(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “समय सीमा…“।)
अभी अभी # ८५१ ⇒ आलेख – समय सीमा श्री प्रदीप शर्मा
समय को भी क्या कोई, कभी बांध पाया है। समय अपने आप में सीमातीत भी है और समयातीत भी। हमें समय थोक में नसीब नहीं होता, टुकड़ों टुकड़ों में परोसा जाता है समय हमें। समय अपनी गति से चलता रहता है, हम समय देखते ही रह जाते हैं, और समय हमसे आगे निकल जाता है। समय की गति तो इतनी तेज है कि वह पलक झपकते ही गुजर जाता है। बहता पानी है समय।
हमें अक्सर लगता है, कि हमारे पास बहुत समय है, लेकिन हम समय को न तो ताले में ही बंद कर सकते हैं, और न ही उसे किसी बैंक में फिक्स्ड डिपॉज़िट करवा सकते हैं। समय वह जमा राशि है, जिसे जमा करो तो ब्याज पर ब्याज लगने लगता है, और जो मूल है, वह भी खतरे में पड़ जाता है।।
समय को न तो हम बचा सकते और न ही खर्च कर सकते, बस केवल इन्वेस्ट कर सकते हैं। पैसे की ही तरह, अगर समय का भी सदुपयोग किया जाए, तो समय अच्छा चलता है। लोग अक्सर हमसे थोड़ा समय मांगा करते हैं। क्या उनके पास अपना समय नहीं है। क्या करेंगे, वे हमारा समय लेकर। हम भी उदार हृदय से अपना थोड़ा समय उन्हें दे भी देते हैं और फिर शिकायत करते हैं, फालतू में हमारा समय खराब कर दिया। मानो, समय नहीं, शादी का सूट हो। जिसे आप कम से कम ड्राइक्लीन तो करवा सकते हैं। खराब समय का आप क्या कर सकते हैं।
क्या हुआ, अगर उसने आपका थोड़ा सा समय खराब कर दिया। आपने जिंदगी में कौन सा समय का अचार डाल लिया। समय को तो खर्च होना ही है। आदमी पहले समय खर्च करके पैसे कमाता है और फिर खराब समय के लिए पैसे बचाकर रखता है। क्या पैसे बचाने से अच्छा समय आता है। कुछ भी कहो, खराब समय में पैसा ही काम आता है।।
पैसा बचाया जाए कि समय बचाया जाए ! समय तो निकलता ही चला जा रहा है। अच्छे समय में समझदारी इसी में है, पैसा कमाया जाए और उसे सही तरीके से इन्वेस्ट किया जाए। समय तो पंछी है, समय का पंछी उड़ता जाए ..!!
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “अवतार…“।)
अभी अभी # ८५० ⇒ आलेख – अवतार श्री प्रदीप शर्मा
बहुत पहले आकाशवाणी पर एक भजन सुना था, जिसके बोल कुछ इस प्रकार थे ;
पतितों को उबारा है तुमने
भक्तों को उबारो तो जानें।
हम भूल गए, भगवन तुमको
पर तुम न भुलाओ, तो जानें।।
उबारना, मतलब तारना! जिसका जन्म ही किसी को तारने के लिए हुआ हो, वह अवतार। आप इसे, अब तार, भी कह सकते हैं। लेकिन अब अवतार नहीं होते इसलिए पतितों को कोई तार नहीं रहा है। क्या पतितों को मारा नहीं जा सकता। ऐसा प्रतीत होता है, जिन पतितों को पहले कभी अवतारों ने तारा भी होगा, वे तैर कर इस भव सागर में वापस आ गए। अब हमें तारो, नहीं तो मारो।
अवतार का एक अर्थ और होता है, जो अवतरित हुआ, वह अवतार! जन्म तो खैर अवतारों का भी होता है लेकिन उन्हें प्रकट होना कहते है। भए प्रगट कृपाला, दीनदयाला कौशल्या हितकारी। उनकी तिथि मनाई जाती है, तारीख नहीं, राम नवमी। अवतार जो करते हैं, वह उनकी लीला होती है। कृष्ण जन्माष्टमी। वसु देवकी की आठवीं संतान अष्टमी को कंस के कारागृह में पैदा हुई। अवतारों का निर्वाण दिवस अथवा पुण्यतिथि नहीं मनाई जाती। जो अवतरित होते हैं, वे कालांतर में अपनी लीला समेट लेते हैं। आम और खास मानव शरीर धारी महान आत्माओं, विभूतियों में, सबके जन्म दिवस और पुण्य तिथि दोनों मनाई जाती है।।
पापी, दुष्ट और अधम में आसुरी शक्ति होती है, इसलिए वह सज्जनों की तुलना में अधिक शक्तिशाली होता है। जब साधु और शैतान का संतुलन गड़बड़ा जाता है, शैतान, साधु पर भारी पड़ने लगता है, तब संतों की रक्षा के लिए, ईश्वर को स्वयं अवतार लेना पड़ता है। केवल भक्ति से भी भगवान नहीं मिलते, शत्रुता से भी इश्वर को प्राप्त किया जा सकता है, क्योंकि उसके बारे में सुना है, वह दुष्टों को भी मारता नहीं, तारता है।
एक ओर राम नाम की लूट मची है, भक्त राम राम भजते, राम में समा रहे हैं, तो दूसरी ओर दैत्यों और असुरों की लाइन लगी है। हम पापी, अपराधी, अधम, नीच है, हमें भी मारो, सुना है आपके हाथों से मरने पर मुक्ति मिलती है। आप मारते नहीं, तारते हो। मुक्ति पाने का आसान रास्ता। गंगा में डुबकी, सभी पापों से मुक्ति। कुंभ में स्नान, अमृत कुंड में स्नान। दान – पुण्य से स्वर्ग की प्राप्ति, कठिन तपस्या से मनचाहे वर की प्राप्ति। खोने को कुछ नहीं। कोई खाली हाथ नहीं जाता। वह दाता, हम भिखारी।। हम पतित, तुम पतित पावन!
