हिन्दी साहित्य – कविता ☆ जादू ☆ श्री अनिल वामोरकर ☆

श्री अनिल वामोरकर

☆ कविता ☆

☆ जादू ☆ श्री अनिल वामोरकर ☆

मैं क्या जानूँ 

क्या जादू है?

जिस दिन हुए दर्शन

मैं मैं न रहा…

 

तपोवन में जाता

सुध बुध खो जाता

क्या जानूँ क्या बात है

मैं मैं न रहा…

 

वाणी की मिठास

बोधप्रद ज्ञान

अमावस की रात

फिर भी अंतर मे प्रकाश

मैं मैं न रहा…

 

न जगत की खबर

न घर की याद

शाश्वत आनंद की बौछार

मैं मैं न रहा…

 

माँ की नज़र

करुणा का सागर

वात्सल्य की मूरत

बदल गया अंदर बाहर से

मैं मैं न रहा…

 

जब मैं छूटा

हलका सा महसूस होता,

शाश्वत आनंद का झोका

ऊपर ही ऊपर 

चला चला

मैं मैं न रहा…

 

© श्री अनिल वामोरकर

अमरावती

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १६१ ☆ नहा आया हूँ गंगा में ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “नहा आया हूँ गंगा में” ।)

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १६१ ☆

☆ नहा आया हूँ गंगा में ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

☆

सब त्योहार तुम्हारे

बहा आया हूँ गंगा में।

 

शेष बची बस याद

किसी मन के कोने में

अर्पित होता स्वयं

अकेला रात बिछौने में

हर व्यवहार तुम्हारे

चुका आया हूँ गंगा में।

 

आँखें सोती नहीं

नींद के मारे सपने

रात चली बेरहम

भोर सिरहाने रखने

सब उपकार तुम्हारे

सिरा आया हूँ गंगा में।

 

जीते रहे सदा भ्रम

मिलकर ख़ुशियों वाले

परे हटाकर दर्द

बाँटते रहे उजाले

कर संस्कार तुम्हारे

नहा आया हूँ गंगा में।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – समय का फेर… ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – समय का फेर… ?  श्री संजय भारद्वाज ?

जो बोया

लहलहा रहा है,

समय का फेर

समझ आ रहा है,

ताउम्र निगले जिसने

हरदम सूरज,

जुगनू की रोशनी में

अब दिन बिता रहा है

?

© संजय भारद्वाज   

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ श्रीगणेश साधना, गणेश चतुर्थी तदनुसार सोमवार 14 सितंबर को आरम्भ होकर अनंत चतुर्दशी तदनुसार शुक्रवार 25 सितम्बर तक चलेगी। 🕉️

💥 इस साधना का मंत्र होगा – ॐ गं गणपतये नमः।💥

💥 साधक को इस मंत्र की कम से कम एक माला (108 जप) का संकल्प लेना होगा। इस मंत्र के मालाजप के साथ ही कम से कम एक पाठ अथर्वशीर्ष का भी करना है। जिन्हें अथर्वशीर्ष बहुत कठिन लगे, वे इसे सुनें अवश्य।🕉️

💥 हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।

≈≈हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १६८ ☆ तीरगी शब की मिटाना है… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “तीरगी शब की मिटाना है …“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १६८ ☆

✍ तीरगी शब की मिटाना है… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे  ☆

☆

आप सब बीती बनाएंगे चले जायेंगे

दर्द के गीत सुनाएंगे चले जायेंगे

*

हम है मज़दूर मुक़द्दर में है अपने झुग्गी

आपके घर को बनाएंगे चले जायेंगे

*

राहबर आज के हमराह न होने वाले

राह दुश्वार बताएंगे चले जायेंगे

*

आना जाना है लगा चार दिनों का मेला

सिलसिला हम भी निभाएंगे चले जायेंगे

*

ग़म ख़ुशी ज़ीस्त में आते है सदा महमाँ से

फ़िक़्र क्यों पैर टिकाएंगे चले जायेंगे

*

तीरगी शब की मिटाना है तो महताब उगा

ज़ोम बस जुगनू दिखाएंगे चले जायेंगे

*

एक तवायफ़ की न लाचारी को समझे कोई

लोग बस वक़्त बिताएंगे चले जायेंगे

*

पैरहन जिस्म किराए से मिला है सबको

मालिके रूह बुलाएंगे चले जायेंगे

☆

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ हेमंत साहित्य # ७२ – उकताहट… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – उकताहट…।)

