हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ “चंद्र विजय अभियान” – संकल्प संपादक : आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆ समीक्षा – श्री हिमकर श्याम ☆

पुस्तक चर्चा ☆ “चंद्र विजय अभियान” – संकल्प संपादक :  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆ समीक्षा – श्री हिमकर श्याम

कृति : चंद्र विजय अभियान (काव्य संकलन)

संकल्प संपादक : आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ 

प्रकाशन: समन्वय प्रकाशन अभियान

मूल्य: ११०० /-

पृष्ठ: ३०० 

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

☆ इसरो की ऐतिहासिक उपलब्धि को समर्पित काव्य संकलन ‘चंद्र विजय अभियान’ — श्री हिमकर श्याम ☆

चांद और साहित्य का गहरा संबंध रहा है। चांद को अक्सर प्रेम, रहस्य, और कल्पना के प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। चांद का सौंदर्य हमेशा से ही कवियों, लेखकों और शायरों को लुभाता रहा है। कभी चांद मामा बन जाता है तो कभी चांद को महबूब की उपमा दे दी जाती है। चांद मनुष्य का आदिम सहयात्री है। हर किसी को चांद ने लुभाया है। अपनी तरफ आकर्षित किया है।

साहित्य ही नहीं भारतीय संस्कृति, धर्म, ज्योतिष शास्त्र में चंद्रमा महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। वैदिक, ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद्, वेदांग, पुराण, रामायण, महाभारत, जैन एवं बौद्ध साहित्य की सामग्रियों से चन्द्रमा के देवत्व को स्थापित करने का सफल प्रयास किया गया है। धार्मिक जीवन में एवं विश्व की प्रायः सभी धार्मिक परम्पराओं में व्रत, पूजा, अनुष्ठान आदि में चंद्रमा की पूजा की पूजा प्रचलित रही है। विज्ञान कहता है कि चंद्रमा पृथ्वी का एकमात्र प्राकृतिक उपग्रह है। अरबों साल पहले एक बड़ा ग्रह पृथ्वी से टकराया था। इस टक्कर के फलस्वरूप चांद का जन्म हुआ। अपोलो -11 के अंतरिक्ष यात्री नील आर्म स्ट्रांग ने चांद पर पहला कदम रखा था।

चंद्रमा पर भारतीय मेधा की दस्तक विषमयकारी है। चांद पर पानी भारत की खोज है। भारत के लिए 23 अगस्त की तारीख महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक है। इसी दिन इसरो के चंद्रयान-3 ने चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर सॉफ्ट लैंडिंग कर इतिहास रच दिया था। चंद्रयान मिशन की सफलता हर भारतीय का मस्तक गर्व से ऊँचा करने वाली है। बहुभाषीय काव्य-संकलन ‘चन्द्र विजय अभियान’ इसरो की ऐतिहासिक उपलब्धि को समर्पित है।

विश्व कीर्तिमान रचनेवाले इस अनूठे संकलन का प्रकाशन हाल ही में ‘विश्ववाणी हिन्दी संस्थान द्वारा  किया गया है। आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ इस पुस्तक के संकल्पक-सम्पादक हैं। पुस्तक पर की गई उनकी मेहनत का आभास इसे हाथ में लेते ही हो जाता है। 300 पृष्ठों के इस संकलन में 5 देशों, 51 भाषा-बोलियों में 213 रचनाकारों की काव्य रचनाएं संकलित हैं। इसमें महत्वपूर्ण संकलन में झारखण्ड के कई रचनाकारों की रचनाएं संकलित की गई हैं, जिनके नाम हैं- निर्मला कर्ण, नीता शेखर ‘विषिका, पुष्पा पांडे, मनीषा सहाय, सिम्मी नाथ और हिमकर श्याम (राँची), डॉ संगीता नाथ और प्रियदर्शनी पुष्पा (धनबाद), ई. ब्रजेन्द्र नाथ मिश्र और वीणा कुमारी नंदिनी (जमशेदपुर)। गीता चौबे ‘गूँज’ (बेंगलुरु) भी झारखंड से हैं।

पुरोवाक् में आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ने लिखा है कि ‘चन्द्र विजय अभियान’, भारत ही नहीं मानवता का महाअभियान है। आमुख डॉ साधना वर्मा का है और भूमिका लिखी है गीतिका श्रीव ने। संकलन में सबसे वरिष्ठ कवि 94 वर्षीय तथा सबसे कनिष्ठ कवि 12 वर्षीय हैं। संकलन में गीत, नवगीत, बाल गीत, कजरी गीत, पद, मुक्तक, गीतिका, मुक्तिका, पूर्णिका, गजल, हाइकु, माहिया, दोहे, सोरठे, कुण्डलिया, कहमुकरी आदि काव्य-विधाओं में अनुपम एवं पठनीय रचनाएं हैं।

बैक कवर पर चन्द्रयान पर यशवर्धन श्रीवास्तव, मयंक वर्मा, वर्तिका खरे, खंजन सिन्हा और अर्जिता सिन्हा द्वारा बनाई गई सुंदर तस्वीरें हैं। दो पृष्ठों पर चन्द्रयान की सफलता के नायक/नायिका इसरो के वैज्ञानिकओं एवं अभियन्ताओं के नाम और रंगीन छाया-चित्र हैं, जो उनके प्रति श्रद्धा भाव को दर्शाता है। समन्वय प्रकाशन, जबलपुर से छपी इस किताब का डिजाइन, पृष्ठ सज्जा, रंग रूप और छपाई आकर्षक है। 1100/- रुपये मूल्य की यह संग्रहणीय पुस्तक हर साहित्य प्रेमी के संग्रह की शोभा बढ़ाने योग्य है।

समीक्षा – आचार्य प्रताप

साभार – समन्वय प्रकाशन अभियान, जबलपुर, मध्यप्रदेश 

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ ☆ “समकाल की आवाज ” – कवि… श्री हरभगवान चावला ☆ समीक्षा – श्री जयपाल ☆

श्री जयपाल

 

(सुप्रसिद्ध लेखक श्री जयपाल जी पंजाब शिक्षा विभाग से सेवानिवृत्त अध्यापक हैं। आपका एक कविता संग्रह ‘दरवाजों के बाहर‘  आधा प्रकाशन  से प्रकाशित। (इस संग्रह पर कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र में शोधकार्य), कुछ कविताएं पंजाबी में  अनुदित (पुस्तक रूप में प्रकाशित)।पत्र-पत्रिकाओं में लगातार रचनाएं प्रकाशित। देस-हरियाणा पत्रिका (कुरुक्षेत्र) के सह संपादक  प्रदेशाध्यक्ष- जनवादी लेखक संघ हरियाणा।

आज प्रस्तुत है श्री हरभगवान चावला जी द्वारा लिखित काव्य संग्रह  “समकाल की आवाजपर चर्चा।

“समकाल की आवाज ” – कवि… श्री हरभगवान चावला ☆ समीक्षा – श्री जयपाल ☆

पुस्तक चर्चा

समकाल की आवाज ( चयनित कवितायें)

कवि– श्री हरभगवान चावला (9354545440)

कीमत-175/- रुपये (पेपरबैक)

प्रकाशक–न्यू वर्ड पब्लिकेशन, नई दिल्ली (8750688053)

☆ मानवीय संवेदना,प्रेम और विद्रोह की कविताएं – श्री जयपाल

इस हफ्ते हिंदी साहित्य के बहुचर्चित और प्रतिबद्ध कवि हरभगवान चावला की कविताओं से गुजरना हुआ । यह एक अलग तरह का एहसास था,एक आत्मीय अनुभूति थी। ये कविताएं ‘समकाल की आवाज़’- चयन के तहत ‘न्यू वर्ड पब्लिकेशन’- नई दिल्ली, के प्रयास से प्रकाश में आई हैं। इन कविताओं के चयन के संदर्भ में खुद प्रकाशक अफ्रीकी कवि कुमालो के हवाले से कहते हैं —

कवि हमें ऐसी कविताओं की जरूरत है

कविताएं

जो आतताइयों के चेहरे पर

सीधा वार करती हों

और उनके गरूर को तोड़ती हों

 

कवि

इससे पहले कि यह दशक भी

अतीत में गर्क हो जाए

तुम जनता के बीच जाओ और

जन संघर्षों को आगे बढ़ाने में

मदद करो

प्रकाशक की इस घोषणा में एक संवेदनशील साहित्यकार की तड़प दिखाई देती है । प्रकाशक समकालीन साहित्यिक सृजन से ऐसी कविताओं से पाठक को रूबरू कराना चाहते हैं जिनमे न केवल अपने समय की  धड़कन हो बल्कि एक दायित्व और  बौद्धिक ईमानदारी भी मौजूद हो , कवितायें जो अपने समय के गंभीर सवालों के द्वंद्व से गुजरी हों l यह द्वंद्वात्मकता और दृढ़ता समकाल  की कविताओं के चयन में दिखाई देती हैं।  कवि हरभगवान चावला स्वयं अपनी  कविता के बारे में कहते हैं–

‘हर तरह के शोषण का विरोध तथा मानव संवेदना की प्रतिष्ठा । प्रेम शायद मेरी कविता की रीढ़ है । कईं बार  तड़प उठती है कि सारी व्यवस्था को बदल दूँ ताकि कोई भूखा न हो । अनपढ़ न हो,शोषण का शिकार न हो। जाति या धर्म से इतर इंसान ,बस इंसान हो । इंसानी संवेदना से लबरेज । क्या कविता चीजों को बदल सकती है–? नहीं ,लेकिन कविता चीजों को देखने का नजरिया बदल देती है ।कविता को डूबकर पढ़ने के बाद आदमी ठीक वैसा नहीं रहता जैसा वह कविता पढ़ने के पहले होता है।’

इन कविताओं को पढ़ते हुए बार-बार ऐसा ही एहसास  पाठक को भी होता है । ये कविताएं समाज का मार्मिक दस्तावेज  हैं ।

इस संग्रह की शुरुआत लोक जीवन की कविताओं से होती है । इन कविताओं में कवि के लोक-जीवन के प्रति गहरे अनुराग को अभिव्यक्ति  मिली है ।  लोकगीतों के तंज,ताने और उलाहने ,लोक जीवन की गंध तथा सादगी के साथ यहां आये हैं। इसके अतिरिक्त इन कविताओं में जल का संकट, पर्यावरण के प्रति व्यवस्था की लापरवाही, जल-जंगल जमीन के बारे में पूंजीवाद की निर्ममता, मजदूर और किसान की  बदहाली, दलितों और अल्पसंख्यकों के प्रति नफरत ,आस्था-विश्वास, धर्म, संस्कृति, भाषा जाति, संप्रदाय, क्षेत्र आदि के नाम पर देश में गुंडागर्दी को सत्ता का समर्थन, संविधान और लोकतंत्र का दमन, लेखकों,पत्रकारों, कलाकारों और बुद्धिजीवियों की सरकार के प्रति चाटुकारिता ,वैश्विक दक्षिण-पंथी उभार, देश में फासीवाद का खतरनाक खेल, अंधविश्वास, पाखण्ड और अज्ञान का निर्लज्ज महिमामंडन आदि समसामयिक सामाजिक सरोकारों के मुद्दों को प्रतिबद्धता  और चुनौतीपूर्ण  स्वर के साथ उठाया गया है। इन ज्वलंत प्रश्नों को एक सशक्त आवाज देती हुई उनकी कुछ कविताओं की महत्वपूर्ण पंक्तियों की बानगी आप भी लिजिए–

चावल में

 गंगा के हरे भरे मैदानों का स्वाद था

 दाल में

 रेतीली मिट्टी की मिठास

 

 मेरी चुनरी उड़ गयी

 संभाल मेरी बिटिया

आकाश चढ़ी चुनरी

 जुल्म हुआ बिटिया !