पतितों का तो उद्धार करते हो, और हम भक्तों को कायदे कानून सिखाते हो। गरुड़ पुराण से धौंस जमाते हो। नर्क, दोजख और जहन्नुम का डर और स्वर्ग, जन्नत और वैकुंठ का लालच। करुणा निधान का दण्ड विधान भी क्या कोई बुद्धिमान समझ पाया है।
वह भगवान है, सभी ऐश्वर्यों का स्वामी! वो जिस पर मेहरबान, वो पहलवान। कार्तिक मास कथाओं का, दान पुण्य और स्वयं के कल्याण का मास होता है।
घर बैठे, टीवी पर भागवत आई, तो हमने भी बहती गंगा में हाथ धो लिए। आरती चल रही है भागवत जी की। भागवत भगवान की है आरती। पापियों को पाप से है तारती। घर में जगदीश जी की आरती भी देखिए। मैं मूरख खल कामी, पाप हरो देवा। मैं समझदार, बुद्धिमान, पढ़ा लिखा आदमी कहां जाऊं? Go to hell. भगवान हैं हम, सुप्रीम कोर्ट के भी बाप। हमारा न्याय, ईश्वर का न्याय है। कोई अजामिल अपने पुत्र का नाम नारायण रख ले, और प्राण त्यागते वक्त उसे पुकारे, तो हम स्वयं चले आते हैं। आ जाते है राम, कोई बुला के देख ले।।
अच्छा है, अब अवतार नहीं होते। अपनी करनी का फल यहीं भोगो। कर लो कितने भी छल कपट, आपकी कॉन्फिडेंशियल फाइल ऊपर तैयार हो रही है। वहां कोई सोर्स अथवा रिश्वत काम नहीं आती। कर लो, जितना दान पुण्य का पाखंड करना है, जैसा करा है, वैसा ही भरना भी होगा।
आज के लोकतंत्र के अवतार संतों को तारने और दुष्टों को मारने आए हैं। काला हिट, जहरीला flit और कानून का शिकंजा ही काफी है इन इंसानियत के दुश्मन नीच, जहरीले कीड़े मकोड़े, सपोलों और बिच्छुओं के लिए। हे भगवान! हमारी भी सुन ले। दुष्टों को तार मत, उनको तो तू मार ही दे। कहीं ये रक्तबीज, अथवा भस्मासुर आगे चलकर, पुन: कोरोना बनकर मानवता को ही नष्ट ना कर दें।।
(डा. मुक्ता जीहरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से हम आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख सम्बन्ध बनाम मर्यादा। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की लेखनी को इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # ३०१ ☆
☆ सम्बन्ध बनाम मर्यादा… ☆
सम् + बन्ध अर्थात् समान रूप से बंधा हुआ… जहां समता हो; समानता हो; स्वैच्छिक बंधन हो; एक-दूसरे के प्रति सर्वस्य न्यौछावर करने का जज़्बा हो; मर-मिटने का संजीदा भाव हो; पहले आप, पहले आप की शालीनता हो; दूसरों में अच्छाई व गुण तलाशने का प्रयास हो। सो! यह संबंधों में प्रगाढ़ता स्थापित करने के लिए, दूसरों के दु:ख से द्रवित होकर, उन्हें कष्ट से मुक्ति प्रदान करने व करवाने का भाव अहम् भूमिका अदा करता है।
परंतु यह सब तो गुज़रे ज़माने की बातें हो गई हैं। आजकल तो सब संबंध स्वार्थ पर आधारित हैं। हम धन-सम्पत्ति व रुतबा देखकर उसकी ओर आकर्षित होते हैं, क्योंकि आज का युग प्रतिस्पर्द्धा का युग है। हर इंसान अधिकाधिक धन कमाने हेतु मर्यादा को ताक पर रख, सीमाओं को लांघ कर आगे बढ़ जाना चाहता है। पैसे के लिए मानव सब संबंधों को दरक़िनार कर केवल अपनी उन्नति व स्वार्थ-पूर्ति के बारे में सोच-विचार करता है और राह में आने वाली समस्त बाधाओं को रौंदता हुआ लक्ष्य-प्राप्ति की ओर अग्रसर होता है। वह संबंधों की गरिमा व अहमियत को नकार बेतहाशा आगे बढ़ता जाता है और बीच राह आने वाली बाधाओं व किसी के प्रतिरोध करने पर किसी की हत्या करने में भी गुरेज़ नहीं करता।
चलिए! हम दृष्टिपात करते हैं उस मन:स्थिति पर… जब मानव में स्वयं को सर्वश्रेष्ठ सिद्ध करने की भावना बलवती होती है। उस स्थिति में वह अच्छे-बुरे व उचित-अनुचित के भाव का तिरस्कार कर, अपनी नज़रें लक्ष्य पर केंद्रित कर उस ओर अग्रसर होता है। संवाद संबंधों की जीवन-रेखा है और संबंध सेतु हैं… जीवन का मूलाधार हैं। इनके अभाव में धरा पर जीवन की कल्पना अधूरी है… सर्वथा असंभव है। परंतु आजकल तो पति-पत्नी दाम्पत्य बंधन में बंध, एक छत के नीचे रहते हुए भी अजनबी-सम व्यवहार करते हैं; एक-दूसरे से बेखबर जीवन पथ पर अग्रसर होते हैं; विवशता से अपना जीवन ढोते हैं। इस कारण संयुक्त परिवार- व्यवस्था चरमरा गयी है, जिसका सबसे अधिक ख़ामियाज़ा बच्चों व वृद्धों को भुगतना पड़ रहा है। स्नेह व सुरक्षा के अभाव में बच्चों के कदम अपराध जगत् की ओर प्रवृत्त हो रहे हैं, जो अपने कुकृत्यों से समाज व देश की जड़ों को खोखला कर रहे हैं।
यदि हम संबंधों का वर्गीकरण करें, तो कुछ संबंध जन्मजात होते हैं– जैसे माता-पिता भाई-बहन व अन्य परिवारजन..जिन से हम जन्म से ही रूबरू हो जाते हैं तथा इसमें हम तनिक भी हस्तक्षेप नहीं कर सकते। हमें न चाहते हुए भी उनसे निबाह करना पड़ता है। शायद! यह माता-पिता द्वारा प्रदत्त उपहार स्वरूप होते हैं, जिनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करना हमारा कर्तव्य नहीं, दायित्व होता है। हमें न चाहते हुए भी उन संबंधों को सहर्ष स्वीकारना व अहमियत देनी पड़ती है। कई बार बच्चे माता-पिता की ग़लतियों का अंजाम भुगतते हुए, आजीवन एकांत की त्रासदी झेलने को विवश हो जाते हैं तथा दायित्व-वहन करते हुए अपने जीवन का स्वर्णिम काल नष्ट कर देते हैं।
मानव एक सामाजिक प्राणी है और संबंध स्थापित करना उसकी मजबूरी होती है, क्योंकि अकेले रह कर जीवन जीने की कल्पना करना बेमानी है। तीसरे स्वार्थ के संबंध होते हैं, जिन्हें मानव अपनी खुदगर्ज़ी के लिए स्थापित करता है और उसका प्रयोग वह स्वार्थ-सिद्धि हेतु सीढ़ी के रूप में करता है। उस स्थिति में वह दूसरे को हानि पहुंचाने, यहां तक कि उसकी हत्या करने में तनिक भी संकोच नहीं करता। ऐसे संबंधों का