☆ हेमंत साहित्य # ७२ ☆

✍उकताहट… ☆ श्री हेमंत तारे  ☆

☆

इतना बुरा भी नहीं होता

किसी दिन बोर होना,

किसी कुर्सी,

किसी सोफ़े पर

यूँ ही पड़े रहना,

बिना खोले कोई किताब।

 

काम तो

कभी ख़त्म होते नहीं,

तैरते रहते हैं

दिल, दिमाग़ और

घर के कोने-कोने में।

 

फिर भी कभी

मन कहता है, आज रहने दो।

 

ऐसे में अक्सर

हाथ बढ़ता है फ़ोन की ओर,

उँगलियाँ ढूँढ़ लेती हैं

किसी अपने का नंबर,

जिससे मुद्दत से

न हुई हो गुफ़्तगू

बेवजह

बेहिसाब l

 

बात शुरू होती है

बेवजह,

और चल पड़ती है

बिना किसी हिसाब के।

 

उकताहट

इतनी बुरी भी अलामत नही,

यदा-कदा

यह भी दे जाती है ईनाम

किसी अपने से

जुड़ने का,

यूँ ही,

बेवजह,

बेहिसाब।

☆

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ८० ☆ कविता – क्रेता… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता  – “क्रेता…“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ८० ☆

✍ कविता ☆ जीना… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

☆

सम्मान में खड़े होना

होता है शिष्टाचार ,

ईश्वर के आगे झुकना

है भक्ति का इज़हार।

*

भीड़ में खड़े हो अच्छा है

जय जय कार करना,

भीड़ का हिस्सा होना

नहीं श्रद्धा व्यक्त करना।

*

संत साधु महात्मा सेवक

भीड़ सबको चाहिए,

अपने सामने नतमस्तक

प्रश्न नहीं याचना चाहिए।

*

एक ऊपर विराजमान

सैकड़ों नीचे, कौन सी रीत

एक चेहरे पर दंभी मुस्कान

सैकड़ों पर एक दबी भीत।

*

एक पानी एक ही पवन

एक ही धरती एक आसमान ,

एक मानव एक ही जीवन

फिर पाना क्यों है असमान।

*

एक जीता शान से यहाँ

एक मांगता मौत यहाँ,

ऐसा क्यों है जगत में

कौन समझाएगा यहाँ।

☆

© डॉ सत्येंद्र सिंह

एम.ए. विद्यावाचस्पति(मानद)

दिनांक 28 मार्च, 2026

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

 

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १६४ – बुन्देली कविता – ”लरका रय हैं हुँदरा देखौ” ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – “लरका रय हैं हुँदरा देखौ“।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १६४ ☆

☆  बुन्देली कविता – “लरका रय हैं हुँदरा देखौ“ ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

☆

लरका रय हैं हुँदरा देखौ

खुल गय जैंसे पिंजरा देखौ

 *

सरपट कितै भगत जा रय हौ

गिर नें परिओ खदरा देखौ

 *

हो रइ खीब मिलावट खोरी

मिलत अन्न में ककरा देखौ

 *

छुट्टी हो गइ, धूम मचा रय

बड़े ऊधमी बँदरा देखौ

 *

अब बरसात चुनावों की है

राजनीति के मिंदरा देखौ

 *

गंदी फिलम बनाउत रव जौ

बो शिल्पा कौ कुंदरा देखौ

 *

‘भगवत’ चरत रैत है तउ पै

भरत न ओ कौ पिंदरा देखौ

☆

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २३५ – छल प्रपंच की आड़ ले… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “सजल – बदल गया है आज जमाना”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २३५ ☆

☆ छल प्रपंच की आड़ ले… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

☆ 

करुणा जागृत कीजिये, निज मन में श्री मान ।

अहंकार की विरक्ति से, जग होता कल्यान ।।

*

दूर छिटकने जब लगें, सारे अपने लोग ।

तब समझो है लग गया, अहंकार का रोग ।।

*

मन ग्लानि से भर उठे, अपने छोड़ें साथ ।

काम न ऐसा कीजिये, झुक जायेे यह माथ।।

*

मन अशांत हो जाय जब, मत घबरायें आप ।

विचलित कभी न होइयेे, करंे शांति का जाप ।।

*

गिर कर उठते जो सदा, करते ना परवाह ।

पथ दुरूह फिर भी चलें, मिलती उनको राह ।।

*

कष्टों में जीवन जिया, मानी कभी न हार ।

सफल वही होते सदा, जीत मिले उपहार ।।

*

भूत सदा इतिहास है, वर्तमान ही सत्य ।

कौन भविष्यत जानता, काल चक्र का नृत्य ।।

*

छल प्रपंच की आड़ ले, बना लिया जो गेह ।

पंछी यह उड़ जाएगा, पड़ी रहेगी देह ।।8

☆

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २७८ – हिन्दी अनुरागी ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है समसामयिक विषय  पर आधारित एक कविता “हिन्दी अनुरागी”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २७८ ☆