 

तेरे गीतों में भी मैं ही रहूंगी बनी

कैसे जा पाऊंगी मैं समूची ससुराल

 

ऐसे न मुझको भेज री माई

दे दे मुझको दहेज री माई

अपने हाथ की मठरी देना

 यादों की एक गठरी देना

आंसू अपने सहेज री माई

 

आया सहेली मगसर री

बाबुल का तन थरथर री

कर्ज का दर्द सताए सखी री

बाबुल मरता जाए सखी री

उसका जीवन जंग सखी री

लड़ने का यही ढंग सखी री

 

पर दुष्यंत हैं

कि उन्हें न शकुंतलाएं याद हैं

न प्रेम- निशानियां

 

ये विधवाएं हैं

कुल कलंकिनी, पति भक्षिणी

अपने-अपने घरों से निष्कासित

गृहस्वामिनियां

 

पाप मुक्ति के लिए

कुंभ से ज्यादा अच्छा अवसर

और मंदिर की सीढ़ियों से बेहतर जगह

भला कौन सी हो सकती हैं ?

 

कुम्भ में छूटी औरतें बूढ़ी होती हैं

ये बूढ़ी औरतें अपने बेटों के सिरों पर

पाप की गठरी की तरह लदी होती हैं

 

 वर्तमान जिनके नियंत्रण में है वे जब चाहें

गढ़ लेते हैं चमचमाता मनोनुकूल अतीत

 

मैंने दिल्ली से एक सवाल पूछा

जवाब मेरे शहर से मिले बहुत सारे

 पत्थरों और गालियों की शक्ल में

 

भेड़ें अपनी मस्ती में

देशभक्ति के गीत गाएं

और भेड़ियों को

शांति से अपना काम करने दें

 

ईंधन की मानिंद भट्टियों में

झोंक दिए जाते हैं जिंदा इंसान

तुम्हारी कविता को गंध नहीं आती

कहां से लाते हो तुम

अपनी कविता की ज्ञानेन्द्रियां कवि..?

 

 कभी मिलो

जैसे धूप में जलते पौधे से

पानी मिलता है

 

एक दिन जरूर डरना छोड़ देंगे

डर के जंगल में फंसे लोग

 

बाज की आँखें सपने नहीं

शिकार देखती हैं

 

बोनों का ईश्वर भी बोना ही होता है

 

 ईश्वर मर गया मरना ही था उसे

उसके मर जाने के बाद भी उम्मीदें जिंदा रही

 

तुझे कहां कहां से बेदखल करूं

तूं कहां नहीं है मौजूद

 

न लिखना कि गांव में आने लगी हैं

साधु संतों की यात्राएं

ओ पिता !

कोई अच्छी खबर लिखना

 

कविता अगर उगती है

तो उगे जैसे घास उगती है

 

कविता अगर उतरती है

तो उतरे पेड़ पर जैसे पक्षी उतरता है

 

कविता लिपि से नहीं  होती

वह तो जीवन से संभव होती है

 

राजा होना बेशक ईश्वर होना नहीं है

पर इंसान होना राजा होने की अनिवार्य शर्त है

 

सूरज उन घरों में

कभी नहीं झांक पाता

महानायक

जिन घरों के चिराग़ बुझा देते हैं

 

भूखे हो

प्यासे हो

बीमार हो

 लाचार हो

जैसे भी हो गर्व करो

 

जूते जब एक ही नाप के बनने लगे

तो लोगों ने पैर कटवा कर नाप के अनुरूप कर लिए

 मुझे लगा पैर कटवाने से बेहतर है नंगे पांव चलना

 

जैसे जैसे बढ़ती है ग्रामीण स्त्रियों की उम्र इनकी गोद बड़ी होती जाती है

आंखें उदास

 

 ईश्वरीय किताबों में आग होती है

पानी नहीं होता

ईश्वरीय किताबें स्त्री विरोधी होती है

और शूद्र विरोधी भी

ईश्वरीय किताबों पर राजा गर्व करते हैं

 

 ईश्वरीय किताब का ईश्वर

जब किताब से निकल प्रजा में आता है

 तो आग्नेय अस्त्र में बदल जाता है

 

आजादी को हमने कभी निर्जन वन की घास या

पेड़ की तरह नहीं जिया

 

 मैं अपने घर में था

ठीक उसी वक्त जंगल में भी

जंगल के पेड़ मेरे घर की चीजों में थे जंगल के जानवर मेरे भीतर

 

जब तक हम पहुँचेंगे पंजाब

क्या तब तक भी बचा रहेगा

पंजाब के दरियाओं का पानी

छंद/अलंकार/बिम्ब/प्रतीक / वक्रोक्तियां/ शब्द/अर्थ /वाक्य /पद / मुहावरे/ लोकोक्तियां/कला/संगीत  आदि  सभी प्रकार के आवरणों को हटाकर ये कवितायें पाठक से एकांत में आकर मिलती हैं। दरअसल कविता मे जीवन होता है और जीवन में कविता । स्वयं कवि मानते हैं कि कविता लिपि में नहीं, जीवन से सम्भव होती है । इन कविताओं को कविता के व्याकरण से बाहर आकर ही समझा जा सकता है। ये कवितायें पाठक को  आत्मविश्वासी, आत्मीय,  अन्याय के प्रति विद्रोही, सामाजिक परिवर्तन के प्रति क्रांतिकारी ,इंसानियत के प्रति समर्पित, ईमानदार, संवेदनशील और वैज्ञानिक चेतना से लैस एक बेहतर इंसान बनाती हैं ।  इन कविताओं को जीवन में उतारा जा सकता है,जिया जा सकता है और एक बेहतर समाज की उम्मीद को जिंदा रखा जा सकता है। यही इन कविताओं की सार्थकता है।

बेहतरीन कविता-संग्रह के लिए कवि हरभगवान चावला को बहुत बहुत-बहुत बधाई!!

समीक्षा-… श्री जयपाल 

संपर्क- 112-ए /न्यू प्रताप नगर, अम्बाला शहर( हरियाणा)-134007 – फोन-94666108

jaipalambala62@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # 186 ☆ “शब्दिका…” – रचनाकार : डॉ. संजीव कुमार ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है डॉ. संजीव कुमार जी द्वारा लिखित  शब्दिकापर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# 186 ☆

☆ “शब्दिका…” – रचनाकार : डॉ. संजीव कुमार ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

पुस्तक चर्चा

पुस्तक : शब्दिका

रचनाकार : डॉ. संजीव कुमार

चर्चा : विवेक रंजन श्रीवास्तव, भोपाल

☆ “शब्दिका”: शब्दों की शास्त्रीय यात्रा – – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

हिंदी के काव्यशास्त्र के अनुसार कविता की मूल्यवत्ता ध्वनि, रस, अलंकार, वक्रोक्ति, औचित्य आदि तत्वों में निहित होती है, जबकि पश्चिमी आलोचना उसे भाव, संरचना, प्रतीकात्मकता, भाषा की प्रामाणिकता से आँकती है। डॉ. संजीव की रचनाएँ इन दोनों परिप्रेक्ष्यों के संतुलन का उदाहरण प्रस्तुत करती हैं। उनकी कविताएं न तो मात्र भाववाचक हैं और न ही बौद्धिक चातुर्य का प्रदर्शन, बल्कि अनुभव, संवेदना और सामाजिक बोध का बहुआयामी संगम हैं। काव्य और कविता के मूलभूत तत्व संग्रह की सभी कविताओं में समान रूप से मुखरित दिखते हैं।

“हम शब्द हैं”, यह कविता शब्दों की अस्मिता की खोज है। शब्द न केवल संप्रेषण के माध्यम हैं, बल्कि वे स्वयं भी अर्थ की तलाश में भटकते हैं।

“हम शब्द हैं

जो खोज रहे हैं

अपना भविष्य…”

यहाँ संजीव कुमार शब्द का मानवीकरण (personification) करते है। यह प्रतीकात्मक कविता है, जो साहित्यिक सृजन-प्रक्रिया को शब्दों की दृष्टि से देखने का प्रयास करती है। कविता आत्मचिंतनात्मक है तथा आत्मकथात्मक प्रतीकों में ढली हुई है। विषयवस्तु (Content & Themes) की दृष्टि से रचनाएं उद्देश्य पूर्ण हैं।

“खुशनुमा दुनिया” यह कविता इंद्रिय बोधात्मक सौंदर्य की अभिव्यक्ति है। यहाँ गंध और अनुभूति का सामंजस्य शब्दों में मिलता है।

 “सोचने की

कोई सीमा नहीं होती…”

यह कविता ध्वनि, रस और अनुभूति का सुंदर समन्वय है। ‘खुशनुमा’ नवोन्मेष शब्द-सृजन की दृष्टि से उल्लेखनीय प्रयोग है।

“घर की गली” यह कविता स्थान विशेष के माध्यम से सामाजिक विषमताओं और घटनाओं को बयां करती है।

यह प्रसंगबद्ध यथार्थवाद (Contextual Realism) है। कवि बालक, चोर, महिला, और गली जैसे प्रतीकों का सहारा लेकर नग्न यथार्थ को चित्रित किया गया है।

“अनुशासन” यह कविता शिक्षा-दर्शन और सामाजिक मूल्य-परिवर्तन की पड़ताल करती है।

 “बच्चों की ज़िन्दगी

कितनी अच्छी होती है

उन्हें नहीं पता

कि अनुशासन क्या है…”

कविता में विरोधाभास (Paradox) का सौंदर्य है, अनुशासन, जो सकारात्मक मूल्य है, उसे बच्चों की मासूम स्वतंत्रता के सापेक्ष रखकर गंभीर विचार प्रस्तुत किया गया है।

शिल्प (Form & Craft) की चर्चा की जाए तो डॉ. संजीव की कविता का शिल्प सधा हुआ और नियंत्रित है। वे छंदमुक्त काव्य के माध्यम से आधुनिकता को आत्मसात करते हैं, परंतु उनके शिल्प में काव्यात्मक संतुलन की झलक बनी रहती है।