आजकल संसार में जाल बिछा हुआ है और हर इंसान मुखौटा धारण कर, दोहरा जीवन जीने को विवश है। यह संबंध अस्थायी होते हैं और लक्ष्य-प्राप्ति के पश्चात् अस्तित्वहीन हो जाते हैं; समाप्त हो जाते हैं…जैसे नज़रों से ओझल होने पर, व्यक्ति मन से भी उतर जाता है…बहुत दूर चला जाता है।
मुझे याद आ रहे हैं, ऐसे बहुत से क़िरदार, जो माता- पिता द्वारा प्रदत्त संबंधों की सज़ा आज तक भुगत रहे हैं। पुत्र की लालसा में सात-सात कन्याओं का भरा-पूरा परिवार जुटा लेने का प्रचलन आज भी बदस्तूर जारी है। पहले लोग यह चिंता नहीं करते थे कि वे अपने बच्चों को धरोहर रूप में इतना बड़ा कर्ज़ अर्थात् उत्तरदायित्व सौंप कर जा रहे हैं, जिसका भुगतान उन्हें तथा आगामी पीढ़ियों को आजीवन अपने हाथों अपने सपनों को होम करके चुकाना पड़ेगा। शायद! इस ओर उनका लेशमात्र ध्यान भी नहीं जाता कि वह मासूम बच्चा कब बड़ा होगा और उसके आत्मनिर्भर होने तक वे जीवित भी रहेंगे या सारा बोझ उसके कंधों पर ज़बरदस्ती लाद कर, इस दुनिया से रुख्सत हो जाएंगे और वह नादान उनकी भयंकर-भीषण कारस्तानियों का फल आजीवन भुगतने को बाध्य होगा। क्या नाम देंगे आप ऐसे माता-पिता को, जन्मदाता…जो सृष्टि- सृजन में भरपूर योगदान देकर अपनी संतान को नरक में अकारण झोंक देते हैं।
यदि हम इसकी व्याख्या करें, तो उनके इस कर्म को भी अक्षम्य अपराध के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए और ऐसे अंधविश्वासी व स्वार्थी माता-पिता के लिए भी कठोर सज़ा व दण्ड का प्रावधान होना चाहिए। यह देखकर अत्यंत दु:ख होता है कि रिश्तों से अनजान, एक नवजात शिशु को न जाने कितने अटूट रिश्तों-बंधनों में बांध दिया जाता है… मानो उसे चक्रव्यूह में जकड़ दिया जाता है; जहां से मुक्ति पाने का कोई विकल्प-उपाय नहीं होता। वह निरीह औरत की भांति उस अपराध की सज़ा आजीवन भुगतने को विवश होता है, जो उसने किया ही नहीं और न ही समाज द्वारा प्रदत्त होता है–उसे अपना पक्ष रखने का अधिकार। इन परिस्थितियों में वह लड़का हो या लड़की, उसे अपना जीवन प्रतिदान रूप में देना पड़ता है…अपने सपनों-अरमानों को अपने हाथों रौंद कर; उनकी सहर्ष बलि देकर, अपने समस्त जीवन को बहन-भाइयों व माता-पिता के पालन-पोषण हेतु झोंकना पड़ता है। यहां लड़के- लड़की में भेद नहीं होता, क्योंकि यह मसला है, माता-पिता द्वारा की गई ग़लतियों का परिणाम भुगतने का..यहां तक तो समाज में समानाधिकार व्यवस्था लागू है…जिसमें कोई भेदभाव नहीं है। वैसे तो आजकल वृद्धावस्था में माता-पिता के भरण- पोषण का दायित्व, पुत्र न होने की स्थिति में पुत्री को वहन करना लाज़िमी है। ठीक ही तो है, अब तो उसे संपत्ति में समानाधिकार प्राप्त है। अधिकार व कर्त्तव्य का चोली-दामन का साथ है। एक के बिना दूसरा अस्तित्वहीन है। वैसे तो यह संतान का नैतिक दायित्व भी है।
हां! आवश्यकता है, माता-पिता को अपनी सोच बदलने की…सो! अब उन्हें बेटी के घर का अन्न-जल ग्रहण करने की परंपरा का त्याग करना होगा। वैसे भी बड़े-बड़े शहरों में अक्सर माता-पिता बेटियों के घर में रहते हैं। इसका मुख्य कारण है…बेटों का विदेशों में नौकरी करना और माता-पिता को पाश्चात्य संस्कृति का रास न आना। अक्सर सिंगल चॉइल्ड होने के कारण भी बेटियों के लिए इस दायित्व को निर्वहन करना अनिवार्य हो जाता है।
आधुनिक युग में महिलाएं नौकरी करती हैं और दोहरा जीवन जीती हैं। परन्तु कहां बदल पाए हैं, हम अपनी दकियानूसी सोच; कहां त्याग पाए हैं रूढ़ियों, परंपराओं व प्राचीन मान्यताओं को… जिसका स्पष्ट प्रमाण है…पति व परिवारजनों की अपेक्षाओं में तनिक भी परिवर्तन न आना…जिसका संबंध उनकी सोच में परिवर्तनशीलता से है। परंतु वह सर्वथा असंभव है…ऐसा तो कभी हो नहीं सकता। भले ही हम भौतिक दृष्टि से संपन्न हो गए हैं, परंतु हमारी सोच, विचारधारा व मानसिक धरातल सदियों पहले जैसा है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है…कन्या पक्ष के लोगों का वर-पक्ष के लोगों के सम्मुख ता-उम्र नत-मस्तक रहना; उनकी अप्रत्याशित इच्छाओं व मांगों की लंबी फेहरिस्त की पूर्ति करना, भले ही वे उस में सक्षम न हों। इतना ही नहीं, उनके माता-पिता और उनकी आगामी पीढ़ी के साथ न चाहते हुए भी संबंध-निर्वाह करना; उनकी नियति, मजबूरी व विवशता बन जाती है…. यहां तक कि मरणोपरांत मृत्युभोज व कफ़न जुटाना भी वधु के माता-पिता का ही दायित्व होता है। क्या हम चाह कर भी इन प्राचीन परंपराओं से भविष्य में भी मुक्ति पाने में समर्थ हो सकेंगे?
परंतु चंद महिलाएं अपनी संस्कृति को तज, ग़लत राहों पर चल पड़ी हैं। देर रात तक क्लबों में सिगरेट के क़श लगाना, जुआ खेलना तथा नशे की हालत में लड़खड़ाते हुए लौटना उनकी दिनचर्या में शामिल है। अपहरण, फ़िरौती, हत्या व धन-सम्पदा पाने के लिए विवाह रचाना, पति व परिवारजनों पर दहेज की मांग का इल्ज़ाम लगा जेल भिजवाना–उनके शौक में शामिल है’, जिसमें महिला के माता-पिता का भी भरपूर योगदान रहता है। वे ‘तू नहीं, और सही’ और खाओ पीओ, मौज उड़ाओ’ में विश्वास रखने लगी हैं …वे हर पल को खुशी से भरपूर जी लेना चाहती हैं। सो! संबंध-सरोकार अंतिम सांसें ले रहे हैं… मरने के कग़ार पर हैं। लिव-इन के प्रचलन के कारण परिवार टूट रहे हैं; सिंगल पेरेंट की संख्या बढ़ रही है, जिसका सबसे अधिक ख़ामियाज़ा बच्चे भुगत रहे हैं तथा अपराध-जगत् की ओर प्रवृत्त हो रहे हैं। सो! हमें प्रचलित मान्यताओं व अंधविश्वासों से मुक्ति पाने के लिए समाज में विवाह-रूपी संस्था को पुन: जीवन-दान प्रदान करना होगा। लिंग-भेद को नकारना होगा, ताकि तथाकथित माता-पिता ऐसे भीषण ग़ुनाह न करें और बच्चों को उनके कर्मों की सज़ा आजीवन न भुगतनी पड़े और वे अपने सपनों को साकार करने व जीवन को अपने ढंग से जीने को स्वतंत्र हों।
