सुश्री इन्दिरा किसलय

☆ लघुकथा  ☆ लड़की तो थी ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

फुलवा  बैगा जनजाति से संबंध रखती थी। गर्भवती  फुलवा का आठवाँ महीना शुरू हो चुका था।

पति मायो ने उसे साप्ताहिक बाजार में, साथ चलने के लिए कहा जो सात किलोमीटर दूर था। उन्हें जरूरत की लगभग सभी चीजें खरीदने बाजार जाना पड़ता था। उन्होंने आधा किलोमीटर पैदल चलकर एक ऑटो लिया।

सौदा सुलुफ खरीदने के बाद मायो ने देखा हल्की रिमझिम तेज बारिश में बदल गई। उन्होंने बहुत इन्तजार किया। टाइम पास के लिये भजिए और रंगीन जलेबी खाई।

अंधेरा घिरने लगा था बारिश में पहाड़ और जंगल का मौसम डराने लगता है। हल्की सी कालिमा और हवाओं के थपेड़े—जब लोगों का शोर थम जाता है तो जंगल बोलना शुरू कर देता है। फिर उसकी भाषा समझना आसान नहीं होता।

घर लौटना जरूरी था। जरा सी बारिश थमी तो उन्होंने एक ऑटोवाले को तैयार किया और चल पड़े। बीच में एक नाला पड़ता था। पुल पर से पानी बह रहा था अतः ऑटोवाले ने आगे जाने से इंकार कर दिया।

मायो फुलवा से बोला चल- इतना पानी तो हम पार कर लेंगे। पुल के बीच में पहुँचते ही, दोनों कुछ संभल पाते उससे पहले, पहाड़ों से होता हुआ पानी का जोरदार रेला आया और दोनों को बहा ले गया।

सुबह परिजन खोजने निकले तो बहुत दूर मायो जंगली झाड़ियों में फँसा पड़ा था। उसे निकाला गया।फुलवा की खोज शुरू हुई। पुलिस ने मृत फुलवा के शरीर को पोस्टमार्टम के लिये भेजा।

 घर में शोक पसरा हुआ था ।मायो की माँ को लोग सांत्वना देने  आने लगे —

बेचारी बहू  भी गई और बच्चा भी। बहुत बुरा हुआ।

मालूम हुआ – पेट में लड़की तो थी – मायो की माँ बोली।

©  सुश्री इंदिरा किसलय 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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