हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८४५ ⇒ विचार – प्रवाह ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “विचार – प्रवाह।)

?अभी अभी # ८४५ ⇒ आलेख – विचार – प्रवाह ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

बहता पानी निर्मला!

गंगा आये कहां से,

गंगा जाये कहां रे।

लहराये पानी में

जैसे धूप छांव रे।।

हमारे विचारों का प्रवाह भी गंगा के बहते पानी के समान ही है। एक बार अंजुलि में नदी के प्रवाह से जो जल हम भरते हैं, दूसरी बार वह जल नहीं होता। कोई नयी जलधारा हमारे हाथ में नीर समा जाती है। विचारों का आवागमन भी कुछ इसी प्रकार का होता है। जो विचार हाथ लग गया, अर्थात जिसे जब्त कर लिया गया, लिख लिया गया, वह अक्षर बन जाता है, शेष विचारों की आकाश गंगा में प्रवाहित हो जाता है।

नदी का उद्गम पहाड़ होते है।

विचारों का उद्गम मन, बुद्धि, अस्मिता और अहंकार होते है। मन का काम संकल्प विकल्प करना है। बुद्धि हमें सोचने पर मजबूर करती है। अस्मिता हमें संस्कार, परिवार और कुल मर्यादा का स्मरण करवाती है और अहंकार हमारा वर्तमान अस्तित्व है। हमारी राष्ट्रीयता, हमारा नाम, उपाधि और रुतबा सभी जगह अपनी अमिट छाप छोड़ जाता है।।

जागृत अवस्था में तो विचार आना स्वाभाविक है, सुषुप्तावस्था में भी स्वप्न हमारा पीछा नहीं छोड़ते। वहां हमारा मन जाग रहा होता है। केवल गहरी नींद, ध्यान और अचेतावस्था में मन को शांति मिल पाती है। समुद्र की गहराई है गहरी नींद में, और ध्यान में, लेकिन वहां मोती नहीं, सिर्फ सुख चैन है, निर्विकल्प समाधि है।

जितने भी चिंतक, विचारक और दार्शनिक हुए हैं, उनके केवल वे ही विचार मूर्त रूप ले पाए हैं, जो कहीं लिपिबद्ध हुए हैं, उनके भी कई विचार प्रकट ही नहीं हो पाए। बस मन – मन मस्तिष्क में आए और बादलों की तरह बिना बरसे, मंडरा कर चले गए। विचारों का प्रवाह कभी रुकता नहीं, जो हाथ लग गया, वह सूत्र, जो फिसल गया, वह अन्तर्ध्यान।।

विचारों के प्रवाह को रोकना ध्यान कहलाता है। ध्यान करने की कोई विधि नहीं होती। सांस के आने जाने पर ध्यान देने को कहा जाता है। मन पर एक चौकीदार बिठा दिया। ध्यान कर रहे हैं, और ध्यान कहीं और है। पहले सिर्फ दरवाजे पर ध्यान दो। मन की किवड़िया अगर खुली है, तो सजना तो द्वार से प्रवेश करेंगे ही। अगर विचार नहीं, तो संकल्प विकल्प भी नहीं। कोई कविता नहीं, कोई कहानी नहीं, कोई उपन्यास नहीं, कोई महाकाव्य नहीं। विचारों का प्रकटीकरण ही सृजन है।

आनंद और सुख को कोई परिभाषित नहीं कर पाया। गूंगे ने गुड़ चखा, भर पाया। विचार अच्छे भी होते हैं और बुरे भी। वेदव्यास अगर देवताओं के गुरु हैं तो असुरों के शुक्राचार्य भी गुरु हैं। हिटलर, मार्क्स, लेनिन और अरस्तू एक विचार है। आस्तिकता और नास्तिकता विचारों के दो ध्रुव हैं, पूरब और पश्चिम है। विचारों का उगना और अस्त होना ही उनकी नियति है। विचारों से ही इतिहास बनते और बिगड़ते हैं।।

कुछ विचार हमारे होते हैं, कुछ हम किताबों से, कथित महापुरुषों से, हमारे आराध्य ग्रंथों एवं पुराणों से ग्रहण कर लेते हैं और फिर अपने विचार प्रकट करते है। उन पर बहस होती है, विवाद होते है। जब हम सही होते हैं, तो प्रसन्न होते हैं, जब कोई हमें गलत साबित करता है, तो अप्रसन्न होते हैं।

विचारों का दृष्टा बनना भी ध्यान की एक विधि है। मन को विचार से अलग रख पाना ही दृष्टा भाव है। भाव को विचार से श्रेष्ठ माना गया है। विचार चिंतन है, भाव समाधि है। विचार प्रवाह और भाव प्रवाह ऐसी नौकाएं हैं जो हमें संसार रूपी सागर की सैर कराती है। जिन खोजा तिन पाइयां, गहरे पानी पैठ।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३१३ – गीता सुगीता ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३१२ ☆ गीता सुगीता… ?

धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।

मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय।।

अर्थात धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में युद्ध की इच्छा से एकत्रित हुए मेरे और पांडु के पुत्रों ने क्या किया?