आइए! हम प्राचीन परंपराओं को तोड़, सामाजिक बुराइयों को दफ़न कर समूल नष्ट कर दें तथा नयी सोच, नयी उमंग व नयी तरंग के साथ, नवीन युग में पदार्पण करें, जहां लघुता-प्रभुता का भेद न हो और सब अपने कर्त्तव्य-दायित्वों का सहर्ष वहन करें। अपनी सीमाओं को लांघ, जीवन में मर्यादा का अतिक्रमण न करें, ताकि त्याग का सर्वोपरि भाव सदैव बना रहे। यही है मानव जीवन की अपेक्षा व पराकाष्ठा…जिसे धारण कर हम मासूमों को आत्महत्या करने से रोक पाएंगे…जो स्वयं को इन दायित्वों के चक्रव्यूह में फंसा हुआ पाते हैं और वे पलायनवादिता की राह पर चल पड़ते हैं, क्योंकि उन्हें अपने जीवन का अंत करने से सुगम, कोई दूसरा उत्तम उपाय-विकल्प दिखाई नहीं पड़ता।
परंतु हमें स्मरण रखना चाहिए कि मानव जीवन अनमोल है, जो हमें चौरासी लाख योनियों की यात्रा करने के पश्चात् प्राप्त होता है। सो! संबंधों को शाश्वत बनाए रखने के लिए दरक़ार है… स्नेह, सहयोग, समर्पण व त्याग की; प्रबल इच्छा-शक्ति, एकाग्रता व अटल विश्वास की… इन्हें जीवन में अपना कर, जहां हम संबधों व सरोकारों को जीवंतता प्रदान कर, समाज व देश को, समुन्नत व समृद्ध बना सकेंगे और स्नेह, प्रेम, सहयोग, सौहार्द, समन्वय व सामंजस्यता द्वारा समरसता का साम्राज्य स्थापित करने में समर्थ हो सकेंगे।
अंतत: मैं यह कहना चाहूंगी कि संबंध….अर्थात् यदि हम समान रूप से बंधे रहेंगे और मर्यादा व सीमाओं का उल्लंघन-अतिक्रमण नहीं करेंगे, तो ग़िले-शिक़वे व शिकायतें स्वत: समाप्त हो जाएंगी… हम अपने-अपने द्वीप से बाहर निकल, सौहार्दपूर्ण ढंग से अपना जीवन बसर कर सकेंगे। स्वार्थहीन संबंध स्थायी होते हैं, क्षणिक नहीं…न उनमें कोई वाद-विवाद व संघर्ष होता है; न ही प्रतिदान की इच्छा व आकांक्षा। सो! यही है संबंधों के स्थायित्व का मात्र उपादान, जिससे मर्यादा भी सुरक्षित रह सकेगी।।
हर व्यक्ति अपने भीतर एक अदृश्य संसार लिये चलता है—विचारों, अनुभवों, मूल्यों और संवेदनाओं का ऐसा उत्तराधिकार जो हमारे जीवन-मार्ग को चुपचाप दिशा देता है। मेरी अपनी विरासत किसी एक नाम या किसी सीमित परम्परा की नहीं। यह एक बहती हुई धारा है, जो सदियों के शान्त आत्मचिन्तन से उपजी है—ऐसी पंक्तियों में व्यक्त, जो आदेशों जैसी नहीं, बल्कि भीतर छिपे सत्य का स्नेहिल भान कराती हैं।
मेरे लिये इस विरासत का मूल बहुत सरल है—
🌱 “अहं ब्रह्मास्मि – मैं उसी अनन्त सत्ता का अंश हूँ।”
🌱 “तत्त्वमसि – और तुम भी वही हो।”
ये वाक्य मेरे भीतर यही कहते हैं कि मेरी और संसार की सीमाएँ उतनी ठोस नहीं जितनी दिखती हैं। जो मुझमें है, वही तुममें है; जो तुममें है, वही समस्त सृष्टि में स्पंदित है।
जीवन को लेकर मेरा दृष्टिकोण भी इसी सरलता में उतर आता है—
🌱 “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन…”
अर्थात, मनुष्य केवल अपने कर्म का चयन कर सकता है, पर फल पर अधिकार नहीं रख सकता।
यह विचार मुझे हर स्थिति में संतुलित रखता है। बस अपना श्रेष्ठ प्रयास करते रहो—बाक़ी जीवन की लय पर छोड़ दो। अपेक्षा कम हो तो मन हल्का रहता है।
इसी समझ से एक सहज करुणा जन्म लेती है—अपने लिये नहीं, सबके लिये। मेरे भीतर हमेशा इन शुभकामनाओं की ध्वनि गूंजती है:
ये केवल प्रार्थनाएँ नहीं; यह वह संवेदना है जो किसी एक समुदाय या समूह की नहीं होती—यह मनुष्य होने की सामूहिक विरासत है। हम सभी एक-दूसरे के सुख-दुःख से जुड़े हुए हैं।
इसी क्रम में एक गहरी और व्यापक प्रार्थना भी मेरे मन को छूती है:
🌱 “ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥”
इसका सरल अर्थ है—यह भी पूर्ण है, वह भी पूर्ण है; पूर्ण से पूर्ण ही उत्पन्न होता है; पूर्ण में से पूर्ण निकाल भी लो तो भी पूर्ण ही शेष रहता है।
यह पंक्तियाँ हमें समग्रता का बोध कराती हैं—कि सृष्टि की नींव कमी नहीं, बल्कि पूर्णता है। जीवन तब सहज हो जाता है जब हम अपने भीतर और बाहर इसी पूर्णता को पहचानने लगते हैं।
मेरी विरासत मुझे यह भी सिखाती है कि ज्ञान कभी एक-रूपी नहीं होता:
🌱 “एकं सत्यं, विप्राः बहुधा वदन्ति।”
सत्य एक है, पर उसकी अभिव्यक्ति अनेक रूपों में हो सकती है।
यह विचार मन को ख़ुला रखता है—सुनने, सीखने और समझने के लिये। कोई भी ज्ञान अंतिम नहीं, और कोई भी मार्ग अकेला नहीं।
और फिर वह अनादि-प्रार्थना, जो हर खोजी हृदय की धुन है—
🌱 “असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय…”
असत्य से सत्य की ओर ले चलो, अज्ञान के अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो।
यह जीवन के उस शाश्वत प्रयत्न का स्वर है—साफ़ देखने, स्पष्ट सोचने और भीतर के आलोक तक पहुँचने का।
इस संवाद की शुरुआत क्यों?
मेरा प्रयास किसी विचार-धारा की तुलना करना या किसी मत को परिभाषित करना नहीं है। यह सिर्फ़ एक विनम्र कोशिश है—उस सांस्कृतिक और आध्यात्मिक धरोहर को समझने की, जिसने मुझे भीतर से आकार दिया है।
मैं इसे इसलिए साझा कर रहा हूँ, क्योंकि विरासत कोई स्थिर वस्तु नहीं—यह एक जीवित संवाद है। जब हम विचार करते हैं, प्रश्न पूछते हैं, अनुभव बाँटते हैं, तो यह और समृद्ध होती जाती है।
इसी आशा के साथ यह यात्रा आरम्भ की है—अनन्त, मुक्त और सतत्—जहाँ हर व्यक्ति अपनी बात जोड़ सकता है, और हम सब मिलकर अपने भीतर की रोशनी को थोड़ा और स्पष्ट कर सकते हैं।
A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.
