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(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)
‘गिरमिटिया देशों का इतिहास, वर्तमान और भविष्य की दिशा’ – नालंदा विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय सहयोग परिषद द्वारा सेमिनार आयोजित
आधुनिक नालंदा विश्वविद्यालय के सहयोगी 17 देश 455 एकड़ का विशाल परिसर प्राचीन और अर्वाचीन वास्तु कला का अद्भुत संगम ।
नव स्थापित नालंदा विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय सहयोग परिषद द्वारा आयोजित ‘गिरमिटिया देशों का इतिहास, वर्तमान और भविष्य की दिशा’ पर आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सेमिनार (28-29 मार्च) में वक्ता के रूप में भाग लेने का अवसर प्राप्त हुआ। इस विश्वविद्यालय को 17 देशों के सहयोग से पुनर्जीवित किया गया है। भारत सरकार ने 2010 में नालंदा विश्वविद्यालय अधिनियम पारित किया और बिहार में राजगीर के पास ही 2014 में इसका शैक्षणिक सत्र प्रारंभ हुआ। इस विश्वविद्यालय का नवीन परिसर 455 एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ है जो प्राचीन नालंदा और अर्वाचीन वास्तु कला का अद्भुत उदाहरण है । भारत सहित विभिन्न देशों के लगभग 700 विद्यार्थी इस विश्वविद्यालय में अध्ययनरत हैं।
नालंदा विश्वविद्यालय का इतिहास पांचवीं शताब्दी में शुरू होता है जब गुप्त वंश के सम्राट कुमारगुप्त प्रथम ने बिहार के राजगीर में 427 ई के लगभग इसकी स्थापना की थी और इसे बौद्ध धर्म का सबसे बड़ा शिक्षा केंद्र माना जाता था ।यह दुनिया का पहला आवासीय विश्वविद्यालय था जिसमें 10, 000 से अधिक छात्र और लगभग 2000 शिक्षक थे। चीन, तिब्बत, जावा, जापान कोरिया, म्यांमार, कंबोडिया श्रीलंका आदि देशों से यहां छात्र अध्ययन के लिए आते थे। चीनी यात्री ह्वेनसांग और इत्सिंग ने यहां कई साल रहकर अध्ययन किया और नालंदा के वैभव को दुनिया तक पहुंचाया। विश्वविद्यालय का 9 मंजिला पुस्तकालय जिसे धर्मगंज कहा जाता था, में ज्ञान का विपुल भंडार था। यह विश्वविद्यालय 800 वर्षों तक शिक्षा और शोध का वैश्विक केंद्र बना रहा ।ज्ञान की इस विशाल ज्योति को 1193 इस्वी में तुर्क आक्रमणकारी बख्तियार खिलजी ने बुझा दिया किंतु नालंदा विश्वविद्यालय अब पुनः अपने वैभव को अर्जित करने के लिए कुलपति प्रो. सतीश चतुर्वेदी के नेतृत्व में प्रयासरत है। अंतरराष्ट्रीय सहयोग परिषद के महासचिव श्री श्याम परांडे, सचिन श्री गोपाल अरोड़ा और निदेशक श्री नारायण कुमार को इस सफल आयोजन के लिए बधाई और धन्यवाद।
साभार – डॉ जवाहर कर्णावट
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’≈