पंक्तियाँ छोटी हैं, किंतु उनमें अर्थ की गहराई है।

ध्वनि-सौंदर्य है, प्रतीक और बिंब की शक्ति से कविता प्रभावशाली बनती है।

संवेदना और विषय की संगति स्पष्ट है। कोई पंक्ति अनावश्यक नहीं लगती।

कविताओं की भाषा शैली (Language and Style) में संजीव कुमार का अध्ययन तथा अनुभव एक साथ परिलक्षित होता है। वे कविता में अपनी भाषा सरल, व्यावहारिक, और संवादात्मक बनाए रखते है , यही उनकी विशेषता है।

कविता में कही कृत्रिमता नहीं होती, बल्कि वे पूरी प्रामाणिकता से लिखते है।

कवि अपने पाठक से प्रत्यक्ष वार्तालाप करता है, जिससे संप्रेषण में आत्मीयता बनती है।

अलंकार एवं काव्य-सौंदर्य (Aesthetic Devices) की विवेचना भी आवश्यक है।

प्रमुख अलंकारों का प्रयोग दक्षता पूर्वक मिलता है। “हम शब्द हैं” पूरे शीर्षक में ही रूपक है।

“शब्द खोज रहे हैं भविष्य” में शब्दों को मानवीय व्यवहार देकर उनका सक्षम मानवीकरण किया गया है, किताब का शीर्षक ही शब्दिका रखा गया है।

“अनुशासन से आज़ादी” का मूल्यांकन करें तो विरोधाभास की ताकत का उपयोग आकर्षक है।

“घर की गली” में दृश्यात्मक चित्रण परिलक्षित होता है।

अलंकारों की योजना संयमित है। जो प्रभाव छोड़ती है। कविताओं में रस और संवेदना का स्तर ( Emotional Appeal) कवि की लेखकीय क्षमता

बताता है। करुण रस ‘घर की गली’ में नारी की पीड़ा, शांत रस ‘खुशनुमा दुनिया’ में जीवन की कोमल अनुभूति। श्रृंगार और वात्सल्य रस ‘अनुशासन’ में बालक के प्रति सहज प्रेम के भाव दृष्टि गोचर होते हैं, जो पाठक को काव्य गत आनंद प्रदान करते हैं।

रसनिष्पत्ति के लिए कवि भाव को लय से अधिक महत्वपूर्ण मानता है। यह आधुनिक काव्य की प्रवृत्ति है।

विषय वैविध्य  उच्च काव्य-संवेदना, भाषा शैली, स्पष्ट, सहज प्रतीकात्मकता, प्रभावशाली प्रेरक, स्थायी प्रभाव अंकित करने वाली काव्यशास्त्रीय कसौटी पर संतुलित एवं सुसंगत रचनाएं काव्य संग्रह शाब्दिका को संग्रहणीय बनाती हैं।

“शब्दिका” समकालीन हिंदी कविता का महत्वपूर्ण संग्रह है जिसमें काव्य की संज्ञा, सजगता और संस्कार तीनों समाहित हैं। यह संग्रह न तो यांत्रिक आधुनिकता की शिकार है, न ही परंपरागत बोझ से किसी भी तरह दबा हुआ है। इसमें सर्जनात्मक आत्मा की उपस्थिति है, जो न केवल शब्दों के माध्यम से अर्थ रचती है, बल्कि पाठक के अंतर्मन में अनुभूति की मन प्रफुल्लित करती लहरें उत्पन्न करती है।

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ “यादों का बक्सा…” – लेखक… श्री आलोक श्रीवास्तव धीरज ☆ चर्चा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆

श्री यशोवर्धन पाठक

 

यशोवर्धन की पुस्तक चर्चा ☆

☆ “यादों का बक्सा…” – लेखक… श्री आलोक श्रीवास्तव धीरज ☆ चर्चा – श्री यशोवर्धन पाठक

पुस्तक चर्चा

पुस्तक – यादों का बक्सा

लेखक – श्री आलोक श्रीवास्तव धीरज

प्रकाशक – पाथेय प्रकाशन 

☆ यादों का बक्सा – माडल स्कूल की गौरवगाथा का ऐतिहासिक दस्तावेज श्री आलोक श्रीवास्तव धीरज का–श्री यशोवर्धन पाठक ☆

मध्यप्रदेश की संस्कारधानी में स्थित शासकीय माडल स्कूल का एक गौरवशाली इतिहास रहा है और अगर आप अपने मन में इस अखिल भारतीय ख्याति प्राप्त लब्ध- प्रतिष्ठ शिक्षा संस्थान के स्वर्णिम काल की मनोहर झांकी से रूबरू होने की उत्कट अभिलाषा रखते हैं तो आपको मध्यप्रदेश सरकार में अपर कलेक्टर के पद से सेवानिवृत्त श्री आलोक श्रीवास्तव धीरज की हाल में ही प्रकाशित किताब यादों का बक्सा का आद्योपांत पारायण करना चाहिए। श्री आलोक श्रीवास्तव माडल स्कूल के भूतपूर्व छात्र हैं और हम दोनों ने एक साथ माडल स्कूल से हायर सेकंडरी स्कूल परीक्षा उत्तीर्ण की थी। श्री श्रीवास्तव की यह कृति दर असल माडल स्कूल का ऐसा यश अर्चन ग्रंथ है जो शिक्षा जगत की हर लायब्रेरी का अनिवार्य हिस्सा बनने में समर्थ है। आलोक जी ने विगत दिनों अपना यह बहुमूल्य ग्रंथ मुझे भेंट किया था जिसे पढ़कर मेरे मानस पटल पर अंकित अपने छात्र जीवन की मधुर स्मृतियां जीवंत हो उठीं। मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि उनका यह ग्रंथ एक ऐसा संग्रहणीय दस्तावेज है जिसे माडल स्कूल के हर छात्र को अपने पास भली-भांति सहेजकर रखना चाहिए। ‘यादों का बक्सा’ को खूबसूरत बनाने के लिए श्री श्रीवास्तव ने जो कठिन साधना की है उसके लिए वे असीम प्रशंसा और साधुवाद के हकदार हैं।

भाई आलोक श्रीवास्तव ने अपने इस बेशकीमती ग्रंथ में माडल स्कूल की स्थापना से लेकर अब तक की सारी दुर्लभ जानकारी प्रस्तुत करने की ईमानदार कोशिश की है और अपनी इस कोशिश में वे पूर्णतः सफल हुए हैं। इस अर्थ में इसे अगर एक बहुमूल्य ऐतिहासिक दस्तावेज कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। देश विदेश में माडल स्कूल का नाम रोशन करने वाले अनेक भूतपूर्व छात्रों के संस्मरणात्मक लेख इस ग्रंथ में प्रमुखता से प्रकाशित किए गए हैं जो माडल स्कूल के सभी स्वनामधन्य भूतपूर्व प्राचार्यों सहित समस्त गुरुजनों के श्रद्धापूर्वक यश अर्चन की भावना से प्रेरित हैं। ‘यादों का बक्सा ‘ में प्रमुखता से प्रकाशित अपने लेख में शाला के भूतपूर्व छात्र और मप्र शासन के जनसंपर्क विभाग में अपर संचालक के पद से सेवानिवृत्त श्री हर्षवर्धन पाठक कहते हैं कि “जिन शासकीय शिक्षा संस्थानों में शिक्षा प्राप्त करना अथवा शिक्षण कार्य करना सम्मान और प्रतिष्ठा की बात समझी जाती थी उनमें माडल हाई स्कूल का नाम अग्रणी पंक्ति में था। इस विश्वास को कीर्ति तथा उपलब्धियों के शिखर तक पहुंचाने वाले मनस्वी शिक्षाविदों में स्वर्गीय शिव प्रसाद निगम प्रमुख थे। ” श्री पाठक के अनुसार स्वर्गीय श्री निगम ने लगभग डेढ़ दशक तक इस प्रतिष्ठित विद्यालय की कमान संभाली और वह समय इस शिक्षण संस्थान का ‘स्वर्णकाल’ कहा जा सकता है। मध्यप्रदेश शासन के लोक शिक्षण विभाग के संचालक पद से सेवानिवृत्त श्री श्यामानुज प्रसाद वर्मा अपने संस्मरणात्मक लेख में माडल हाई स्कूल की गौरवगाथा का सजीव चित्रण करते हुए कहते हैं ” मेरे जीवन में जो भी सफलता प्राप्त हुई है उसमें माडल स्कूल का बड़ा योगदान है। जब कभी कालेज में शिक्षक मेरी किसी सफलता पर प्रश्न पूछते थे कि किस स्कूल से आए हो तो मैं सगर्व उत्तर देता था कि जबलपुर के माडल हाई स्कूल से। ” इसमें दो राय नहीं हो सकती कि माडल हाई स्कूल ने अपने हजारों भूतपूर्व छात्रों को देश विदेश में गर्व के साथ यह कहने का सौभाग्य प्रदान किया है कि उन्होंने जबलपुर के माडल हाई स्कूल से विद्यालयीन शिक्षा प्राप्त की है।

”यादों का बक्सा ” का आद्योपांत पारायण करने के पश्चात् ही आप यह जान पायेंगे कि 1904 में सीमित संसाधनों के साथ जिस माडल स्कूल की नींव रखी गई थी वह अपनी प्रगति यात्रा में कितने महत्वपूर्ण पड़ाव तय करते हुए कालांतर में देश के सुप्रतिष्ठित शिक्षा संस्थानों की अग्रणी पंक्ति में विशिष्ट स्थान अर्जित करने का हकदार बना। ” यादों का बक्सा” में प्रकाशित, माडल हाई स्कूल के संस्थापक पं. लज्जा शंकर झा का हस्तलिखित पत्र माडल स्कूल की स्थापना से लेकर स्वर्गीय श्री शिव प्रसाद निगम के प्राचार्य काल तक की प्रगति यात्रा का प्रामाणिक दस्तावेज है। निःसंदेह इस पत्र ने ” यादों का बक्सा ” की खूबसूरती में चार चांद लगा दिए हैं और सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार एवं गोविंद राम सेक्सरिया अर्थ वाणिज्य महाविद्यालय जबलपुर के पूर्व प्राचार्य डॉ कुन्दन सिंह परिहार ने इस अनमोल ग्रंथ के प्रकाशन पर हर्ष व्यक्त करते हुए अपनी सम्मति में लिखा है ” मुझे खुशी है कि संस्था के पूर्व छात्र श्री आलोक श्रीवास्तव ने शाला के प्रति अपने ऋण के शोधन के लिए यह पुस्तक लिखने का निर्णय लिया। ” मैं उनके कथन से पूर्णतः सहमत हूं परन्त मैं यह भी मानता हूं कि माडल स्कूल के ऋण शोधन की भावना से किया गया बड़े से बड़ा कार्य भी भूतपूर्व छात्रों को माडल स्कूल के ऋण से उऋण नहीं कर सकता। जैसा कि डॉ परिहार कहते हैं कि इस संस्था के प्रति कृतज्ञता महसूस करना उसके पूर्व छात्रों के लिए स्वाभाविक है। सही अर्थों में ‘ यादों का बक्सा ‘ कृतज्ञता ज्ञापन का ही एक विनम्र प्रयास है जिसके लिए मैं एक बार पुनः श्री आलोक श्रीवास्तव को साधुवाद देना चाहता हूं। ” पाथेय प्रकाशन ” द्वारा प्रकाशित यह ग्रंथ शिक्षा जगत के लिए अनमोल उपहार सिद्ध होगा।