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≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’≈
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “ड ऽऽ र और भय…“।)
अभी अभी # ८४९ ⇒ आलेख – ड ऽऽ र और भय श्री प्रदीप शर्मा
कैसी कैसी जोड़ी बनाई है भगवान ने, राम और श्याम और जय वीरू की जोड़ी तो ठीक, डर और भय की भी जोड़ी। दोनों बिलकुल जुड़वा लगते हैं, हूबहू डिट्टो एक जैसे, शक्ल सूरत से रंगा बिल्ला माफिक, डरावने और भयंकर।
अजी साहब छोड़िए, सब आपका वहम है, डर और भय की तो कोई शक्ल ही नहीं होती। जंगल मे
अकेले जाओ तो डर लगता है, चिड़ियाघर में कितना मजा आता है। जब तक हम सुरक्षित हैं, निडर और निर्भय हैं, जहां किसी ने सिर्फ बोला सांप, बस हो गया कबाड़ा। भय का सांप अथवा सांप का भय तो हमारे अंदर बैठा है।
कहीं डंडे का डर तो कहीं बंदूक का डर, बेचारे बेजुबान जानवर को भी हम चाबुक से डराते हैं।
वाह रे सर्कस के शेर।।
इतना बड़ा शब्दकोश आखिर बना कैसे! क्या कम से कम शब्दों से काम नहीं लिया जा सकता, प्यार मोहब्बत, लाड़ प्यार! बच्चे को लाड़ मत करो प्यार ही कर लो। हटो जी, ऐसा भी कभी होता है। क्या एक भगवान शब्द से आपका काम चल जाता है। इतने देवी देवता, एक दो से ही क्यों नहीं काम चला लेते।
हर शब्द के पीछे एक अर्थ छुपा होता है। आपको डरावने सपने आते हैं, आपकी नींद खुल जाती है, अरे यह तो सपना था, कोई डर की बात नहीं! आपके अवचेतन में भय के संस्कार है, इसीलिए तो डरावने सपने आते हैं। छोटे छोटे बच्चे नींद में चमक जाते हैं, एकदम रोना शुरू कर देते हैं, उनके सिरहाने चाकू रखा जाता है। चाकू सुरक्षा कवच है और गंडा तावीज भी। मानो या ना मानो।।
डर से ही डरावना शब्द बना है, और भय से भयंकर! जगह जगह भयंकर सड़क दुर्घटना की खबरें मन को व्यथित कर देती हैं। कुछ लोग इतनी तेज गाड़ी चलाते हैं भाई साहब, कि उनके साथ तो बैठने में भी डर लगता है।
खतरों से खेलना कोई समझदारी नहीं। सावधानी हटी, दुर्घटना घटी।
हमें बचपन से ही डराया गया है, कभी भूत से तो कभी बाबा से! आजकल के बच्चे भूत से नहीं डरते, क्योंकि वे ब्ल्यू व्हेल जैसे खेल खेलते हैं। अब हम बाबाओं से डरते नहीं, उनसे ज्ञान प्राप्त करने जाते हैं। वे भी हमें ज्ञान बांटते हैं, भगवान से डरो।।
पढ़ने से कैसा डरना, लेकिन सबक याद नहीं होने पर मास्टरजी की छड़ी से तो डर लगता ही था। कहीं परीक्षा का डर तो कहीं साइंस मैथ्स का डर। हमारे गणित का डर तो अभ्यंकर सर भी दूर नहीं कर पाए।
कोई अमर नहीं, हमारा शरीर नश्वर है, फिर भी कोई मरना नहीं चाहता। शुभ शुभ बोलो। मरने की बात अपनी जुबान पर ही मत लाओ, क्योंकि हम सबको मृत्यु का भय है। हम नचिकेता नहीं जो यम की छाती पर जाकर खड़े हो जाएं।।
क्या आपको नहीं लगता, ये डर और भय और कोई नहीं, जय विजय ही हैं। मैं आपको जय विजय की कथा नहीं सुनाऊंगा, लेकिन ये कभी वैकुंठ के द्वारपाल थे, बेचारे शापग्रस्त हो गए और आसुरी शक्ति बने भगवान विष्णु को फिर भी नहीं छोड़ रहे। कभी रावण कुंभकर्ण तो कभी कंस शिशुपाल। आज के हिटलर स्टालिन भी शायद ये ही हों।
डर और भय ही कलयुग के जय विजय हैं। अगर आपने इन पर काबू पा लिया तो समझो आपका स्वर्ग का नहीं, वैकुंठ का टिकिट कट गया, यानी आप जन्म मृत्यु के चक्कर से बाहर निकल गए।।
ये सब कहने की बातें हैं।
क्या आपको आज के हालात से डर नहीं लगता।
क्या आप नहीं चाहते, लोग निडर होकर चैन की नींद सोएं। इसलिए हमें हमेशा जागरूक रहना होगा, खतरा देश के बाहर से भी है और अंदर भी।
हमें देश की, संविधान की और लोकतंत्र की रक्षा करनी है।
हम पहले लोगों को भयमुक्त वातावरण देंगे और बाद में अपने अंदर के जय विजय यानी डर और भय को भी देख लेंगे। आखिर इतनी जल्दी भी क्या है। सुना है नेटफ्लेक्स पर कोई बढ़िया हॉरर मूवी लगी है, मजेदार है।।
(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ” में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक ज्ञानवर्धक आलेख – “उज्जैन का ऐतिहासिक श्री चित्रगुप्त मंदिर” ।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३८८ ☆
~ न्यूयार्क से ~ उज्जैन का ऐतिहासिक श्री चित्रगुप्त मंदिर श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
उज्जैन का ऐतिहासिक श्री चित्रगुप्त मंदिर: स्वयं भगवान चित्रगुप्त ने तपस्या की थी यहां
महाकाल की नगरी उज्जैन केवल बाबा महाकाल के कारण ही नहीं, बल्कि कर्म, न्याय और मोक्ष की गहरी अवधारणाओं से जुड़े भगवान श्री चित्रगुप्त मंदिर के कारण भी विशेष पहचान रखती है। क्षिप्रा नदी के पवित्र तट रामघाट, अंकपात क्षेत्र में स्थित यह मंदिर उन विरले तीर्थों में गिना जाता है, जहाँ मृत्यु के बाद मिलने वाले न्याय, कर्मों के लेखा-जोखा और मोक्ष की परंपरा को महसूस किया जा सकता है। प्राचीन अवंती या उज्जयिनी की इस तपोभूमि को भगवान श्री चित्रगुप्त की साधना का स्थल माना जाता है, जहाँ उन्होंने तपस्या कर सर्वज्ञता और समस्त जीवों के कर्मों का लेखा रखने की दिव्य शक्ति प्राप्त की थी।
मान्यता के अनुसार, सृष्टि की रचना के समय भगवान ब्रह्मा ने दीर्घ तपस्या के दौरान अपने ही मन में अंकित एक दिव्य पुरुष की कल्पना की, वह चित्र मन के अंतरतम में गुप्त हो गया, इसी से “चित्रगुप्त” नाम की उत्पत्ति मानी जाती है।
ब्रह्मा ने इस दिव्य पुरुष को आदेश दिया कि वे महाकाल की नगरी उज्जैन जाकर कठोर तपस्या करें और मानव कल्याण के लिए ऐसी शक्तियाँ अर्जित करें, जिनसे वे समस्त प्राणियों के पाप पुण्य और कर्मों का सूक्ष्मतम लेखा रख सकें। लोक परंपरा में यही स्थान आगे चलकर श्री चित्रगुप्त धाम , धर्मराज चित्रगुप्त मंदिर के रूप में प्रतिष्ठित हुआ ।
आज भी भगवान श्री चित्रगुप्त की प्रतिमा को एक हाथ में कर्मों की पुस्तक और दूसरे हाथ से लेखा करते हुए दर्शाया गया है।
