श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # १८ ☆
☆ दस्तावेज ☆ मारीशस ~ पत्थर के नीचे सोना होता है़… ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆
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भारत से गिरमिटिया देशों को पहुंचे भारतीय मजदूर, जो हमारे ही पूर्वज थे, ने अपने धैर्य, संघर्ष, एवं श्रम के दम पर तथा इसके साथ अपने साथ ले गयी भारतीय सांस्कृतिक विरासत की पूंजी के बल पर विरान द्वीपों को एक अत्याधुनिक, खूबसूरत, सुविधा सम्पन्न राष्ट्र में बदल दिया।
भारत से मजदूर के रूप में गिरमिटिया देशों को पहुंचे हमारे पूर्वजों ने समुद्र के किनारे वीरान पड़े द्वीपों को न सिर्फ स्वर्ग सा बना दिया, बल्कि स्वयं को सत्ता के शिखर पर स्थापित कर लिया। इन्होंने चौमुखी विकास किया। आज आधुनिकता के दौर में, जब हम भारत में रहते हुए अपनी संस्कृतियों से विमुख हो रहे हैं। ऐसे समय में भी इन गिरमिटिया मजदूरों के वंशज आज भी भारतीय साहित्य संस्कृति और कला के क्षेत्र में अप्रतिम योगदान कर रहे हैं। इन साहित्यकारों के साहित्य अतीत की पीड़ा से लेकर वर्तमान के उजाले को अपने साहित्य में रोपित करती हुई दिखती है। कम से कम मॉरीशस साहित्यकार रामदेव धुरंधर के पथरीला सोना उपन्यास के सात खंड इस यात्रा को बखूबी प्रमाणित करते हैं।
डॉ दीपक पाण्डेय एवं डॉ नूतन पाण्डेय जी द्वारा संपादित पुस्तक “रामदेव की रचना धर्मिता” के पृष्ठ 24 पर डॉ.हरेराम पाठक जी का आलेख रामदेव धुरंधर का साहित्य समाजैतिहासिक दस्तावेज में #श्री_रामदेव_धुरंधर के ऐतिहासिक उपन्यास पथरीला सोना को कोट को करते हुए डॉक्टर पाठक लिखते हैं –
“पथरीला सोना श्रम संस्कृति का महाआख्यान है। कारण इसमें श्रम की पीड़ा ही नहीं, बल्कि उसके सौंदर्य का भी अनुलेखन है। कोई भी मजदूर जब श्रम करता है तो उसके श्रम के बराबर उसे मजदूरी नहीं मिल पाती तो भी वह श्रम करना नहीं छोड़ता है। आखिर कहां से आती है उसमें यह शक्ति? क्या राज है उसकी कठोर जीवटता का, जो कभी उसे हार मानने नहीं देता है। धुरंधर स्पष्ट का उत्तर देते हुए कहते हैं –
शादी विवाह के गीत, भक्ति काव्य और इस तरह के भारतीय कृतियां और संस्कृति का इस देश में विस्तार होता चला गया था। जो लोग साधारण लोग थे उनके अंतस में भी समाने लगा था कि अपने भारत की इतनी सारी धरोहर से हम इस देश में अपने को धन्य पा रहे हैं। ” अर्थात भारतवर्ष की आस्था मूलक संस्कृति धरोहर ही उस समय प्रवासी भारतीयों की थाती थी जिसके बल पर शोषित होते हुए भी कठोर श्रम साधना के बल पर वे सुदूर मॉरीशस में अपने पैर जमा सके।
“उपन्यास की एक पात्र धानी कहती है – “मैं धरती और आसमान से तो नहीं लड़ सकती लेकिन कुदाल से काम करना मुझे आता है” ( पथरीला सोना खंड तीन पृष्ठ 309 )
श्री धुरंधर जी का यह उपन्यास सन 1834 से लेकर 1912 तक के भारतीय श्रम शूरवीरों की जीवट कथा है, जिन लोगों ने मॉरीशस को अपनी कर्मभूमि बनाया। आज अपनी श्रम संस्कृति एवं कर्म बल से उन्होंने मॉरीशस की बंजर भूमि को उपजाऊ बनाया है एवं वहां की सरकार खुद उनकी सरकार है।
डॉ अमित कुमार गुप्ता एवं सुश्री ज्योति कुशवाहा द्वारा संपादित पुस्तक भारतीय संस्कृति के उन्नयन में प्रवासी साहित्यकार यह शीर्षक “मॉरीशस साहित्य का है।