 ………………

© श्री यशोवर्धन पाठक

पूर्व प्राचार्य, राज्य सहकारी प्रशिक्षण संस्थान,  जबलपुर

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # 185 ☆ “माधवी (खंड काव्य)…” – कवी – डा संजीव कुमार ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है कवी – डा संजीव कुमार  जी द्वारा लिखित  माधवी (खंड काव्य)पर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# 185 ☆

“माधवी (खंड काव्य)…” – कवी – डा संजीव कुमार ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

पुस्तक चर्चा

पुस्तक – माधवी (खंड काव्य)

कवी – डा संजीव कुमार

प्रकाशक इंडिया नेटबुक्स, नोएडा

 

☆ एक दार्शनिक एवं सांस्कृतिक अन्वेषण – – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

महाभारत के माधवी-गालव प्रसंग पर लिखित डा संजीव कुमार के खंड काव्य माधवी की चर्चा मैं तीन कोणों से करना चाहता हूं। विज्ञान, वर्तमान स्त्री विमर्श के संदर्भ, और तीसरा मात्र महाभारत के कथा रूप में।

महाभारत के उद्योग पर्व में वर्णित “माधवी-गालव प्रसंग” विलक्षण गाथा है, जिसमें स्त्री के आत्मबलिदान, ब्रह्मतेज और पुरुष अहंकार के टकराव का चित्रण है। यह प्रसंग गालव ऋषि और ययाति की पुत्री माधवी के माध्यम से समाज की सत्ता-संरचना, गुरु-शिष्य परंपरा, और स्त्री की मर्यादा पर एक दार्शनिक विमर्श प्रस्तुत करता है।

गालव ऋषि, अपने गुरु विश्वामित्र को गुरु-दक्षिणा स्वरूप “श्वेत अश्व, जिनके एक कान पर श्याम चिह्न हो, आठ सौ अश्व” ऐसे ही देना चाहते थे।

 “अष्टशतानि मे देहि गच्छ गालव माम् चिरम्॥”

(महाभारत, उद्योग पर्व)

इस असंभव कार्य की पूर्ति हेतु जब गालव असमर्थ हुए, तब ययाति पुत्री माधवी ने आगे बढ़कर अपने अद्वितीय वरदान कुंवारीत्व को बार-बार पुनः प्राप्त करने की क्षमता का उपयोग करने की अनुमति दी।

यह तत्कालीन स्त्री स्वायत्तता का अनूठा उदाहरण है। माधवी तीन राजाओं हंस, दिवोदास और उशीनर से विवाह कर, प्रत्येक को एक वीर पुत्र प्रदान करती है। बाद में वह स्वयं पुनः ब्रह्मचर्य के पथ पर वन लौट जाती है।

 “प्रसुःत्यन्ते प्रसुत्रन्ते कन्यैव त्वं भविष्यसि॥”

(तू पुत्र जनने के पश्चात फिर से कन्या हो जाएगी)

इस प्रकार माधवी का चरित्र समर्पण और मौन प्रतिरोध का प्रतीक बन जाता है। वह किसी की दासी नहीं, वरन् एक निर्णायक है, जिसने राष्ट्रों को वारिस दिए और फिर वन गमन को चुना। गालव का तप अंततः माधवी के त्याग के सहारे सफल होता है।

किंतु माधवी की व्यथा, उसका मौन, और उसका वनगमन एक प्रश्नचिन्ह बना कर पाठकों के अंतर्मन को झकझोर देता है।

 “वैरम् व्रीवति वनम् धर्म बृह्मचर्येण संवृतम् ॥”

(उसने संसार त्याग वन को वरण किया, धर्म और ब्रह्मचर्य से युक्त होकर)

यह प्रसंग नारी की शक्ति और संवेदना का समन्वय है। माधवी ‘द्रौपदी’ की भांति प्रतिरोध नहीं करती, परंतु गांधारी की तरह उसका मौन ही युगों तक गुंजायमान है। यह कथा केवल स्त्री-पुरुष के संबंधों का आख्यान नहीं, बल्कि एक समाजशास्त्रीय और नैतिक विमर्श भी है जहाँ त्याग सबसे बड़ा धर्म बनता है और स्त्री, इतिहास की गूढ़ संचालक।

माधवी-गालव प्रसंग महाभारत के उन अध्यायों में से है जहाँ वैदिक ऋचाएँ, समाज का सत्य, और स्त्री का आत्म-बलिदान एक साथ गुंथे हुए हैं।

माधवी का प्रसंग आज के स्त्री विमर्श में एक गूढ़ और मार्मिक प्रतीक के रूप में उभरता है। वह महाभारत की एक ऐसी स्त्री है जो अपने निर्णय स्वयं लेती है, भले ही वे पराकाष्ठा के स्तर पर त्यागमय हों। माधवी अपने वरदान का उपयोग गालव की सहायता हेतु करती है। उसका यह आत्म उत्सर्ग उसे ‘वस्तु’ नहीं, ‘कर्ता’ बनाता है।

वर्तमान स्त्री विमर्श में जब “एजेंसी”, “कंसेंट”, “बॉडी ऑटोनॉमी” तथा ” सेरोगेसी” जैसे विचार अति प्रबल हैं, जब लोकाचार बार बार तार तार हो रहे हैं, जब नव विवाहिताएं पति की हत्या करवा रही हैं, जब वासना पक्ष इतना प्रबल होता जा रहा है कि विवाहिता देशों की सीमाएं लांघकर ऑनलाइन प्रेमियों के पास भाग रही हैं, जब मर्यादा खंड कर सास दामाद के साथ भागने वाले कांड कर रही हैं तब माधवी की कथा यह प्रश्न उठाती है, कि क्या त्याग भी सशक्तिकरण हो सकता है? माधवी न तो विद्रोह करती है, न ही किसी मंच से भाषण देती है, परंतु उसका मौन, उसका निर्णय, उसकी तपस्या एक अदृश्य प्रतिरोध है।

आज की स्त्री अपने निर्णयों में स्वतंत्र होना चाहती है, चाहे वह करियर हो या मातृत्व। माधवी उस स्वतंत्रता की आदिम अभिव्यक्ति है। वह चार राजाओं से विवाह कर, पुत्र उत्पन्न कर, स्वयं पुनः ब्रह्मचर्य धारण करती है, यह उसकी शारीरिक, मानसिक और सामाजिक स्वतंत्रता का प्रतीक है।

माधवी की गाथा कहती है कि स्त्री केवल करुणा नहीं, चेतना है। वह केवल पात्र नहीं, परिप्रेक्ष्य है।

डा संजीव कुमार ने इस परिप्रेक्ष्य को पुनर्जागृत किया है।

वे लिखते हैं

“माधवी दुखी थी

वह नहीं सोच पा रही थी

कि अपने जीवन को सफल समझे या असफल

यह तो जैसे

किराये की कोख बेचनेवाली बन गई थी वह

दो सौ घोड़ों के प्रतिकर पर।

 

मातृत्व किसी स्त्री का नया जीवन होता है

एक तो वह नौ महीने का गर्भधारण और असहनीय प्रसव पीड़ा से अपने तन का टुकड़ा संतान के रूप में जन्म देगी,

और फिर जुड़ जाता है उसका तन-मन उसका अस्तित्व अपनी संतान के लिए वह बारंबार उसे छाती से लगाती है उसे चूमती और अपना दूध पिलाती है।

माधवी दूध पिला रही है अपने नवजात

को

पर उसे छोड़कर जाना होगा यह संतान भी।

कवि की कल्पनाशीलता उनकी स्वयं की साहित्यिक स्वतंत्रता है।

हो सकता है, यदि मैं माधवी गालव प्रसंग पर लिखता तो शायद मैं माधवी के भीतर छुपी उस माँ को लक्ष्य कर लिखता जो बारम्बार अपनी कोख में संतान को नौ माह पालने के बाद भी लालन पालन के मातृत्व सुख से वंचित कर दी जाती है। गालव बार बार उसका दूध आंचल में ही सूखने को विवश कर उसे क्रमशः नये नये राजा की अंकशायनी बनने पर मजबूर करता रहा।

मैं भोपाल में मीनाल रेजीडेंसी में रहता हूं, सुबह घूमने सड़क के उस पार जाता हूं। वहाँ हाउसिंग बोर्ड ने जो कालोनी विकसित की है, उसका नामकरण अयोध्या किया गया है, एक सरोवर है जिसे सरयू नाम दिया गया है। हनुमान मंदिर भी बना हुआ है, कालोनी के स्वागत द्वार में भव्य धनुष बना है। मैं परिहास में कहा करता हूं कि हजारों वर्षों के कालांतर में कभी इतिहासज्ञ वास्तविक अयोध्या को लेकर संशय न उत्पन्न कर देँ।

दुनियां में अनेक स्थानो पर जहां भारतीय बहुत पहले बस गये हैं जैसे कंबोडिया, फिजी आदि वहां राम को लेकर कुछ न कुछ साहित्य विस्तारित हुआ है, कुछ स्थापत्य, नृत्य, लोक रचनाएं आदि देखने सुनने मिलती हैं और समय समय पर तदनुरूप चर्चायें विद्वान अपने शोध में करते रहते हैं। इसी भांति पढ़ने, सुनने से जो भ्रम निर्मित होते हैं उसका एक रोचक उदाहरण बच्चों की एक बहस में मिलता है। एक साधु कहीं से गुजर रहे थे, उन्हें बच्चों की बहस सुनाई दी। कोई बच्चा कह रहा था मैं हाथी खाउंगा, तो कोई ऊंट खाने की जिद कर रहा था, साधु का कौतुहल जागा कि आखिर यह माजरा क्या है, यह तो शुद्ध सनातनी मोहल्ला है। उन्होंने दरवाजे पर थाप दी, भीतर जाने पर वे अपनी सोच पर हंसने लगे दरअसल बच्चे होली के बाद शक्कर के जानवरों को लेकर लड़ रहे थे।

किसी महाकाव्य के अंश को नए स्वरूप में समग्र से काटकर देखने की सीमा होती है, जिससे ऐसे भ्रम बनते हैं, यह खतरा विद्वान साहित्यिक कृतियों में उठाते रहते हैं। यह सब मैं इसलिये कह रहा हूं क्योंकि डॉ संजीव कुमार ने खण्ड काव्य माधवी को रचकर यह जोखिम उठाया है।

इससे पहले इसी प्रसंग पर कर्म भूमि से तपोवन तक उपन्यास भी मैने पढ़ा था जिसकी लेखिका संतोष श्रीवास्तव जी हैं।