यह मंदिर उत्तर भारतीय नागर शैली की परंपरागत रचना लिए हुए है, जिसमें गर्भगृह, मंडप और ऊँचा शिखर प्रमुख रूप से दिखाई देते हैं। गर्भगृह में स्थापित भगवान चित्रगुप्त की मूर्ति को सफेद संगमरमर की शांत, गंभीर और न्यायमूर्ति भाव वाली प्रतिमा के रूप में वर्णित किया जाता है, जो भक्तों को अपने कर्मों के प्रति सजग रहने की प्रेरणा देती है। रामघाट स्थित धर्मराज श्री चित्रगुप्त मंदिर में यमराज, धर्मराज और यमुना के साथ चित्रगुप्त की संयुक्त उपासना की परंपरा भी मिलती है, जिससे यह स्थल मृत्यु, धर्म, पवित्रता और न्याय , इन चारों के अनूठे संगम के रूप में देखा जाता है।
कथाओं के अनुसार, उज्जैन के इसी क्षेत्र में भगवान चित्रगुप्त ने दीर्घकालीन तप कर वह दिव्य शक्ति पायी, जिसके बल पर वे यमलोक में प्रत्येक आत्मा के लोक-परलोक के कर्मों का खाता तैयार करते हैं। इसी कारण यहाँ आने वाले श्रद्धालु केवल पूजा ही नहीं, बल्कि आत्म-मंथन, अनुशासित जीवन और सत्यनिष्ठ आचरण का संकल्प भी करते हैं ताकि मृत्यु के बाद उनके पक्ष में उत्तम लेखा लिखा जाए। कायस्थ समाज, जो श्री चित्रगुप्त को अपना आदि–देव और कुलदैव मानता है, इस मंदिर को ‘कायस्थों के चार धाम’ के रूप में अग्रणी स्थान देता है , और कार्तिक शुक्ल द्वितीया (चित्रगुप्त पूजा ,यम द्वितीया) पर यहाँ विशेष अनुष्ठानों, लेखनी, बही की पूजा और सामाजिक कार्यक्रमों के माध्यम से अपनी सांस्कृतिक एकता को व्यक्त करता है।
उज्जैन के धर्मराज–चित्रगुप्त मंदिर से कई जीवंत लोककथाएँ भी जुड़ी हैं, जो इसके आध्यात्मिक महत्व को बढ़ाती हैं। एक प्रसिद्ध मान्यता यह है कि वनवास के बाद भगवान राम ने शिप्रा तट पर इसी क्षेत्र में आकर धर्मराज–चित्रगुप्त की विशेष पूजा की और अपने पिता दशरथ सहित पूर्वजों का तर्पण कर पितृऋण से मुक्ति की प्रार्थना की थी। इसीलिए आज भी बहुत से लोग यह विश्वास लेकर आते हैं कि शिप्रा में स्नान और चित्रगुप्त मंदिर में विधिवत पूजा तर्पण से पितृदोष शांत होता है और पूर्वजों की आत्माओं को शांति और उन्नति प्राप्त होती है।
आधुनिक समय में इस मंदिर की एक अत्यंत विशिष्ट और चमत्कारिक मानी जाने वाली लोकपरंपरा ने भी लोगों का ध्यान खींचा है। यहाँ ऐसे अनेक श्रद्धालु पहुँचते हैं जो असहनीय रोग, दीर्घकालीन पीड़ा या जीवन मृत्यु के संघर्ष में उलझे अपने परिजनों के लिए या तो चमत्कारिक स्वास्थ्य लाभ की प्रार्थना करते हैं या फिर शांत, पीड़ामुक्त मृत्यु के रूप में मोक्ष का वरदान माँगते हैं।
प्रचलित विश्वास यह है कि सच्ची आस्था से की गई विशेष पूजा के बाद चौबीस घंटे के भीतर या तो कष्टों से राहत मिलती है या फिर अत्यंत शांतिपूर्ण प्रस्थान का मार्ग खुल जाता है, इसलिए इसे कई लोग रूपक रूप में “मौत का वरदान” माँगने वाला मंदिर भी कहने लगे हैं, जबकि भक्त इसे वास्तव में “मोक्ष और कष्टमुक्ति” की याचना मानते हैं।
स्थानीय परंपरा में यह धारणा भी प्रचलित है कि इस मंदिर के ऊपर से कर्क रेखा गुजरती है, जो इसे ज्योतिषीय दृष्टि से विशेष ऊर्जा–क्षेत्र बनाती है और ग्रहदोषों, विशेषकर कालसर्प, राहु–केतु आदि के समाधान के लिए यहाँ दीपदान और विशेष पूजा कराई जाती है। कई पीढ़ियों से यहाँ सेवा कर रहे पुरोहितों के अनुसार रामघाट का यह मंदिर कम से कम सैकड़ों वर्षों से नियमित पूजा अर्चना का केंद्र है, और उनके वंश द्वारा सत्रहवीं, अठारहवीं शताब्दी से यहाँ आराधना किए जाने के प्रमाण मिलते हैं। समय समय पर मंदिर का जीर्णोद्धार, नई प्रतिमाओं की प्राणप्रतिष्ठा और ट्रस्ट के गठन जैसी प्रक्रियाएँ भी हुईं, जिनके कारण इसे “श्री चित्रगुप्त धाम” के रूप में व्यवस्थित धार्मिक केंद्र का रूप मिला।
समग्र रूप से देखें तो उज्जैन का श्री चित्रगुप्त मंदिर केवल एक देवालय भर नहीं, बल्कि भारतीय धर्मदर्शन के “कर्म सिद्धांत” का जीवंत विद्यालय है, जहाँ हर दर्शन यह स्मरण कराता है कि मृत्यु के बाद न्याय निश्चित है और उसका आधार हमारे अपने कर्म ही हैं। महाकालेश्वर, कालभैरव और शक्तिपीठों के साथ स्थित यह धाम उज्जैन की बहुरंगी आध्यात्मिक विरासत में उस कड़ी के रूप में जुड़ता है जो भक्ति के साथ-साथ जिम्मेदार, न्यायपूर्ण और नैतिक जीवन जीने की प्रेरणा देती है । इसलिए जब यह कहा जाता है कि “स्वयं भगवान चित्रगुप्त ने यहाँ तपस्या की थी”, तो इसके पीछे वही भाव निहित है कि यह स्थल मनुष्य को अपने भीतर के न्यायाधीश, अपने ही ‘चित्रगुप्त’ को जगाने की प्रेरणा देता है।
यह मंदिर न केवल कायस्थों के लिए बल्कि समूचे हिंदू समाज , पौराणिक, ऐतिहासिक, ASI, पर्यटन हर दृष्टि से जन महत्व की विरासत है।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “किताब और कैलेंडर …“।)
अभी अभी # ८४८ ⇒ आलेख – किताब और कैलेंडर श्री प्रदीप शर्मा
किताबें रोज छपती हैं, कैलेंडर हर वर्ष छपते हैं। किताब में क्या छपेगा, इसका निर्णय लेखक करता है, कैलेंडर में क्या छपेगा, इसका निर्णय समय करता है, इसीलिए किताब को कृति और कैलेंडर को काल निर्णय भी कहा जाता है। एक लेखक को लोग कम जानते हैं, लाला रामस्वरूप को कौन नहीं जानता।
मैं समय हूं। मेरे समय में किताब को पुस्तक कहा जाता था और टीचर को शिक्षक। टेक्स्ट बुक, पाठ्य पुस्तक कहलाती थी और lesson पाठ कहलाता था। सर और टीचर को अध्यापक और गुरु जी कहा जाता था और अटेंडेंस को हाजरी। जब क्लास में नहीं, कक्षा में हाजरी भरी जाती थी, तब छात्र यस सर अथवा प्रेजेंट सर नहीं, उपस्थित महोदय कहा करते थे।।
कैलेंडर की तरह हर वर्ष पाठ्य पुस्तकें भी बदली जाती थी। उधर कैलेंडर का साल बदलता, इधर हमारी कक्षा भी बदलती और पाठ्य पुस्तक भी।
किताबें पढ़कर और पढ़ लिखकर ही व्यक्ति पहले ज्ञान अर्जित करता है और फिर बाद में किसी किताब की रचना करता है। एक किताब की तुलना में एक कैलेंडर छापना अधिक आसान है। इसीलिए जो अधिक पढ़ लिख जाते हैं वे किताबें ही छापना पसंद करते हैं, कैलेंडर नहीं।।