#श्री_अभिमन्यु_अनत_युग” में प्रोफेसर रेखा पी मेमन एक गिरमिट गीत का उदाहरण देती है –
“सुन कहानी गिरमिटियन के।
काटे कलजन सुन सुन के
भइल मोहताज मजूरिया जब देशवा में,
फ़सलन मीठी बतिया दलालवा के,
पहुंचन मिरिचिया या जहाजी भाई बनन के,
गुलाम बनलन साहब गोरवन के,
मिलल झोपड़ियां हसवा पियासवासवा,
ओढ़ावन बिछावन पहनावा गोनिया के,
न सिक लीव न लोकल लिव न परब कोईई
बीतल समैय बांच चौपाइयां रामायण के,
बचाओलन धर्वा पूजा पाठ करके। ।
मॉरीशस के प्रख्यात नाटककार #श्री_सोमदत्त_बखोरी का एक नाटक “गुमान की गोली” जिसे डॉक्टर नूतन पाण्डेय जी की कृति “मरिशसीय हिंदी नाटक साहित्य और सोमदत्त बखोरी” के एक नाटक “गुमान की गोली” का एक पात्र सोमनाथ कहता है कि-
सोमनाथ : जिंदगी में ऐसी ऐसी ठोकर खाकर ही आंखें खुलती है। जिस क्रांति ने हमारे दिल में घर कर लिया है वह कब शांत होने वाली कवि में केवल रोने और गाने के गुण नहीं होते, कवि कल्पना का खिलौना नहीं, कवि समय आने पर निर्जीव हड्डियों में जान भी फूंक सकता है। आज तक मेरी कलम से कोमलता टपकती आई है। अब मैं चाहता हूं कि उसमें आग की लपटे निकले ताकि अन्याय, अनिति, शोषण दमन अत्याचार की दुनिया से हार कर मत जाए, ताकि हर एक मालिक समझ जाए कि गरीबों के ही भी पहलू में एक इंसान का दिल होता है ( पृष्ठ 118 )
रामदेव की रचना धर्मिता पुस्तक के अपने एक आलेख में डॉ. दीपक पांडेय सहायक निदेशक केंद्रीय हिंदी निदेशालय, नई दिल्ली एवं पूर्व द्वितीय सचिव ( भाषा – संस्कृति ) भारतीय उच्चायोग त्रिनिडाड एवं टोबैगो अपने आलेख शीर्षक “रामदेव धुरंधर की लघु कथाओं का वैशिष्टय” के (पृष्ठ 230 ) रामदेव धुरंधर की लघुकथा “घर एक बसेरा” के हवाले से लिखते हैं कि-
“किसी भी परिस्थिति में अपने कर्तव्यों से विमुख न होना मानव का लक्ष्य है। परिस्थितियों से पलायन किसी समस्या का समाधान नहीं है। बल्कि समस्याओं का सामना करना ही समस्याओं पर विजय प्राप्त करने का एकमात्र साधन है। “
उपरोक्त संदर्भों आलेखों को पढ़कर हम कह सकते हैं कि प्रवासी साहित्यकार अपने लिखे के माध्यम से उन प्रवासी जनों की बात करते हैं, जो कोई दूसरे नहीं बल्कि हमारे ही पूर्वज थे। जिन्होंने दूसरे देश जाकर के मौज मस्ती नहीं मनाई बल्कि उन्होंने एक बड़ा संघर्ष किया। संघर्ष इतना बड़ा था, जिसकी सीमाए नहीं थी। दिशाएं तय ही नहीं थी। संघर्ष का अंत कहां है, इसका पता उनको नहीं चल रहा था।
संघर्ष की सीमा तो समुद्र के भीतर पानी के जहाज में जब वे बैठे तो उन प्रवासी मजदूरों को भी नही समझ में आ रही थी, जहां दूर-दूर तक धरती ही नजर ही नहीं आ रही थी।
पानी के जहाज पर के तांबूल पर बैठे हुए पक्षी की मनोस्थिति कैसी होती है – इसे ऐसे ही जान सकते हैं कि जैसे उड़ जहाज को पंछी फिर जहाज पर आवे।
“जाना कहां-कहां है रुकना कुछ भी उनको पता नहीं”
ऐसी मन:स्थिति को मैंने अपनी कृति काव्य कथा विथिका ” के माध्यम से लिखा था –
[ इस रचना के शीर्षक का भाव मुझे मारीशस के हिंदी साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी के ऐतिहासिक उपन्यास पथरीला सोना से मिला ]
पत्थर के नीचे सोना होता है़ ……
*
भारत की संस्कृति और ताकत,