दुनियां में विभिन्न संस्कृतियों में भौतिक साक्ष्य और समानांतर सापेक्ष साहित्य के दर्शन होते हैं। भारतीय संस्कृति अन्य संस्कृतियों से कहीं अधिक प्राचीन है। रामायण और महाभारत भारतीय संस्कृति के दो अद्भुत महा ग्रंथ हैं। इन महान ग्रंथों में धार्मिक, पौराणिक, ऐतिहासिक और दार्शनिक, आध्यात्मिक और वैचारिक ज्ञान की अनमोल थाथी है। महाभारत जाने कितनी कथायें उपकथायें ढ़ेरों पात्रों के माध्यम से न्याय, शिक्षा, चिकित्सा, ज्योतिष, युद्धनीति, योगशास्त्र, अर्थशास्त्र, वास्तुशास्त्र, शिल्पशास्त्र, कामशास्त्र, खगोलविद्या के गुह्यतम रहस्यों को संजोये हुये है। परंपरागत रूप से, महाभारत की रचना का श्रेय वेदव्यास को दिया जाता है। धारणा है कि महाभारत महाकाव्य से संबंधित मूल घटनाएँ संभवतः 9 वीं और 8 वीं शताब्दी ईसा पूर्व के बीच की हैं। महाभारत की रचना के बाद से ही अनेकानेक विद्वान सतत उसकी कथाओ का विशद अध्ययन, अनुसंधान, दार्शनिक विवेचनायें करते रहे हैं। वर्तमान में अनेकानेक कथावाचक देश विदेश में पुराणो, भागवत, रामकथा, महाभारत की कथाओ के अंश सुनाकर समाज में भक्ति का वातावरण बनाते दिखते हैं। विश्वविद्यालयों में महाभारत के कथानकों की विवेचनायें कर अनेक शोधार्थी निरंतर डाक्टरेट की उपाधियां प्राप्त करते हैं। प्रदर्शन के विभिन्न माध्यमो में ढ़ेरों फिल्में, टी वी धारावाहिक, चित्रकला, साहित्य में महाभारत के कथानकों को समय समय पर विद्वजन अपनी समझ और बदलते सामाजिक परिवेश के अनुरूप अभिव्यक्त करते रहे हैं।

न केवल हिन्दी में वरन विभिन्न भाषाओ के साहित्य पर महाभारत के चरित्रों और कथानको का व्यापक प्रभाव परिलक्षित होता है। महाभारत कालजयी महाकाव्य है। इसके कथानकों को जितनी बार जितने तरीके से देखा जाता है, कुछ नया निकलता है। हर समय, हर समाज अपना महाभारत रचता है और उसमें अपने अर्थ भरते हुए स्वयं को खोजता है। डा संजीव कुमार ने भी महाभारत पढ़ी, समझी, उसके ऐसे अनेक कथानक चुने और उन्हें वर्तमान से जोड़ते हुए किताबों पर किताबें रच डालीं। वे बधाई के सुपात्र हैं।

महाभारत पर अवलंबित हिन्दी साहित्य की रचनायें देखें तो डॉ॰ नरेन्द्र कोहली का प्रसिद्ध महाकाव्यात्मक उपन्यास महासमर, धर्मवीर भारती का अंधा युग, आधे-अधूरे, संशय की रात, सीढ़ियों पर धूप, माधवी (नाटक), शकुंतला (राजा रवि वर्मा), कीचकवधम, युगान्त, आदि जाने कितनी ही यादगार पुस्तकें साहित्य की धरोहर बन गयी हैं।

महाभारत से छोटे छोटे कथानक लेकर अनेकानेक रचनायें हुईं हैं जिनमें रचनाकार ने अपनी सोच से कल्पना की उड़ान भी भरी है। इससे निश्चित ही साहित्य विस्तारित हुआ है। किन्तु इस स्वच्छंद कल्पना के कुछ खतरे भी होते हैं।

उदाहरण स्वरूप रघुवंश के एक श्लोक की विवेचना के अनुसार माहिष्मती में इंदुमती प्रसंग में कवि कुल शिरोमणी कालिदास ने वर्णन किया है कि नर्मदा, करधनी की तरह माहिष्मती से लिपटी हुई हैं। अब नर्मदा के प्रवाह के भूगोल की यह स्थिति मण्डला में भी है और महेश्वर में भी है। दोनो ही शहर के विद्वान स्वयं को प्राचीन माहिष्मती सिद्ध करने में जुटे रहते हैं। साहित्य के विवेचन विवाद में वास्तविकता पर भ्रम पल रहा है।

इस खंड काव्य का सारांश भूमिका में कथा सार के रूप में सुलभ है। महाभारत के उद्योग पर्व के अनुसार राजा ययाति जब अपने सबसे छोटे पुत्र पुरु को उसका यौवन लौटाकर वानप्रस्थ ग्रहण कर चुके होते हैं तभी गालव उनसे काले कान वाले ८०० सफेद घोड़ों का दान मांगने आता है। ययाति जिनका सारा चरित्र ही विवादस्पद रहा है, वे अपने पुत्र से उसका यौवन ले सकते हैं, अपनी पुत्री माधवी के अक्षत यौवन का उपयोग कर सकते है। वे गालव को ऐसे विशिष्ट अश्व तो नहीं दे सकते थे, क्योंकि वे राजपाट पुरु दे चुके थे। अपनी दानी छबि बचाने के लिये वे गालव को अपनी अक्षत यौवन का वरदान प्राप्त पुत्री माधवी को ही देते हैं, और गालव को अश्व प्राप्त करने का मार्ग बताते हैं कि माधवी को अलग अलग राजाओ के संतानो की माँ बनने के एवज में गालव राजाओ से अश्व प्राप्त कर ले।

यह सारा प्रसंग ही आज के सामाजिक मापदण्डों पर हास्यास्पद, विवादास्पद और आपत्तिजनक तथा अविश्वसनीय लगता है। मुझे तो लगता है जैसे हमारे कालेज के दिनों में यदि ड्राइंग में मैने कोई सर्कल बनाया और किसी ने उसकी नकल की, फिर किसी और ने नकल की, नकल की तो होते होते सर्कल इलिप्स बन जाता था, शायद कुछ इसी तरह ये असंभव कथानक किसी मूल कथ्य के अपभ्रंश न हों।

कभी कभी मेरे भीतर छिपा विज्ञान कथा लेखक सोचता है कि महाभारत के ये विचित्र कथानक कहीं किसी गूढ़ वैज्ञानिक रहस्य के सूत्र वाक्य तो नहीं। ये सब अन्वेषण और शोध के विषय हो सकते हैं।

इतने अश्वों का विश्वामित्र जैसे तपस्वी करेंगे क्या? उनके आश्रम का तपोवन तो अश्वों से ही भर जाएगा। ” “

मेरा विज्ञान कथा लेखक इशारा करता है कि कही यह यूरेनियम का कोड वर्ड तो नहीं ? कहीं वे कोई अस्त्र तो नहीं बना रहे थे? खैर।

डा संजीव कुमार का यह एक और साहित्यिक सुप्रयास स्तुत्य है। यह उनकी साहित्यिक वर्दी पर एक और बड़ा तमगा है। मन झिझोड़ने वाला असहज कथानक है। स्वयं पढ़ें और स्त्री विमर्श पर तत्कालीन स्थितियों और आज के परिदृश्य का अंतर स्वयं आकलित करें।

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # 184 ☆ “‘म से माँ’ …” – नई दुनिया समूह की प्रस्तुति ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है नई दुनिया समूह की प्रस्तुति  ‘म से माँ’ पर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# 182 ☆

☆ “‘म से माँ’ ” – नई दुनिया समूह की प्रस्तुति ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

पुस्तक चर्चा

पुस्तक – म से माँ…”

नई दुनिया समूह की प्रस्तुति 

☆ ‘म से माँ’ – एक भावनात्मक श्रद्धांजलि – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

भारतीय मीडिया जगत में जागरण समूह केवल समाचार प्रसारक नहीं, सांस्कृतिक संवाहक भी है। सामाजिक सरोकारों को जनमंच तक पहुंचाने की अपनी जिम्मेदारी वे पूरे समर्पण से उठाते रहे हैं। वे केवल व्यवसायिक दृष्टिकोण से ऊपर, अखबार के माध्यम से पाठकों के परिवार के सदस्य वाली भूमिका निभाते नजर आते हैं।

माँ ईश्वर का प्रतिरूप है, प्रकृति के सिवाय केवल मां में नव सृजन की क्षमता ईश्वर ने दी है।

माँ का स्नेह निस्वार्थ, त्याग अद्वितीय और आशीर्वाद अमूल्य होता है। वह केवल जन्म नहीं देती, संस्कार भी देती है। माँ हर दुःख की ढाल, हर सुख की मुस्कान है। जीवन की पहली गुरु, पहला शब्द, पहला स्पर्श, सब कुछ माँ से ही प्रारंभ होता है। इसी मां के महत्व को प्रतिपादित करने के लिए दुनियां भर में मदर्स डे मनाया जाता है।

‘म से माँ’ नई दुनिया समूह के पाठकों के उसी अनुभव का सजीव चित्रण है। श्रद्धा, स्मृति और संवेदना को टेबल बुक के स्वरूप में साकार रूप देकर अदभुत कार्य किया गया है।

एक्जिक्यूटिव प्रेसिडेंट देवेश गुप्ता ने उनके संदेश में माँ की सार्वभौमिकता का सम्मान व्यक्त करते हुए उन्होंने माँ की ममता को संस्कृति, भाषा, और परंपरा से जोड़ते हुए लिखा है कि “माँ केवल नाम नहीं, भावना है”। यह पुस्तक उनके लिए एक माध्यम है उस ऋण को चुकाने का, जो हम सभी माताओं के प्रति संजोए हुए हैं, किंतु शब्दों में व्यक्त नहीं कर पाते। सीईओ संजय शुक्ला ने माँ को एक सम्पूर्ण संस्था लिखा है। उन्होंने ‘माँ’ को भारतीय मानसिकता की आत्मा बताया है। पुस्तक की प्रस्तावना नरेश पांडे, हेड ऑपरेशंस ने लिखी है वे लिखते हैं मां आस्था है

नरेश पांडे जी ने प्रस्तावना को एक सजीव स्मृति चित्र की तरह लिखा है, जिसमें माँ किसी कल्पना या चित्र का नाम नहीं, बल्कि जीवन के प्रत्येक निर्णय के पीछे की मौन उपस्थिति है।

वे स्पष्ट करते हैं कि इस संग्रह में सम्मिलित रचनाएँ किसी एक माँ के लिए नहीं, हर माँ के लिए एक सामूहिक नमन हैं। वह माँ जो कभी स्वयं की भूमिका को नहीं गिनती, बस निभाती रहती है।

संग्रह में स्वयं मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव, अध्यक्ष विधान सभा नरेंद्र सिंह तोमर, अनूप जलोटा, कई प्रशासनिक अधिकारी, अनेक लेखक, लेखिकाएं, पाठकों ने संस्मरण, लघुकथा, काव्य विधाओं में अपने विचार साझा किए हैं।