हम भारतकुमार मनोजकुमार का उपकार नहीं भूलेंगे, जिसने कैलेंडर को एक नया अर्थ दिया और वह भी एक, इकतारे के साथ। हर साल कैलेंडर छाप दिया, और उसके बाद? इकतारा बोले, सुन सुन, क्या कहे ये तुझसे, सुन सुन, सुन सुन सुन।
सृजन, सृजन होता है, चाहे फिर वह किसी कैलेंडर का हो, अथवा किसी पुस्तक का। उत्सव तो बनता है, कहीं सृजन की मेहनत कुछ महीनों की है, तो कहीं कई वर्षों की। प्यार के खत की तरह, किसी पुस्तक के सृजन में, किसी बालक के जन्म में, वक्त तो लगता है।।
जिन्हें गुरु नहीं मिलता, वे निगुरे कहलाते हैं, जिनकी संतान नहीं होती, वे निःसंतान कहलाते हैं लेकिन जो लेखक किसी पुस्तक का सृजन नहीं कर पाए, उसे आप क्या कहेंगे।
आप कैलेंडर छापें, ना छापें, एक पुस्तक अवश्य छापें, आप पर मां सरस्वती की कृपा हो।
जो खुशी एक मां को अपने बालक के जन्म पर होती है, वही खुशी किसी लेखक को अपनी पहली रचना प्रकाशित होने पर होती है। खुशी तो बनती है, एक विमोचन तो बनता है।।
हर साल कैलेंडर छपते हैं, लाखों करोड़ों किताबें छपती हैं, लेकिन समय का विधान देखिए, जब देश दुनिया की जनसंख्या बढ़ती है, तो हमें जनसंख्या नियंत्रण का खयाल आता है। लेकिन इसमें गलत कुछ भी नहीं।
जो गलत है, वह गलत है।
खूब किताबें छापो, खूब कैलेंडर छापो, खूब पैसा कमाओ, लेकिन जब कमाने वाले हाथों से खाने वाले हाथ बढ़ जाते हैं, तो गरीबी में आटा गीला हो ही जाता है। बच्चे दो ही अच्छे, लेकिन हां, मगर हों भी अच्छे।।
एक लेखक को भी अपनी रचना से उतना ही प्रेम होता है जितना मां बाप को अपनी औलाद से। पुत्र मोह तो महाराज दशरथ को भी था और महाराज धृतराष्ट्र को भी। कहां एक के चार और कहां एक के सौ। आजकल हमारे लेखक भी तेंदुलकर और विराट कोहली की तरह अपनी प्रकाशित पुस्तकों की संख्या, रनों की तरह बढ़ा रहे हैं। कोई रन मशीन है तो कोई बुक मशीन। हाल ही में कुछ लेखक अपनी प्रकाशित पुस्तकों का अर्द्ध शतक तो मार ही चुके हैं। कुछ नर्वस नाइंटीज़ में अटके हैं, उनकी मां शारदे सेंचुरी पूरी करे।
आप कैलेंडर चाहे मोहन मीकिंस का लें, अथवा किंगफिशर का, एक लाइफ टाइम पंचांग से ही काम चला लें, हर साल नया कैलेंडर भी खरीदें, लेकिन कृपया खुद कैलेंडर ना छापें। अगर छापने का इतना ही शौक है, तो अपनी किताबें छापें, कोई बैन नहीं, कोई नियंत्रण नहीं।
और हां जो छाप रहे हैं, उनसे जलें नहीं। विमोचन तो पुस्तक के जन्म का अवसर होता है, उस पर बच्चा और जच्चा को आशीर्वाद दें, अनावश्यक कुढ़कर अपशुकन तो ना करें।।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “राजनीति और व्यंग्य…“।)
अभी अभी # ८४७ ⇒ आलेख – राजनीति और व्यंग्य श्री प्रदीप शर्मा
राजनीति एक शास्त्र है और व्यंग्य एक सहित्यिक विधा! जो कभी शास्त्र था, वह एक शस्त्र कब से बन गया, कुछ पता नहीं चला। वैसे तो अरस्तु को राजनीति शास्त्र का जनक माना जाता है, लेकिन भारत के संदर्भ में चाणक्य पर आकर सुई अटक जाती है। कौटिल्य शब्द से ही कूटनीति टपकती है, और कौटिल्य के अर्थ-शास्त्र के बिना सभी शास्त्र अधूरे हैं।
विडंबना देखिये, अर्थशास्त्र पर अर्थ हावी हो गया, और राजनीति शास्त्र पर राजनीति। बुद्धि पर बुद्धिजीवी भारी पड़ गया और ज्ञान पर ज्ञानपीठ। और व्यंग्य जो शास्त्र नहीं था, हास्य की पगडंडियों से चलता चलता साहित्य की प्रमुख धारा में शामिल हो गया। अगर कल का राजनीति शास्त्र आज अस्त्र-शस्त्र से सुसज्जित है, तो व्यंग्य भी किसी ब्रह्मास्त्र से कम नहीं।।
कितने दुःख का विषय है, राजनीति से व्यंग्य है, और तो और व्यंग्य में राजनीति भी है, लेकिन राजनीति में आज व्यंग्य का नितांत अभाव है। याद आते हैं वे दिन जब संसद में ज़ोरदार बहस होती थी, शायरी होती थी, नोंकझोंक होती थी, हंगामे भी होते थे, लेकिन किसी का अपमान नहीं होता था। शून्यकाल में बहस चलती थी। प्रश्नोत्तर काल में मंत्री महोदय पर विपक्ष द्वारा प्रश्नों की बौछार कर दी जाती थी। सत्ता से अधिक लोगों में विपक्ष के लिए सम्मान था।
यूँ कहने को तो व्यंग्य और राजनीति का चोली दामन का साथ है, लेकिन दोनों की आपस में बोलचाल तक बंद है। व्यंग्य बंद कमरे में फलता-फूलता है, राजनीति सड़क पर उतर आती है। व्यंग्य पर कोई कीचड़ नहीं उछाल सकता, लेकिन अगर किसी व्यंग्यकार ने राजनीति पर कीचड़ उछाला, तो यह आपे में नहीं रहती। राजनीति को नहीं दोष परसाई।।
राजनीति में पार्टी होती है, हर पार्टी का झंडा होता है, नेता होता है, पार्टी का कोई नाम होता है। व्यंग्य इस बारे में बहुत कमजोर है। उसके पास कोई नाम नहीं, नेता नहीं, झंडा नहीं, कोई नारा नहीं। वह विघ्नसन्तोषी है! नेता, नारे, पार्टी र झंडे किसी को वह नहीं बख्शता। अतः उसे समाज में वह सम्मान प्राप्त नहीं होता जो राजनीति को होता है।
जनता नेता की दीवानी होती है, किसी व्यंग्यकार की नहीं। हमारा व्यंग्यकार कैसा हो, परसाई जैसा हो, कोई नहीं कहता।
गुटबाजी और अवसरवाद राजनीति और व्यंग्य में समान रूप से हावी है। वंशवाद के बारे में व्यंग्यकार पूरा कबीर है। कमाल के पूत होते हैं उसके! एक व्यंग्यकार का लड़का कितना भी बड़ा हो जाए, अपने पिता के जूते में पाँव डालना पसंद नहीं करता। राजनीति में तो पूत के पाँव पालने में ही नज़र आ जाते हैं।।
शेक्सपियर के शब्दों में राजनीति और व्यंग्य Strange bedfellows हैं। राजनीति का काम व्यंग्य के बिना आसानी से चल जाता है, लेकिन व्यंग्य को राजनीति की बैसाखी की ज़रूरत पड़ती है। लेकिन व्यंग्यकार जब उसी बैसाखी से राजनीति की पिटाई कर देता है, तो बात बिगड़ जाती है। मेरी बिल्ली मुझ पर म्याऊँ! लेकिन बिल्ली बड़ी चालाक है। वह किसी के टुकड़ों पर नहीं पलती। जहाँ भी मलाई मिलती है, मुँह मार लेती है।
