श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “डिक्टेशन।)

?अभी अभी # 526 ⇒ डिक्टेशन ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

अगर इस अंग्रेजी शब्द का डिसेक्शन अथवा चीर फाड़ की जाए तो आप किसी को डिक्टेट भी कर सकते हैं। समझने वाले भले ही इसे तानाशाही समझें, लेकिन साधारण शब्दों में आप जैसा बोल रहे हैं, वैसा अगर सामने वाला लिखता जाए, तो यह डिक्टेशन हो जाए।

डिक्टेशन शब्द में आदेश देने की बू भी आती है। जब कि अगर प्रेम से बोला जाए, तो मैं बोलूं, तू लिखते जा, ही इस अंग्रेजी शब्द का हिंदी अर्थ होता है।।

आज तो हर बोला हुआ आसानी से रिकॉर्ड हो जाता है, वॉइस स्पीच विधा भी हमारे पास उपलब्ध है, मैं तब की बात कर रहा हूं, जब कक्षा में नोट्स लिखवाए जाते थे। बस उधर से आदेश होता था, चुपचाप बैठे मत रहो, कॉपी कलम निकालो, और जो हम बोल रहे हैं, उसे नोट करो। इट्स इंपॉर्टेंट।

डिक्टेशन हिंदी में भी हो सकता है और अंग्रेजी में भी। जिसे जो भाषा आती है, वह उसी में डिक्टेशन ले सकता है। यह संभव नहीं कि कोई अंग्रेजी में बोल रहा हैं, आपको अंग्रेजी नहीं आती, तो आप हिंदी, उर्दू, मराठी अथवा गुजराती में ही डिक्टेशन ले लो।।

जैसा बोला जाए, वैसा ही सुना जाए, समझा जाए, और लिखा जाए, यानी सुनो, समझो और नोट करो, यही डिक्टेशन का अर्थ हुआ। लेकिन इतनी कसरत क्यों, क्या डिक्टेशन के लिए क्या हिंदी में कोई शब्द नहीं है।

किसी के साथ कदम से कदम मिलाकर चलना अथवा मिलकर गीत गाना, जितना आसान है, उतना ही कठिन है, किसी के बोले हुए को उसी गति में लिखते जाना, शायद इसीलिए पिटमैन ने शॉर्ट हैंड यानी आशु लिपि का आविष्कार किया। कुछ कुछ उर्दू जैसी सांकेतिक भाषा में द्रुत गति में पहले लिखना और बाद में उसे टाइपिंग करना ही एक स्टेनोग्राफर का मुख्य दायित्व होता था।।

आज की तारीख में यह विधा तो छोड़िए, मोबाइल में गूगल आपको अनुवाद भी कर देगा, भाषा उसके लिए कोई समस्या नहीं। अनुवाद की समस्या पर एक जमाने में कई ग्रंथ लिखे गए हैं, लेकिन डिक्टेशन की समस्या का निदान कभी किसी ने नहीं सुझाया।

महाभारत महाकाव्य के लिपिबद्ध होने की कहानी भी बड़ी रोचक है। कुछ कुछ, जब तक आप बोलते जाओगे, मेरी कलम चलेगी, की तरह। इधर वेदव्यास जी महाराज रुके, और उधर गणेश जी का फाइनल फुल स्टॉप।।

हिंदी में डिक्टेशन लेने में शायद इतनी समस्या नहीं आती है, जितना अंग्रेजी में आती है। हां अगर बोलने वाले का ही अगर उच्चारण दोष है तो डिक्टेशन लेने वाले का नहीं दोष गुसाईं।

सबकी अंग्रजी इतनी अच्छी भी नहीं होती। जैसा सुनते हैं, समझते हैं, वैसा लिख लेते हैं। अगर कोई, I have to say को eye have two say लिख मारे तो आप अपना सर कहां दे मारेंगे।।

हमारे कॉलेज में अंग्रेजी की कक्षा में ऐसी कई कॉपियां मौजूद थीं, अगर उनको चेक किया जाए, क्या सुना, क्या, समझा, और क्या लिखा तो समझिए बस महाभारत शुरू हो जाए।

लव की स्पेलिंग luv भी हो सकती थी और मैरिज की mirage. Come here को come hear लिखने वाले भी कम नहीं थे। अगर किसी ने, I don’t know को, I don’t no लिख दिया, तो क्या आप उसे फांसी पर चढ़ा दोगे।

कुछ छात्र, जिनके लिए अंग्रेजी किसी ग्रीक और लैटिन भाषा से कम नहीं थी, वे निश्चिंत होकर कॉपी में कुछ कविता, शायरी अथवा चित्र बनाया करते थे। बाद में यही विधा उन्हें आगे काम आई, अंग्रेजी नहीं।

हम भले ही भाषा को भासा बोलें, लेकिन हमारे भाव शुद्ध हैं और हमें अपनी मातृ भाषा से बहुत प्रेम है। अगर कोई विदेशी भाषा हम पर जबरदस्ती थौंपी जाएगी, तो हम इसी तरह उसकी ऐसी तैसी, क्या कहते हैं उसे हिंदी में, Teeth for tat, यानी जैसे को तैसा करते ही रहेंगे।

Eye loves you. Thank you.

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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