सरिता जैन शशि ने उनके संस्मरण में जैविक माँ के साथ-साथ उन स्त्रियों को माँ के समकक्ष स्थान दिया है, जो ममत्व और त्याग की भूमिका निभाती हैं।

भाभी माँ का वात्सल्य, उनका प्रतीक्षा करना, और गौरैयों के लिए दाना-पानी रखना – यह सब भारतीय संयुक्त परिवार की कोमलतम झांकी प्रस्तुत करता है।

काव्य में “हर दिन माँ का दिन”, गौरव बंग ने  माँ को ईश्वर से भी पहले स्थान दिया है। “हर कोई कह रहा है आज माँ का दिन है, पर कोई ये बताए, वो कौन सा दिन है, जो माँ के बिन होता है!!” यह पंक्ति माँ के निरंतर, अनवरत, अज्ञात सेवा भाव को रेखांकित करती है। रूपकों का प्रयोग जैसे ‘तपती गर्मी में शीतलता’, माँ के वात्सल्य को संपूर्ण प्राकृतिक अनुकरणीयता से जोड़ता है। “अहसास है”, नंदकिशोर पाटीदार की रचना माँ को शब्दों से परे एक ‘अनुभव’ के रूप में परिभाषित करती है। माँ के डांट और दुलार दोनों को पूरक मानते हुए वे माँ के रोम-रोम में अमरत्व प्रतिपादित करते हैं। अत्यंत भावुक और व्यक्तिगत होते हुए भी हर पाठक के अपने जीवन से जुड़ती अभिव्यक्ति है।

माँ के आँचल को दुनिया से बड़ा बताने में एक विशिष्ट आत्मीयता है।

“गॉड हैल्प्स दोज हू हैल्प देमसेल्व्ज” संस्मरण में विवेक रंजन श्रीवास्तव ने किसी कथा की तरह आरंभ कर एक दार्शनिक विचार साझा किया है। माँ को केवल परिवार नहीं, समाज और राष्ट्र निर्माण की प्रेरणा बताते हुए वे माँ के आदर्शों को जीवन के प्रत्येक निर्णय में लागू करते हैं। ‘चदरिया जस की तस धर दी’ जैसी भाषा माँ की विदाई को आध्यात्मिक विस्तार देती है। यह रचना भाव, भाषा और विचार तीनों का उत्तम संगम है।

इस टेबल बुक की हर रचना एक दूसरे से अधिक भाव प्रवण है।

“म से माँ” पुस्तक कोई संकलन भर नहीं, मनोहारी शाब्दिक आभार यात्रा है। लंबे समय तक आपकी टेबल पर यह बनी रहेगी और माँ के उस मौन योगदान की याद ताजा करेगी जिसे हमने कभी ठीक से गिना ही नहीं। इस पुस्तक में शामिल कविताएँ और संस्मरण न केवल भावुक करते हैं, बल्कि पाठक को अपनी माँ के बारे में कुछ लिखने, कुछ कहने के लिए प्रेरित भी करते हैं।

माँ के जीवन की विविध छवियों – डॉक्टर बनाने वाली माँ, ओटले पर खड़ी प्रतीक्षा करती माँ, गौरैया को दाना खिलाने वाली माँ, यशोदा जैसी भाभी माँ इन सबका चित्रण पुस्तक को भारतीय संस्कृति की जीवंत गाथा बना देता है।

जागरण समूह का यह प्रयास न केवल साहित्यिक है, बल्कि म, मां के सामाजिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पुनर्स्मरण का माध्यम भी है।

माँ को शब्दों में पिरोने का यह अद्भुत यत्न, स्वयं माँ को समर्पित है। इस अनूठे साहित्यिक प्रयास की व्यापक चर्चा होनी चाहिए। खरीदिए और पढ़िए।

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ शुभ मुहूर्त (लघुकथा संग्रह) –  श्री देवेन्द्रसिंह सिसोदिया ☆ सुश्री सुषमा व्यास ‘राजनिधि’ ☆

सुश्री सुषमा व्यास ‘राजनिधि’

☆ पुस्तक चर्चा ☆ शुभ मुहूर्त (लघुकथा संग्रह) –  श्री देवेन्द्रसिंह सिसोदिया ☆ सुश्री सुषमा व्यास ‘राजनिधि’ ☆ 

पुस्तक – शुभ मुहूर्त (लघुकथा संग्रह)

लेखक – श्री देवेन्द्रसिंह सिसोदिया

प्रकाशक – बोधि प्रकाशन, जयपुर 

पृष्ठ संख्या – 116

मूल्य – रु 249  

शुभ मुहूर्त के कुंभ में जीवन गंगा के रूप—- समसामयिक हिंदी साहित्य जगत में लघुकथा तेजी से उभरती हुई परिलक्षित होती है। वामनावतार की तरहा यह साहित्य के ब्रम्हांड को नाप चुकी है। अपनी प्रभावी अभिव्यक्ती, सूक्ष्म दृष्टि और गंभीर सोच के कारण लघुकथा एक महत्वपूर्ण विधा के रूप में पहचानी जाने लगी है। लघु होते हुए भी उसके कथ्य चिंतन, मनन और गहन सोच के प्रश्नोत्तर छोड़ जाते हैं। हर वर्ग के पाठकों में लघुकथा साहित्य की प्रसिद्ध विधा है, अतः अनेक लघुकथाकार निरंतर लघुकथा लेखन से हिंदी साहित्य को समृद्ध कर रहे हैं। उन्ही में से एक लघुकथाकार हैं– देवेंद्र सिंह सिसौदिया। देवेन्द्र सिंह सिसौदिया लम्बे अंतराल से लघुकथा लेखन कर रहे हैं। उनके लघुकथा संग्रह ‘शुभ मुहूर्त’ ने साहित्य जगत में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराई है। संग्रह में कुल 82 लघु कथाएं हैं। ‘शुभ मुहूर्त’ लघुकथा संग्रह एक कुंभ की तरह है, जिसमें आसपास से गुजरती जीवन गंगा की संवेदनाओं का जल छलकता हुआ दिखलाई पड़ता है। वर्तमान समय की विसंगतियों, पारिवारिक समस्याओं, मानवीय मूल्यों को लेखक ने बखूबी अपनी लघुकथाओं में उकेरने का प्रयास किया है, सिर्फ प्रयास ही नहीं किया वरन समाधान की दिशा की ओर प्रस्थान भी किया है। संग्रह का शीर्षक ‘शुभ मुहूर्त’ प्रथम लघुकथा भी है, जिसमें पिता और बेटी के स्नेह, प्रेम और ममता का रूप दिखाई पड़ता है। जिसमें पाठक भी डूबने उतरने लगते हैं। बेहद ही सुंदर और मनभावन सी लघुकथा है। यह एक संदेश भी छोड़ जाती है कि प्रेम और स्नेह से दी हुई वस्तुओं के लिए कोई शुभ मुहूर्त देखने की जरूरत नहीं है। लेखक एक व्यंग्यकार भी हैं अतः उनकी लघु कथाओं में मारक क्षमता ठसक के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज कराती है। लघु कथा ‘छांव’ इसका सशक्त उदाहरण है– मदरसे में बैठे बच्चे मंदिर की गुंबद की छांव में राहत पाते हैं। इसी तरहा ‘आतिशबाजी’ लघुकथा में नेताजी पर पटाखे फोड़ने का प्रकरण है और उनके छूटने पर जोरदार आतिशबाजी की जाती है। ‘आत्मीय उद्बोधन’, ‘विकास’, ‘प्रदर्शन’, ‘समाज सेवा’, ‘गरिमा’, ‘वापसी’, ‘घोषणा- पत्र’, इन सभी लघुकथाओं में मार्मिक संवाद है, व्यंग्य की प्रहार क्षमता है और मनोविश्लेषण है जो पाठकों को प्रभावित कर सकता है। भाषा में सरलता है, साथ ही सघन संकेतिकता भी है जो पाठकों का ध्यान आकर्षित करती है। शास्त्रीय संगीत के सधे हुए सुर की तरह संग्रह में शब्द और शिल्प की कसावट ‘बड़ी लड़कियों’ और ‘दादू’ लघुकथाओं में दिखाई पड़ती है। साथ ही यह लघुकथाएं संस्कार और आधुनिक जीवन के तालमेल को भी बेहतर ढंग से प्रतिपादित करती है। संक्षिप्त सरल और मार्मिक लघुकथाएं संग्रह की विशेषता है। संग्रह के अध्ययन, विश्लेषण और उनके गुणवत्ता से जब हम परिचित होते हैं तो यह संग्रह तकनीकी और कलात्मक रूप से समृद्ध दृष्टिगत होता है। लघुकथाओं में काल, स्थान और कार्य एक साथ पिरोए गए हैं। संग्रह में भाषा, शब्द विन्यास और कथ्य की त्रिवेणी में जीवन के सत्य को उभरता और चमकता देख सकते हैं। विषय के मूल स्वर को गहराई से लेखक ने पकड़ा है तथा स्थूल में से सूक्ष्म और सार्थक ढूंढ कर लघुकथाओं की रचना की है। ‘लाल डब्बा’, ‘टाइम मैनेजमेंट’, ‘अदना आदमी’, ‘प्यारी दादी’, ‘लाला’ ऐसी ही लघुकथाएं हैं।

जैसे सुई में धागा पिरोया जाता है, वैसे ही लघुकथाओं में जीवन की सूक्ष्म संवेदनाओं और भावों को पकड़ कर शब्दों में पिरोया गया है। लघुकथाकार ने अपने कलात्मक पक्ष को बहुत सशक्त रूप से पाठकों के सम्मुख रखा है। भावों को कम शब्दों में सरलता से ढालकर मन की बात मन तक पहुंचाई है। संवेदनाओं का खूबसूरत प्रस्तुतीकरण संग्रह में विचरता दिखाई पड़ता है। ‘मां-बाप’, ‘बंटवारा’, ‘बेटी’, ‘गड़गड़ाहट’, ‘मां के हाथ का’, ‘वृद्धाश्रम’, ‘संदेश’, ‘पुराना लोटा’, ‘मन की बात’, ‘नेकी की दीवार’ ऐसी लघुकथाएं हैं, जो भावनाओं से भरपूर संवेदनात्मक तो है ही साथ ही सकारात्मक भी है, जिसे पढ़कर एक सुख, एक सुकून और हल्की सी मुस्कुराहट चेहरे पर आ जाती है।

‘ब्रेकअप’, ‘पॉजिटिव रिपोर्ट’, ‘शर्ट’, ‘कैलकुलेटर’, ‘राष्ट्रभाषा’, ‘हिंदी’, ‘अपनी माटी अपनी बोली’, ‘सहयोग राशि’, ‘नई बहू’ ऐसी लघुकथाएं हैं, जिनमें जीवन मूल्यों, मानवीय रिश्तों और आत्माभिव्यक्ति की नई राह दिखाई पड़ती है।