ज़िन्दगी में हास परिहास हो, व्यंग्य विनोद हो! राजनीति में कटुता समाप्त हो। सहमति-असहमति का नाम ही पक्ष-विपक्ष है। घर घर में विवाद होते हैं, कहासुनी होती है, स्वभावगत विरोध भी होते हैं। लेकिन जब गृहस्थी की गाड़ी आसानी से चल सकती है, तो राजनीति की क्यों नहीं। सत्ता और विपक्ष लोकतंत्र के दो पहिये हैं। दोनों समान रूप से मज़बूत हों। राजनीति में जब व्यंग्य और विनोद का समावेश होगा, तब ही यह संभव है। आईना साथ रखें। किसी को आइना दिखाने के पहले अपना मुँह देखें।।
(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)
☆ आलेख # १५५ ☆ देश-परदेश – साइबर क्राइम ☆ श्री राकेश कुमार ☆
उपरोक्त पेपर क्लिपिंग्स, व्हाट्स ऐप के माध्यम से प्राप्त हुई। आज रविवार को प्रातः कालीन साप्ताहिक साथियों से चर्चा का दिन हैं, इसीलिए आज एक एस बी आई बैंक अधिकारी के साथ हुए साइबर क्राइम पर ही केन्द्रित था।
जबलपुर निवासी श्री अनिल जी ननहोरिया ने विगत 22 नवंबर 2025 को 76 लाख गवां दिए हैं। साथियों ने फ्रॉड आदि से बचने के लिए अपने अपने विचार प्रस्तुत किए, जोकि आपके विचारार्थ निम्नानुसार हैं। आप के मन भी अवश्य कुछ ना कुछ विचार आ रहें होंगे, चाहें तो सब के लिए सांझा कर सकते हैं।
एक साथी ने बताया कि बैंक खाते के लिए एक अलग मोबाइल कनेक्शन रखना चाहिए। जिसकी जानकारी किसी को भी नहीं देवें।
एक दूसरे साथी ने जानकारी दी कि सभी बैंक खाते (FD,SB आदि) पत्नी के साथ Joint operation में करवा लेवें।
एक साथी ने तो ये भी कह दिया कि अधिकतम बचत राशि को बच्चों के नाम कर देवें, और भजन करें।
कहने वाले तो ये भी कहने लगे कि सोना खरीद कर लाकर में रख देना चाहिए, दिन दोगुना रात चौगुना महंगा हो जाएगा। एक और साथी लपक कर बोले, जमीन खरीद कर रख दो, ताकि कोई रंगदार कब्जा कर लेवें।
अंत में एक साथी ने कबीर का दोहा ” पूत सपूत तो क्यों धन संचय, पूत कपूत तो क्यों धन संचय” सुना कर आज सभी साथियों के चाय नाश्ते का बिल भर कर अपने कथन को प्रमाणित कर दिया।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “बुद्धिहीन-बुद्धिजीवी…“।)
अभी अभी # ८४५ ⇒ आलेख – बुद्धिहीन-बुद्धिजीवी श्री प्रदीप शर्मा
बुद्धिमान तो सभी होते हैं, लेकिन सभी बुद्धिमान बुद्धिजीवी नहीं होते! एक श्रमजीवी की तरह जिसकी आजीविका ही बुद्धि से चलती हो, वह बुद्धिजीवी। शेष को आप चाहें तो बुद्धिवादी कह सकते हैं।
हमारे यहाँ मनीषी और विद्वान होते थे, ये बुद्धिजीवी कब चले आए, कुछ पता ही नहीं चला। चाय की क्रांति के साथ ही अंग्रेज़ कॉफ़ी भी ले आए। हम कहवा, काढ़ा तो पीते ही थे, कॉफ़ी हाउस में जाकर कॉफ़ी भी पीने लगे। इस कॉफ़ी के कप में से ही नशीली जिन की तरह कॉफ़ी का जिन्न भी निकल आया। कांग्रेस के ज़माने में इन प्यालों में कई क्रांतियाँ हुईं।।
क्या दिन थे वे! कॉफ़ी हाउस में बैठकर काँग्रेस को कोसा करते थे। जॉर्ज, अटल, लोहिया और चारु मजूमदार की बातें होती थी। वह दिनमान, धर्मयुग और ज्ञानोदय का युग था। साप्ताहिक रविवार जब तक हाथों में नहीं आ जाता, Sunday नहीं मनता था। वह शौरी, सुरेन्द्र प्रताप सिंह, राजेन्द्र माथुर, प्रभाष जोशी और एम जे अकबर का युग था। विपक्ष एकजुट नहीं था, लेकिन जगन्नाथराव जोशी और अटल बिहारी बाजपेयी की आम सभाओं में भारी भीड़ रहती थी। सरकार बुद्धिजीवियों को पुरस्कार और सम्मान दोनों प्रदान करती थी।
लोहिया के अंग्रेज़ी विरोधी आंदोलन ने अंग्रेज़ी के भाव और बढ़ा दिए। वह एनआरआई का नहीं, ब्रेन ड्रेन का ज़माना था। विदेश प्रवास की खबर अखबार में छपती थी, फ़ोटो सहित। अंग्रेज़ी के प्रोफेसर धड़ल्ले से हिंदी में कविता, कहानी, उपन्यास लिख रहे थे, और साहित्य अकादमी और ज्ञानपीठ के चहेते बने हुए थे।।
अंग्रेज़ी सहित्य पर अमेरिकन साहित्य का साया मंडरा रहा था। युद्ध की त्रासदी का असर विश्व साहित्य पर पड़ रहा था। दोस्तोवस्की, सार्त्र, काफ्का और कामू बुद्धिजीवियों की एक नई जमात खड़ी कर रहे थे। कुंठा और संत्रास ने शून्यवाद (nihilism) को जन्म दे दिया था। हेमिंग्वे हीरो wining, dining और concubining का प्रतीक बनकर रह गया था। भारतीय लेखन में भी ये प्रतीक घर कर गए थे। लेखक प्रगतिशील और जनवादी हो चले थे।
ऐसे वक्त में आपातकाल लगा और जेपी ने संपूर्ण क्रांति का बिगुल बजा दिया। दूसरी आज़ादी को लोग ज़ल्द ही भूल गए और अंततः सन 2014 में कांग्रेस-युग का अंत हो गया। देश में पहली बार स्पष्ट बहुमत वाली बीजेपी सरकार का गठन हुआ।।
तब तक गंगा नें बहुत पानी बह चुका था। जेपी की तरह अन्ना भी नेपथ्य में चले गए थे। केजरीवाल दिल्ली में बैठ बीजेपी से किला लड़ा रहे थे। गुजरात का चायवाला 56 इंच का सीना लेकर बनारस पहुँच चुका था। गंगा की सफाई अभियान के साथ स्वच्छ भारत अभियान और कांग्रेस मुक्त भारत का सपना देखा जाने लगा था।
सरकार का समर्थन और विरोध लोकतंत्र में कोई नई बात नहीं! लेकिन लोकतंत्र के इतिहास में पहली बार सत्ता ने विपक्ष के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। गड़े मुर्दे उखाड़े जाने लगे। बुद्धिजीवी भरमाने लगे। विश्व हिंदी सम्मेलन सांस्कृतिक सम्मेलन कहलाने लगे तथा अय्याश मार्क्सवादी बुद्धिजीवी साहित्यकारों से दूरी बनाई जाने लगी।।
बुद्धिजीवी भी सरकार के समर्थन और विरोध में खड़े हो गए। पुरस्कार वापसी ने आग में घी का काम किया और सरकार के समर्थक पद्मश्री और पद्मभूषण से सम्मानित हो गए। आज बुद्धिजीवी मात्र एक गाली बनकर रह गया है। भोली-भाली जनता को सरकार के खिलाफ करने वाला अर्बन नक्सल नहीं तो फिर और क्या है।
समझदारी में कितनी बुद्धि और कितने विवेक का मिश्रण होना चाहिए, 40-60 के अनुपात में जिस देश में ईमानदारी-बेईमानी का मिश्रण होता हो, कहना मुश्किल है। आप अगर समान अनुपात में, बुद्धि का सदुपयोग करते हैं, तो व्यावहारिक और समझदार हैं। इससे कम ज़्यादा में आपके बुद्धिहीन अथवा बुद्धिजीवी होने का खतरा है।।