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(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

विश्व पुस्तक मेला – २०२६ , पीढ़ियों को जोड़ने का बना माध्यम ☆ साभार -श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

माता-पिता के लिए विशेष संदेश:

संस्कारों और किताबों की खुशबू से महका विश्व पुस्तक मेला, पीढ़ियों को जोड़ने का बना माध्यम

नई दिल्ली: प्रगति मैदान में आयोजित विश्व पुस्तक मेले का दृश्य इस बार केवल किताबों की प्रदर्शनी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह परिवारों के लिए एक भावनात्मक और प्रेरक उत्सव बन गया। एशियन लिटरेचर सोसाइटी द्वारा आयोजित एक विशेष परिचर्चा ने यह सिद्ध कर दिया कि डिजिटल चकाचौंध के बीच भी शब्द ही वह डोर हैं, जो एक घर की तीन पीढ़ियों—बुजुर्गों, माता-पिता और बच्चों—को एक सूत्र में पिरोते हैं।

साहित्यिक मंच पर पीढ़ियों का संगम

इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’, डॉ. नीतू सिंह राय और डॉ. अनिता चंद ने अपनी उपस्थिति से न केवल मंच की शोभा बढ़ाई, बल्कि उपस्थित अभिभावकों को जीवन का एक नया दृष्टिकोण दिया। सत्र का कुशल संचालन किरण बाबल ने किया। वक्ताओं ने बड़े ही मार्मिक ढंग से यह संदेश दिया कि एक घर में दादा-दादी के अनुभवों का खजाना, माता-पिता का मार्गदर्शन और बच्चों की नई ऊर्जा तभी सार्थक होती है, जब उनके बीच संवाद का माध्यम ‘किताबें’ बनती हैं।

डिजिटल युग में पाठक की बदलती भूमिका

चर्चा के दौरान यह बात प्रमुखता से उभरी कि आज के डिजिटल युग में पाठक अब केवल निष्क्रिय पाठक नहीं रह गया है। डॉ. प्रकाश और अन्य विद्वानों ने बताया कि तकनीक ने पढ़ने को बहुआयामी बना दिया है। अब पाठक सामग्री को साझा करता है, उस पर टिप्पणी करता है और सामुदायिक चर्चाओं का हिस्सा बनता है। जहाँ एक ओर यह सक्रियता सुखद है, वहीं वक्ताओं ने मैरिएन वुल्फ जैसे शोधकर्ताओं का हवाला देते हुए माता-पिता को सचेत भी किया। उन्होंने कहा कि स्क्रीन पर लगातार पढ़ने से बच्चों की गहन सोच और एकाग्रता प्रभावित हो रही है। ऐसे में माता-पिता की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है कि वे तकनीक का लाभ तो उठाएं, लेकिन बच्चों को गहराई से सोचने की आदत भी डालें।

प्रिंट किताबों का स्पर्श: एक भावनात्मक विरासत

आज के दौर में जब हर चीज़ ऑनलाइन उपलब्ध है, तब भी ‘प्रिंट किताबों’ की प्रासंगिकता पर विशेष जोर दिया गया। वक्ताओं ने साझा किया कि कागज की खुशबू, पन्नों की सरसराहट और किताब को हाथ में पकड़ने का जो संवेदी अनुभव है, वह किसी भी स्क्रीन पर संभव नहीं है। शोध बताते हैं कि प्रिंट किताबों से सीखी गई बातें स्मृति में लंबे समय तक अंकित रहती हैं। यह बुजुर्गों के लिए अपनी विरासत को पोते-पोतियों तक पहुँचाने का सबसे सशक्त माध्यम है।

अभिभावकों के लिए प्रेरक संदेश: कैसे विकसित करें पढ़ने की संस्कृति?

नई पीढ़ी, जो वीडियो और गेम्स की दुनिया में पली-बढ़ी है, उनमें पढ़ने की संस्कृति विकसित करने के लिए माता-पिता को कुछ बुनियादी और भावनात्मक कदम उठाने की सलाह दी गई:

 उदाहरण बनें: बच्चे वह नहीं करते जो हम कहते हैं, वे वह करते हैं जो हम करते हैं। यदि माता-पिता स्वयं किताब पढ़ेंगे, तो बच्चे भी उसे अपनाएंगे।

 पठन कोना (Reading Corner): घर में एक छोटा सा कोना किताबों के लिए समर्पित करें, जहाँ परिवार के सदस्य साथ बैठकर पढ़ें।

 चर्चा का माहौल: स्कूलों और घरों में कहानियों पर चर्चा करें, लेखकों से मिलें और पढ़ने को एक बोझ नहीं, बल्कि खेल की तरह मजेदार बनाएँ।

निष्कर्ष:

यह पूरा कार्यक्रम उपस्थित माता-पिता और बुजुर्गों के लिए एक प्रेरणादायक अनुभव रहा। अंत में यह संदेश दिया गया कि डिजिटल तकनीक और किताबों का स्पर्श मिलकर ही एक स्वस्थ और शिक्षित समाज का निर्माण कर सकते हैं। जैसा कि परिचर्चा का सार था—”किताबों के सानिध्य में बीता समय ही एक परिवार के लिए सबसे बड़ी और अनमोल पूंजी है।”

≈ श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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