अंत में यही कहा जा सकता है कि लेखक ने अपने संग्रह ‘शुभ मुहुर्त में नए प्रयोगात्मक लेखन को महत्व दिया है। गंभीर और प्रभावी लेखनी से उत्सुकता जगाते हुए अनेक प्रश्नों को पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किया है तथा सतत आंकलन और बौद्धिक पर चर्चा के लिए भी स्थान छोड़ा है।

© सुश्री सुषमा व्यास ‘राजनिधि’

इदौर मध्यप्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ ☆ “बौने प्रहसन और अन्य कविताएं (काव्य संग्रह)” – कवि- श्री कपिल भारद्वाज ☆ चर्चा – श्री मनजीत सिंह ☆

श्री मनजीत सिंह

(ई-अभिव्यक्ति में प्रख्यात कवि, नाटककर, शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता श्री मंजीत सिंह जी का हार्दिक स्वागत। आप ख़ान मंजीत भावड़िया “मजीद” के नाम से प्रसिद्ध हैं। वर्तमान में वे पंजाबी यूनिवर्सिटी, पटियाला से भाषा विज्ञान में पी एच डी कर रहे हैं और कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में सहायक प्राध्यापक के रूप में कार्यरत हैं और उर्दू भाषा के संरक्षण व प्रचार प्रसार के प्रति समर्पित हैं। उनकी प्रमुख साहित्यिक कृतियों में “हरियाणवी झलक” (काव्य संग्रह) और “बिराणमाट्टी” (नाटक), रम्ज़ ए उर्दू, हकीकत, सच चुभै सै शामिल हैं, जो हरियाणा की संस्कृति और सामाजिक जीवन की झलक प्रस्तुत करती हैं। उनके साहित्यिक कार्यों को हरियाणा साहित्य अकादमी, हरियाणा उर्दू अकादमी, वैदिक प्रकाशन और अन्य प्रतिष्ठित संस्थानों द्वारा सम्मानित किया गया है। साहित्य और शिक्षा के साथ-साथ, ख़ान मनजीत अपने पारिवारिक परंपरा से जुड़े हुए एक कुशल कुम्हार (पॉटर) भी हैं।)

आज प्रस्तुत है श्री कपिल भारद्वाज जी द्वारा लिखित पुस्तक “बौने प्रहसन और अन्य कविताएं (काव्य संग्रह)पर चर्चा।

☆ “बौने प्रहसन और अन्य कविताएं (काव्य संग्रह)” – कवि- श्री कपिल भारद्वाज ☆ चर्चा – श्री मनजीत सिंह ☆

पुस्तक चर्चा

पुस्तक — बौने प्रहसन और अन्य कविताएं (काव्य संग्रह)

कवि- श्री कपिल भारद्वाज

पृष्ठ संख्या – 114  

कीमत – 169 रुपए (पेपर-बैक)

प्रकाशक – न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन प्रा लि 

☆ यह एक पुस्तक नहीं बल्कि गरीब, वैश्याओ, मजदूरों की आत्मा की आवाज़ है – श्री मनजीत सिंह 

मुझे आज एक पुस्तक मिली जो कि श्री कपिल भारद्वाज द्वारा रचित कविता संग्रह “बौने प्रहसन” जो एक उम्दा और दिमाग के तारों को हिला देने वाली है। इस काव्य संग्रह में वाकई जबरदस्त लेखनी का प्रयोग किया है। बेबाक बेखौफ आस-पास घट रही घटनाओं को कविताओं की लड़ी में पिरोया है। ऐसी लड़ी जो भगवान को भी उसी के घर के सामने खड़ा कर देती है। पहली कविता प्रेम जो महसूस करवाती है कि प्रेम ऐसा होना चाहिए जो स्याह काली रात को भी सौन्दर्य में बदल दें। प्रेम ऐसा हो जो जाति, धर्म से ऊपर उठकर रोटी का सवाल करे। काला रंग जो जीवन में रंग भर दे, जो एक श्यामपट का काम करती हो। कितनी जिन्दगी के बुलबुले को रंगने से जिन्दगी रंगीन बनती है। जिस तरह शिक्षक द्वारा श्यामपट्ट पर किसी सवाल को बताना विद्यार्थी के अन्दर वह रोशनी भर देता है। ठीक उसी तरह यह कविता भी रंग भरने का काम कर रही है। ‘तानाशाह मुस्कुरा नहीं सकता’ बहुत ही आला दर्जे की कविता है, जो बता रही है कि समाजवाद की तरफ बढ़ो और एक न्यायपूर्ण समाज की स्थापना करो। यह बताता है कि तानाशाह हमेशा गुलाम बनाकर रखता है। इस कविता में वह हिटलर का जिक्र करता है, क्योंकि तानाशाह के अन्दर प्रेम नहीं होता है। वह प्रेम की परिभाषा नहीं जानता। हां वह लुटेरा है, मालिक है मजदूरों का, राजा है प्रजा का, मजदूर वर्ग का, सत्ता का, और सरकार ही किसानों और मजदूरों के अभी तक के शोषण, अन्याय, भेदभाव और गैर-बरावरी का हिसाब मांग रही है।  कविता अपने विचारों और भावनाओं को व्यक्त करने का एक सुंदर तरीका है। प्राचीन काल में काव्य में काव्य और प्रतीकात्मकता को बहुत महत्व दिया जाता था, लेकिन आधुनिक काल में कविता काव्य और प्रतीकात्मकता से स्वतंत्र हो गई है। कविताओं में प्रतीकात्मकता और अलंकरण की आवश्यकता समाप्त हो गई और नई कविता का युग शुरू हुआ। वस्तुतः कविता में अर्थ तत्व प्रधान होता है। रस को काव्य की आत्मा माना जाता है। यह आज भी काव्य का सर्वोत्तम तत्व है। श्री कपिल भारद्वाज ने अपनी एक अलग लहर चलाई जो भविष्य में जाकर एक समुन्दर का काम करेगी । यह एक पुस्तक नहीं बल्कि गरीब, वैश्याओ, मजदूरों की आत्मा की आवाज़ है ।

आज मुक्त छंद कविता की नदियाँ बह रही हैं। मुक्त कविताओं में कविता का कोई प्रयास नहीं था; मेरे लिए भावना ही मुख्य तत्व है। आज की कविता में मन में उमड़ते भाव, मन में आए विचार और अनुभव प्रेरणादायी थे और कविताएं मनमोहक थीं। लेकिन इन कविताओं में एक लय है, भावना की एक लय है, जो पाठक को बांधे रखती है। अगर दिल में कोई तीखा कांटा चुभता है। उसका इलाज भी इसी किताब में दिया है।एक अज्ञात बुराई पूरे व्यक्तित्व पर छाई रहती है और हमारी भावनाओं को उत्पन्न करने के लिए कुछ करना पड़ता है। परिस्थिति के वातावरण ने, समय के लम्बे अंतराल ने, हमारी सृजनात्मक क्षमताओं को बढ़ाया, यहां तक कि जब अवसर आया, तो हमारे हृदय में जो एकमत भावनाएं, विचार और भावनाएं थीं, वे भी पूरी तरह अभिव्यक्त हुईं हैं। जलती हुई आग को बुझाने के लिए बस एक अवसर की आवश्यकता थी, और फिर जन्म की पीड़ा के बाद जो सामने आया वह सृजन और गहन अनुभूति का एक आनंदमय चरमोत्कर्ष था। यह कविता संग्रह प्रेम के बाद उत्पन्न होने वाले अनुभवों का संग्रह है।

उनकी कविताओं में जीवन के अनेक रंग हैं। आपकी कविता ‘कुंवारी लाईब्रेरी’ जीवन के संघर्ष का वर्णन करती है।

कौन सी भाषा में बिलखता है बच्चा 

और 

बिछड़ते वक्त उसने कहा 

मैं तेनू फिर मिलांगी।

बदलते समय के साथ रिश्ते भी बदल रहे हैं। कवि ने इस रिश्ते को इस प्रकार प्रस्तुत किया है:

आदमी होने की संभावना कितनी कम बची है 

से पता चलता है आज कल के रिश्ते का‌ जोकर, निरापद, कविता -1, दिसंबर -1 आदि में। कविताओं में मौसम का रंग न हो तो क्या फायदा? कविताएँ केवल सुहावने मौसम में ही स्वीकार की जाती हैं। कवि फागुन के सुंदर रंगों को उकेरते हुए कहता है: 

प्रेम कविताएं कितनी अच्छी है।

कवि का रक्त चाप, इंतजार, लोकतंत्र की वेज बिरयानी वाकई जबरदस्त हैं। 

कवि समाज में व्याप्त बुराइयों पर भी प्रहार करता है। चाहे महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराध हों, प्रेमी -प्रेमिकाओ के बढ़ते अपराध हों, सांप्रदायिकता का जहर हो, भीड़ द्वारा घेर लिए जाने और क्रूर हत्याओं का भय हो, रूढ़िवादिता में फंसा जीवन हो या मानवीय भावनाओं को ठेस पहुंचाना हो, वे चीखते हैं। कवि को छोड़कर किस ने इस पर विचार किया है। इतना ही नहीं, कवि ने निराशा व्यक्त करके इस घने अंधकार में हमेशा आशा का एक छोटा सा दीपक जलाया है।

विरह की बरछी,सोशल मीडिया और हमारे जीवन का अंधेरा, दुःख आदि कविताएं भावनाओं से काव्य सृजन करने की दृष्टि से भी उत्कृष्ट हैं। कविता की भाषा में एक प्रवाह, एक लय होती है। कवि ने कुछ ही शब्दों में बहुत ही सुन्दरता और वाक्पटुता से कोई बात कह दी है। कविताओं में सौन्दर्य है। कवि अपनी भावनाओं को कुछ शब्दों में और कुछ छवियों के माध्यम से व्यक्त करना सबसे अच्छा जानता है, और यह चित्रात्मक नियम पाठक को स्थिरता प्रदान करता है। कविता विचारों और भावनाओं को सरल और सीधे ढंग से प्रस्तुत करती है, जिससे पाठक के लिए कविता का अर्थ समझना आसान हो जाता है। पुस्तक का आवरण, चित्र की शैली का है, जो दिलचस्प है। यह कविता प्रेमियों के लिए एक अच्छा कविता संग्रह है।

चर्चाकार… श्री मनजीत सिंह

सहायक प्राध्यापक (उर्दू), कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय कुरुक्षेत्र 

manjeetbhawaria@gmail.com 

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆  मोची का ठीहा: जयपाल जी की दृष्टि में दलित चेतना और आत्म-संघर्ष का बौद्धिक विमर्श – श्री एस पी भाटिया ☆

श्री जयपाल

(ई- अभिव्यक्ति में सुप्रसिद्ध लेखक श्री जयपाल जी का स्वागत है। आप पंजाब शिक्षा विभाग से सेवानिवृत्त अध्यापक हैं। आपका एक कविता संग्रह ‘दरवाजों के बाहर‘  आधार प्रकाशन  से प्रकाशित। (इस संग्रह पर कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र में शोधकार्य), कुछ कविताएं पंजाबी में  अनुदित (पुस्तक रूप में प्रकाशित)।पत्र-पत्रिकाओं में लगातार रचनाएं प्रकाशित। देस-हरियाणा पत्रिका (कुरुक्षेत्र) के सह संपादक  प्रदेशाध्यक्ष- जनवादी लेखक संघ हरियाणा।)