यह प्रश्न धृतराष्ट्र ने संजय से पूछा था। यही प्रश्न श्रीमद्भगवद्गीता का प्रथम श्लोक भी है।

18 अध्यायों में विभक्त श्रीमद्भगवद्गीता 700 श्लोकों के माध्यम से जीवन के विभिन्न आयामों का दिव्य मार्गदर्शन है। यह मार्गदर्शन विषाद योग, सांख्य योग, कर्म योग, ज्ञानकर्म-संन्यास योग, कर्म-संन्यास योग, आत्मसंयम योग, ज्ञान-विज्ञान योग, अक्षरब्रह्म योग, राजविद्याराजगुह्य योग, विभूति योग, विश्वरूपदर्शन योग, भक्ति योग, क्षेत्रक्षेत्रज्ञ विभाग योग, गुणत्रयविभाग योग, पुरुषोत्तम योग, दैवासुरसंपद्विभाग योग, श्रद्धात्रय विभाग योग, मोक्षसंन्यास योग द्वारा अभिव्यक्त हुआ है।

योगेश्वर श्रीकृष्ण ने मार्गशीर्ष माह के शुक्ल पक्ष की मोक्षदा एकादशी को गीता का ज्ञान दिया था। गीता जयंती इसी ज्ञानपुंज के प्रस्फुटन का दिन है। इस प्रस्फुटन की कुछ बानगियाँ देखिए-

1) यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन।

न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचराम्।।

अर्थात, हे अर्जुन! सम्पूर्ण प्राणियों का जो बीज है, वह मैं ही हूँ। मेरे बिना कोई भी चर-अचर प्राणी नहीं है।

इस श्लोक से स्पष्ट है कि हर जीव, परमात्मा का अंश है।

2) यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।

तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति।।

अर्थात जो सबमें मुझे देखता है और सबको मुझमें देखता है, उसके लिये मैं अदृश्य नहीं होता और वह मेरे लिये अदृश्य नहीं होता।

3) न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः।

न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम्।।

अर्थात न ऐसा ही है कि मैं किसी काल में नहीं था या तू नहीं था अथवा ये सारे राजा नहीं थे और न ऐसा ही है कि इससे आगे हम सब नहीं रहेंगे।

इसे समझने के लिए मृत्यु का उदाहरण लें। मृत्यु अर्थात देह से चेतन तत्व का विलुप्त होना। आँखों दिखता सत्य है कि किसी एक पार्थिव के विलुप्त होने पर एक अथवा एकाधिक निकटवर्ती उसका प्रतिबिम्ब -सा बन जाता है।

विज्ञान इसे डीएनए का प्रभाव जानता है, अध्यात्म इसे अमरता का सिद्धांत मानता है। अमरता है, सो स्वाभाविक है कि अनादि है, अनंत है।

4) या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।

यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः॥

सब प्राणियोंके लिए जो रात्रि के समान है, उसमें स्थितप्रज्ञ संयमी जागता है और जिन विषयों में सब प्राणी जाग्रत होते हैं, वह मुनिके लिए रात्रि के समान है ।

इसके लिए मुनि शब्द का अर्थ समझना आवश्यक है। मुनि अर्थात मनन करनेवाला, मननशील। मननशील कोई भी हो सकता है। साधु-संत से लेकर साधारण गृहस्थ तक।

मनन से ही विवेक उत्पन्न होता है। दिवस एवं रात्रि की अवस्था में भेद देख पाने का नाम है विवेक। विवेक से जीवन में चेतना का प्रादुर्भाव होता है। फिर चेतना तो साक्षात ईश्वर है। ..और यह किसी संजय का नहीं स्वयं योगेश्वर का उवाच है। इसकी प्रतीति देखिए-

5) वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः।

इंद्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना॥

मैं वेदों में सामवेद हूँ, देवों में इंद्र हूँ, इंद्रियों में मन हूँ और प्राणियों की चेतना हूँ।

जिसने भीतर की चेतना को जगा लिया, वह शाश्वत जागृति के पथ पर चल पड़ा। जाग्रत व्यक्ति ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते’ का अनुयायी होता है।

6) कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।

मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।।

अर्थात कर्म करने मात्र का तुम्हारा अधिकार है, तुम कर्मफल के हेतु वाले मत होना और अकर्म में भी तुम्हारी आसक्ति न हो।

मनुष्य को सतत निष्काम कर्मरत रहने की प्रेरणा देनेवाला यह श्लोक जीवन का स्वर्णिम सूत्र है। सदियों से इस सूत्र ने असंख्य लोगों के जीवन को दिव्यपथ का अनुगामी किया है।

श्रीमद्भगवद्गीता के ईश्वर उवाच का शब्द-शब्द जीवन के पथिक के लिए दीपस्तंभ है। इसकी महत्ता का वर्णन करते हुए भगवान वेदव्यास कहते हैं,

गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्रसंग्रहै:।

या स्वंय पद्मनाभस्य मुखपद्माद्विनिः सृता ।।

(महा. भीष्म 43/1)

श्रीमद्भगवद्गीता का ही भली प्रकार से श्रवण, कीर्तन, पठन, पाठन, मनन एवं धारण करना चाहिए क्योंकि यह साक्षात पद्मनाभ भगवान के  मुख कमल से निकली है।

गीता जयंती के अवसर पर श्रीमद्भगवद्गीता के नियमित पठन का संकल्प लें। अक्षरों के माध्यम से अक्षरब्रह्य को जानें, सृष्टि के प्रति स्थितप्रज्ञ दृष्टि उत्पन्न करें। शुभं अस्तु।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 6 नवम्बर से मार्गशीर्ष साधना आरम्भ होगी। इसका साधना मंत्र होगा – ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 🕉️ 

🕉️ इसके साथ ही हम श्रीमद्भगवद्गीता का पारायण करेंगे। इसमें 700 श्लोक हैं। औसत 24 श्लोक या उनके अर्थ का दैनिक रूप से पाठ करेंगे 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८४४ ⇒ वात और बात ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “वात और बात।)

?अभी अभी # ८४४ ⇒ आलेख – वात और बात ? श्री प्रदीप शर्मा  ? 

