श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव
गोरखपुर, उत्तर प्रदेश की निवासी लेखका व कवयित्री अभिलाषा श्रीवास्तव जी एक प्रेरणादायक महिला हैं। साहित्य की सेवा में निरंतर रत | आपको 2024 में अंतरराष्ट्रीय महिला सम्मान पत्र से नवाजा गया। विशेष सम्मान : एक्सीलेंट कवयित्री अवार्ड से सम्मानित तथा पुरस्कृत |उनके द्वारा संवाद टीवी पर फाग प्रसारण में प्रस्तुत किया गया और विभिन्न राज्यों के प्रमुख अखबारों व पत्रिकाओं में उनकी कविता, कहानी और आलेख प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी लेखनी में समाज के प्रति संवेदनशीलता और सृजनात्मकता का सुंदर संगम देखने को मिलता है।
☆ आलेख ☆ नाजुक रिश्ते ☆ श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव ☆
माँ सीता प्रभु श्रीराम व लक्ष्मण जी जंगल में वनवास करते थे फिर भी माता के आभूषणों की पहचान नहीं कर पाये लक्ष्मण जी यह प्रसंग पढ़ने के बाद मन में सीता जी से ज्यादा लक्ष्मण जी के लिए सम्मान मन में बढ़ गया।
वक़्त के साथ समाज ने करवट बदला व बदलाव आया अब देवर भाभी केवल रिश्ते में देवर भाभी ही नहीं होतें बल्कि ससुराल में दुल्हन के लिए पति के बाद सबसे बड़ा स्तंभ देवर होता है जो भाभी को समझता है भाभी के लिए सबसे बड़ी आवाज़ बनता है बिलकुल एक भाई के जैसा।
हाँ मायक़े में भी तो भाई ही होता है जो बहन के लिए सबसे पहले खड़ा हो जाता है और बहन पे उठने वाले हर नज़र को भाई भेद कर बहन को महफूज़ रखता है यह रिश्ते ही तो है नई पीढ़ी को एक दूजे में बांध के रिश्तोंकी बगियाँ जिंदा एंव खुशहाल समाज की पहचान दिलाने के लिए भाई- बहन, देवर- भाभी, जीजा -साली हम उम्र रिश्तों की पहचान जो एक दूसरे की बात समझ सकते हैं लेकिन इन तीनों रिश्तों में भाई बहन का रिश्ता एक अलग अलौकिक क्षमता के साथ होता है क्योंकि भाई बहन नाभिक बंधन से जुड़े हुए होते हैं और उनका रिश्ता बिलकुल प्रभात फेरी के किरणों के रूप में होता है बिलकुल एक दूजे के प्रति संवेदनशील एवं हृदयँ बंधन में लिपटा अब बाकी बचें हुए रिश्तों में गरिमा की बहुत आवश्यकता होती है क्योंकि यह रिश्ता बिलकुल नाजुक डोर से बंधा हुआ हंसी मजाक की गठरियाँ में बंधा हुआ होता है। थोड़ी सी छूट और एक हंसता खेलता परिवार टूट जाता है इस रिश्ते को संभालने की जिम्मेदारी देवर भाभी की ही नहीं बल्कि उस वक़्त घर में रहने वाले मुखिया की भी होती है क्योंकि बच्चे कब कैसे किस बात पे आकर्षित हो जाये वह खुद नही समझ पाते लेकिन आप की अनुभवी आखें उनके लिए मार्गदर्शक बन सकतीं हैं। यह जिम्मेदारी प्रत्येक सदस्य की होती है क्योंकि घर सभी का होता है फिर एक ही व्यक्ति से अलग अलग रिश्तें भी होतें है प्रत्येक व्यक्ति का खैर।
एक बात और भी लिखना चाहूंगी, माचिस की तीली बनने से पहले एक बार जरूर सोचिए घर खुद का है और तीली भी आप फिर जलने के बाद तीली भी तो कहीं मुहं दिखाने लायक नहीं होती अत: रिश्तों की पाठशाला में दीपक बनकर प्रज्वलित होकर ठहाकों के साथ खेलते हुए मस्त रहे कुछ नहीं मिलता श्राप बनने से। क्योंकि बाद में अफ्सोस करके क्या होगा जब शंक घुटन व अवसाद की दिमक दिमाग़ में जल गया तो तीली स्वयं को नहीं बनाये।
नाजुक रिश्तों में गरिमा का ध्यान रखना ही समझदारी है बाकी तो आज की पीढ़ी खुद समझदार है।
~ अभिव्यक्ति की स्याही ~
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© श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव
गोरखपुर, उत्तरप्रदेश
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