ई-अभिव्यक्ति में 10 जून को “मोची (आत्मकथा)” शीर्षक से श्री जयपाल जी द्वारा पुस्तक समीक्षा प्रकाशित की गई थी।

यह समीक्षा आप निम्न लिंक पर पढ़ सकते हैं। 👇

हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ “मोची (आत्मकथा)” – लेखक… श्री द्वारका भारती ☆ चर्चा – श्री जयपाल ☆

इस संदर्भ में हमें हमारे प्रबुद्ध एवं विद्वान पाठक श्री एस पी भाटिया जी, (वरिष्ठ पत्रकार, अजीत समाचार) द्वारा एक विचारणीय प्रतिक्रिया प्राप्त हुई है, जिसे हम अपने प्रबुद्ध पाठकों के साथ साझा कर रहे हैं। यह प्रतिक्रिया अपने आप में एक प्रतिक्रियात्मक आलेख है।    

 मोची का ठीहा: जयपाल जी की दृष्टि में दलित चेतना और आत्म-संघर्ष का बौद्धिक विमर्श – श्री एस पी भाटिया ☆

पुस्तक चर्चा

पुस्तक — मोची (आत्मकथा)

लेखक — श्री द्वारका भारती

पृष्ठ संख्या – 120 

कीमत – 100 रुपए (पेपर-बैक)

प्रकाशक – नवचेतना पब्लिकेशन जालंधर (पंजाब)

संपर्क –90415-23025(प्रकाशक), –83603-03781-(लेखक)

एक मोची की दुकान से उठी हुई यह आत्मकथा केवल चमड़े की गंध नहीं, बल्कि विचारों की तपिश और अनुभवों की ईमानदार आवाज़ है। लेखक द्वारका भारती की रचना “मोची (आत्मकथा)” पर जयपाल की टिप्पणी साहित्यिक विवेक और सामाजिक विवेचना की एक उत्कृष्ट मिसाल है। वे मात्र आलोचक नहीं हैं, एक संवेदनशील द्रष्टा हैं—जो शब्दों के पीछे छिपी पीड़ा को पढ़ना जानते हैं, और तथाकथित नीच कहे जाने वाले जीवन के उच्चतम नैतिक आयामों को पहचानते हैं।

जयपाल जी की कलम जब भारती की आत्मकथा पर चलती है, तो वह न केवल समाज के मौन को तोड़ती है, बल्कि वह हमारे चेतन अवचेतन को झिंझोड़ती है। जिस आत्मकथा को ‘चमड़े की सड़ांध में जन्म और मृत्यु’ का प्रतीक कहा गया, उसी में जयपाल ने दर्शन, विद्रोह और मानवीय गरिमा के सबसे पवित्र अंश खोज निकाले।

वह बताते हैं कि कैसे द्वारका भारती की दुकान महज़ एक ‘ठीहा’ नहीं, बल्कि एक बौद्धिक केंद्र बन जाती है, जहाँ बैठकर लेखक रजनीश, अंबेडकर, मार्क्स, राहुल सांकृत्यायन को पढ़ता है और इतिहास, धर्म, समाज, राजनीति पर विवेकपूर्ण दृष्टिकोण विकसित करता है। जयपाल जी इस स्थान को ‘मोची का ठीहा’ कहकर जैसे एक प्रतीक रच देते हैं—जहाँ श्रम और शास्त्र, अपमान और आत्मगौरव, दोनों का समागम होता है।

जयपाल जी की दृष्टि इस आत्मकथा को न केवल सामाजिक आलोचना का विषय बनाती है, बल्कि इसे एक ऐसी धारा में परिवर्तित करती है, जिसमें करुणा, विद्रोह और आत्म-गौरव की त्रिवेणी बहती है। वे कहते हैं—यह आत्मकथा एक बहती नदी है, जो दलित जीवन की संघर्षगाथा को इतने स्वाभाविक, प्रवाहमय और भावात्मक रूप में प्रस्तुत करती है कि हर पाठक की आत्मा तक भीग जाती है।

उनकी यह टिप्पणी केवल समीक्षा नहीं, बल्कि एक सृजन का पुनः-सृजन है, जिसमें एक श्रमिक की पीड़ा, एक लेखक की साधना और एक विचारक की दृष्टि—तीनों एकाकार हो जाते हैं। जयपाल जी ने जिस गहनता, संतुलन और गंभीर सौंदर्य के साथ इस कृति को विश्लेषित किया है, वह आज के समय में विचारधारा और संवेदना के बीच एक दुर्लभ सेतु है।

श्री एस. पी. भाटिया
वरिष्ठ पत्रकार,अजीत समाचार।

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # 184 ☆ “ज्योत्स्ना” – कवि डॉ. संजीव कुमार ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है डॉ. संजीव कुमार जी द्वारा लिखित काव्य संग्रह “ज्योत्स्नापर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# 182 ☆

☆ “ज्योत्स्ना” – कवि डॉ. संजीव कुमार ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

पुस्तक चर्चा

पुस्तक समीक्षा: “ज्योत्स्ना”

कवि: डॉ. संजीव कुमार

☆ “छायावादी कोमलता” और आधुनिक विषाद का सेतु – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

हिंदी काव्य के मानक सिद्धांतों के आलोक में बहुविध कवि, लेखक, संपादक डॉ संजीव कुमार की कृति ज्योत्स्ना का विश्लेषण संग्रह को हिंदी काव्य परंपरा में “छायावादी कोमलता” और आधुनिक विषाद के सेतु के रूप में स्थापित करता है।

संजीव जी काव्य के मानक सिद्धांतों के अनुशासन में रहकर भी नवीन बिंब तथा भाव अभिव्यक्तियों का सृजन करने में सफल हैं। कविताओं का भाव-पक्ष, रस, ध्वनि एवं भावाभिव्यक्ति की विवेचना करें तो रस सिद्धांत के अनुसार संग्रह की सभी कविताओ में शांत रस, आत्मिक शांति और करुण रस, व्यथा से संचालित उद्गार दिखते हैं। “जीवन दुख की आस भरा” जैसी रचनाओं में वेदना की अभिव्यक्ति है। भारतीय काव्यशास्त्र के अनुरूप ये कविताएं स्थायी भाव, दुःख, विरह प्रतिपादित करती है।

ध्वनि सिद्धांत “मौन व्यथाओं का…” जैसी पंक्तियों में व्यंजना शक्ति द्वारा अप्रकट भाव जैसे आध्यात्मिक अनुसंधान साधे गए हैं, जो पाठक के काव्य गत आनंद को बढ़ाता है।

प्रकृति के माध्यम से भावों का प्रतीकात्मक चित्रण जैसे “स्तब्ध जगत, संध्या श्यामल” भावाभिव्यक्ति अलंकारिक उदाहरण है।

शिल्प-पक्ष, भाषा, छंद एवं अलंकार, मानक हिंदी का स्वरूप, काव्य संरचना की भाषा परिनिष्ठित खड़ी बोली है, जिसमें संस्कृत के तत्सम शब्द जैसे ज्योतिर्मय, प्रलय और सरल उर्दू-फारसी शब्द जैसे मखमल, आभास का सामंजस्य युक्त उपयोग किया गया है। यह मानक हिंदी की शुद्धता एवं बोधगम्यता के सिद्धांतों के अनुरूप है।

अधिकांश रचनाएँ मुक्तछंद में हैं, किंतु “पुलक मन…” जैसी कविताओं में गेयता बनाए रखने हेतु लयबद्धता साधी गई है। डॉ. कुमार के “छंद-विन्यास” का कलात्मक प्रभाव है। उपमा “तम की कज्जल छाया… मोम सा” रूपक “जीवन दुख की आस भरा आकुलता का सावन” अनुप्रास “मैं विकल-श्रांत सरि के तट पर“, ये सभी अलंकारशास्त्र के मानकों को पूर्ण करते हैं।

कविताओं की प्रासंगिकता की चर्चा करें तो आधुनिकता एवं सामाजिक संवेदनशीलता आधुनिक जीवन की व्यथा, “अवसाद”, “अकेलापन” जैसे विषय समकालीन मानसिक संघर्षों से जुड़ते हैं, जो डॉ. संजीव कुमार की सामाजिक संवेदनशीलता को दर्शाते हैं।

आध्यात्मिक समाधान के उद्देश्य, वेदना से मुक्ति हेतु “ज्योत्स्ना” (आत्मज्ञान) की अवधारणा भारतीय दर्शन के मोक्ष सिद्धांत से प्रेरित है। “जग-जीवन हो ज्योतिर्मय” जैसी पंक्तियाँ रचनाकार की आशावादी दृष्टि को प्रतिबिंबित करती हैं।

मानक काव्य सिद्धांतों से विचलन एवं नवीनता भरे प्रयोग, पारंपरिक सीमाओं का अतिक्रमण भी सुंदर तरीके से मिलता है। उदाहरण स्वरूप “तुम छू लो मुझको” जैसी रचनाएँ भक्ति काव्य की परंपरा (सखी-भाव) को आधुनिक प्रेमालाप से जोड़ती कही जा सकती हैं।

 मुक्तछंद की प्रधानता क्लासिकल छंदबद्धता से विचलन है, किंतु यह हिंदी काव्य की आधुनिक प्रवृत्ति के अनुसार उचित ही है।

नवीन प्रतीक जैसे “सावन”, “विद्युत”, “मधुमास” जैसे प्रतीक प्रकृति के माध्यम से मानवीय भावनाओं की अभिव्यक्ति करते हैं, जो धूमिल जैसे आधुनिक कवियों की शैली की याद दिलाते हैं।

शक्ति एवं सीमाएँ .. शक्तियाँ, भावों की गहन अनुभूति एवं प्रतीकात्मक संप्रेषणीयता रचनाओं की विशेषता है।

मानक हिंदी के व्याकरणिक नियमों का पालन, किया गया है। जो कविताओं के शिक्षण एवं शोध हेतु उपयुक्त है।

 कुछ रचनाओं में अमूर्त भावबोध सामान्य पाठक की पहुँच से दूर है।

विचारों की पुनरावृत्ति देखने भी मिलती है। काव्य वैविध्य को सीमित करती है।

काव्यशास्त्र के प्रतिमानों में “ज्योत्स्ना” की रचनाएं हिंदी काव्य के मानक सिद्धांतों रस, ध्वनि, अलंकार, मानक भाषा का सफल निर्वाह करती है। यह आधुनिक गीतिकाव्य की उत्कृष्ट कृति है, जहाँ वैयक्तिक पीड़ा सार्वभौमिक आध्यात्मिकता में अभिव्यक्तमिलती है। डॉ. कुमार की रचनाएं बहुआयामी साहित्यिक पहचान स्थापित करती हैं।

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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