शरीर का अपना गुण धर्म होता है। आरोग्य हेतु त्रिदोष अर्थात् कफ, पित्त और वात के निवारण हेतु औषधियों का सेवन भी किया जाता है। वात को एक प्रमुख विकार माना गया है। त्रिफला इसमें बड़ा गुणकारी सिद्ध हुआ है।

सुबह सुबह विकार की चर्चा करना और कुछ नहीं आपका हाजमा ठीक रहे, बस इतनी ही कामना करना है। हम जानते हैं कुछ लोगों का हाजमा इतना अच्छा है कि उन्हें कंकर पत्थर तो क्या, बड़े बड़े पुल और अस्पताल भी खिलाओ तो भी उनके पेट में दर्द नहीं होता। आसान शब्दावली में इसे रिश्वत खाना कहते हैं।।

लेकिन हम आज भ्रष्टाचार नहीं, सामान्य शिष्टाचार की बात कर रहे हैं। जो लोग इतने शरीफ हैं कि एक मूली का परांठा तक खाते हैं तो लोग या तो नाक पर हाथ रख लेते हैं अथवा रूमाल तलाशने लग जाते हैं। एकाएक ओज़ोन की परत कांप जाती है और पर्यावरण अशुद्ध हो जाता है। बस यही, वात दोष अथवा वायु विकार है।

वात विकार की ही तरह कुछ लोगों के पेट में बात भी नहीं पचती। कल रात सहेली ने एक बात बताई और संतोषी माता की कसम दिलवाई कि यह बात किसी को बताना मत, बस, तब से ही पेट में गुड़गुड़ हो रही है। उधर रेडियो पर लता का यह गीत बज रहा है ;

तुझे दिल की बात बता दूं

नहीं नहीं, किसी को बता देगी तू

कहानी बना देगी तू।।

पहले कसम खाना और उसके बाद किसी बात को पचाना क्या यह अपने आप पर दोहरा अत्याचार नहीं हुआ। वात और बात दोनों ही ऐसे विकार हैं, जिनका निदान होना अत्यंत आवश्यक है। यह शारीरिक और मानसिक रोगों की जड़ है। यह एक गंभीर सामाजिक समस्या है। इसे हल्के में नहीं लिया जा सकता।

किसी आवश्यक बात को छुपाना, दर्द को छुपाने से कम नहीं होता। भगवान ने भी हमें कान तो दो दिए हैं और मुंह केवल एक। हमारे कान हमेशा चौकन्ने रहते हैं, सब कुछ सुन लेते हैं। ईश्वर ने पेट भोजन पचाने के लिए दिया है, बातों को पचाने के लिए नहीं। क्या यह हमारे पाचन तंत्र पर अत्याचार नहीं। वात और बात दोनों का बाहर निकलना तन और मन दोनों के लिए स्वास्थ्यवर्धक है।।

ईश्वर बड़ा दयालु है। उसने अगर सुनने के लिए दो द्वार दिए हैं, दांया और बांया कान तो खाने और बात करने के लिए मुख भी बनाया है। जो खाया उसे पचाएं, जो ज्ञान की बातें सुनी, उन्हें भी गुनें, हजम करें। इंसान केवल खाना ही नहीं खाता। और भी बहुत कुछ खाता पीता है। कभी गम भी खाता है, कड़वी बातें भी पचा जाता है, अपमान के घूंट भी पानी समझकर पी लेता है। सावन के महीने में, जब आग सी सीने में, लगती है तो पी भी लेता है, दो चार घड़ी जी लेता है।

वही खाएं, जो हजम हो। वही बात मन में रखें, जिसमें अपना हित हो। पेट और मन को हल्का रखना बहुत जरूरी है। वात और बात के भी दो अलग अलग रास्ते हैं। लेकिन यह संसार मीठा ही पसंद करता है। इसे न तो कड़वे लोग पसंद हैं और न ही वात रोगी। आप मीठा बोल तो सकते हैं लेकिन वात तो वात है। सबकी वाट लगा देता है। आप कितने भी स्मार्ट हों, एक फार्ट सारा खेल बिगाड़ देता है।।

कुछ तो लोग कहेंगे। लोगों का काम है कहना। हम तो कह के रहेंगे जो हमें कहना। कल ही त्रिफला खाया है। जरा दूर ही रहना। फिर मत कहना, बताया नहीं, जताया नहीं, आगाह नहीं किया। सुप्रभात…!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८४३ ⇒ मन की बातें, मन ही जाने ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “मन की बातें, मन ही जाने ।)

?अभी अभी # ८४३ ⇒ आलेख – मन की बातें, मन ही जाने ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

मन रे, तू काहे न धीर धरे ! गोपियों ने तो आसानी से कह दिया, उधो ! मन नहीं दस बीस। मन की शरीर में एक्ज़ेक्ट लोकेशन किसी को पता नहीं है। कभी लोग दिल को मन मान बैठते हैं, तो कभी दिमाग को।

मन संकल्प विकल्प करता है, और दिमाग सोचता है। अगर कभी, मन नहीं करे, तो दिमाग कुछ सोचता भी नहीं। आप कह सकते हैं कि दिल और दिमाग़ पर मन की दादागिरी है।।

अध्यात्म में मन पर लगाम कसने की बात की जाती है। मन बड़ा उच्छ्रंखल है ! साहिर ने मन पर पीएचडी की है ! तोरा मन दर्पण कहलाये। भले बुरे, सारे कर्मों को, देखे और दिखाए। यानी मन, मन ना हुआ, किसी पुराने फिल्मी थिएटर का प्रोजेक्टर हुआ। वह फ़िल्म देखता भी है, और उसे दर्शकों को दिखाता भी है। एक व्यक्ति मन मारकर प्रोजेक्टर चलाता है, हम मन लगाकर फ़िल्म देखते हैं। सही भी तो है ! कहीं हमारा मन लग जाता है, और कहीं हमें मन को मारना पड़ता है।

