सुश्री इन्दिरा किसलय

☆ व्यंग्य ☆ मच्छर के सियासी तेवर… ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

हाड़ कँपा देने वाली, कयामत की ठंड फिर भी निकिता को मुँह पर रजाई ओढ़कर सोना अच्छा नहीं लगता। दम घुटने जैसा एहसास होता है। ये क्या—जैसे ही भगवान का नाम लेकर  निकिता ने आँखें बंद कीं सोने का प्रयास किया ,एक मच्छर होठों के ऊपर, ठीक नाक के नीचे काट गया।वह खुद ही भुनभुनाने लगी–इन मच्छरों को जरा भी तमीज नहीं। काटने का सलीका तो सीख लेते। ठीक है कि”खून पीना तुम्हारा जन्मसिद्ध अधिकार है।”

खून ही पीना है तो चुपचाप पियो ना। तबला पेटी लेकर क्यों चले आते हो। उस पर भूँssssभूँ ssssगीत गाने की जरूरत क्या है।

पर नहीं, हम डंके की चोट पर पिएंगे—ढोल नगाड़े बजाकर पिएंगे। बिना  ढोल नगाड़े बजाए, ताकत का लोहा कौन मानता है।डरता है कौन !

है कोई माई का लाल- जो हमारा कुछ बिगाड़ सके। बाल भी बाँका कर सके। पता चला कि उस मच्छर की सियासी हल्के में भारी दखल है। और वह “किम जोंग” प्रजाति का  मच्छर है। जिनपिंग कबीले के मच्छरों से गाढ़ी दोस्ती है उसकी। तभी तो मगरा रहा है ।

ऐसे में नींद आने से रही। निकिता के भीतर का खोजी पत्रकार जाग्रत हो उठा। उसने गूगल सर्च किया तो पता चला कि वे फीमेल को इम्प्रेस करने के लिये गाते हैं। तो भाई मच्छर -जाओ ना ! जाकर अपनी मच्छरानी को रिझाओ ना गाकर। हमारी नींद में खलल क्यों डालते हो।

एक तो अपनी लंबूतरी नोंक से खून चूसते हो—-ऊपर से गीत संगीत का सहारा लेते हो।

असित बोले डार्लिंग–अपनी सहनशीलता बढ़ाओ। वैसे भी तुम कछुआ छाप क्वाइल, अगरबत्ती,लिक्विड सभी कुछ आजमा चुकी हो। कुछ बिगड़ा मच्छरों का। सब कुछ पचा गये। इनका इम्यून सिस्टम बड़ा तगड़ा है। ठीक वैसे ही जैसे जनता की सारी शिकायतों का नेता पर कोई असर नहीं होता। अब तुम रैकेट ले आओ, थोड़ी थोड़ी देर में घुमाती रहो। पहले भूँ भूँ सुनते थे अब तिड़ तिड़- तिड़ तिड़ सुनो। आत्मरक्षार्थ कोई न कोई उपाय तो करना पड़ेगा ना।

रही आवाज़ की बात तो तुम चाहो न चाहो सुनना तो पड़ेगा कितनी ही भौंडी, बेसुरी,खरखरी, कर्णकर्कश क्यों न हो। हमारे पास चुनाव की सुविधा कहाँ, जो मनपसंद आवाज़ का चयन कर सकें।

निकिता बोली असित तुम बात को कहां से कहां तक ले गये। टी वी चैनल ज्यादा न देखा करो। भक्तिभाव में लीन लोगों की संगत न किया करो।

तुम्हें पता है मुझे डेंगू से बड़ा डर लगता है। जानते हो कार्पोरेशन वालों ने  क्या कहा–घर के बाहर रखे जलपात्रों में “गप्पी मछली”डालने का सुझाव दिया है। अब गप्पी मछली लाये कहां से ?

उन्हें पता है जब केवल शब्दों के जमाखर्च से काम चल जाता है तो खाली पीली मशक्कत कौन करे! घर घर गप्पी पहुँचाए कौन ? सुनते हैं अब लेडी मच्छर भी प्रतिशोध की मुद्रा में हैं। उनको अंडरएस्टीमेट करना भी ठीक नहीं।

अब बस भी करो निकिता- मच्छर पुराण खत्म करो। सो भी जाओ। जानती हो ना मच्छर हो या मच्छरानी, सियासी रंग में रंगकर एक रंग हो जाते हैं। ढंग एक हो जाते हैं।उनपर चढ़ने से रहा और दूसरा रंग।

©  सुश्री इंदिरा किसलय 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares
0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments