श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # २८ ☆

☆ लघुकथा ☆ ~ लेखक की बेशकीमती संपत्ति ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

लेखक की संपन्नता देखकर कुछ लोग उससे ईर्ष्या किया करते थे। वे लेखक की संपत्ति का आकलन कर पाने में स्वयं को अक्षम पाते थे।

लेखक के परिजन इस बात से बेखबर और मन ही मन निराश रहते थे कि लोग उसके पिता के किस संपत्ति की बात करते हैं। पिता नें मरने के काफी दिनों बाद तक लेखक के पुत्रों में यह चर्चा होती थी कि आखिर उसके पिता नें वह बहुमूल्य संपत्ति कहां छुपा रखी है जिसकी बात अक्सर आम लोगो में होती रहती है।

कुछ रहस्यमयी एवं गूढ चीजों की तलाश में विदेशी विद्वानो एवं राजनायिको का प्रतिनिधि मंडल लेखक के शहर में आया था।

लेखक के घर के चारों तरफ की सुरक्षा कड़ी कर दी गई। आला अधिकारियों आना-जाना शुरू हो गया। घर को पूरी तरह से सरकारी कब्जे में ले लिया गया। घर के सभी लोगों की सिक्योरिटी चेकिंग की जा चुकी थी। लेखक के परिजन अभी इस बात से अनभिज्ञ थे कि उनके साथ ऐसा क्यों हो रहा है। इसी बीच उन्होंने किसी अधिकारी को यह कहते हुए सुना कि इस घर के लोगों के पिता के पास एक ऐसी बेशकीमती चीज है, जो शायद विश्व के किसे लेखक के घर या किसी लाइब्रेरी में नहीं है।

कुछ ही घंटे बाद गाड़ियों का काफिला लेखक के घर के सामने आकर रुका। मुश्किल से तीन या चार लोग लेखक के अध्ययनशाला में प्रवेश किये। जिसमें स्थानीय अधिकारी एवं कुछ विदेशी विद्वान थे। लेखक की अलमारी में रखी हुई एक पुस्तक से कुछ पंक्तियों के तस्वीर उतारते हुए, लेखक के घर पधारे प्रतिनिधियों नें लेखक के पुत्र -पुत्रियों से बड़े ही अदब के साथ भेंट की। साथ ही साथ कुछ बेशकीमती चीजे एवं उपहार भेंट करते हुए उनके साथ फोटो भी खिंचवाई।

अगले दिन यह खबर देश-विदेश के अखबार के पन्नों में थी कि अमुख बेशकीमती साहित्यिक दस्तावेज स्वर्गीय फलां (लेखक का नाम) के घर से प्राप्त किए गए। यह वैश्विक साहित्य जगत की बड़ी उपलब्धि है।

लेखक के परिजनों को अब अपनें स्वर्गीय लेखक पिता की वास्तविक संपन्नता का भान हो चुका था।

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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