हमारे शरीर में जितना स्थूल है, वह सूक्ष्म यंत्रों से देखा जा सकता है। दिल, दिमाग़, लिवर और किडनी ! किडनी दो, बाकी तीनों एक एक। दो दो हाथ, दोनों कान, दो ही आँख, और एक बेचारी नाक ! हमारी समझ से बाहर की बात है। दाँतों तले उँगली दबाइए, और उस बनाने वाले का एहसान मानिए।।

जो हमारे अंदर है, लेकिन नहीं नज़र आते, वे मन, चित्त, बुद्धि, और अहंकार हैं। जब हम मन की बात करते हैं, तो कभी उसके विकारों की बात नहीं करते। दुनिया में इतनी बुराई है, कि हमें अपनी बुराई कहीं नजर ही नहीं आती। काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार को मन के विकार माना गया है। भले ही आप इन्हें विकार मानें, लेकिन इनके बिना भी कहीं संसार चला है।

बुद्धि का काम सोच विचार करना है। चित्त और मन को आप अलग नहीं कर सकते ! हमारे लिए तो दिल, चित्त और मन सब एक ही बात है। कौन ज़्यादा मगजमारी करे। हमारी आम भाषा में अगर कहें तो भई दिल को साफ रखो। किसी के प्रति मन में मैल न आने दो और चित्त शुद्धि के प्रति सजग रहो।।

एक गांठ होती है, जिसे प्रेम की गांठ कहते हैं। यह जितनी मजबूत हो, उतनी अच्छी ! दुश्मनी की गांठ अगर ढीली होती जाए, खुलती चली जाए, तो बेहतर। दुश्मनी दोस्ती में बदल जाए, तो और भी बेहतर।

मन में भी गांठ पड़ जाती है ! यह बहुत बुरी होती है। चिकित्सा पद्धति में शरीर की किसी भी गांठ का इलाज है, मन की गांठ का नहीं। प्रेम, भक्ति और समर्पण ही वह संजीवनी औषधि है, जो मन की गांठ को खोल सकते हैं। जब मन मुक्त होता है, मस्त होता है, तब ही ये बोल सार्थक होते हैं;

मन मोरा बावरा !

निस दिन गाए, गीत मिलन के।

चिंता को चिता कहा गया है !

कम सोचो। चिंतन अधिक करो। किसी माँ को कभी मत सिखाना कि चिंता मत करो।

माँ का नाम ही care and concern है। हम भी अगर खुद का खयाल रखें, और थोड़ी बहुत दूसरों की भी चिंता करें, तो कोई बुरा नहीं। मन लगा रहेगा, दिल को तसल्ली मिलेगी और हाँ, थोड़ा बहुत चित्त भी शुद्ध होगा।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २६६ ☆ हरियाली: जीवन का असली प्राण–तत्व… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना हरियाली: जीवन का असली प्राण–तत्व। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख  # २६६ ☆ हरियाली: जीवन का असली प्राण–तत्व

आज के डिजिटल युग में मनुष्य अपनी ही बनाई दौड़ में थककर गिर रहा है, तब प्रकृति हमें एक शांत, स्थिर और सुकून भरी पुकार देती है—

“रुक जाओ… मेरी गोद में आओ… मैं तुम्हें फिर से जीवन दूँगी।”

हरियाली केवल पेड़–पौधों का रंग नहीं है, यह जीवन का मूल भाव है। जिस दिन मनुष्य से पेड़ छिन जाते हैं, उसी दिन उसकी साँस, उसकी शांति, उसका अस्तित्व भी खोने लगता है। इसीलिए कहा जाता है—

“धरती हर बार देती है… बस लेने वाले हाथ हरे होने चाहिए।”

आज पर्यावरण संकट दुनिया की सबसे बड़ी चिंता बन चुका है। प्रदूषण बढ़ रहा है, वर्षा घट रही है, तापमान असंतुलित हो रहा है, और धरती अपनी थकान का इजहार कर रही है। किंतु इससे बाहर निकलने का सबसे सुंदर, सरल और प्रभावी उपाय भी वही है—

प्रकृति।

एक पौधा लगाना किसी दान से कम नहीं। यह ऐसा पुण्य है जिसकी छाया हम नहीं, आने वाली पीढ़ियाँ पाती हैं।

जब हम बीज बोते हैं, तो सिर्फ एक बीज नहीं डालते…

हम धरती की धड़कन में एक नई धुन जोड़ते हैं।

बुज़ुर्ग कहते थे—

“पेड़ हमारी छाया नहीं, हमारी शिक्षा हैं।

सिखाते हैं—स्थिर रहो, देते रहो, और किसी से बदले में कुछ मत माँगो।”

हमारे गाँवों और कस्बों की पहचान कभी उनके बरगद, नीम, पीपल और आम के पेड़ों से होती थी। बच्चे पेड़ों पर खेलते थे, रास्ते में यात्री छाया पाते थे, और घरों में हवा ठंडी बहती थी। पर आज इन पेड़ों की कमी ने हमारे जीवन से ठंडक, ताज़गी और अपनापन छीन लिया है।

समय आ गया है कि हम फिर से प्रकृति को उसके सम्मान की जगह दें।

ग्रीन मोटिवेशन का अर्थ सिर्फ पौधा लगाना नहीं, बल्कि अपनी सोच को हरियाली से भरना है।

