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🙏💐 स्मृतिशेष ज्ञानरंजन 💐🙏
(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)
जबलपुर शहर ने ज्ञानरंजन को शिद्दत से याद किया
साभार – श्री हिमांशु राय
(साभार – जबलपुर सफरनामा)
जबलपुर शहर के साहित्य जगत और कला जगत ने अपने ज्ञानरंजन को शिद्दत से याद किया। ज्ञान जी का निधन 7 जनवरी को हुआ। 10 जनवरी को शाम 4 बजे अन्नपूर्णा होटल इन के सभागार में ज्ञानरंजन जी को याद करने के लिए शहर के लोग जमा हुए। चार बजे लोग आना शुरू हुए और कुछ ही देर में हॉल पूरा भरा हुआ था। लोग बाहर खड़े थे। इनमें वो सब थे जो किसी न किसी कारण ज्ञान जी से जुड़े हुए थे। ज्ञान जी एक सार्वजनिक व्यक्तित्व थे। उनका हर व्यक्ति और संस्था से व्यक्तिगत ताल्लुक था। इसीलिए ज्ञान जी की श्रद्धांजलि सभा में साहित्यकार, पत्रकार, कलाकार और बड़ी संख्या में उनसे व्यक्तिगत रूप से जुड़े व्यक्ति शामिल थे।
अवधेश बाजपेयी ने ज्ञान जी का एक बहुत सुंदर पोट्रेट बनाया था। विवेक चतुर्वेदी ने श्रद्धांजलि सभा का बैनर बनाया था। पंकज स्वामी ने पूरे कार्यक्रम को फेसबुक लाइव करने की व्यवस्था की थी। अजय धाबर्डे ने फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी के द्वारा हर क्षण को कैद किया। सबसे पहले हिमांशु राय ने सभा की शुरूआत की और बांकेबिहारी ब्यौहार को संचालन के लिए आमंत्रित किया। बांकेबिहारी ब्यौहार ने ज्ञानरंजन जी के सन् 1961 से जी एस कॉलेज में साथ रहे वरिष्ठ साहित्यकार श्री कुंदनसिंह परिहार को आमंत्रित किया। परिहार जी ने कहा कि ज्ञानरंजन उस दौर में अपनी कहानियां और उनकी भाषा के कारण बहुत चर्चा में रहे। वे बहुत खिलंदड़े व्यक्ति थे। साहित्य के अतिरिक्त उन्होंने खूब मित्र बनाए। लोगों के सुखदुख में खूब साथ दिया। राजेन्द्र चंद्रकांत राय ने कहा कि कॉलेज के दिनों में ज्ञान जी से परिचय हो जाने के कारण उनका साहित्य से गहरा नाता बना। उनकी कहानियां परंपरागत कहानियां से बहुत अलग थीं। इंदौर से आए तरूण भटनागर ने कहा कि उनके बिलकुल शुरूआती दौर में ज्ञानजी की कहानियां ने प्रभावित किया। ज्ञानजी ने उन्हें कहानियां लिखने के प्रेरित किया और मार्गदर्शन किया। राजेन्द्र दानी ने भरे गले से ज्ञान जी के सान्निध्य को याद किया। उन्होंने कहा कि ज्ञानजी जितने बड़े साहित्यकार थे उतने ही बड़े मनुष्य थे। वे हमारी और हमारे परिवार की व्यक्तिगत चिन्ता करते थे। उन्होंने पहल के सहयोगी के रूप में मुझे बहुत सिखाया और मुझ पर भरोसा किया। ज्ञान जी के निकट सहयोगी मनोहर बिल्लोरे ने कहा कि उनसे परिचय के बाद मेरा जीवन बदल गया। मैं न केवल साहित्य का अध्येता बना वरन उनके साथ पहल पत्रिका के लिए एक सहयोगी बन सका। उनके साथ प्रतिदिन बैठता था। राजीव शुक्ल ने बताया कि सन सत्तर के दशक में जबलपुर आकर जब ज्ञानजी से मुलाकात हुई तबसे आज तक गहरे संबंध बने हुए हैं जो साहित्य से लेकर व्यक्तिगत और पारिवारिक रहे हैं। पंकज स्वामी ने कहा कि ज्ञान जी ने समाज में हर किसी की चिंता करते थे। उन्होंने मेरे पुत्र से अलग से बातचीत की और उसकी परेशानियों को समझा। अपने यहां सब्जी देने आने वाले की लड़की को लैपटॉप खरीद कर दिया। कॉफी में बैठकर भी वो ये देखते थे कौन किस तरह से व्यवहार कर रहा है और उसकी व्यक्तिगत समस्या क्या है ?
