श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपके भावप्रवण एवं विचारणीय “गर्मी के दोहे” ।)

✍ जय प्रकाश की कविता # १४४ ☆ गर्मी के दोहे ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

दिन जलता है आग से,भरती रात उसाँस

पानी पी पी प्यास भी,बनी गले की फाँस।

पत्ता पत्ता मौन है,मौन हवा के बोल

सूरज तपती आग की,बैठा गठरी खोल।

 *

चिड़िया खोजे रेत में,गुमी नदी की धार

घाट बँधी हर नाव का,डूब गया व्यापार।

 *

लू लपटों की बाढ़ में,बहे पसीना खूब

हरियाली के गाँव में,रही सूखती दूब।

 *

धरती का आँचल फटा,फटी बिवाई पाँव

तरुवर तरुवर खोजती,धूप तनिक सी छाँव।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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