घर की छत पर दो गमले लगाना—छोटी शुरुआत भी बड़ा बदलाव लाती है।

बच्चों को पौधों की देखभाल सिखाना—यह उनके चरित्र में संवेदनशीलता बोता है।

प्लास्टिक कम करना और मिट्टी को जगह देना—यही धरती की असली पूजा है।

हर त्यौहार, हर शुभ काम पर एक पौधा समर्पित करना—यह संस्कृति को हरियाली से जोड़ देता है।

हरियाली कोई विकल्प नहीं… यह जीवन का आधार है।

अगर आज पेड़ बचे रहेंगे, तो कल हमारी पृथ्वी सांस ले सकेगी।

अगर आज हम पौधे लगाएँगे, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें धन्यवाद देंगी।

आइए मिलकर एक संकल्प लें—

“जहाँ हम खड़े हों, वहाँ जीवन उगे।”

प्रकृति हमें कभी खाली हाथ नहीं लौटाती।

बस हमें उसके साथ चलने की जरूरत है।

**

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८४२ ⇒ जीवित प्रमाणित ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “जीवित प्रमाणित।)

?अभी अभी # ८४२ ⇒ आलेख – जीवित प्रमाणित ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

हाल ही में, मैं अपने आपको, जीवित घोषित और प्रमाणित करके आया हूं। वैसे तो जीते सभी हैं, लेकिन मनुष्य योनि में मुख्य रूप से योगी, भोगी और रोगी ही जीवित देखे जाते हैं। योगी ईश्वर के लिए जीता है, तो भोगी सौ वर्ष तक सांसारिक सुख भोगना चाहता है, और रोगी की आस, स्वस्थ होने की उम्मीद और जिजीविषा उसे हमेशा जीवित रखती है। केवल एक पेंशनभोगी ही ऐसा प्राणी है, जो सिर्फ़ पेंशन पर जीता है। यानी पेंशन ना हुई, उसकी लाइफ़ सपोर्ट सिस्टम अर्थात् वेंटीलेटर हुई।

डिजिटल युग में घर बैठे ऑनलाइन भी अपने आपको जीवित घोषित किया जा सकता है, इसके लिए बस अपने मोबाइल अथवा डेस्कटॉप पर क्लिक किया, और आप जीवित सिद्ध हुए। जीना आपका जन्मसिद्ध अधिकार है, लेकिन जीवित रहना एक पेंशनभोगी का कर्तव्य भी है, क्योंकि उसे पेंशन जीवित रहने के लिए ही दी जाती है। सेवामुक्ति के पश्चात् आजीवन उसे एक पेंशनभोगी योनि में ही आखरी सांस तक, दिन रात गुजारने हैं।।

पेंशन यूं ही मुफ्त में नहीं मिल जाती, इसके लिए कुछ वर्ष तो गुजारिए परिश्रम और लगन से किसी शासकीय, अर्ध शासकीय दफ्तर में। सस्पेंड होने और टर्मिनेट होने के अंदेशे से अपने आपको बचाते हुए, क्लीन चिट मिलने के पश्चात् ही यह सुनहरा पल एक वेतन भोगी के जीवन में आता है। जो दुनिया में कुछ नहीं कर सकता, केवल वह ही आसानी से नौकरी कर सकता है। केवल कुछ कर गुजरने वाले ही आपसे नौकरी, चाकरी और गुलामी तक करवा लिया करते हैं। पहले आपसे सिर्फ वोट मांगा, और बाद में वामन अवतार की तरह दानवीर बाली को कंगाल कर बैठे।

असली अन्नदाता तो वही है, जो हर व्यक्ति को रोजी रोटी दे, लेकिन कुछ पुण्यात्मा ऐसे भी होते हैं, जो मुफ़्त में राशन, बिजली, पानी और दवा दारू भी बांटा करते हैं, और प्रभु के गुण गाया करते हैं ;

राम की दुनिया, राम का खेत।

खा ले चिड़िया भर भर पेट।।

लेकिन आदमी जिस चिड़िया का नाम है, उसका पापी पेट कभी भरता ही नहीं। कभी ये दिल मांगे मोर, तो कभी एक के साथ एक फ्री। उसे उसके आज की ही नहीं, कल की भी चिंता जो रहती है।।

हम कल की चिंता से मुक्त इसीलिए तो हैं, कि हमें कल भी पेंशन मिलती रहेगी। हमारी पेंशन का संबंध हमारी साँसों से है। बसंती के पाँवों की तरह जब तक हमारी साँसें चलेगी, तब तक हमें भी यकीन है, हमें हमारी पेंशन मिलती रहेगी। पेंशन है तो जीवन है, जीवन है तो पेंशन है। जब पेंशन है तो क्या टैंशन है।

अटेंशन, अटेंशन पेंशनर्स !

जीवन प्रमाण पत्र प्रस्तुत करें, जीना इसी का नाम है।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – क्षण-क्षण ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – क्षण-क्षण ? ?

कविता का एक दिवस होता है। लघुकथा का एक दिवस होता है। कहानी का एक दिवस होता है। नाटक का एक दिवस होता है। नृत्य का एक दिवस होता है। हर विधा, हर कला का एक दिवस होता है। कविता दिवस पर रचता हूँ कविता, लघुकथा दिवस पर लिखता हूँ लघुकथा। जैसा दिन होता है, वैसा सृजन करता हूँ, मैं हूँ जो सबसे हटकर जीता हूँ।

..सुनो,  हर क्षण अनुभूति का होता है। हर क्षण अभिव्यक्ति का होता है। अनुभूति स्वयं चुनती है अभिव्यक्ति। अभिव्यक्ति स्वयं चुनती है अपनी विधा। हर अनुभूति, हर अभिव्यक्ति, हर कला, हर विधा का हर क्षण होता है।

…हर क्षण सृजन का होता है, हर क्षण विसर्जन का होता है। हर क्षण जीवन का होता है और हर क्षण मरण का भी होता है।

याद रहेगा ना…!