हिमांशु राय ने याद करते हुए कहा कि सुदीप बैनर्जी के निधन पर उन्होंने कहा था कि मृत्यु को उत्सव के रूप में लिया जाना चाहिए। ज्ञान जी ने एक बहुत शानदान जीवन जिया। एक लेखक के रूप में वो अमर रहेंगे। उन्होंने अपने संपर्क में आए हर व्यक्ति से व्यक्तिगत संबंध बनाए और उसकी चिंता की। वो आलोचना करने और दंडित करने में भी पीछे नहीं रहते थे। उन्होंने सिखाया कि हर आयोजन को कितने सुनियोजित तरीके से किया जाना चाहिए। यहां तक कि इस उम्र में भी वे अपने कार्यक्रम का कार्ड बांटने घर घर जाया करते थे। पहल संगोष्ठी के रूप में उन्होंने एक बहुत शानदार परंपरा कायम की।
इंदौर से आए सुरेश पटेल ने भरे गले से बताया कि जीवन के शुरूआती दौर में ज्ञान जी ने उन्हें प्रेरणा दी कि तुम कबीर पर कार्य करो। आज कबीर समूह की अन्तर्राट्रीय स्तर की गतिविधि का कारण ज्ञान जी की प्रेरणा रही है। डा निशा तिवारी ने बताया कि प्रारंभ में उनके ज्ञान जी से संपर्क कालेज के कामों के कारण हुए। बाद में उन्होंने मेरे लेखन की प्रशंसा की। अवधेश बाजपेयी ने कहा कि मैं गांव से आया। जब ज्ञान जी से मिला तो ऐसा लगा मानो एक अभिभावक मिल गया जिसने मुझे कला की समझ और दृष्टि दी। विवेक चतुर्वेदी ने कहा कि ज्ञान जी ने हमेशा प्रोत्साहित किया और आलोचना के द्वारा रचनाओं का परिमार्जन किया। डा सुधीर तिवारी ने बताया कि उनके मेडिकल कॉलेज के दिनों में ज्ञानरंजन जी ने उनके नाटकों का निर्देशन किया था। श्रीमती गीता तिवारी ने ज्ञानरंजन जी से अपने पारिवारिक संबंधों को याद किया। डा स्मृति शुक्ला, श्रद्धा सुनील, कुंदन सिद्धार्थ, डा राधेश्याम सुहाने और डा अनामिका तिवारी ने उनके जीवन में ज्ञान जी के महत्व के बारे में बताया।
इस श्रद्धांजलि सभा में सैकड़ों लोग शामिल हुए। और अंत तक रूके रहे। किसी का जाने का मन नहीं कर रहा था। सभा के पश्चात् देर तक सभी लोगों ने मिलकर ज्ञान जी को लगातार याद किया। श्रद्धांजलि सभा में ज्ञानरंजन के पुत्र शांतनु, बहु, पोती ऋतुपर्णा और पुत्री वत्सला व नातिन सुकृति भी सीधे अस्पताल से आकर शामिल हुए। उल्लेखनीय है कि ज्ञान जी के निधन के उपरांत श्रीमती सुनयना ज्ञानरंजन अस्पताल में भरती हैं।
श्रद्धांजलि सभा में डा छाया राय, आकांक्षा सिंह, मदन तिवारी, मनु तिवारी, अजय यादव, देवेन्द्र सुरजन, प्रकाश दुबे, गंगाचरण मिश्रा, बसंत मिश्रा, पंकज कौरव, दिनेश चौधरी, विवेक श्रीवास्तव, रीना शुक्ला, तनु राय, डा भारती शुक्ला, नरेश जैन, रमेश सैनी, युनुस अदीब, तपन बैनर्जी, नवीन चौबे, मुरलीधर नागराज, डा एस के सिंह, सतीश रेड्डी, वेदप्रकाश अधौलिया, देवेन्द्र श्रीवास्तव आदि उपस्थित थे। पहल परिवार, अन्विति, विवेचना, विवेचना रंगमंडल, समागम रंगमंडल, नाट्यलोक, रंगाभरण, सुरपराग, म प्र हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रगतिशील लेखक संघ, कालजयी अनिल कुमार श्रीवास्तव फाउंडेशन आदि के सदस्य उपस्थित रहे।
साभार – श्री हिमांशु राय, जबलपुर, मध्यप्रदेश
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈









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