🌻कविता🌻 हिन्दी अनुरागी🌻

☆

हिन्दी अनुरागी बनें, रहे हिन्द का नाम।

हिन्दी में बातें करें, भारत भूमि धाम।।

*

है सुघर मधुर सुंदर बोली, बावन सखियों की हमजोली।

इत -उत डोले पल-पल बोले, हिन्दी शब्द मकरंद घोले।।

हलचल करती पवन हिलोरें, मात्रा सुंदर लगती डोरे।

इन्द्रधनुष सी आभा न्यारी, भाषा लय बाधी है प्यारी।।

*

भाषा इसकी है भली, करें सदा सम्मान।

ह्दय भाव से जोड़ती, सबका रखती ध्यान।।

**

ज्ञानी कहते महिमा जानो, हिन्दी को सब अपना मानों।

खूब करें जन-जन की सेवा, छंद विधा के गणपत देवा।।

कोकिल कंण करें उच्चारण, गीत संगीत की है तारण।

माँ की ममता होती लोरी, लचक- मचक चलती है गोरी।।

*

भाव भरी ये पावनी, सहती हरदम पीर।

कब आयेगा पावन पल, हिन्दी होगी हीर।।

**

नैन निहारे तकती राहें, भरती रहती अपनी आहें।

कलम चलाओ हिन्दी धारी, तुम अब बन जाओ गिरधारी।।

कसकस थाथें हिन्दी आशा, राष्ट्र बचायें हिन्दी भाषा।।

धर्म कर्म की सुंदर वाणी, हिन्दी है जग की कल्याणी।।

*

कानों में रस घोलती, मीठी सी पहचान।

आओं गढ़ ले आज हम, गर्वित दृढ अभिमान।।

**

छम-छम बाजें पांवो झांझर, सात सुरो की पहनी घाघर।।

बैलों की घंटी की छुन- छुन, मीठी हिन्दी बाजें रुनझुन।।

लिख- लिख बांचे कविवर प्यारा, बढ़ता हिन्दी भाईचारा।

निकली लेकरआँचल ममता, इसकी नजरों में है समता।।

*

धूँ- धूँ जलती आग में, देख रही सब ओर।

 अपने मुझको थाम ले, लाज बचाओं छोर।।

**

बना देह कंचन है मोती, पावन रिश्ते यही पिरोती।

आओं कर ले मीठी बातें, खूब कटेगी अपनी रातें।।

गंगा यमुना रेवा सरिता, बनी श्रेष्ठ हिन्दी शुभ वरिता।

चरण पखारे श्री नारायण, साधु संत करते है पारण।।

*

नील गगन से बाँधती, बारिश मोती धार।

ले गल बहियाँ डाल के, आओं कर ले प्यार।।

☆

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # ३०१ – ठंडे ये ज्वालामुखी करो…१ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता –  प्रायमरी का मास्टर…५।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # ३०१ ☆

☆ – ठंडे ये ज्वालामुखी करो…१ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ✍

आज

आम आदमी

संत्रस्त है, परेशान है

और है बेहद दुखी,

धैर्य के धिक्कार से

सहिष्णु मन भी

आतुर है

बन जाने को ज्वालामुखी।

याद आ रहा है

एक पुराना गीत-

‘मन के हारे हार है

मन के जीते जीत! ‘

गीत, आखिर गीत होता है

खण्डहर में गूँजते गीत से

आदमी भयभीत होता है।

हम,

खण्डहर में खड़े खड़े

भयभीत होते जा रहे हैं-

हमारी नियति-

होठों से गिरकर

पत्थर पर लिखे गीत होते जा रहे हैं।

हमारे नाकनक्श भूख

तराशे हैं,

हकीकत ये है –

हम कई दिनों से उपासे हैं, प्यासे हैं,

और

क्रमशः…

स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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