?

© संजय भारद्वाज  

सोमवार दि. 30 .05 .2016, संध्या  7:15  बजे

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 6 नवम्बर से मार्गशीर्ष साधना आरम्भ होगी। इसका साधना मंत्र होगा – ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 🕉️ 

🕉️ इसके साथ ही हम श्रीमद्भगवद्गीता का पारायण करेंगे। इसमें 700 श्लोक हैं। औसत 24 श्लोक या उनके अर्थ का यदि दैनिक रूप से पाठ करेंगे 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – आलेख ☆ हँसी की लहरों के पीछे छिपा गहरा विज्ञान: Laughter Yoga ☆ श्री जगत सिंह बिष्ट (लाफ्टर योगा मास्टर ट्रेनर) ☆

श्री जगत सिंह बिष्ट

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

🌷हँसी की लहरों के पीछे छिपा गहरा विज्ञान: Laughter Yoga🤣☆ श्री जगत सिंह बिष्ट ☆

सुबह-सुबह पार्क में लोगों को ज़ोर-ज़ोर से हँसते हुए देखना आजकल आम बात है। दूर से देखने पर यह दृश्य कभी-कभी हास्यास्पद या अटपटा लगता है। लेकिन उन हँसी की लहरों के पीछे एक गहरा विज्ञान छिपा है—Laughter Yoga. यह केवल मज़ा-मस्ती नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित अभ्यास है, जो शरीर, मन और भावनाओं को स्वस्थ बनाने के लिए तैयार किया गया है।

🌷हास्ययोग: बिना कारण हँसने की अनोखी पद्धति

Laughter Yoga (LY) का मूल विचार बहुत सरल है—अगर हँसी स्वास्थ्य के लिए इतनी लाभदायक है, तो इसके लिए चुटकुलों या कॉमेडी का इंतज़ार क्यों करें? क्यों न हँसी को ही एक व्यायाम बना दिया जाए!

इसी सोच से LY की शुरुआत हुई। इसमें हँसी को स्वेच्छा से, छोटे-छोटे अभ्यासों और childlike playfulness के ज़रिये पैदा किया जाता है। इसमें हास्य की ज़रूरत नहीं, बस हँसने की इच्छा और समूह का माहौल चाहिए।

मज़ेदार बात यह है कि शरीर असली और बनावटी हँसी में फर्क नहीं करता। हँसी शुरू होते ही शरीर वैसी ही प्रतिक्रिया देता है—लाभ तुरंत मिलते हैं।

डॉ. एंड्रयू वील के शब्दों में:

“Laughter oxygen बढ़ाता है, immunity को मज़बूत करता है, दर्द कम करता है, stress घटाता है और दिल की बीमारी, diabetes, arthritis, migraine और cancer से रक्षा करता है। यह technique सुरक्षित, सीखने में आसान, और मज़ेदार है।”

🌷नॉर्मन कज़िन्स की कहानी: हँसी से दर्द पर विजय

अमेरिकी लेखक नॉर्मन कज़िन्स की कहानी ने दुनिया भर का ध्यान हँसी की चिकित्सा शक्ति की ओर खींचा। रीढ़ की एक गंभीर बीमारी से जूझते हुए उन्होंने पाया कि दस मिनट की दिल खोलकर की गई हँसी उन्हें दो घंटे की pain-free नींद देती थी।

उनके अनुभव के बाद वैज्ञानिकों ने शोध किया और पता चला कि हँसी शरीर में endorphins—यानी प्राकृतिक painkillers—को बढ़ाती है। कज़िन्स हँसी को “internal jogging” कहते थे, क्योंकि इससे शरीर के अंगों में हलचल होती है, साँस गहरी होती है और उम्मीद की ऊर्जा एवं उमंग पैदा होती है।

🌷हँसी एक व्यायाम है: विज्ञान क्या कहता है

डॉ. विलियम फ्राय ने शोध करके बताया कि हँसी शरीर की ज़्यादातर प्रणालियों को सक्रिय कर देती है। वे कहते हैं,

“Mirthful laughter अच्छा physical exercise है और respiratory infections का खतरा कम करता है।”

Loma Linda University के डॉ. ली बर्क ने पाया कि हँसी stress hormones को घटाती है और immunity को मजबूत करती है।

यूनिवर्सिटी ऑफ मैरीलैंड के कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. माइकल मिलर ने खोजा कि हँसी blood vessels को फैलाती है, जिससे blood circulation बढ़ता है और cardiovascular disease का खतरा कम होता है।

इसलिए यह कहना बिल्कुल सही है कि दस मिनट की जोरदार हँसी तीस मिनट की रोइंग मशीन पर exercise के बराबर होती है।

🌷Motion Creates Emotion: मन और शरीर का गहरा संबंध

1884 में मनोवैज्ञानिक विलियम जेम्स ने बताया कि शरीर और मन एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं। अगर मन खुशी पैदा करता है, तो शरीर प्रतिक्रिया देता है; और अगर शरीर खुशी का अभिनय करे, तो मन में भी वही भावना पैदा होती है।

