श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “दोषारोपण…“।)
अभी अभी # १०८६ ⇒ आलेख – दोषारोपण
श्री प्रदीप शर्मा
दोष एक ऐसा पौधा है, जिसे कभी अपने आँगन में लगाया नहीं जाता, इसके लिए किसी दूसरे के घर की मिट्टी तलाशी जाती है। वहाँ यह बहुत फलता-फूलता है। कौन कब किसी पड़ोसी के घर पौधारोपण करता है। हाँ, अगर दोष का पौधा हो, तो खाद मिट्टी की व्यवस्था भी की जाती है।
हम हरे भरे उपवन को उजाड़ कंक्रीट का जंगल बना देते हैं, खेती की जगह औद्योगिकरण को बढ़ावा देते हैं, मज़दूर की जगह मशीन से काम लेने लगते हैं, तो पर्यावरण दूषित होता है। अधिक सड़कें, मॉल और फ्लाईओवर बनाने पड़ते हैं। जब यह सब हो जाता है, तब हमें पौधारोपण का ख्याल आता है और हम भावुक होकर पितृ पर्वत की ओर दौड़ पड़ते हैं।।
दोष किसमें नहीं ! लेकिन जिस तरह आईना सिर्फ चेहरे को देखता है, गुण दोषों को नहीं, हमें भी स्वयं में दोष नज़र नहीं आते। कबीर इंसान नहीं थे ! उन्हें दूसरों में नहीं, स्वयं में दोष नज़र आते थे। वे कहते हैं;
बुरा जो देखन मैं चला, मुझसे बुरा न कोय
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय
लो जी ! कोई खुद पर भी दोषारोपण करता है ? दोषारोपण और करारोपण हमेशा दूसरों पर ही किया जाता है। सभी दोषमुक्त और करमुक्त होने की फिराक में रहते हैं।।
भारत रत्न सचिन जैसे क्रिकेट-रत्न पर लोग आरोप लगाते हैं कि झुमाकर द्वारा भेंट की गई फरारी वे करमुक्त करवाकर ले आए। लो जी ! ये भी कोई बात हुई। फर्राटा कार चलाने वाले झुमाकर ने फर्राटेदार रन बनाने वाले सचिन को सम्मान-स्वरूप जो फर्राटा-फरारी कार भेंट की, उस पर भी करारोपण ? घोर कलयुग ! सचिन कार कमाकर नहीं लाए, भेंट में लाए। केबीसी को छोड़कर बहुत से राष्ट्रीय पुरस्कार करमुक्त होते हैं। सम्मान और करारोपण कभी साथ साथ नहीं चलते। मनोजकुमार की अधिकांश देशभक्ति की फिल्में मनोरंजन कर से मुक्त रहती थी। एक तो फ़िल्म में मनोरंजन नहीं, ऊपर से मनोरंजन कर। और जो इसका विरोध करे, उस पर दोषारोपण।
कुछ तो लोग कहेंगे ! लोगों का काम है कहना। आप तो करते रहिए, आपको जो करना। हाथी जब वन-वे में बाज़ार में चलता है, तब उसका चालान नहीं कटता। कोई ट्रैफिक का सिपाही अगर उसको देख सीटी बजाता है, तो लोग हँसते हैं।
हाथी को कानून सिखा रहा है। ज़रा उसके पास तो जाकर देख।।
हमारे देश में पिछले 70 वर्षों से विपक्ष, सत्ता-पक्ष पर दोषारोपण कर रहा था। दोष का वृक्ष इतना पनपा, कि विपक्ष ही सत्ता-पक्ष हो गया। आज सत्ता-पक्ष विपक्ष पर दोषारोपण कर रहा है। एक दूसरे पर दोषारोपण को हम आगे चलकर राष्ट्रीय दोषारोपण दिवस के रूप में मना सकते हैं।
अगर एक नेता और कुशल प्रशासक, विपक्ष के विरोध और दोषारोपण की ओर ध्यान देगा तो उसे कभी अनुच्छेद 370 और 35-ए नज़र नहीं आएँगे। अगर राजनीति में द्रोणाचार्य जैसा गुरु होगा तो अर्जुन को सिर्फ़ मछली की आँख ही नज़र आएगी। कश्मीर अब स्वर्ग हुआ है, Let opposition go to hell. द्रोणाचार्य उवाच।।
दोस्तों के साथ पौधारोपण हो, लेकिन अगर कभी दुश्मन के घर जाएँ, तो दोषारोपण अवश्य करके आएँ। इस मामले में आनंद बख्शी साहब कुछ ज़्यादा ही तल्ख़ थे।
मेरे दुश्मन, तू मेरी दोस्ती को तरसे !
तू फूल बने पतझड़ का,
तुझ पर बहार न आए कभी।
लगता था, मानो पाकिस्तान में दोषारोपण करके आए हों।।
© श्री प्रदीप शर्मा
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