली गीत – नातेदारी ☆ डॉ. सलमा जमाल ☆

डॉ.  सलमा जमाल  (डा. सलमा जमाल जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत है। रानी दुर्गावती विश्विद्यालय जबलपुर से  एम. ए. (हिन्दी, इतिहास, समाज शास्त्र), बी.एड., पी एच डी (मानद), डी लिट (मानद), एल. एल.बी. की शिक्षा प्राप्त ।  15 वर्षों का शिक्षण कार्य का अनुभव  एवं विगत 22 वर्षों से समाज सेवारत ।आकाशवाणी छतरपुर/जबलपुर एवं दूरदर्शन भोपाल में काव्यांजलि में लगभग प्रतिवर्ष रचनाओं का प्रसारण। कवि सम्मेलनों, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं में सक्रिय भागीदारी । विभिन्न पत्र पत्रिकाओं जिनमें भारत सरकार की पत्रिका “पर्यावरण” दिल्ली प्रमुख हैं में रचनाएँ सतत प्रकाशित।अब तक लगभग 72 राष्ट्रीय एवं 3 अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार/अलंकरण। वर्तमान में अध्यक्ष, अखिल भारतीय हिंदी सेवा समिति, पाँच संस्थाओं की संरक्षिका एवं विभिन्न संस्थाओं में महत्वपूर्ण पदों पर आसीन।   आपके द्वारा रचित अमृत का सागर (गीता-चिन्तन) और बुन्देली हनुमान चालीसा (आल्हा शैली) हमारी साँझा विरासत के प्रतीक है। आप प्रत्येक बुधवार को आपका साप्ताहिक स्तम्भ  ‘सलमा की कलम से’ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है एक भावप्रवण बुंदेली गीत  “छोटी बहन”।  साप्ताहिक स्तम्भ – सलमा की कलम से # 26   बुंदेली गीत – नातेदारी — डॉ. सलमा...
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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “श्री रघुवंशम्” ॥ हिन्दी पद्यानुवाद सर्ग # 17 (71-75)॥ ☆ प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

॥ श्री रघुवंशम् ॥ ॥ महाकवि कालिदास कृत श्री रघुवंशम् महाकाव्य का हिंदी पद्यानुवाद : द्वारा प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’॥ ☆ “श्री रघुवंशम्” ॥ हिन्दी पद्यानुवाद सर्ग #17 (71 - 75) ॥ ☆ रघुवंश सर्ग : -17   चंद्र उदधि दोनों ही बढ़ हो जाते फिर क्षीण। पर दोनों से बढ़ अतिथि, रहा सदैव नवीन।।71।।   सागरपोषित मेघ ज्यों देता है जल दान। त्यों याचक दाता बने पा उससे वरदान।।72।।   स्तुत्य अतिथि सुन प्रशंसा होता था हियमान। किन्तु सदा बढ़ता गया उसका यश औं मान।।73।।   दर्शन से कर नष्ट अघ, तत्व से कर तम नाश। उदित सूर्य के गुणों का दिया प्रजा को भास।।74।।   चंद्र-किरण से कमल न, रवि से कुमुद विकास। किन्तु अतिथि के गुणों ने किया शत्रु मन वास।।75।।   © प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’    A १, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर. म.प्र. भारत पिन ४८२००८ ≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈ ...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # 88 – दोहे ☆ डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

डॉ राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’ (संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी  हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। आज प्रस्तुत हैं आपके अप्रतिम कालजयी दोहे।)   साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # 88 –  दोहे प्रश्न प्रेम का जब उठे, उग जाता संदेह। अशरीरी यदि प्रेम तो, किस मतलब की देह।।   परिभाषा दें प्रेम की, किसकी है औकात।  कभी मरुस्थल सा लगे कभी चांदनी रात।।   मन में प्रतिक्षण उमड़ते, इतने इतने भाव। एक लहर पर दूसरी रचती नए रचाओ।।   प्रेम तत्व गहरा गहन, जिसका आर न पार। शब्दों से भी है परे, अर्थों का विस्तार।।   परिभाषा क्या प्रेम की, सभी हुए असमर्थ । प्रेम प्रेम है प्रेम का यही हुआ बस अर्थ।।   © डॉ राजकुमार “सुमित्र” 112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश ≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) –...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # 33 – मनोज के दोहे ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है “मनोज के दोहे”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। मनोज साहित्य # 33 – मनोज के दोहे ☆ (चैत, उपवास, प्रतीक्षा, मनमीत) चैत शुक्ल नवमी दिवस, जन्मे थे श्री राम। नगर अयोध्या था सजा, बना देव का धाम।।   चैत्र माह प्रतिपदा को, नौ दिन का उपवास। मातृ-शक्ति का दिवस यह,भक्ति भाव है खास।।   सुखद प्रतीक्षा है अभी, बने हमारे काज। नित विकास के पथ गढ़ें, रहे राम का राज।।   मन के जो नजदीक हैं, बन जाते मनमीत। दिल में जब वे आ बसें, मनभावन हैं गीत।।   ©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)-  482002 मो  94258 62550 ≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈...
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