यही सिद्धांत Laughter Yoga की रीढ़ है। जब हम कृत्रिम रूप से भी हँसना शुरू करते हैं, तो कुछ ही मिनटों में दिमाग में खुशी की लहरें बनने लगती हैं। बच्चों जैसे हाव-भाव, ताली बजाना, “हो-हो, हा-हा-हा” जैसे chanting—ये सब मन को स्वतः प्रसन्न अवस्था में ले जाते हैं।

मन और शरीर का यह मेल LY की सच्ची शक्ति है।

🌷हँसना भी एक Skill है

LY का एक और सिद्धांत है कि laughter can be programmed into your body. यानी हँसना एक skill की तरह सीखा जा सकता है। जैसे साइकिल चलाना या तैरना सीख लिया तो जीवन भर भूलते नहीं, वैसे ही एक बार हँसी का अभ्यास सीख लें, तो शरीर खुद उसे याद रखता है।

नियमित अभ्यास से दिमाग में नए neuronal connections बनते हैं, जो happy chemistry पैदा करते हैं। फिर भले ही कोई कारण न हो, मन हल्का और प्रसन्न रहता है।

🌷लोगों के सान्निध्य में हंसना

न्यूरोसाइंटिस्ट रॉबर्ट प्रोवाइन ने बताया कि हम ज़्यादातर बार किसी मजाक पर नहीं, बल्कि लोगों के साथ होने पर हँसते हैं। दोस्त से “हैलो, कैसे हो?” कहने भर से भी हल्की हँसी आती है—क्योंकि हँसी सामाजिक व्यवहार है।

इसका एक कारण है Mirror Neurons—हमारे दिमाग की वे कोशिकाएँ जो दूसरों की भावनाओं की नकल कर लेती हैं। किसी को हँसते देख कर हमारा मन भी हँसी की ओर खिंचता है।

मनोवैज्ञानिक पॉल एक्मैन और रॉबर्ट लेवेनसन ने यह भी पाया कि “put on a happy face” सच में काम करता है। चेहरा मुस्कुराता है, तो मन में भी खुशी पैदा होती है। यही प्रक्रिया आप हर सुबह हँसी क्लबों में देख सकते हैं।

🌷शरीर को फर्क नहीं पड़ता कि हँसी असली है या नकली

चार्ल्स शेफ़र का शोध बताता है कि

“Forced laughter adults के लिए mood और mental well-being बढ़ाने का एक सस्ता, सरल और प्रभावी तरीका है। शरीर को नहीं पता कि हँसी बनावटी है—even though your brain might know.”

बस हँसी शुरू होनी चाहिए, उसके बाद शरीर अपना काम खुद कर लेता है—endorphins बढ़ते हैं, stress घटता है और मन हल्का हो जाता है।

🌷“Joy Cocktail”: हँसी से उठने वाली सकारात्मक तरंगें

Laughter Yoga Movement के जनक डॉ. मदन कटारिया बताते हैं कि नियमित हँसी से शरीर में happiness, warmth, unconditional love, bonding, tolerance, forgiveness, generosity और compassion जैसे गुणों से भरे hormones और neuropeptides निकलते हैं। वे इसे प्यार से “joy cocktail” कहते हैं।

शायद यही वजह है कि Laughter Clubs का माहौल परिवार जैसा लगता है—लोगों में अपनापन, जुड़ाव और सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है।

और डॉ. कटारिया का प्रसिद्ध वाक्य—

“When you laugh, you change; and when you change, the whole world changes.”

—लाफ्टर योग की आत्मा को पूरी तरह व्यक्त करता है।

🌷सरल लेकिन गहरा अभ्यास

पहली नज़र में Laughter Yoga एक हल्का-फुल्का खेल लगता है, पर वास्तव में यह मनोविज्ञान, शरीर-विज्ञान, न्यूरोसाइंस और योग का सुंदर संगम है। यह शरीर में oxygen बढ़ाता है, मन से विषाद हटाता है, immunity मजबूत करता है, भावनाओं को संतुलित करता है और समाज में खुशियों के पुल बनाता है।

हँसी सिर्फ मनोरंजन नहीं—यह स्वास्थ्य और सुख की ओर ले जाने वाली एक पूरी यात्रा है।

 #laughteryoga #हास्ययोग

 © जगत सिंह बिष्ट

लाफ्टर योगा मास्टर ट्रेनर

LifeSkills

A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.

The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and training.

Please feel free to call/WhatsApp us at +917389938255 or email lifeskills.happiness@gmail.com if you wish to attend our program or would like to arrange one at your end.

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ४३ ☆ आलेख – जिजीविषा… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख  – “जिजीविषा“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ४३ ☆

✍ आलेख – जिजीविषा… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

वैज्ञानिकों का मत है कि करीब बीस अरब वर्ष पहले एक बड़े धमाके के साथ सृष्टि का वर्तमान क्रम चालू हुआ।  तारों में सौर मंडल, उसमें पृथ्वी का जन्म, फिर उसका ठंडा होना, जल ऊपर आना और प्रारंभिक जीव वनस्पतियों का उद्गम। अनुमान यह है कि मछली से मानव तक कुल विकास गत 60 करोड़ वर्षों का है। इस विकास क्रम का भी अपना इतिहास है। कहते हैं कि प्रत्येक जीव जंतु का शरीर कोशिकाओं का गोदाम है और सभी कोशिकाओं तक ऑक्सीजन तथा खाद्य अणु पहुंचाना और फालतू कचरा बाहर निकालना शरीर द्वारा होता है। व्यवस्था और प्रणाली भिन्न भिन्न हैं परंतु मैलिक कार्य में कोई अंतर नहीं है। धरती पर प्रजनन सर्व प्रथम पानी में ही हुआ और उसके बाद गीली और फिर सूखी भूमि पर। ऑक्सीजन प्राप्त की जाती रही पर बाद में श्वसन प्रणाली भी विकसित हुई। अनुभूति इंद्रियां, हृदय, स्मृति सबका विकास हुआ परंतु इच्छा कैसे पैदा हुई और उसका विकास क्रम का पता नहीं।