श्रम के श्वासों मेंं बसती है़।
सेवा और श्रम के इर्द गिर्द,
शीतल बयार बन बहती है़ ॥
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श्रम, सेवा का प्रतिमान बने,
हनुमान यहाँ पूजे जाते।
जन जन के मन मेंं बसते हैं,
वानर तन सुन्दर कहलाते ॥
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पत्थर की चाकी मेंं पिस कर,
रोटी का आटा बनता है।
छाते की नोको से घिस कर,
श्रमयोगी का भाल चमकता है़ ॥
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काली अधियारी स्याह भरी,
झोपड़ी मेंं सोना होता है़।
श्रमिको का भी संकल्प यही,
पत्थर के नीचे सोना होता है़।
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निर्धन माँ बाप के बेटे भी,
इस देश के मुखिया बनते हैं।
श्रम के सोपान पर चढ़ कर के,
भारत का भाग्य बदलते है़ ॥
*
श्रम, और समर्पण, राष्ट्र प्रेम,
मिल कर शक्ति बन जाती है़।
फिर सात समुन्दर पार पहुँच,
अपना परचम लहराती है़ ॥
राजेश कुमार सिंह “श्रेयस “
अवधी साहित्य के श्रेष्ठ साहित्यकार डॉ राम बहादुर मिश्र जी जब श्री रामदेव धुरंधर की एक कहानी ‘ वास्तविक रचनाकार” पर टिप्पणी करते हुए लिखते हैं –
भारतीय वाग्मय में इस बात की अवधारणा ही स्थापित की जाती है। धुरंधर जी ने भी लघुकथा की एक त्रासदी को सुखान्त बनाया है।
मॉरीशस के भारतीय उच्चायोग में द्वितीय सचिव ( भाषा एवं संस्कृति ) के पद पर रह चुकी डॉ नूतन पाण्डेय, सहायक निदेशक केंद्रीय हिंदी निदेशालय नई दिल्ली, प्रवासी साहित्यकारों के योगदान के विषय में लिखती हैं कि-
हम अतीत में न जाकर अब मॉरीशस में हिंदी के प्रचार प्रसार की बात करते हैं। फ्रेंच और ब्रिटिश उपनिवेशवादियों के द्वारा एग्रीमेंट के तहत भारतीयों को गिरमिटिया मजदूर के रूप में कर 1834 में मॉरीशस दीप में लाया गया था। मॉरीशस पहुंचे भारतीय मजदूर ने इस अपरिचित दीप में भारतीय भाषा और संस्कृति के जो बीज रोपे थे वे वट वृक्ष बनकर हिंदी साहित्य को ऑक्सीजन पहुंचाने का दायित्व निभा रहे हैं।
इन सभी बातों और इन सभी आलेखों के आधार पर हम कह सकते हैं कि –
भारत से गिरमिटिया देश पहुंचे भारतीय मजदूरो ने प्रत्येक क्षेत्र में एक बड़ी जमीन तैयार की, जहां आज भी भारतीय कला, संस्कृति, संस्कार और साहित्य की सुगंध महसूस की जा सकती है।
हम भारतीय उनके ऋणी है, तथा उनके संघर्ष को नमन करते हैं कारण की उन्होंने एक बहुत बड़ा कार्य किया। ऐसा भी होता कि वह किसी देश में जाते, अभावो के साथ जाते और फिर वहां एक लुप्त प्राय समूह बनाकर रह जाते। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया, उन्होंने तो ऐसा कर दिया कि हमारा सीना गर्व से ऊंचा हो गया। उन्होंने ऐसे कई देशों में जाकर न सिर्फ भारतीय संस्कृति और भारतीयता का बीज रोपण किया, बल्कि स्वयं को एक विशाल वट वृक्ष की तरह से स्थापित किया।
आज भी उनके वंशज अपने कलम के दम पर, हमारी भाषा संस्कृति और सभ्यता के साथ कदम ताल करते हुए चल रहे है। यह कम गौरव की बात नहीं है।
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© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”
लखनऊ, उप्र, (भारत )
दिनांक 05 अगस्त 2025
≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