बिना इच्छा के तो कुछ होता ही नहीं परंतु जीने की इच्छा का क्या मतलब। जन्म हुआ है तो जीना ही पड़ेगा। फिर जीने की इच्छा हो या न हो, जीना ही होगा। परंतु फिर भी जीने की इच्छा है और वह सदा जीने की, अमर होने की। आध्यात्मिक मत है कि यह सृष्टि ब्रह्म से पैदा हुई, उसकी एक से अनेक होने की इच्छा हुई और वह अनेक हो गया। क्यों हुआ यह कोई नहीं जानता। लाभ हानि के हिसाब से अच्छी बुरी इच्छा का वर्गीकरण भी हुआ। आज संसार में जो कुछ दिखाई देता है वह मानव इच्छा का ही परिणाम है। इच्छा प्रकट करने के लिए भाषा बनी, लिखना शुरू हुआ। विभिन्न ग्रंथ लिखे गए। सभ्यता बनीं, सिद्धांत बने। रहने के लिए महल बने। चलने के लिए सड़क बनीं और उन चलने के लिए अनेक वाहन। भूमि कम पड़ी तो जल और आसमान में भी वाहन चलने लगे। फिर भी इच्छा पूरी नहीं हुई।एक पैदा होती है और उसके पूरी होने पर दूसरी सामने आकर खड़ी हो जाती है।

आध्यात्मिक गुरु कहते हैं कि इच्छा त्यागो, जबकि यह कहना भी एक अच्छा है।  मृत्यु होने पर संसार से छुटकारा मिल जाता है परंतु फिर भी मुक्ति की इच्छा है। किससे मुक्ति की इच्छा? यह भी तो एक इच्छा है। औरों की सुधारने की इच्छा भी बड़ी प्रबल होती है। अमर होने की इस इच्छा ने कितने जीव जंतुओं मानवों का विनाश किया है, इसका कोई हिसाब नहीं।  उत्पत्ति सृष्टि है अपने आप होती है और विनाश किया जाता है जो इच्छा से होता है।  अब जीने की इच्छा को अदम्य साहस के रूप में भी देखा जाने लगा है। फिर भी इच्छा का उत्स नहीं पता।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८४१ ⇒ छोटे-बड़े सपने ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “छोटे-बड़े सपने।)

?अभी अभी # ८४१ ⇒ आलेख – छोटे-बड़े सपने ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

कुछ लोग स्वप्नदृष्टा होते हैं !। वे देश के लिए बड़े-बड़े सपने देखते रहते हैं। सपने देखने के लिए चैन की नींद जरूरी है। कोई आपका स्वप्न भंग न कर दे। इसलिए वे सख्त हिदायत देकर सोते हैं। देश के लिए बड़ा सपना देख रहा हूँ। do not disturb.

फिल्मों की तरह ही होते हैं ये सपने ! कभी बहुत बड़े, कभी बहुत छोटे। सपने देखने के पहले, रुपहले पर्दे पर यह लिखा हुआ नहीं आता, फ़िल्म कितने रील की है। अच्छी है या बुरी, इसकी कोई समीक्षा पहले नहीं होती। एकदम लाइव टेलीकास्ट शुरू हो जाता है।।

कोई फ़िल्म सपनों का सौदागर जैसी वाहियात निकल जाती है तो कोई मेरा नाम जोकर जैसी उत्कृष्ट फ़िल्म। देशभक्त लोग, देशहित में यादगार और यलगार जैसी फिल्में सपनों में देखना पसन्द करते हैं। एक बार तो सपने में चेतक पर सवार, महाराणा प्रताप बन नाला पार कर रहे थे। चेतक का पाँव फिसल गया और उनकी नींद टूट गई, वे पलंग के नीचे गिरे हुए थे।

बड़े सपने देखना इतना आसान भी नहीं होता। एक मच्छर भी आपके सपनों को चूर-चूर कर सकता है। सपनों के लिए मच्छरदानी एक मुफ़ीद जगह है अगर सपना ज़्यादा डरावना न हुआ तो। जो डरते हैं, उन्हें सपने कम देखना चाहिए। जिन्हें कुर्सी छिन जाने का डर है, उन्हें कुर्सी पर बैठकर सपने नहीं दिखाना चाहिए। जनता जागरूक है।।

रात लंबी ज़रूर होती है लेकिन और लंबी हो जाती है, जब चैन की नींद नहीं आती। जो सत्ता में हैं, उन्हें विपक्ष के सपने आते हैं। विपक्ष को तो सपने में भी कुर्सी ही नज़र आती है। चैन की नींद में या तो सपने आते ही नहीं, और अगर आते भी हैं तो अक्सर सुहाने ही होते हैं, बहारों के सपने होते हैं। चुनावी जीत के ढोल में खलल पड़ता है, जब मोबाइल की घंटी अचानक बज उठती है।

समय की माँग है कि बड़े बड़े सपने ना तो देखे जाएँ, और न ही दिखाए जाएँ ! छोटे छोटे सपने ज़्यादा रात भी ख़राब नहीं करते। आखिर सपनों को पूरा करने के लिए जागना भी तो ज़रूरी है। सपना देखना बुरा नहीं, लेकिन झूठे सपने दिखाना अपराध ज़रूर है।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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